ईश्वर कैसा है,कहाँ रहता है,उसका रंग कैसा है,कोई उसका रूप या हुलिया तो बताइये?जब तक इन बातों का ज्ञान न हो जाय,तब तक अपने प्रियतम को कैसे पहचाने?कैसे समझे कि हम किसके दर्शन कर रहे हैं या हमें दर्शन हो गए?याज्ञवल्क्य ने एक बार गार्गी से कहा था-“ब्रह्म के जाननेवाले उसे अक्षर,अविनाशी,कूटस्थ कहते हैं।वह न…
— Read on pparihar.com/2022/07/18/god-in-vedas/

Future Badrinath and God Narsimha of Joshimath connection


Badrinath finds mention in the first chapter of second skanda of ‘Skanda Purana’.

The 57th shloka says, “The Ashram of lord Narayan was called ‘Muktipada’ in Satyuga, ‘Yogasiddha’ in Treta, ‘Vishal’ in Dwapar and ‘Badrikaashram’ in Kaliyug.”

In Vaman Purana, sage Pulastya says that ‘Dharma’ the divine body, manifested from the heart of Lord Brahma and married to ‘Murti’, daughter of Daksh. She gave birth to 4 sons, 2 of them being Nar and Narayan. Nar and Narayan reached Badrinath and performed penance.

It is believed that this is the same place where Ved Vyas compiled the Vedas and wrote Purans assisted by Bhagwan Ganesh. In Dwapar, Pandavas along with Draupadi too visited here when they were on their ascent to heaven (Swargarohini yatra).

According to Hindu scriptures, Bhakt Narad got salvation in Badrinath and the sages like Gautam, Kashyap and Kapil, who was himself the incarnation of lord Vishnu…

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Ayodhya and Ram in Atharved

Ayodhya and Ram and Atharv Veda


Ayodhya founded by Manu, in Atharva Veda called City of the Gods, capital of solar dynasty and Ikshvakus, Sarayu great river in Rigveda.

Ayodhyā (Hindi: अयोध्या) is an ancient city of India, the old capital of Awadh, in the current Faizabad district of Uttar Pradesh. Ayodhya is the birth place of Hindu God Shri Ram, and the capital of Kosala Kingdom. This Hindu holy city is described as early as in the Hindu Epics. During the time of Gautama Buddha the city was called Ayojjhā (Pali). Under Muslim rule, it was the seat of the governor of Awadh, and later during the British Raj the city was known as Ajodhya or Ajodhia and was part of the United Provinces of Agra and Oudh, it was also the seat of a small ‘talukdari’ state. It is on the right bank of the river Sarayu, 555 km east…

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Brahm Sutra -Part 3


Chapter IV, Phala-Adhyaya Section 1

In the Third Chapter, the Sadhanas or the means of knowledge relating to Para Vidya (higher knowledge) and Apara Vidya (lower knowledge) were discussed. The Fourth Chapter treats of Phala or the Supreme Bliss of attainment of Brahman. Other topics also are dealt with in it. In the beginning, however, a separate discussion concerned with the means of knowledge is dealt with in a few Adhikaranas. The remainder of the previous discussion about Sadhanas is continued in the beginning. As the main topic of this Chapter is that of the results or fruits of Brahma Vidya, it is called Phala Adhyaya.


Adhikarana I: (Sutras 1-2) The meditation on the Atman enjoined by scripture is not an act to be accomplished once only, but is to be repeated again and again till knowledge is attained.

Adhikarana II: (Sutra 3) The meditator engaged in meditation on…

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what happened to the famous towns of #Ramayana like #Ayodhya, #Chitrakoot, #Kishkindha

It is important to know what happened to the famous towns of #Ramayana like #Ayodhya, #Chitrakoot, #Kishkindha after all?

So that we also remember the atrocities against ourselves like the Jews…

🔸1 #Ayodhya :- In the capital of Shri Ram and Raghuvansh, it was attacked by Muslim invader Balban in the year 1270. Balban destroys all temples in Ayodhya, women and children auctioned in objectionable conditions at the intersection between the city where Ramrajya was founded. These temples were reconstructed by the queen of Indore Ahilyabai Holkar.

🔸2. #Ganga_River_Bore :- This was the bank near which Shri Ram killed Tadka and rescued the sages. At the time of 1760, when Ahmed Shah Abdali entered India and Indian Muslims helped him reach the river Ganges. Then Abdali cut the head of 1 thousand cows and flowed in the same river Ganga to burn the Marathas.

🔸3. #Chitrakoot :- Shri Ram stayed in Chitrakoot during exile which was captured by Alauddin Khilji in 1298. 5 thousand men killed, thousands of women sent to the Haram of Alauddin Khilji and temples destroyed. Ranoji Scindia rescued this city again in 1731.

🔸4. #Nasik: – The place where Laxman ji cut the nose of Shurpankha and which was the workplace of Shri Ram. It was attacked by Muhammad bin Tughlak, Tulgak set fire to a Shiva temple built by Lord Shri Ram in Nashik and killed for 12 days. Nashik residents were appealed to accept Islam or be ready to die. Later Sambhaji Maharaj, son of Chhatrapati Shivaji Maharaj re-established these temples.

🔸5. #Kishkindha: – State of Monkey Raj Maharaj Sugriva, which was called Vijaynagar Empire by moving forward. In 1565, Vijayanagar empire was defeated in the war of Talikota and Muslims burnt the whole state, you still search Hampi in Google, its huge residue will be seen today, which shows how grand India was before Muslims. But religious fire burned everything to ashes. Later the Yaduvanshi of Mysore rescued it again.

This is how our Ramayana era city was looted and rebuilt.

पैगम्बर मोहम्मदराचीन अरबी काव्य संग्रह गंथ ‘सेअरूल-ओकुल , शिवलिंग ,काबा में स्थित महाकाय शिवलिंग (संगे अस्वद) ,

ईराक की एक पुस्तक है जिसे ईराकी सरकार ने खुद छपवाया था। इस किताब में 622 ई से पहले के अरब जगत का जिक्र है।

आपको बता दें कि ईस्लाम धर्म की स्थापना इसी साल हुई थी। किताब में बताया गया है कि मक्का में पहले शिवजी का एक विशाल मंदिर था जिसके अंदर एक शिवलिंग थी जो आज भी मक्का के काबा में एक काले पत्थर के रूप में मौजूद है। पुस्तक में लिखा है कि मंदिर में कविता पाठ और भजन हुआ करता था।

प्राचीन अरबी काव्य संग्रह गंथ ‘सेअरूल-ओकुल’ के 257वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद से 2300 वर्ष पूर्व एवं ईसा मसीह से 1800 वर्ष पूर्व पैदा हुए लबी-बिन-ए-अरव्तब-बिन-ए-तुरफा ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता में भारत भूमि एवं वेदों को जो सम्मान दिया है, वह इस प्रकार है-

“अया मुबारेकल अरज मुशैये नोंहा मिनार हिंदे।
व अरादकल्लाह मज्जोनज्जे जिकरतुन।1।
वह लवज्जलीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जिकरा।
वहाजेही योनज्जेलुर्ररसूल मिनल हिंदतुन।2।
यकूलूनल्लाहः या अहलल अरज आलमीन फुल्लहुम।
फत्तेबेऊ जिकरतुल वेद हुक्कुन मालन योनज्वेलतुन।3।
वहोबा आलमुस्साम वल यजुरमिनल्लाहे तनजीलन।
फऐ नोमा या अरवीयो मुत्तवअन योवसीरीयोनजातुन।4।
जइसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-खुबातुन।
व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।5।”

(1) हे भारत की पुण्य भूमि (मिनार हिंदे) तू धन्य है, क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना।
(2) वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश, जो चार प्रकाश स्तम्भों के सदृश्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, यह भारतवर्ष (हिंद तुन) में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुआ।
(3) और परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे ज्ञान है, इनकेअनुसार आचरण करो।
(4) वह ज्ञान के भण्डार साम और यजुर है, जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए, हे मेरे भाइयों! इनको मानो, क्योंकि ये हमें मोक्ष का मार्ग बताते है।
(5) और दो उनमें से रिक्, अतर (ऋग्वेद, अथर्ववेद) जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते है, और जो इनकी शरण में आ गया, वह कभी अन्धकार को प्राप्त नहीं होता।

इस्लाम मजहब के प्रवर्तक मोहम्मद स्वयं भी वैदिक परिवार में हिन्दू के रूप में जन्में थे, और जब उन्होंने अपने हिन्दू परिवार की परम्परा और वंश से संबंध तोड़ने और स्वयं को पैगम्बर घोषित करना निश्चित किया, तब संयुक्त हिन्दू परिवार छिन्न-भिन्न हो गया और काबा में स्थित महाकाय शिवलिंग (संगे अस्वद) के रक्षार्थ हुए युद्ध में पैगम्बर मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम को भी अपने प्राण गंवाने पड़े।

उमर-बिन-ए-हश्शाम का अरब में एवं केन्द्र काबा (मक्का) में इतना अधिक सम्मान होता था कि सम्पूर्ण अरबी समाज, जो कि भगवान शिव के भक्त थे एवं वेदों के उत्सुक गायक तथा हिन्दू देवी-देवताओं के अनन्य उपासक थे, उन्हें अबुल हाकम अर्थात ‘ज्ञान का पिता’ कहते थे। बाद में मोहम्मद के नये सम्प्रदाय ने उन्हें ईर्ष्यावश अबुलजिहाल ‘अज्ञान का पिता’ कहकर उनकी निन्दा की।

जब मोहम्मद ने मक्का पर आक्रमण किया, उस समय वहाँ बृहस्पति, मंगल, अश्विनीकुमार, गरूड़, नृसिंह की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थी। साथ ही एक मूर्ति वहाँ विश्वविजेता महाराजा बलि की भी थी, और दानी होने की प्रसिद्धि से उसका एक हाथ सोने का बना था।

‘Holul’ के नाम से अभिहित यह मूर्ति वहां इब्राहम और इस्माइल की मूर्त्तियों के बराबर रखी थी। मोहम्मद ने उन सब मूर्त्तियों को तोड़कर वहां बने कुएं में फेंक दिया, किन्तु तोड़े गये शिवलिंग का एक टुकडा आज भी काबा में सम्मानपूर्वक न केवल प्रतिष्ठित है, वरन् हज करने जाने वाले मुसलमान उस काले (अश्वेत) प्रस्तर खण्ड अर्थात ‘संगे अस्वद’ को आदर मान देते हुए चूमते है।

प्राचीन अरबों ने सिन्ध को सिन्ध ही कहा तथा भारतवर्ष के अन्य प्रदेशों को हिन्द निश्चित किया। सिन्ध से हिन्द होने की बात बहुत ही अवैज्ञानिक है।

इस्लाम मत के प्रवर्तक मोहम्मद के पैदा होने से 2300 वर्ष पूर्व यानि लगभग 1800 ईश्वी पूर्व भी अरब में हिंद एवं हिंदू शब्द का व्यवहार ज्यों कात्यों आज ही के अर्थ में प्रयुक्त होता था।

अरब की प्राचीन समृद्ध संस्कृति वैदिक थी तथा उस समय ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, धर्म-संस्कृति आदि में भारत (हिंद) के साथ उसके प्रगाढ़ संबंध थे। हिंद नाम अरबों को इतना प्यारा लगा कि उन्होंने उस देश के नाम पर अपनी स्त्रियों एवं बच्चों के नाम भी हिंद पर रखे।

अरबी काव्य संग्रह ग्रंथ ‘ से अरूल-ओकुल’ के 253वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम की कविता है जिसमें उन्होंने हिन्दे यौमन एवं गबुल हिन्दू का प्रयोग बड़े आदर से किया है। ‘उमर-बिन-ए-हश्शाम’ की कविता नई दिल्ली स्थित मन्दिर मार्ग पर श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बिड़लामन्दिर) की वाटिका में यज्ञशाला के लाल पत्थर के स्तम्भ (खम्बे) पर कालीस्याही से लिखी हुई है, जो इस प्रकार है –

”कफविनक जिकरा मिन उलुमिन तब असेक ।
कलुवन अमातातुल हवा व तजक्करू ।1।
न तज खेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा ।
वलुकएने जातल्लाहे औम असेरू ।2।
व अहालोलहा अजहू अरानीमन महादेव ओ ।
मनोजेल इलमुद्दीन मीनहुम व सयत्तरू ।3।
व सहबी वे याम फीम कामिल हिन्दे यौमन ।
व यकुलून न लातहजन फइन्नक तवज्जरू ।4।
मअस्सयरे अरव्लाकन हसनन कुल्लहूम ।
नजुमुन अजा अत सुम्मा गबुल हिन्दू ।5।

अर्थात् –
(1) वह मनुष्य, जिसने सारा जीवन पाप व अधर्म में बिताया हो, काम, क्रोध में अपने यौवन को नष्ट किया हो।
(2) यदि अन्त में उसको पश्चाताप हो, और भलाई की ओर लौटना चाहे, तो क्या उसका कल्याण हो सकता है ?
(3) एक बार भी सच्चे हृदय से वह महादेव जी की पूजा करे, तो धर्म-मार्ग में उच्च से उच्चपद को पा सकता है।
(4) हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर केवल एक दिन भारत (हिंद) के निवास का दे दो, क्योंकि वहां पहुंचकर मनुष्य जीवन-मुक्त हो जाता है।
(5) वहां की यात्रा से सारे शुभ कर्मो की प्राप्ति होती है, और आदर्शगुरूजनों (गबुल हिन्दू) का सत्संग मिलता है ।

क्षत्रिय राजपूत सम्राट जयपाल सिंह जांजुआ जी के स्वर्णिम इतिहास की शौर्यवान गाथा

सम्राट जयपाल सिंह जांजुआ

क्षत्रिय राजपूत सम्राट जयपाल सिंह जांजुआ जी के स्वर्णिम इतिहास की शौर्यवान गाथा ।। 🙏🚩

भारतीय इतिहास के पन्नो से गायब किया गया एक और वीरो की गौरवगाथा जिसे पढ़कर ही आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा!

यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि राजपूतों ने धरती का कोना कोना अपने विरोक्त लहू से लहू लुहान कर दिया पर बदले में उन्हें इतिहास में मिला सिर्फ बदनामी!

वामपंथियों के छापे झूठे इतिहास में हमे हमेशा पढाया जाता रहा कि भारत के राजा कभी एक नहीं हुए तभी भारत गुलाम बना!
बल्कि वास्तविकता तो ये है कि वीर राजपूतों के तलवार की धार का सामना करने वाला कोई आक्रमणकारी पैदा ही नही हुआ था धरती पर!
पढ़िए इतिहास में छुपायी गई एक गौरवगाथा!
8.5 लाख विदेशी सेना को रौंद के फेंक दिया भारत 1 लाख क्षत्रिय वीरो ने!

राजपूत राजाओं की एकता ने मेवाड़, कन्नौज, अजमेर एवं चंदेल राजा धंग और काबुल शाही जंजुआ राजपूत राजा जयपाल ने सुबुक्तगीन की 8.5 लाख सेना को धुल चटाया था!
ऐसे ही हमारे भारत के गौरवशाली इतिहास की गौरवगाथाओ को छुपाकर इतिहास में केवल ये लिखा गया राजपूतों ने गद्दारी की थी और उन्हें गद्दार बता गया!
सुबुक्तगीन ने जाबुल शाही जंजुआ राजपूत राजा जयपाल के साम्राज्य पर हमला किया था !

हम आपको बता दें कि जंजुआ राजपूत वंश भी तोमर वंश की शाखा है और अब यह अधिकतर पाकिस्तान के पंजाब में मिलते हैं!
अब कुछ थोड़े से हिन्दू जंजुआ राजपूत भारतीय पंजाब में भी मिलते हैं!

उस समय अधिकांश अहिगणस्थान(अफगानिस्तान), और समूचे पंजाब पर जंजुआ शाही राजपूतो का शासन था!

जाबुल के महाराजा जयपाल की सहायता के लिये मेवाड़, अजमेर, कन्नौज, चंदेल राजा धंग ने भी गजनी के सुल्तान सुबुक्तगीन के विरुद्ध युद्ध के लिए अपनी सेना, धन, गज सेना सब दे दिया था!

और सभी राजपूत राजाओं ने भरपूर योगदान दिया!
सुबुक्तगीन ने 8.5 लाख की सेना के साथ यह आक्रमण करने ९७७ ई. (977A.D) के मध्य में आया था!

उसकी मदद के लिए उसका पिता उज़्बेकिस्तान के सुल्तान सामानिद सेना के साथ आया!
इतनी बड़ी सेना का यह भारत के भूभाग पर पहला आक्रमण था!
मित्रो 8.5 लाख की सेना का युद्ध कोई छोटा मोटा युद्ध नही अपितु एक ऐसा भयंकर तूफान होता है जिसके सामने किसी का भी रूकना असंभव होता है!
मैदानों की सीधी लड़ाई लड़कर इतनी बड़ी सेना को परास्त करना महावीर रणबांकुरों का और अदम्य युद्धनीति के ज्ञाताओं का ही काम हो सकता है!
प्राचीन काल से युद्धनीति और युद्धकौशल में भारत सदा अग्रणी रहा है!
व्यूह रचना के विभिन्न प्रकार और फिर उन्हें तोडऩे की युद्धकला विश्व में भारत के अतिरिक्त भला और किसके पास रही हैं?
इसलिए 8.5 लाख सेना के इस भयंकर तूफान को रोकने के लिए भारत के क्षत्रियो की भुजाएं फड़कने लगीं!

सुबुक्तगीन ने कई बार भारत के विषय में सुन रखा था कि इसकी युद्ध नीति ने पूर्व में किस प्रकार विदेशी आक्रांताओं को धूल चटाई थी?
इसलिए वह विशाल सेना के साथ भारतवर्ष का राज्य जाबुल की ओर बढ़ा!
यह बात नितांत सत्य है कि भारत के अतिरिक्त यदि किसी अन्य देश की ओर इतनी बड़ी सेना कूच करती तो कई स्थानों पर तो बिना युद्ध के ही सुबुक्तगीन की विजय हो जानी निश्चित थी!
पर हमारे भारत के वीर राजपुताना के पौरूष ने 8.5 लाख की विशाल सेना की चुनौती स्वीकार की!
मेरे अनुसार तो इस चुनौती को स्वीकार करना ही भारतवर्ष की पहली जीत थी और सुबुक्तगीन की पहली हार थी!
क्योंकि सुबुक्तगीन ने इतनी बड़ी सेना का गठन ही इसलिए किया था कि भारत इतने बड़े सैन्य दल को देखकर भयभीत हो जाएगा और उसे भारतवर्ष की राजसत्ता यूं ही थाली में रखी मिल जाएगी!
उसने सेना का गठन यौद्घिक स्वरूप से नही किया था, और ना ही उसका सैन्य दल बौद्धिक रूप से संचालित था!
वह आकस्मिक उद्देश्य के लिए गठित किया गया संगठन था जो समय आने पर बिखर ही जाना था!
समय का चक्र बढ़ता गया और वो समय आ गया सन ९७७ ईस्वी (977A.D) में जाबुल और पंजाब के सीमांतीय पर लड़ा गया यह ऐतिहासिक युद्ध जहाँ एक तरफ थी!
सुबुक्तगीन की 8.5 लाख की लूटेरो सेना!
और दूसरी तरफ थी भारत माता की संस्कृति मातृभूमि के रक्षकों की 1 लाख सेना!
जिनमें मेवाड़, अजमेर, कन्नौज, जेजाभुक्ति प्रान्त (वर्त्तमान बुन्देलखण्ड) के राजा धंग चंदेल, जाबुल शाही जंजुआ राजपूत राजाधिराज जयपाल सब एक हो गये!
जाबुल पंजाब सीमान्त पर क्षत्रिय वीर अपने महान पराक्रमी राजाओं के नेतृत्व में मातृभूमि के लिए धर्मयुद्ध लड़ रहे थे!

जबकि विदेशी आततायी सेना अपने सुल्तान के नेतृत्व में भारत की अस्मिता को लूटने के लिए युद्ध कर रही थी!
8.5 लाख सेना सायंकाल तक 3.5 लाख से भी आधा भी नही बची थी!
गजनी के सुल्तान की सेना युद्ध क्षेत्र से भागने को विवश हो गयी युद्ध में स्थिति स्पष्ट होने लगी इस भयंकर युद्ध में लाशों के लगे ढेर में मुस्लिम सेना के सैनिकों की अधिक संख्या देखकर शेष शत्रु सेना का मनोबल टूट गया!
और समझ गया था कि राजपूत इस बार भी खदेड़, खदेड़ कर काट कर फेंक देंगे!
क्षत्रिय सेना के पराक्रमी प्रहार को देखकर सुबुक्तगीन का हृदय कांप रहा था!
९७७ ईस्वी (977A.D) में इस युद्ध में सुबुक्तगीन की मृत्यु राजा जयपाल के हाथो होती हैं!
युद्ध में विजय श्री भी होती है!
परन्तु इस बात को वामपंथी इतिहासकार छुपा देते हैं!
सुबुक्तगीन की मृत्यु का भेद तक नही बताते हैं!
परन्तु इतिहासकार प्रकांड ज्ञानी डॉ. एस.डी.कुलकर्णी ने अपनी किताब The Struggle for Hindu Supremacy एवं Glimpses of Bhāratiya में लिखा गया हैं इस स्वर्णिम इतिहास का क्षण “1 लाख राजपूत राजाओं के संयुक्त सैन्य अभियान से सुबुक्तगीन की 8.5 लाख की विशाल सेना को परास्त कर मध्य एशिया के आमू-पार क्षेत्र तक भगवा ध्वज लहराकर भारतवर्ष के साम्राज्य में सम्मिलित किया था!
युद्ध का फलस्वरूप राजाधिराज जयपाल के प्रहार से सुबुक्तगीन की मृत्यु होती हैं”!
बहुत समय से ही राष्ट्र के प्रति इन राजाओं के पराक्रम की उपेक्षा के पीछे एक षडयंत्र काम करता रहा है!
जिसके अंतर्गत बार-बार पराजित किये गए मुस्लिम आक्रांताओं में से यदि एक बार भी कोई विजय प्राप्त कर लेता तो वह नायक बना दिया जाता है!
और पराजित को खलनायक बना दिया जाता रहा है!
इसलिए हम आज भी अपने इतिहास में विदेशी नायक और क्षत्रिय खलनायकों का चरित्र पढऩे के लिए अभिशप्त हैं!

विदेशी नायकों का गुणगान करने वाले इतिहास लेखक तनिक हैवेल के इस कथन को भी पढ़ें-जिसमें वह कहता है-’यह भारत था न कि यूनान जिसने इस्लाम को अपनी युवावस्था के प्रभावशाली वर्षों में बहुत कुछ सिखाया इसके दर्शन को तथा धार्मिक आदर्शों को एक स्वरूप दिया तथा बहुमुखी साहित्य कला तथा स्थापत्यों में भावों की प्रेरणा दी!
साम्प्रदायिक मान्यताएं होती हैं!
घातक इतिहास के तथ्यों के साथ गंभीर छेड़छाड़ कराने के लिए साम्प्रदायिक मान्यताएं और साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह सबसे अधिक उत्तरदायी होते हैं!
साम्प्रदायिक आधार पर जो आक्रांता किसी पराजित जाति या राष्ट्र पर अमानवीय और क्रूर अत्याचार करते हैं!
प्रचलित इतिहास लेखकों की शैली ऐसी है कि उन अमानवीय और क्रूर अत्याचारों का भी वह महिमामंडन करती है!
यदि इतिहास लेखन के समय लेखक उन अमानवीय क्रूर अत्याचारों को करने वाले व्यक्ति की साम्प्रदायिक मान्यताओं या पूर्वाग्रहों को कहीं न कहीं उचित मानता है!
या उनसे सहमति व्यक्त करता है!
तब तो ऐसी संभावनाएं और भी बलवती हो जाती हैं!
भारतवर्ष की पावन भूमि प्राचीन काल से राजपूत राजाओं के अनुकरणीय बलिदान की रक्त साक्षी दे रही है!
जिन्होंने विदेशी आक्रांता को यहां धूल चटाई थी और विदेशी 8.5 लाख सेना को गाजर मूली की भांति काटकर अपनी राजपुताना रियासत में एकता की धाक जमाई थी!
उनका वह रोमांचकारी इतिहास और बलिदान हमें बताता है कि भारतवर्ष का भूतपूर्व हिस्सा रहे जाबुल की भूमि ने हिंदुत्व की रक्षार्थ जो संघर्ष किया!
उनका बलिदान निश्चय ही भारत के स्वातंत्र समर का एक ऐसा राष्ट्रीय स्मारक है!
जिसकी कीर्ति का बखान युग युगांतरो तक किया जाना चाहिए!

हिन्दुओ हमने इतिहास से ही शत्रु को चांटे ही नही मारे अपितु शत्रु को ही मिटा डाला!
हमारा वह पुरूषार्थ उस गांधीवादी परंपरा से बहुत बड़ा है!
निस्संदेह बहुत बड़ा है!
जिन्होंने शत्रु से चांटा एक गाल पर खाया तो दूसरा गाल भी चांटा खाने के लिए आगे कर दिया और अंत में चांटा मारने वालों की मानसिक दासता को उसकी स्मृतियों के रूप में यहां बचाकर रख लिया!
हमने कृतज्ञता को महिमामंडित करना था!
पर हम लग गये कृतघ्नता को महिमामंडित करने!
इसे क्या कहा जाये!

1.आत्म प्रवंचना?
2.आत्म विस्मृति?
3.राष्ट्र की हत्या?
4.राष्ट्रीय लज्जा?

रोमिला थापर जैसी कम्युनिस्ट इतिहासकार की मान्यता है कि महमूद किसी मंदिर को तोडऩे नही आया था, वह तो अरब की किसी पुरानी देवी की मूर्ति ढूंढऩे आया था जिसे स्वयं पैगंबर साहब ने तोडऩे को आज्ञा दी थी!
(दैनिक जागरण 1 जून 2004, एस. शंकर-’रोमिला का महमूद’)
रोमिला थापर जैसे इतिहासकार तथ्यों की उपेक्षा कर रही है!
और अपनी अपनी मान्यताओं को स्थापित करते जा रहे हैं!
और मान्यताएं भी ऐसी कि जिनका कोई आधार नही जिनके पीछे कोई तर्क नही और जिनका कोई औचित्य नही!


  1. S.D Kulkarni The Struggle for Hindu Supremacy
  2. Glimpses of Bhāratiya Rajendra Singh Kushwaha
  3. Mitra, Sisirkumar (1977). The Early Rulers of Khajurāho
  4. Smith, Vincent Author (1881). “History of Bundelkhand”
  5. Dikshit, R. K. (1976). The Candellas of Jejākabhukti

क्षत्रिय धर्म युगे: युगे: ⚔️🚩

#क्षत्रिय #क्षत्रियविरासत #शूर्यवंशीक्षत्रिय #चंद्रवंशीक्षत्रिय #राजपूत #राजपुताना‌ #क्षत्रिययानिराजपूत #जयपालसिंह_जांजुआ #कन्नोज #मेवाड #मालवा #अजमेर #राजस्थान #भारतवर्षै #आर्यावर्तै

जय माॅं भवानी ⚔️🚩
जय एकलिंग महाराज ⚔️🚩

Dinosaurs are mentioned in Vedas, Puranas


We heard about Aghasur, was a huge reptile and that is what the dinosaurs are supposed to be. So therefore in the 8.4 million species that the Padma Purana talks about, the large number of reptile species that are talked about, include gigantic size reptiles, which is what our modern nomenclature calls dinosaurs.

Per Vedas, the 8.4 million species always exist, on all planets, and if they are not on a particular planet, that does not mean that they have extinct. They have just become invisible to our vision, as Bhagavad Gita 2;22 explains that the body is like a dress for the soul, so the dresses are given to the soul according to its karma. At the same time, certain dresses are suitable for certain environments. and certain are unsuitable. Just like a soul in a polar bear’s body, which exists on the poles, and an ordinary bear which…

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