गजनी अफगानिस्तान-यदुवंशीभाटियों के पूर्वजो ने यहां तीनहजार साल राज किया

गजनी अफगानिस्तान-यदुवंशी, भाटियों के पूर्वजो ने यहां तीनहजार साल राज किया

नवरात्रि के दिन चल रहे हैं, देवी स्वरूपों के दर्शन करते-करते, देश-दुनिया के संग्रहालयों में रखी देवी मूर्तियों के विभिन्न स्वरूप भी ध्यान आकर्षित करते हैं, कितने कुशल कारीगर थे और कितनी श्रद्धा भक्ति से उन्हें मंदिरों में स्थापित करा गया था, आज खण्डित होकर भी उनमें सम्मोहन शक्ति मौजूद है। ऐसी ही देवी की एक खण्डित मूर्ति, काबुल संग्रहालय की तस्वीरों में देखने को मिलती है जो 80 के दशक में गजनी शहर के पास उत्खनन में मिली थी। इस मूर्ति के प्रति जैसलमेरी होने से आकर्षण और भी बढ़ जाता है क्योंकि जैसलमेर के इतिहास में अफ़ग़ानिस्तान के गजनी का महत्वपूर्ण स्थान है। यदुवंश की पौराणिक राजधानियों से ऐतिहासिक राजधानियों का जुड़ाव इस गजनी शहर में ही होता है, जैसलमेर में मान्यता है की यदुवंशी राजा गज ने वहाँ दुर्ग की स्थापना करी थी और उसे यदुवंश की चौथी राजधानी बनाकर गजनी नाम दिया था , जिसे बाद में खुरासान(ख़्वारिज्म) और रुम(बायजेंटियम) के संयुक्त मोर्चे ने जीत लिया था। आज भी 10वी सदी से पहले के ऐतिहासिक साक्ष्यों की कमी के कारण कुछ इतिहासकार गजनी से जैसलमेर के जुड़ाव को किंवदंती मानकर अस्वीकार कर देते हैं। लेकिन एक सदी पूर्व तक जैसलमेर के विभिन्न समाजों और व्यापार के सम्बन्ध उस शहर से थे, जैसलमेर से बुखारा-मध्य एशिया जाने वाले प्रमुख व्यापारिक मार्ग पर यह महत्वपूर्ण पड़ाव था। विभिन्न प्राचीन पुस्तकों और आधुनिक पुरातात्विक खोजों से गजनी के इतिहास के कुछ रोचक तथ्यों के बारे में जानकारी मिलती है जो इस प्रकार है-

  1. गजनी का सबसे प्राचीन उल्लेख यूनानी(ग्रीक) भूगोलविद पटोल्मी द्वारा दूसरी ईस्वी शताब्दी में अपनी किताब जीयोग्राफिया में मिलता है, जहाँ इसका यूनानी भाषा मे नाम ग़जका लिखा गया है।
  2. ईस्वी वर्ष 629 में चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनत्सांग इस शहर में रुका था, अपने आलेखों में उसने चीनी भाषा में इसका नाम हो-सी-ना लिखा है, जो रेशम मार्ग पर एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था।
  3. ईस्वी वर्ष 950 में गजनी का उल्लेख भारत के महत्वपूर्ण स्मृद्ध व्यापारिक केंद्र और बिना बगीचों वाले खूबसूरत शहर के रूप में, बग़दाद के यात्री अबू ईशाक ईब्राहिम ईश्तकारी ने अपनी किताब, किताब-अल-मसलिक-वल-मामलिक में करा है।
  4. ईस्वी वर्ष 988 में अरबी लेखक इब्न हवकाल ने अपनी किताब सूरत-अल-अर्ज में वर्ष 961 से 966 ईस्वी तक गजनी पर तुर्क योद्धा अल्प्टिजिन के घेरे व हमले के बाद विध्वंस का जिक्र करा है, लेकिन फिर भी यह व्यापार का मुख्य केंद्र था और तुर्क समुदाय का मुख्य गढ़ बन चुका था।
  5. उन्ही वर्षों में लिखी फारसी किताब हुदूद-अल-आलम में ग़ज़नी का उल्लेख मिलता है जो उस वक्त तक खोरासान के दक्षिण-पूर्व में सीमांत बामियान प्रान्त के अधीन था और महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था इसका उपनाम फ़ूर्दत-अल-हिन्द था जिसका मतलब भारत का व्यापारिक केंद्र होता है। इस किताब में इसे ग़जना नाम से उल्लेखित करा गया है और इस किताब के लेखन के समय अल्पतजिन की मृत्यु के बाद उसके दास सबुक्तजिन को गद्दी पर बैठाया जा चुका था।
  6. इसके बाद सबुक्तजिन के उत्तराधिकारी, महमूद के शासनकाल में गजनी एक शक्तिशाली साम्राज्य की राजधानी के रूप में उभरा, जिसका उल्लेख महमूद के दरबारियों की किताबों में उल्लेखित हैं, विशेषकर अल-बेरुनी की किताब-उल-हिन्द में।
  7. लेकिन गजनी का वह वैभव एक सदी में ही खत्म होने लगा जब गुर के शासक हुसैन जहाँसोज ने ईस्वी वर्ष 1151 में शहर को आग के हवाले कर दिया।
  8. लेकिन एक बार फिर से यह नगर भारत के व्यापारियों से गुलजार हो गया और इसकी स्मृद्धि ने ईस्वी वर्ष 1221 में मंगोलों के हमले को प्रेरित करा, जिसका उल्लेख अरबी लेखक याकूत-अल-हमवी की किताब, किताब मुज्ज्म-अल-बुलदान में मिलता है।
  9. ईस्वी वर्ष 1332 में इब्नबतूता के समय यह शहर भूतहा खण्डहर बन चुका था और यहाँ रहने वाले कुछ हजार लोग भी सर्दियों में इसे छोड़कर कंधार चले जाते थे।
  10. ईस्वी वर्ष 1504 में बाबरनामा में इसका उल्लेख मिलता है, जहाँ बाबर आश्चर्य व्यक्त करता है कि रेशम मार्ग के इस महत्वपूर्ण पड़ाव को हिंदुस्तान और खुरासान के राजाओं ने कभी राजधानी क्यों नहीं बनाया, शायद उसे इसके इतिहास की सही जानकारी नहीं थी।
  11. यही आश्चर्य ईस्वी वर्ष 1832 में इसे पहली बार देखने वाले यूरोपीय यात्री चार्ल्स मैसन ने भी अपने यात्रा विवरण में व्यक्त करा है।
  12. ईस्वी वर्ष 1839 में सदियों से जीर्ण शीर्ण प्राचीन दुर्ग, खण्डहरों और इमारतों को अंग्रेजी फौज ने प्रथम अंग्रेज-अफ़ग़ान युद्धों में गोला बारूद से काफी नुकसान पहुँचाया था।
  13. आधुनिक काल मे 1960 से 2003 तक ईटली के पुरातत्वविदों की टीम ने जियोवानी वेरार्दी के निर्देशन में उत्खनन कार्य करे और नगर के प्राचीन इतिहास विशेषकर 6ठी सदी काल के कुछ अवशेष खोज निकाले, जिनमें प्राचीन दुर्ग के पास सरदार टेपे नाम के टीले से ईसा की दूसरी शताब्दी काल में कुषाण काल में बने महाराज कनिक विहार नाम के बौद्ध विहार और स्तूप के अवशेष, 15 मीटर लम्बी बुद्ध की लेटी मूर्ति के अवशेष, विभिन्न मूर्तियाँ, एक अन्य स्थान पर शिव मंदिर के अवशेष, दुर्गा जी की विशाल मूर्ति का सिर और महिषासुर की मूर्ति के अवशेष मिले।

इन विवरणों से यह स्पष्ट है कि गजनी ईसा की दूसरी शताब्दी में कुषाण काल में स्थापित हो चुका था और इसकी ख्याति महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र के रूप में यूनान तक पहुँच चुकी थी। जैसलमेर के इतिहास पर शोध करने वाले इतिहासकारों से विनती है गजनी के दूसरी शताब्दी से नौंवी शताब्दी तक के इतिहास को प्राचीन फ़ारसी, अरबी, चीनी, बाइजेंटाइन, आर्मेनियन, तुर्की ग्रन्थों और विदेशी पुरातत्वविदों के सहयोग से प्राप्त कर नई जानकारियों से यदुवंश के इतिहास की गुमशुदा कड़ियों पर खोजबीन करने की।

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Author: Sanatan Dharm and Hinduism

My job is to remind people of their roots. There is no black,white any religion in spiritual science. It is ohm tat sat.

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