या पृथ्वी सच में शेषनाग पर टिकी हुई है ? क्या है इसका वैज्ञानिक रहस्य ?

क्या पृथ्वी सच में शेषनाग पर टिकी हुई है ? क्या है इसका वैज्ञानिक रहस्य ?


क्या पृथ्वी सच में शेषनाग पर टिकी हुई है ? चंद्रमा, आंतरिक्ष-स्टेशनो और सेट्लाइट से लिये गये पृथ्वी के फोटो में तो कोई भी शेषनाग (सर्प) दिखाई नहीं देते है फिर पुराणों और ग्रंथों में ऐसा क्यों कहा गया है कि पृथ्वी शेषनाग पर टिकी हुई है ?


इस विषय में श्रीरामचरित्रमानस, यथार्थ-गीता और भागवत-पुराण तीनों में बात की गयी है । यथार्थ-गीता के 10 अध्याय के 29 वे श्लोक के अनुसार, भागवत-पुराण में यह बताया गया है कि ‘पृथ्वी सरसों की दाने की तरह शेषनाग-नामक सर्प के ऊपर टिकी हुई है’ ।


इसी विषय में श्रीरामचरित्रमानस के बालकांड-दोहा-72 के दूसरे चौपाई में आया है कि :- …
तपबल संभु करहिं संघारा । तपबल सेषु धरइ महिभारा ॥ भावार्थ:- शेषजी तप के बल से ही पृथ्वी का भार धारण करते हैं॥2॥…….. ….. .


इस विषय का वैज्ञानिक तर्क निम्न प्रकार से है । हमारी पृथ्वी, 8 ग्रहों और सूर्य सहित सौरमंडल में स्थित है । यह सौरमंडल, अनेकों तारों सहित आकाशगंगा नामक मंदाकिनी में स्थित है । इस आकाशगंगा नामक मदाकिनी का आकार सर्पिलाकार (सर्प+अकार) है । शेषनाग वास्तव में तों एक सर्प ही तो है । हम सभी इस मंदाकिनी के शिकारी भुजा अर्थात मुख (ओरायन-सिग्रस) के पास स्थित है ।


हमारे सत्य-सनातन-धर्म के ॠषि-मुनी, आज के वैज्ञानिकों से अधिक ज्ञाता और योग्य थे । वे अपनी शक्ति से इस पृथ्वी लोक को छोड़कर अन्य लोकों में (एलियन-लोक) में विचरण करने में सक्षम थे । वे इस मंदाकिनी से बाहर जाकर, अकाशगंगा और पृथ्वी के स्थिति और अकार को स्पस्ट रुप में देखने में पुर्णतः सक्षम थे । वह यह भी देख सकते थे कि सर्प के अकार रुपी मंदाकिनी में, पृथ्वी सरसों के दाने की भाँति प्रतीत हो रही है ।


सौरमंडल के आकार औऱ मन्दाकिनी के आकार के संदर्भ में विज्ञान में आया है कि यदि सौरमण्डल को एक रुपया का सिक्का मान लिया जाय तो मन्दाकिनी का क्षेत्रफ़ल सम्पूर्ण भारत का 1.5 गुना होगा । इस अनुपात को शास्त्र भी मानता है ।


अकाशगंगा और पृथ्वी के इस अदभुत संरचना को असानी से समझाने के लिये, हमारे महर्षियों ने सर्प-माडल (शेषनाग-माडल) का नाम दे दिया था जैसे कि परमाणु-संरचना को समझाने के लिये जेजे टामसन ने तरबूज-माडल का नाम दे दिया था ।

Does the earth really rest on Sheshnag? What is its scientific secret?


Does the earth really rest on Sheshnag? No Sheshnag (serpent) is visible in the photos of the Earth taken from the Moon, Inner-stations and Satellites, then why is it said in the Puranas and texts that the Earth rests on Sheshnag?


This subject has been talked about in all three of Shri Ramcharitmanas, Reality-Gita and Bhagwat-Purana. According to the 29th verse of Chapter 10 of the Reality-Gita, it has been told in the Bhagavata-Purana that ‘the earth rests like a grain of mustard on a serpent named Sheshnag’.


In this subject it has come in the second chapter of Balkand-Doha-72 of Shri Ramcharitmanas that :- …
Tapabal sambhu karhin sanghara. Tapbal Seshu Dharai Mahibhara. Meaning:- Sheshji bears the weight of the earth only by the power of tenacity.


The scientific reasoning for this topic is as follows. Our Earth is located in the Solar System including 8 planets and the Sun. This solar system, with many stars, is located in a galaxy called a galaxy. The shape of this galaxy named Madakini is spiral (snake + shape). Sheshnag is actually a snake. All of us are situated near the hunter arm of this galaxy, that is, the mouth (Orion-Sigus).


The sages of our Satya-Sanatan-Dharma were more knowledgeable and capable than today's scientists. With his power, he was able to leave this earth and roam in other worlds (alien-lokas). He was able to go out of this galaxy and see clearly the position and size of the galaxy and the earth. He could also see that in the snake-shaped Mandakini, the earth looked like a mustard seed.


In the context of the size of the solar system and the size of the Mandakini, it has come in science that if the solar system is considered to be a one rupee coin, then the area of ​​the Mandakini will be 1.5 times that of the whole of India. Shastra also accepts this ratio.


To explain this amazing structure of galaxy and earth easily, our sages gave the name of snake-model (Sheshnag-model) like JJ Thomson gave the name of watermelon-model to explain atomic structure. .

Author: Sanatan Dharm and Hinduism

My job is to remind people of their roots. There is no black,white any religion in spiritual science. It is ohm tat sat.

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