कुतुबुद्दीनऐबक, और #क़ुतुबमीनारकी सच्चाई

Real Islamic structure

कुतुबुद्दीनऐबक, और #क़ुतुबमीनारकी सच्चाई

किसी भी देश पर शासन करना है तो उस देश के लोगों का ऐसा ब्रेनवाश कर दो कि वो अपने देश, अपनी संसकृति और अपने पूर्वजों पर गर्व करना छोड़ दें ।

इस्लामी हमलावरों और उनके बाद अंग्रेजों ने भी भारत में यही किया. हम अपने पूर्वजों पर गर्व करना भूलकर उन अत्याचारियों को महान समझने लगे जिन्होंने भारत पर बे हिसाब जुल्म किये थे ।
अगर आप दिल्ली घुमने गए है तो आपने कभी विष्णु स्तम्भ (क़ुतुबमीनार) को भी अवश्य देखा होगा. जिसके बारे में बताया जाता है कि उसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनबाया था. हम कभी जानने की कोशिश भी नहीं करते हैं कि कुतुबुद्दीन कौन था, उसने कितने बर्ष दिल्ली पर शासन किया, उसने कब विष्णू स्तम्भ (क़ुतुबमीनार) को बनवाया या विष्णु स्तम्भ (कुतुबमीनार) से पहले वो और क्या क्या बनवा चुका था ?

दो खरीदे हुए गुलाम

कुतुबुद्दीन ऐबक, मोहम्मद गौरी का खरीदा हुआ गुलाम था. मोहम्मद गौरी भारत पर कई हमले कर चुका था मगर हर बार उसे हारकर वापस जाना पडा था. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की जासूसी और कुतुबुद्दीन की रणनीति के कारण मोहम्मद गौरी, तराइन की लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को हराने में कामयाब रहा और अजमेर / दिल्ली पर उसका कब्जा हो गया ।

ढाई दिन का झोपड़ा

अजमेर पर कब्जा होने के बाद मोहम्मद गौरी ने चिश्ती से इनाम मांगने को कहा. तब चिश्ती ने अपनी जासूसी का इनाम मांगते हुए, एक भव्य मंदिर की तरफ इशारा करके गौरी से कहा कि तीन दिन में इस मंदिर को तोड़कर मस्जिद बना कर दो. तब कुतुबुद्दीन ने कहा आप तीन दिन कह रहे हैं मैं यह काम ढाई दिन में कर के आपको दूंगा ।
कुतुबुद्दीन ने ढाई दिन में उस मंदिर को तोड़कर मस्जिद में बदल दिया. आज भी यह जगह “अढाई दिन का झोपड़ा” के नाम से जानी जाती है. जीत के बाद मोहम्मद गौरी, पश्चिमी भारत की जिम्मेदारी “कुतुबुद्दीन” को और पूर्वी भारत की जिम्मेदारी अपने दुसरे सेनापति “बख्तियार खिलजी” (जिसने नालंदा को जलाया था) को सौंप कर वापस चला गय था ।

दोनों गुलाम को शासन

कुतुबुद्दीन कुल चार साल ( 1206 से 1210 तक) दिल्ली का शासक रहा. इन चार साल में वो अपने राज्य का विस्तार, इस्लाम के प्रचार और बुतपरस्ती का खात्मा करने में लगा रहा. हांसी, कन्नौज, बदायूं, मेरठ, अलीगढ़, कालिंजर, महोबा, आदि को उसने जीता. अजमेर के विद्रोह को दबाने के साथ राजस्थान के भी कई इलाकों में उसने काफी आतंक मचाय ।

विष्णु स्तम्भ

जिसे क़ुतुबमीनार कहते हैं वो महाराजा वीर विक्रमादित्य की वेधशाला (observatory) थी. जहा बैठकर खगोलशास्त्री वराहमिहर ने ग्रहों, नक्षत्रों, तारों का अध्ययन कर, भारतीय कैलेण्डर “विक्रम संवत” का आविष्कार किया था. यहाँ पर 27 छोटे छोटे भवन (मंदिर) थे जो 27 नक्षत्रों के प्रतीक थे और मध्य में विष्णु स्तम्भ था, जिसको ध्रुव स्तम्भ भी कहा जाता था ।
दिल्ली पर कब्जा करने के बाद उसने उन 27 मंदिरों को तोड दिया. विशाल विष्णु स्तम्भ को तोड़ने का तरीका समझ न आने पर उसने उसको तोड़ने के बजाय अपना नाम दे दिया. तब से उसे क़ुतुबमीनार कहा जाने लगा. कालान्तर में यह यह झूठ प्रचारित किया गया कि क़ुतुब मीनार को कुतुबुद्दीन ने बनबाया था. जबकि वो एक विध्वंशक था न कि कोई निर्माता.

कुतुबुद्दीन ऐबक की मौत का सच
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अब बात करते हैं कुतुबुद्दीन की मौत की. इतिहास की किताबो में लिखा है कि उसकी मौत पोलो खेलते समय घोड़े से गिरने पर से हुई. ये अफगान / तुर्क लोग “पोलो” नहीं खेलते थे, पोलो खेल अंग्रेजों ने शुरू किया. अफगान / तुर्क लोग बुजकशी खेलते हैं जिसमे एक बकरे को मारकर उसे लेकर घोड़े पर भागते है, जो उसे लेकर मंजिल तक पहुंचता है, वो जीतता है ।
कुतबुद्दीन ने अजमेर के विद्रोह को कुचलने के बाद राजस्थान के अनेकों इलाकों में कहर बरपाया था. उसका सबसे कडा विरोध उदयपुर के राजा ने किया, परन्तु कुतुबद्दीन उसको हराने में कामयाब रहा. उसने धोखे से राजकुंवर कर्णसिंह को बंदी बनाकर और उनको जान से मारने की धमकी देकर, राजकुंवर और उनके घोड़े शुभ्रक को पकड कर लाहौर ले आया.
एक दिन राजकुंवर ने कैद से भागने की कोशिश की, लेकिन पकड़ा गया. इस पर क्रोधित होकर कुतुबुद्दीन ने उसका सर काटने का हुकुम दिया. दरिंदगी दिखाने के लिए उसने कहा कि बुजकशी खेला जाएगा लेकिन इसमें बकरे की जगह राजकुंवर का कटा हुआ सर इस्तेमाल होगा. कुतुबुद्दीन ने इस काम के लिए, अपने लिए घोड़ा भी राजकुंवर का “शुभ्रक” चुना.
कुतुबुद्दीन “शुभ्रक” घोडे पर सवार होकर अपनी टोली के साथ जन्नत बाग में पहुंचा. राजकुंवर को भी जंजीरों में बांधकर वहां लाया गया. राजकुंवर का सर काटने के लिए जैसे ही उनकी जंजीरों को खोला गया, शुभ्रक घोडे ने उछलकर कुतुबुद्दीन को अपनी पीठ से नीचे गिरा दिया और अपने पैरों से उसकी छाती पर कई बार किये, जिससे कुतुबुद्दीन वहीं पर मर गया ।

शुभ्रक मरकर भी अमर हो गया

इससे पहले कि सिपाही कुछ समझ पाते राजकुवर शुभ्रक घोडे पर सवार होकर वहां से निकल गए. कुतुबुदीन के सैनिको ने उनका पीछा किया मगर वो उनको पकड न सके. शुभ्रक कई दिन और कई रात दौड़ता रहा और अपने स्वामी को लेकर उदयपुर के महल के सामने आ कर रुका. वहां पहुंचकर जब राजकुंवर ने उतर कर पुचकारा तो वो मूर्ति की तरह शांत खडा रहा ।
वो मर चुका था, सर पर हाथ फेरते ही उसका निष्प्राण शरीर लुढ़क गया. कुतुबुद्दीन की मौत और शुभ्रक की स्वामिभक्ति की इस घटना के बारे में हमारे स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाता है लेकिन इस घटना के बारे में फारसी के प्राचीन लेखकों ने काफी लिखा है. धन्य है भारत की भूमि जहाँ इंसान तो क्या जानवर भी अपनी स्वामी भक्ति के लिए प्राण दांव पर लगा देते हैं ।

अलई मीनार या अल्लाई मीनार का सच

कुतुबमीनार परिसर में ही एक अनगढ़ इमारत मिल जाएगी, जिसके शिलापट्ट पर अलई मीनार लिखा है और उसमें तारीख लिखी है और यह भी लिखा है कि अलाउद्दीन खिलज़ी ने इस मीनार को कुतुबमीनार के टक्कर में बनाने का असफल प्रयास किया था. और वह भी कुतुबमीनार के तथाकथित निर्माण की तिथि से डेढ़- दो सौ साल बाद.

सोचो जो एक बनी बनाई इमारत की नकल नहीं कर सकते वो असली इमारत क्या बनवा पाते…?

इसी तरह औरंगजेब यमुना के उस पार काला ताजमहल बनवाने के मंसूबे पाले मर गया, जबकि वह 52 साल तक सबसे अधिक समय तक दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाला मुगल शासक था.

विष्णु स्तम्भ ( वर्तमान कुतुबमीनार) की टक्कर में बनाई गई अलाई मीनार, महरौली, कुतुबमीनार परिसर, दिल्ली.

ये है इस्लामिक वास्तुकला का सच और सुबूत…..

आंख फाड़ कर देख लो

और संभवतः ये अलाई मीनार , विष्णु-स्तम्भ (कुतुबमीनार) परिसर में तोड़े गए 27 नक्षत्र मंदिरों के ही ढेर से बनाई जा रही थी.🙏साभार🙏

Hindus are enemies of themselves due to cast divide

तैमूरलंग का सामना

डॉविवेकआर्य

हिन्दू समाज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे जातिवाद से ऊपर उठ कर सोच ही नहीं सकते। यही पिछले 1200 वर्षों से हो रही उनकी हार का मुख्य कारण है। इतिहास में कुछ प्रेरणादायक घटनाएं मिलती है। जब जातिवाद से ऊपर उठकर हिन्दू समाज ने एकजुट होकर अक्रान्तायों का न केवल सामना किया अपितु अपने प्राणों की बाजी लगाकर उन्हें यमलोक भेज दिया। तैमूर लंग के नाम से सभी भारतीय परिचित है। तैमूर के अत्याचारों से हमारे देश की भूमि रक्तरंजित हो गई। उसके अत्याचारों की कोई सीमा नहीं थी।
तैमूर लंग ने मार्च सन् 1398 ई० में भारत पर 92000 घुड़सवारों की सेना से तूफानी आक्रमण कर दिया। तैमूर के सार्वजनिक कत्लेआम, लूट खसोट और सर्वनाशी अत्याचारों की सूचना मिलने पर संवत् 1455 (सन् 1398 ई०) कार्तिक बदी 5 को देवपाल राजा (जिसका जन्म निरपड़ा गांव जि० मेरठ में एक जाट घराने में हुआ था) की अध्यक्षता में हरयाणा सर्वखाप पंचायत का अधिवेशन जि० मेरठ के गाँव टीकरी, निरपड़ा, दोगट और दाहा के मध्य जंगलों में हुआ।
सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये – (1) सब गांवों को खाली कर दो। (2) बूढे पुरुष-स्त्रियों तथा बालकों को सुरक्षित स्थान पर रखो। (3) प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति सर्वखाप पंचायत की सेना में भर्ती हो जाये। (4) युवतियाँ भी पुरुषों की भांति शस्त्र उठायें। (5) दिल्ली से हरद्वार की ओर बढ़ती हुई तैमूर की सेना का छापामार युद्ध शैली से मुकाबला किया जाये तथा उनके पानी में विष मिला दो। (6) 500 घुड़सवार युवक तैमूर की सेना की गतिविधियों को देखें और पता लगाकर पंचायती सेना को सूचना देते रहें।
पंचायती सेना – पंचायती झण्डे के नीचे 80,000 मल्ल योद्धा सैनिक और 40,000 युवा महिलायें शस्त्र लेकर एकत्र हो गये। इन वीरांगनाओं ने युद्ध के अतिरिक्त खाद्य सामग्री का प्रबन्ध भी सम्भाला। दिल्ली के सौ-सौ कोस चारों ओर के क्षेत्र के वीर योद्धा देश रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने रणभूमि में आ गये। सारे क्षेत्र में युवा तथा युवतियां सशस्त्र हो गये। इस सेना को एकत्र करने में धर्मपालदेव जाट योद्धा जिसकी आयु 95 वर्ष की थी, ने बड़ा सहयोग दिया था। उसने घोड़े पर चढ़कर दिन रात दूर-दूर तक जाकर नर-नारियों को उत्साहित करके इस सेना को एकत्र किया। उसने तथा उसके भाई करणपाल ने इस सेना के लिए अन्न, धन तथा वस्त्र आदि का प्रबन्ध किया।
प्रधान सेनापति, उप-प्रधान सेनापति तथा सेनापतियों की नियुक्ति
सर्वखाप पंचायत के इस अधिवेशन में सर्वसम्मति से वीर योद्धा जोगराजसिंह गुर्जर को प्रधान सेनापति बनाया गया। यह खूबड़ परमार वंश का योद्धा था जो हरद्वार के पास एक गाँव कुंजा सुन्हटी का निवासी था। बाद में यह गाँव मुगलों ने उजाड़ दिया था। वीर जोगराजसिंह के वंशज उस गांव से भागकर लंढोरा (जिला सहारनपुर) में आकर आबाद हो गये जिन्होंने लंढोरा गुर्जर राज्य की स्थापना की। जोगराजसिंह बालब्रह्मचारी एवं विख्यात पहलवान था। उसका कद 7 फुट 9 इंच और वजन 8 मन था। उसकी दैनिक खुराक चार सेर अन्न, 5 सेर सब्जी-फल, एक सेर गऊ का घी और 20 सेर गऊ का दूध।
महिलाएं वीरांगनाओं की सेनापति चुनी गईं उनके नाम इस प्रकार हैं – (1) रामप्यारी गुर्जर युवति (2) हरदेई जाट युवति (3) देवीकौर राजपूत युवति (4) चन्द्रो ब्राह्मण युवति (5) रामदेई त्यागी युवति। इन सब ने देशरक्षा के लिए शत्रु से लड़कर प्राण देने की प्रतिज्ञा की।
उपप्रधान सेनापति – (1) धूला भंगी (बालमीकी) (2) हरबीर गुलिया जाट चुने गये। धूला भंगी जि० हिसार के हांसी गांव (हिसार के निकट) का निवासी था। यह महाबलवान्, निर्भय योद्धा, गोरीला (छापामार) युद्ध का महान् विजयी धाड़ी (बड़ा महान् डाकू) था जिसका वजन 53 धड़ी था। उपप्रधान सेनापति चुना जाने पर इसने भाषण दिया कि – “मैंने अपनी सारी आयु में अनेक धाड़े मारे हैं। आपके सम्मान देने से मेरा खूब उबल उठा है। मैं वीरों के सम्मुख प्रण करता हूं कि देश की रक्षा के लिए अपना खून बहा दूंगा तथा सर्वखाप के पवित्र झण्डे को नीचे नहीं होने दूंगा। मैंने अनेक युद्धों में भाग लिया है तथा इस युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान दे दूंगा।” यह कहकर उसने अपनी जांघ से खून निकालकर प्रधान सेनापति के चरणों में उसने खून के छींटे दिये। उसने म्यान से बाहर अपनी तलवार निकालकर कहा “यह शत्रु का खून पीयेगी और म्यान में नहीं जायेगी।” इस वीर योद्धा धूला के भाषण से पंचायती सेना दल में जोश एवं साहस की लहर दौड़ गई और सबने जोर-जोर से मातृभूमि के नारे लगाये।
दूसरा उपप्रधान सेनापति हरबीरसिंह जाट था जिसका गोत्र गुलिया था। यह हरयाणा के जि० रोहतक गांव बादली का रहने वाला था। इसकी आयु 22 वर्ष की थी और इसका वजन 56 धड़ी (7 मन) था। यह निडर एवं शक्तिशाली वीर योद्धा था।
सेनापतियों का निर्वाचन – उनके नाम इस प्रकार हैं – (1) गजेसिंह जाट गठवाला (2) तुहीराम राजपूत (3) मेदा रवा (4) सरजू ब्राह्मण (5) उमरा तगा (त्यागी) (6) दुर्जनपाल अहीर।
जो उपसेनापति चुने गये – (1) कुन्दन जाट (2) धारी गडरिया जो धाड़ी था (3) भौन्दू सैनी (4) हुल्ला नाई (5) भाना जुलाहा (हरिजन) (6) अमनसिंह पुंडीर राजपुत्र (7) नत्थू पार्डर राजपुत्र (😎 दुल्ला (धाड़ी) जाट जो हिसार, दादरी से मुलतान तक धाड़े मारता था। (9) मामचन्द गुर्जर (10) फलवा कहार।
सहायक सेनापति – भिन्न-भिन्न जातियों के 20 सहायक सेनापति चुने गये।
वीर कवि – प्रचण्ड विद्वान् चन्द्रदत्त भट्ट (भाट) को वीर कवि नियुक्त किया गया जिसने तैमूर के साथ युद्धों की घटनाओं का आंखों देखा इतिहास लिखा था।
प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर के ओजस्वी भाषण के कुछ अंश –
“वीरो! भगवान् कृष्ण ने गीता में अर्जुन को जो उपदेश दिया था उस पर अमल करो। हमारे लिए स्वर्ग (मोक्ष) का द्वार खुला है। ऋषि मुनि योग साधना से जो मोक्ष पद प्राप्त करते हैं, उसी पद को वीर योद्धा रणभूमि में बलिदान देकर प्राप्त कर लेता है। भारत माता की रक्षा हेतु तैयार हो जाओ। देश को बचाओ अथवा बलिदान हो जाओ, संसार तुम्हारा यशोगान करेगा। आपने मुझे नेता चुना है, प्राण रहते-रहते पग पीछे नहीं हटाऊंगा। पंचायत को प्रणाम करता हूँ तथा प्रतिज्ञा करता हूँ कि अन्तिम श्वास तक भारत भूमि की रक्षा करूंगा। हमारा देश तैमूर के आक्रमणों तथा अत्याचारों से तिलमिला उठा है। वीरो! उठो, अब देर मत करो। शत्रु सेना से युद्ध करके देश से बाहर निकाल दो।”
यह भाषण सुनकर वीरता की लहर दौड़ गई। 80,000 वीरों तथा 40,000 वीरांगनाओं ने अपनी तलवारों को चूमकर प्रण किया कि हे सेनापति! हम प्राण रहते-रहते आपकी आज्ञाओं का पालन करके देश रक्षा हेतु बलिदान हो जायेंगे।
मेरठ युद्ध – तैमूर ने अपनी बड़ी संख्यक एवं शक्तिशाली सेना, जिसके पास आधुनिक शस्त्र थे, के साथ दिल्ली से मेरठ की ओर कूच किया। इस क्षेत्र में तैमूरी सेना को पंचायती सेना ने दम नहीं लेने दिया। दिन भर युद्ध होते रहते थे। रात्रि को जहां तैमूरी सेना ठहरती थी वहीं पर पंचायती सेना धावा बोलकर उनको उखाड़ देती थी। वीर देवियां अपने सैनिकों को खाद्य सामग्री एवं युद्ध सामग्री बड़े उत्साह से स्थान-स्थान पर पहुंचाती थीं। शत्रु की रसद को ये वीरांगनाएं छापा मारकर लूटतीं थीं। आपसी मिलाप रखवाने तथा सूचना पहुंचाने के लिए 500 घुड़सवार अपने कर्त्तव्य का पालन करते थे। रसद न पहुंचने से तैमूरी सेना भूखी मरने लगी। उसके मार्ग में जो गांव आता उसी को नष्ट करती जाती थी। तंग आकर तैमूर हरद्वार की ओर बढ़ा।
हरद्वार युद्ध – मेरठ से आगे मुजफ्फरनगर तथा सहारनपुर तक पंचायती सेनाओं ने तैमूरी सेना से भयंकर युद्ध किए तथा इस क्षेत्र में तैमूरी सेना के पांव न जमने दिये। प्रधान एवं उपप्रधान और प्रत्येक सेनापति अपनी सेना का सुचारू रूप से संचालन करते रहे। हरद्वार से 5 कोस दक्षिण में तुगलुकपुर-पथरीगढ़ में तैमूरी सेना पहुंच गई। इस क्षेत्र में पंचायती सेना ने तैमूरी सेना के साथ तीन घमासान युद्ध किए।
उप-प्रधानसेनापति हरबीरसिंह गुलिया ने अपने पंचायती सेना के 25,000 वीर योद्धा सैनिकों के साथ तैमूर के घुड़सवारों के बड़े दल पर भयंकर धावा बोल दिया जहां पर तीरों* तथा भालों से घमासान युद्ध हुआ। इसी घुड़सवार सेना में तैमूर भी था। हरबीरसिंह गुलिया ने आगे बढ़कर शेर की तरह दहाड़ कर तैमूर की छाती में भाला मारा जिससे वह घोड़े से नीचे गिरने ही वाला था कि उसके एक सरदार खिज़र ने उसे सम्भालकर घोड़े से अलग कर लिया। (तैमूर इसी भाले के घाव से ही अपने देश समरकन्द में पहुंचकर मर गया)। वीर योद्धा हरबीरसिंह गुलिया पर शत्रु के 60 भाले तथा तलवारें एकदम टूट पड़ीं जिनकी मार से यह योद्धा अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ा।
(1) उसी समय प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर ने अपने 22000 मल्ल योद्धाओं के साथ शत्रु की सेना पर धावा बोलकर उनके 5000 घुड़सवारों को काट डाला। जोगराजसिंह ने स्वयं अपने हाथों से अचेत हरबीरसिंह को उठाकर यथास्थान पहुंचाया। परन्तु कुछ घण्टे बाद यह वीर योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गया। जोगराजसिंह को इस योद्धा की वीरगति से बड़ा धक्का लगा।
(2) हरद्वार के जंगलों में तैमूरी सेना के 2805 सैनिकों के रक्षादल पर भंगी कुल के उपप्रधान सेनापति धूला धाड़ी वीर योद्धा ने अपने 190 सैनिकों के साथ धावा बोल दिया। शत्रु के काफी सैनिकों को मारकर ये सभी 190 सैनिक एवं धूला धाड़ी अपने देश की रक्षा हेतु वीरगती को प्राप्त हो गये।
(3) तीसरे युद्ध में प्रधान सेनापति जोगराजसिंह ने अपने वीर योद्धाओं के साथ तैमूरी सेना पर भयंकर धावा करके उसे अम्बाला की ओर भागने पर मजबूर कर दिया। इस युद्ध में वीर योद्धा जोगराजसिंह को 45 घाव आये परन्तु वह वीर होश में रहा। पंचायती सेना के वीर सैनिकों ने तैमूर एवं उसके सैनिकों को हरद्वार के पवित्र गंगा घाट (हर की पौड़ी) तक नहीं जाने दिया। तैमूर हरद्वार से पहाड़ी क्षेत्र के रास्ते अम्बाला की ओर भागा। उस भागती हुई तैमूरी सेना का पंचायती वीर सैनिकों ने अम्बाला तक पीछा करके उसे अपने देश हरयाणा से बाहर खदेड़ दिया।
वीर सेनापति दुर्जनपाल अहीर मेरठ युद्ध में अपने 200 वीर सैनिकों के साथ दिल्ली दरवाज़े के निकट स्वर्ग लोक को प्राप्त हुये।
इन युद्धों में बीच-बीच में घायल होने एवं मरने वाले सेनापति बदलते रहे थे। कच्छवाहे गोत्र के एक वीर राजपूत ने उपप्रधान सेनापति का पद सम्भाला था। तंवर गोत्र के एक जाट योद्धा ने प्रधान सेनापति के पद को सम्भाला था। एक रवा तथा सैनी वीर ने सेनापति पद सम्भाले थे। इस युद्ध में केवल 5 सेनापति बचे थे तथा अन्य सब देशरक्षा के लिए वीरगति को प्राप्त हुये।
इन युद्धों में तैमूर के ढ़ाई लाख सैनिकों में से हमारे वीर योद्धाओं ने 1,60,000 को मौत के घाट उतार दिया था और तैमूर की आशाओं पर पानी फेर दिया।
हमारी पंचायती सेना के वीर एवं वीरांगनाएं 35,000, देश के लिये वीरगति को प्राप्त हुए थे।
प्रधान सेनापति की वीरगति – वीर योद्धा प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर युद्ध के पश्चात् ऋषिकेश के जंगल में स्वर्गवासी हुये थे।
(सन्दर्भ-जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-३७९-३८३ )
ध्यान दीजिये। एक सवर्ण सेना का उपसेनापति वाल्मीकि था। अहीर, गुर्जर से लेकर 36 बिरादरी उसके महत्वपूर्ण अंग थे। तैमूर को हराने वाली सेना को हराने वाली कौन थे? क्या वो जाट थे? क्या वो राजपूत थे? क्या वो अहीर थे? क्या वो गुर्जर थे? क्या वो बनिए थे? क्या वो भंगी या वाल्मीकि थे? क्या वो जातिवादी थे?
नहीं वो सबसे पहले देशभक्त थे। धर्मरक्षक थे। श्री राम और श्री कृष्ण की संतान थे? गौ, वेद , जनेऊ और यज्ञ के रक्षक थे।
आज भी हमारा देश उसी संकट में आ खड़ा हुआ है। आज भी विधर्मी हमारी जड़ों को काट रहे है। आज भी हमें फिर से जातिवाद से ऊपर उठ कर एकजुट होकर अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपनी मातृभूमि की रक्षा का व्रत लेना हैं। यह तभी सम्भव है जब हम अपनी संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर सोचना आरम्भ करेंगे। आप में से कौन कौन मेरे साथ है?

The biggest problem of Hindu society is that they cannot think above casteism. This is the main reason for their defeat for the last 1200 years. There are some inspiring incidents in history. When the Hindu society, rising above casteism, unitedly not only faced the revolutionaries but also sent them to Yamlok by putting their lives on the line. All Indians are familiar with the name of Taimur Lang. Due to the atrocities of Timur, the land of our country became bloody. His atrocities knew no bounds.
In March 1398, Timur Lang made a stormy attack on India with an army of 92000 cavalry. On receiving information about Timur’s public massacre, plundering and apocalyptic atrocities, in Samvat 1455 (A.D. 1398), the session of Haryana Sarvakhap Panchayat under the chairmanship of Devpal Raja (who was born in a Jat family in Nirapada village district, Meerut) on Kartik Badi 5 District Meerut’s village Tikri, Nirpada, Dogat and Daha in the middle of the forest.
The following resolutions were passed unanimously – (1) Evacuate all the villages. (2) Keep old men, women and children in a safe place. (3) Every healthy person should join the army of Sarvkhap Panchayat. (4) Women should also take up arms like men. (5) The army of Timur, moving from Delhi to Hardwar, should be fought with guerilla warfare style and mix poison in their water. (6) 500 cavalry youths watch the activities of Timur’s army and keep track of them and inform the Panchayati army.
Panchayati Sena – 80,000 Malla warrior soldiers and 40,000 young women gathered under the Panchayati flag carrying weapons. Apart from the war, these heroines also took care of the provision of food items. Hundreds of brave warriors of the area around Delhi came to the battlefield to sacrifice their lives for the defense of the country. All over the region, young men and women became armed. Dharampaldev Jat warrior, whose age was 95 years, had given great support in gathering this army. He gathered this army by motivating men and women by going far and wide day and night on a horse. He and his brother Karanpal made arrangements for food, money and clothes etc. for this army.
Appointment of Chief Commander, Vice Chief General and Generals
In this session of Sarvkhap Panchayat, the brave warrior Jograj Singh Gurjar was unanimously made the chief commander. This Khubd was a warrior of Parmar dynasty who was a resident of Kunja Sunhati, a village near Hardwar. Later this village was destroyed by the Mughals. Descendants of Veer Jograj Singh fled from that village and settled in Landora (district Saharanpur) who established Landora Gurjar state. Jograj Singh was a child brahmachari and a famous wrestler. His height was 7 feet 9 inches and weight was 8 mans. His daily dose is four servings of food grains, five servings of vegetables and fruits, one serving of cow’s ghee and 20 servings of cow’s milk.
Women were elected commanders of the heroines, their names are as follows – (1) Rampyari Gurjar girl (2) Hardei Jat girl (3) Devikaur Rajput girl (4) Chandro Brahmin girl (5) Ramdei Tyagi girl. All of them pledged to die fighting the enemy for the defense of the country.
Deputy Chief General – (1) Dhula Bhangi (Balmiki) (2) Harbir Gulia was elected Jat. Dhula Bhangi was a resident of Hansi village (near Hisar) of District Hisar. This great mighty, fearless warrior, the great victorious of the guerilla (guerrilla) war was the Dhaadi (the great great robber) whose weight was 53 Dhadis. On being elected as the Vice-President, he gave a speech that – “I have killed many strands in my entire life. I am very happy to pay your respects. I take a vow in front of the heroes that I will shed my blood for the defense of the country and will not let the holy flag of Sarvakhap go down. I have participated in many wars and will sacrifice my life in this war. Saying this, he took out blood from his thigh and sprinkled blood at the feet of the commander-in-chief. He took his sword out of the sheath and said, “It will drink the blood of the enemy and will not enter the sheath.” With the speech of this brave warrior Dhula, there was a wave of enthusiasm and courage in the Panchayati Sena Dal and everyone shouted slogans of motherland loudly.
The second vice-chief commander was Harbir Singh Jat, whose gotra was Gulia. He was a resident of district Rohtak village Badli in Haryana. Its age was 22 years and its weight was 56 dhadis (7 mind). He was a fearless and mighty brave warrior.
Election of generals – their names are as follows – (1) Gajesingh Jat Gathwala (2) Tuhiram Rajput (3) Meda Rawa (4) Sarju Brahmin (5) Umra Taga (Tyagi) (6) Durjanpal Ahir.
The vice general who was elected – (1) Kundan Jat (2) Dhari Gadaria who was Dhaadi (3) Bhondu Saini (4) Hulla Nai (5) Bhana Weaver (Harijan) (6) Aman Singh Pundir Rajputra (7) Nathu Pardar Rajputra (😎) Dulla (Dhaadi) Jat who used to run from Hisar, Dadri to Multan (9) Mamchand Gurjar (10) Falwa Kahar.
Assistant commander – 20 assistant generals of different castes were elected.
Veer Kavi – The great scholar Chandradutt Bhatt (Bhat) was appointed as a heroic poet who wrote the history of the events of the wars with Timur.
Excerpts from the brilliant speech of Chief General Jograj Singh Gurjar –
“Veer! Follow the instructions given by Lord Krishna to Arjuna in the Gita. The door of heaven (salvation) is open for us. The position of salvation which the sage Muni attains through yoga practice, is attained by a brave warrior by sacrificing himself in the battlefield. Get ready to protect Mother India. Save the country or be sacrificed, the world will praise you. you i

राजा हर्षवर्धन बैंस थानेश्वर, हरयाणा

हर्षवर्धन बैंस थानेश्वर,हरयाणा

  • सर्व खाप हरियाणा के निर्मातसम्राट हर्षवर्धन बैंस , इन्होंने ही ‘सर्वखाप पंचायत’ की नींव सन् 643 में रखी। जिसके इतिहास का समुचित रिकार्ड 7वीं सदी से लेकर आज तक का, स्वर्गीय चै० कबूलसिंह गाँव शोरम जिला मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) के घर लगभग 40 किलो भार में जर-जर अवस्था में उपलब्ध है।
  • नोट जाटों में खाप शुरू से ही है 5 वी शताब्दी में भी यशोवर्धन विर्क के नेतृत्व में खाप पंचायत का बहुत बड़ा सम्मेलन हुआ था । यशोवर्धन विर्क के नेतृत्व में ही जाट देवताओं ने हूणों को कूटा था ॥
  • बौद्व धर्मी जाट सम्राट राजा हर्षवर्धन – कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी । सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहाँ हमारा ॥</code></pre></li>महाराजा कनिष्क (कुषाणवंशीय जाट) से लेकर (सन् 73 ई०) से महाराजा हर्षवर्धन) राजा थे। कभी किसी हिन्दू राजपूत राजा ने बौद्व धर्म नहीं अपनाया क्योंकि यह कभी संभव नहीं था, क्योंकि उस समय तक इस संघ की उत्पत्ति नहीं हुई थी। सभी मौर्य राजा जाट मोरवंशज थे। गुप्त राजाओं ने अपने समय को भारतीय इतिहास का ‘स्वर्णकाल’ बना दिया। गुप्त इनको इसलिए कहा गया कि इनके पूर्वज मिल्ट्री गवर्नर थे, जिन्हें गुप्ता, गुप्ते व गुप्ती के नाम से जाना जाता था। इसलिए इस राज के संस्थापक राजा का नाम तो श्रीगुप्त ही था। इनके सिक्कों पर धारण लिखा पाया जाता है। क्योंकि इनका गोत्र व वंश धारण था, जो आज भी क्षत्रियवंशी जाटों में है। इनके राज प्रशासन से स्पष्ट हो जाता है कि इन्होंने कभी धर्म व जाति-पाति तथा ऊंच-नीच का भेदभाव नहीं किया। साम्राज्य को प्रान्तों में बांटा गया था तथा पंचायतों को समुचित अधिकार थे। ब्राह्मणों को क्षत्रियों से श्रेष्ठ नहीं माना जाता था। राजतंत्र होते हुए भी गणतंत्र प्रणाली लागू करने वाले सम्राट हर्षवर्धन बैंस जाट सम्राट चन्द्रगुप्त मोर/मौर्य,सम्राट अशोक मोर/मौर्य के बाद अगर कोई सम्राट महान हुआ
    है तो वो जाट राजा हर्षवर्धन बैंस है । जाट राजा हर्षवर्धन बैंस के पूर्वज

भोगवतीपुरी का शासक नागराज वासुकि नामक सम्राट् था। यह वसाति/बैंस गोत्र का था Iइस वंश का राज्य वसाति जनपद पर भी था । इस वंश का वैभव महाभारतकाल में और भी अधिक चमका। होशियारपुर (पंजाब) के समीप श्रीमालपुर प्राचीन काल से वसाति बैंस,क्षत्रियों का निवास स्थान है। वर्तमान में भी श्रीमालपुर के आसपास जाट बैंस बहुत बड़ी संख्या में निवास करते है ।

पुष्पपति नामक पुरुष अपने कुछ साथियों सहित श्रीमालपुर से चलकर कुरुक्षेत्र में आया और यहां श्रीकण्ठ (थानेश्वर बसाकर इसके चारों ओर के प्रदेश का राजा बन गया। इसका पुत्र नरर्व्धन 505 ई० में सिंहासन पर बैठा। इस के पुत्र राजर्व्धन और आदित्यर्वधन पहले गुप्तों के सामन्त (जागीरदार) थे गुप्त वंश के कमजोर होने का सबसे बड़ा प्रभाव पंजाब,हरियाणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश और इन्द्रप्रस्थ के जाट गणतंत्रो पर पड़ा सभी गणराज्यो को पुनः अपनी शक्ति को संगठित करने का अवसर मिल गया था । इस अवसर का जाट गणराज्यों ने भरपूर लाभ उठाते हुए अपने आप को पुनःस्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली थी ।

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य से पराजय के बाद अर्जुनायन,नाग ,यौधेय ,मालव जाट गणतंत्रो (खापो ) ने एक नवीन संगठन बनाया जिसमे सभी गणराज्यो की समान रूप से भागीदारी थीद्य प्रारंभ में इसका प्रधान पद मालव विर्क जाटों के पास था बाद में प्रधान नागवंशी बैंस जाटों को बनाया गया अश्व सेना का प्रधान अर्जुनायन (कुंतल ) जाटों को ,महासेनापति यौधेयो को बनाया गया थाद्य यह नागवंशी बैंस जाट श्रीमालपुर (पंजाब) के मूल निवासी से थेद्य इस संघ के शक्ति शाली होने पर यह नागवंशी जाट बैंस थानेश्वर के महाराजाओ के रूप में प्रसिद्ध हुए

आदित्यर्व्धन की महारानी महासेनगुप्ता नामक गुप्तवंश की कन्या थी। इससे पुत्र प्रभाकरर्व्धन की उत्पत्ति हुई। ए० स्मिथ के लेख अनुसार प्रभाकरर्व्धन की यह माता गुप्तवंश (धारण जाट गोत्र) की थी । प्रभाकरवर्धन सम्राट हर्ष के पिता है ।

पुष्पभूति वंश का पहला महान् शासक प्रभाकरर्व्धन था। प्रभाकरर्व्धन की रानी यशोमती से राज्यर्व्धन का जन्म हुआ। उसके चार वर्ष बाद पुत्री राजश्री और उसके दो वर्ष बाद 4 जून 590 ई० को हर्षर्व्धन का शुभ जन्म हुआ। राज्यश्री का विवाह मौखरीवंशी कन्नौज नरेश ग्रहवर्मा के साथ हुआ था। किन्तु मालवा और मध्य बंगाल के गुप्त शासकों ने ग्रहवर्मा को मारकर राज्यश्री को कन्नौज में ही बन्दी बना दिया। इनमें मालवा का गुप्तवंश का राजा देवगुप्त था और मध्य बंगाल का गौड़ आदिवासी राजा शशांक था

सम्राट् प्रभाकरर्व्धन की मृत्यु सन् 605 ई० में हुई थी, जब हर्षवर्धन हूणों से युद्ध कर रहा था । उसी समय कुरगक कुंतल (अर्जुनायन) ने हर्षवर्धन को उनके पिता के ज्वर से पीड़ित होने का समाचार दिया था इसके बाद उसके बड़े पुत्र राज्यवर्दधन ने राजगद्दी सम्भाली। उसने 10 हजार सेना के साथ मालवा पर आक्रमण करके देवगुप्त का वध कर दिया। फिर वहां से बंगाल पर आक्रमण करने के लिए वहां पहुंच गया। परन्तु मध्यबंगाल में गौड़ राजा शशांक ने अपने महलों में बुलाकर धोखे से राज्यवर्धन का वध कर दिया। हर्ष चरित्र के अनुसार जब राज्यर्व्धन की मृत्यु का समाचार देने के लिए ब्रह्देश्वर कुंतल (अश्व सेना का प्रधान) ने अपने एक अश्व सैनिक को थानेश्वर भेजा ।

यह सन्देश पाकर अपने भाई की मृत्यु का बदला लेने के उदेश्य से सम्राट हर्ष अपनी सेना के साथ ब्रह्देश्वर के पड़ाव की तरफ बढ़ा हर्ष का साथ देने के लिए यशोधर्मन का पुत्र भांडी ( हर्ष का ममेरा भाई ) भी आया हर्ष ने सिंघनाद यौधेय, ब्रह्देश्वर कुंतल ,भांडी विर्क को गौड़ शासक शशांक पर आक्रमण करने को कहा और स्वयं माधवगुप्त के साथ विंध्याचल की तरफ अपनी बहिन राजश्री को खोजने के लिए चल दिया सिंघनाद यौधेय , ब्रह्देश्वर कुंतल ,भांडी ने कन्नोज पर अधिकार कर लिया राज्यवर्धन की मृत्यु के पश्चात् 606 ई० में विद्वानों के कहने पर मात्र 16 वर्ष की आयु में जाट सम्राट हर्षवर्धन राजसिंहासन पर बैठा।

हर्षवर्धन ने विशाल हरयाणा सर्वखाप पंचायत की स्थापना की। इसके लेख प्रमाण आज भी चै० कबूलसिंह मन्त्री सर्वखाप पंचायत गांव शोरम जि० मुजफ्फरनगर के पासं हैं। हर्षवर्धन के अपनी पत्नी दुर्गावती से 2 पुत्र थे- वाग्यवर्धन और कल्याणवर्धन। पर उनके दोनों बेटों की अरुणाश्वा नामक ब्राहमण मंत्री ने हत्या कर दी। इस वजह से हर्ष का कोई वारिस नहीं बचा। हर्ष की मृत्यु के बाद, उनका साम्राज्य भी धीरे-धीरे बिखरता चला गया और फिर समाप्त हो गया। लेकिन उनके वंश के बैंस जाट आज भी थानेश्वर में 20 गामो में निवास करते है । हर्ष के पूर्वजो का गाम श्रीमालपुर में भी आज तक बैंस जाट निवास कर रहे है।

पुरे भारतवर्ष में बैंस जाटों के 200 से ज्यादा गाव है जिनमे उत्तरप्रदेश के अमरोहा में 27 गाव(बसेड़ा कंजर,बलदाना,रुस्तमपुर ,बधोहिया,धनौड़ा,ध्योती,ड्योडी वाजिदपुर ,घोसीपुर ,मंडिया,इसेपुर,कालाखेडा,खजुरी ,खंड्सल,खुनपुर ,कूबी,लाम्बिया ,मंदयिया ,मुकारी,शाहपुर ,तसीहा,अकवादपुर है हापुड में पांच गाम जिनंमे बहलोलपुर प्रमुख है हरिद्वार में रुहल्की ,दयालपुर ,मुरादाबाद में सात (हाकीमपुर,मुन्डाला) ,पीलीभीत में 6,रामपुर में 2,बदायूं में 3 आगरा जिले में पांच ,गावो में शाहजहांपुर ,लखीमपुर ,नैनीताल ,उधमसिंह नगर में बड़ी संख्या में बैंस जाट निवास करते है । राजस्थान में भरतपुर जिले में 14 ग्राम(चिकसाना ,फतेहपुर,भोंट ,भौसिंगा ,कुरका ,पूंठ) बैंस (बिसायती) जाटों के है धोलपुर जिले में 4ग्राम बैंस जाटों के है मध्यप्रदेश में जाट पथरिया ,पारदी ,रायपुर में बैंस जाट है हरियाणा में कुरुक्षेत्र थानेश्वर के आसपास 20 गाम है शाहबाद,शादीपुर ,शाहीदा ,उदरसी,कमोदा,बागथळा, जटपुरा,अम्मिन,अधोल यमुनानगर में 7 गाम ,फरीदाबाद के दयालपुर में हिसार के खेहर और लाथल में कैथल और करनाल जिले में भी बैंस जाट है ।

पंजाब के गुरदासपुर में 16 गाव ,पटियाला जिले में 18,लुधियाना में 5 (मुश्काबाद ,तप्परियां ) जालंधर जिले में 28 गाव (तलहन ,आदमपुर ,कन्दोला,माजरा कलान,शहतपुर ,पुनु माजरा ,चक बिलसा ,मीरपुर ,महमूदपुर ,सरोवल ,सुन्दरपुर ,खोजपुर ,बैंस कलां, होशियारपुर जिले में 35 गाम (बैंस कलां ,बैंस खुर्द ,बैंस तनिवल,नांगल खुर्द ,कहरी,चब्बेवाल ,श्रीमालपुर,महिलपुर,गणेशपुर ,भलटा ) इसके अतरिक्त पंजाब में अलग अलग जिलो मंे 50 से अधिक गांवो में बैंस जाट निवास करते है ।

महानजाटराजाहर्षवर्धनबैंस का जन्म 590 ई . में हुआ था । इनके पिता का नाम प्रभाकर वर्धन बैंस व माता का नाम यशोमति था । इनका बचपन बड़े लाड – प्यार से बीता तथा इन्हें उच्च शिक्षा दी गई । इसके साथ – साथ शस्त्र शिक्षा का भी प्रबंध किया गया । ये इतने निपुण हो गए थे कि इन्होने मात्र 14 वर्ष की अल्प आयु में युद्ध में भाग ले लिया था । ये अच्छी शिक्षा के कारण ही उच्चकोटि का विद्वान व साहित्यकार तथा नाटककार बने । इनके बड़े भाई राजवर्धन की अचानक मृत्यु हो गई थी इस कारण इनको छोटी सी आयु में ही राजगद्दी पर बैठना पड़ा और समय इनके राज्य में अनेक कठिनाइयां थीं । राज्य को शत्रुओं से भय था ।सम्राट हर्षवर्धन जी बुद्धि के साथ – साथ तलवार के भी धनी थे युद्ध कला , साहित्य कला प्रबंध कला व अन्य कलाओं में निपुण थे ।

सम्राट हर्षवर्धन अपने युग का एक महानायक था । इसने अपने राज्य का काफी विस्तार किया, अशोक के बाद यह सबसे ज्यादा शक्तिशाली राजा था । इसने अपने राज्य का विस्तार उत्तर , दक्षिण पूर्व व पश्चिम चारों दिशाओं में किया था तथा वहां पर एक कुशल शासन प्रबंध स्थापित किया था । तलवार के साथ – साथ यह कलम का भी धनी था । इसके जीवनकाल में राज्य ने साहित्य में बहुत उन्नति की थी । सम्राट हर्षवर्धन ने अपनी स्वयं की कलम से भी कई महान कलाकृत्तियों की रचना की थी । थानेश्वर नगर इसकी उन्नति का आधार था । जब वह राजगद्दी पर बैठा तो इसके पिता , भाई व अन्य सगे संबंधियों की मृत्यु हो चुकी थी और इनका राज्य चारों तरफ से संकटों में घिरा हुआ था ।

हर्षवर्धन बैस ने अपनी बुद्धि , अच्छे विचार , कुशल शासन प्रबंध , मानसिक हौंसला तथा युद्ध कला कौशल के कारण उसे सभी संकटों से उभारा और अपने राज्य की सीमाओं की ओर विस्तार किया । सही मायने में राजा हर्षवर्धन बैंस में सम्राट अशोक महान मोरध्मौर्य गोत्री जैसे गुण थे । इसने राज्य विस्तार के साथ प्रजा हितार्थ कार्य भी करवाये व अपने शासन को उच्चकोटि का प्रबंध किया तथा एक विशाल व महान राज्य की सुदृढ़ नींव रखी । सम्राट हर्षवर्धन बैंस ने राज्य विस्तार के साथ – साथ अपने राज्य को भी बहुत ही कुशल ढंग से चलाया ।सम्राट हर्षवर्धन बैंस ने साधन सीमित होते हुए भी बहुत ज्यादा प्रजाहितार्थ कार्य करवाये थे । इसने जनता व यात्रियों के लिए विश्राम गृह बनवाये व वहां पर खाने पीने का उचित प्रबन्ध करवाया । उसके राज्य के लोगों को कहीं भी आने जाने की स्वतंत्रता थी । उसने अपनी सहायता व राज्य के कुशल प्रबन्ध के लिए मंत्री परिषद् का गठन किया हुआ था ।

उसके राज में हर कार्य का पूर लेखा – जोखा रखा जाता था । प्रत्येक मंत्री का कार्य बांटा हुआ था तथा मन्त्री के कार्य के लिए अनेक कर्मचारी थे । अपने शासन को सही व सुचारू रूप से चलाने के लिए राजा हर्षवर्धन बैंस ने अपने राज्य को कई प्रान्तों बांटा हुआ था । उसके बाद आगे भी कई भागों में बंटा हुआ था । इस में राज्य की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी जिसक मुखिया गांव के ही किसी व्यक्ति को बनाया जाता था Iराजा हर्षवर्धन के राज्य में राजतंत्र होते हुए भी गणतन्त्र प्रणाली लागू थी । उसका प्रत्येक पदाधिकारी अधिकारी व कर्मचारी सभी अपने – अपने कार्यों व पदों के जिम्मेवार थे । सारे कार्य का लेखा – जोखा रखा जाता था । प्रत्येक विभाग का एक उच्च अधिकारी था । उसकी सहायता के लिए अनेक कर्मचारी होते थे जो प्रशासन व कानून व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में सहायक थे प्रत्येक कार्य सिद्धांत व सही सम्पन्न होता था तथा प्रत्येक अधिकारी का दायित्व था कि वह अपने कार्य का लेखा – जोखा प्रस्तुत करें ।

राजा हर्षवर्धन के राज्य में ये संगत आदेश थे कि राज्य में आय व व्यय का लिखित ब्यौरा होना चाहिए राजा की आय का प्रमुख साधन भूमिकर था । इसके अलावा वस्तुओं पर कर लगाकर व जुर्माने की वसूली से खजाने को भरा जाता था । उसके बाद उस धन का बड़े सुनियोजित ढंग से प्रयोग करते हुए खर्च किया जाता था ।

कुछ धन सरकारी काम पर खर्च होता था । कुछ कर्मचारियों को दिया जाता था । कुछ विद्वानों व साहसिक कार्य करने वालो पर खर्च होता था शेष धन प्रजा के कार्यों पर खर्च किया जाता था ।सम्राट हर्षवर्धन के राज्य की न्याय प्रणाली बहुत कठोर थी । सभी अपराधियों को इसी कठोर न्याय प्रणाली के आधार पर दण्ड दिया जाता था । इसके लिए अलग से भी अधिकारी नियुक्त कर रखे थे ताकि राज्य में अपराध का फैसला किया जा सके । ग्राम स्तर पर मुखिया इसका फैसला करते थे ।

राजा हर्षवर्धन ने अपने राज्य को सही चलाने के लिए व राज्य के बाहरी शत्रुओं का मुकाबला करने के लिए एक सेना रखी हुई थी । इनकी सेना में 1 लाख 20 हजार घुड़सवार व लाखों की संख्या में पैदल सैनिक थे । इनका कार्य राज्य में सही व्यवस्था बनाना तथा लड़ाई के समय युद्ध में भाग लेना था । सेना के मुखिया को सेनापति कहा जाता था । शिक्षा के ऊपर भी राजा हर्षवर्धन बैंस ने मुख्य रूप से ध्यान दिया । शिक्षा के प्रसार के लिए अनेक विद्यालयो की स्थापना की व नालंदा विश्वविद्यालय को फिर से ऊंचा उठाया व पूर्ण रूप से दान दिया इनके दरबार में अनेक विद्वान थे । बाण उनमें प्रमुख है । उसने अनेक ग्रन्थों को लिखकर तैयार किया इनके राज्य में साहित्य , भूगोल , ज्योतिषी व चिकित्सा का बहुत विकास हुआ था इनके राज्य में तलवार के साथ – साथ साहित्य को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया व विकास किया गया । जाट सम्राट ने स्वयं भी तीन प्रसिद्ध नाटक लिखे थे जिनके नाम रत्नावली , प्रियदर्शिका, नागानन्द थे ।

इन्होंने अपने राजदरबार में अनेक साहित्यकारों को शरण दी व साहित्य का खुद विकास करवाया । सम्राट काव्य कला का भी प्रेमी था । इनके विद्वानों ने इनकी तुलना कालिदास जैसे कवि से की थी । इन सब प्रशासनिक कार्यों के साथ – साथ जाट सम्राट हर्षवर्धन अपने राज्य की सीमाओं को समय – समय पर बढ़ाया व अपने राज्य को संगठित शक्तिशाली व विशाल बनाया था । अनेक प्रदेशों पर विजय प्राप्त की जिसमें प्रमुख विजयों का वर्णन यहां कर रहा हूँ ।

सम्राट हर्षवर्धन की विजय –

ह्यूनसांग के वृत्तान्त तथा बाण के हर्षचरित से उसके निम्नलिखित युद्धों एवं विजयों का ब्यौरा मिलता है –

1, जाट इतिहास उर्दू पृ० 356 लेखक ठा० संसारसिंह।

  1. जाट वीरों का इतिहास – दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-244

बल्लभी अथवा गुजरात की विजय – हर्ष के समय धरुवसेन द्वितीय बल्लभी अथवा गुजरात का राजा था। हर्ष ने उस पर आक्रमण करके उसको पराजित किया परन्तु अन्त में दोनों में मैत्री-सम्बन्ध स्थापित हो गये। हर्ष ने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री का विवाह उससे कर दिया।

गुजरात विजय के बाद सम्राट हर्षवर्धन ने अपना कदम कामरूप राज्य की ओर बढ़ाया । वहां के राजा ने शीघ्र ही सम्राट की अधीनता स्वीकार कर ली और उसके बाद उन्होंने बंगाल पर भी आक्रमण किया और दोनों की राजनैतिक व सैनिक शक्ति ने वहां के राजा को हराया था । कामरूप के बाद सम्राट हर्षवर्धन से जो बंगाल का आधा अधूरा कार्य रह गया था । बगाल पर पहला आक्रमण करके सम्राट हर्षवर्धन ने अपने भाई के वध का बदला लिया था परन्तु वह बंगाल की शक्ति को पूरी तरह से कुचल नहीं सका था । अंत में सम्राट ने बंगाल के राजा शशांक को पूरी तरह समाप्त करने के लिए कामरूप राज्य के राजा के साथ मिलकर बंगाल पर आक्रमण कर दिया इस युद्ध में बंगाल के राजा की बुरी तरह से हार हुई थी व सम्राट हर्षवर्धन बैंस की जीत हुई और बंगाल को अपने राज्य में मिला लिया । इससे उसका राज्य और विस्तृत हो गया ।

इस बंगाल विजय के राजा हर्षवर्धन जो बैंस गोत्री था , इनकी ख्याति चारों और फैल गई । बंगाल विजय के बाद सम्राट हर्षवर्धन पश्चिमी उत्तर की ओर बढा । उसने वहां पर पंजाब को विजित किया और अपने उत्तर पश्चिमी भाग को और विस्तृत किया और उसके बाद उत्तर भारत के बिहार व उड़ीसा को विजय किया और अपने राज्य को और विस्तृत किया । इस प्रकार लगभग समस्त उत्तरी भारतवर्ष पर सम्राट हर्षवर्धन बैंस का राज्य स्थापित हो गया ।

इसके बाद हर्षवर्धन ने अपना कदम सिन्ध राज्य की ओर बढ़ाया तथा सिन्ध को अपने राज्य में मिलाया । कहते हैं सिन्ध अलग प्रान्त था वह अलग व स्वतंत्र था , परन्तु बाद में सिन्ध राजा हर्षवर्धन बैंस के अधीन हो गया था । सिन्ध विजय के बाद हर्षवर्धन ने अपने कदम नेपाल की और बढ़ाए तथा नेपाल को विजय किया और अपने राज्य में मिलाया था । नेपाल को विजय करने के बाद सम्राट ने अपने कदम गजम की ओर बढ़ाये तथा दो या तीन युद्धों के बाद ही गजम पर अधिकार कर लिया था । यह उत्तरी पूर्वी भाग का प्रदेश था । इन विजयों के बाद राजा हर्षवर्धन बैस ने अपने राज्य को स्थापित व सुदृढ़ किया ।

इसके बाद राजा हर्षवर्धन बैंस ने अपने सम्बन्ध दूसरे देशों के साथ बनाने शुरू किये । चीन , श्रीलंका, बर्मा व अन्य कई पड़ोसी देशों के अन्दर अपने राजदूत भेजे । अपनी संस्कृति व कला का प्रचार पूरी दुनिया में करने के लिए कार्य किया । वहां के कई राजाओं ने भी राजा हर्षवर्धन की दोस्ती स्वीकार करते हुए उसे अनेक बहुमूल्य उपहार के रूप भेजे थे ।

पुलकेशिन द्वितीय से युद्ध – ह्यूनसांग लिखता है कि “हर्ष ने एक शक्तिशाली विशाल सेना सहित इस सम्राट् के विरुद्ध चढाई की परन्तु पुलकेशिन ने नर्वदा तट पर हर्ष को बुरी तरह पराजित किया। यह हर्ष के जीवन की पहली तथा अन्तिम पराजय थी। उसके साम्राज्य की दक्षिणी सीमा नर्वदा नदी तक ही सीमित रह गई। इस शानदार विजय से पुलकेशिन द्वितीय की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई और उसने ‘परमेश्वर’ की उपाधि धारण की। यह युद्ध 620 ई० में हुआ था।”

राहुल सांकृत्यायन अपनी पुस्तक ‘वोल्गा से गंगा’ पृ० 242-43 पर लिखते हैं कि “सम्राट् हर्षवर्धन की एक महाश्वेता नामक रानी पारसीक (फारस-ईरान) के बादशाह नौशेखाँ की पोती थी और दूसरी कादम्बरी नामक रानी सौराष्ट्र की थी।”

हर्ष एक सफल विजेता ही नहीं बल्कि एक राजनीतिज्ञ भी था। उसने चीन तथा फारस से राजनीतिक सम्बन्ध स्थापित कर रखे थे। हर्ष एक महान् साम्राज्य-निर्माता, महान् विद्वान् व साहित्यकार था। इसकी तुलना अशोक, समुद्रगुप्त जैसे महान् शासकों से की जाती है। हर्षवर्धन की इस महत्ता का कारण केवल उसके महान् कार्य ही नहीं हैं वरन् उसका उच्च तथा श्रेष्ठ चरित्र भी है। हर्ष आरम्भ में शिव का उपासक था और बाद में बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया था। इसकी कन्नौज की सभा एवं प्रयाग की सभा बड़ी प्रसिद्ध है। हर्ष हर पांचवें वर्ष प्रयाग अथवा इलाहाबाद में एक सभा का आयोजन करता था। सन् 643 ई० में बुलाई गई सभा में ह्यूनसांग ने भी भाग लिया था। ह्यूनसांग एक चीनी भ्रमणकारी नागरिक था ।

इस सभा में पांच लाख लोगों तथा 20 राजाओं ने भाग लिया। इस सभा में जैन, बौद्ध और ब्राह्मण तथा सभी सम्प्रदायों को दान दिया गया। यह सभा 75 दिन तक चलती रही। इस अवसर पर हर्ष ने पांच वर्षों में एकत्रित किया सारा धन दान में दे दिया, यहां तक कि उसके पास अपने वस्त्र भी न रहे। उसने अपनी बहिन राज्यश्री से एक पुराना वस्त्र लेकर पहना। चीनी यात्री ह्यूनसांग 15 वर्ष तक भारतवर्ष में रहा। वह 8 वर्षो तक हर्ष के साथ रहा। उसकी पुस्तक सि-यू-की हर्ष के राज्यकाल को जानने का एक अमूल्य स्रोत है।

इनसे मिलने के लिये आने वाला वंगहुएंत्से के नेतृत्व में चीनी राजदूतदल मार्ग में ही था कि उत्तराधिकारी विहीन वैस साम्राज्य पर ब्राह्मण सेनापति अर्जुन ने अधिकार करने के लिए प्रयत्न प्रारम्भ कर दिया किन्तु वंगहुएंत्से ने तिब्बत की सहायता से अर्जुन को बन्दी बनाकर चीन भेज दिया। बताया जाता है कि वहा चीन के राजा ने इस नीच ब्राहमण की आंखे निकाल दी थी जिससे आप हांगसान की किताब में भी पढ सकतो हो ।

डूंडिया खेड़ा – सम्राट् हर्षवर्धन के वंशधरों की सत्ता कन्नौज से समाप्त होने के पश्चात् डूंडिया खेड़ा में स्थिर हुई। वहां प्रजातन्त्री रूप से इनकी स्थिति सन् 1857 ई० तक सुदृढ़ रही। 1857 के बाद अवध में सत्ताप्राप्त जैस लोगों ने अपने आप को राजपूत घोषित कर दिया। इन लोगों से अवध का रायबरेली जिला भरा हुआ है। जनपद के रूप में इनका वह प्रदेश वैसवाड़ा के नाम पर प्रसिद्ध है। वैस वंशियों की सुप्रसिद्ध रियासत डूंडिया खेड़ा को अंग्रेजों ने इनकी स्वातन्त्र्यप्रियता से क्रुद्ध होकर ध्वस्त करा दिया था।

फगवाड़ा से 7 मील दूर बैंसला गांव से हरयाणा और यू० पी० के वैस जाटों का निकास माना जाता है। लुधियाना की समराला तहसील मुसकाबाद, टपरिया, गुड़गांव में दयालपुर, हिसार में खेहर, लाथल, मेरठमें बहलोलपुर, विगास, गुवांदा और बुलन्दशहर में सलेमपुर गांव बंैस जाटों के हैं। यह सलेमपुर गांव सलीम (जहांगीर) की ओर से इस वंश को दिया गया था। फलतः 1857 ई० में इस गांव के वैसवंशज जाटों ने सम्राट् बहादुरशाह के समर्थन में अंग्रेजों के विरुद्ध भारी युद्ध किया। अंग्रेजों ने इस गांव की रियासत को तोपों से ध्वस्त करा दिया।

सन् 647 ई० में इस प्रतापी सम्राट हर्षवर्धन का निस्सन्तान स्वर्गवास हो गया और उसका साम्राज्य विनष्ट हो गया।

When Taimur Lang was defeated by combined Hindu forces. तैमूर लंग

ने मार्च सन् 1398 ई० में भारत पर 92000 घुड़सवारों की सेना से तूफानी आक्रमण कर दिया। तैमूर के सार्वजनिक कत्लेआम, लूट खसोट और सर्वनाशी अत्याचारों की सूचना मिलने पर संवत् 1455 (सन् 1398 ई०) कार्तिक बदी 5 को देवपाल राजा (जिसका जन्म #निरपड़ा गांव जिला #मेरठ में एक #जाट घराने में हुआ था) की अध्यक्षता में हरियाणा सर्वखाप पंचायत का अधिवेशन जि० मेरठ के गाँव #टीकरी, #निरपड़ा, #दोघट और #दाहा के मध्य जंगलों में हुआ।

सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये – (1) सब गांवों को खाली कर दो। (2) बूढे पुरुष-स्त्रियों तथा बालकों को सुरक्षित स्थान पर रखो। (3) प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति सर्वखाप पंचायत की सेना में भर्ती हो जाये। (4) युवतियाँ भी पुरुषों की भांति शस्त्र उठायें। (5) दिल्ली से हरद्वार की ओर बढ़ती हुई तैमूर की सेना का छापामार युद्ध शैली से मुकाबला किया जाये तथा उनके पानी में विष मिला दो। (6) 500 घुड़सवार युवक तैमूर की सेना की गतिविधियों को देखें और पता लगाकर पंचायती सेना को सूचना देते रहें।

पंचायती सेना – पंचायती झण्डे के नीचे 80,000 मल्ल योद्धा सैनिक और 40,000 युवा महिलायें शस्त्र लेकर एकत्र हो गये। इन वीरांगनाओं ने युद्ध के अतिरिक्त खाद्य सामग्री का प्रबन्ध भी सम्भाला। दिल्ली के सौ-सौ कोस चारों ओर के क्षेत्र के वीर योद्धा देश रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने रणभूमि में आ गये। सारे क्षेत्र में युवा तथा युवतियां सशस्त्र हो गये। इस सेना को एकत्र करने में #धर्मपालदेव जाट योद्धा जिसकी आयु 95 वर्ष की थी, ने बड़ा सहयोग दिया था। उसने घोड़े पर चढ़कर दिन रात दूर-दूर तक जाकर नर-नारियों को उत्साहित करके इस सेना को एकत्र किया। उसने तथा उसके भाई #करणपाल ने इस सेना के लिए अन्न, धन तथा वस्त्र आदि का प्रबन्ध किया।

प्रधान सेनापति, उप-प्रधान सेनापति तथा सेनापतियों की नियुक्ति

सर्वखापपंचायत के इस अधिवेशन में सर्वसम्मति से वीर योद्धा #जोगराजसिंहगुर्जर को प्रधान सेनापति बनाया गया। यह खूबड़ परमार वंश का योद्धा था जो #हरिद्वार के पास एक गाँव #कुंजा_सुन्हटी का निवासी था। बाद में यह गाँव मुगलों ने उजाड़ दिया था। वीर जोगराजसिंह के वंशज उस गांव से भागकर #लंढोरा (जिला #सहारनपुर) में आकर आबाद हो गये जिन्होंने लंढोरा गुर्जर राज्य की स्थापना की। जोगराजसिंह बालब्रह्मचारी एवं विख्यात पहलवान था। उसका कद 7 फुट 9 इंच और वजन 8 मन था। उसकी दैनिक खुराक चार सेर अन्न, 5 सेर सब्जी-फल, एक सेर गऊ का घी और 20 सेर गऊ का दूध।

महिलाएं वीरांगनाओं की सेनापति चुनी गईं उनके नाम इस प्रकार हैं – (1) रामप्यारी गुर्जर युवति (2) हरदेई जाट युवति (3) देवीकौर राजपूत युवति (4) चन्द्रो ब्राह्मण युवति (5) रामदेई त्यागी युवति। इन सब ने देशरक्षा के लिए शत्रु से लड़कर प्राण देने की प्रतिज्ञा की।

उपप्रधान सेनापति – (1) #धूला_भंगी (बालमीकी) (2) हरबीर गुलिया जाट चुने गये। धूला भंगी जिला #हिसार के #हांसी गांव (हिसार के निकट) का निवासी था। यह महाबलवान्, निर्भय योद्धा, गोरीला (छापामार) युद्ध का महान् विजयी धाड़ी (बड़ा महान् डाकू) था जिसका वजन 53 धड़ी था। उपप्रधान सेनापति चुना जाने पर इसने भाषण दिया कि – “मैंने अपनी सारी आयु में अनेक धाड़े मारे हैं। आपके सम्मान देने से मेरा खूब उबल उठा है। मैं वीरों के सम्मुख प्रण करता हूं कि देश की रक्षा के लिए अपना खून बहा दूंगा तथा सर्वखाप के पवित्र झण्डे को नीचे नहीं होने दूंगा। मैंने अनेक युद्धों में भाग लिया है तथा इस युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान दे दूंगा।” यह कहकर उसने अपनी जांघ से खून निकालकर प्रधान सेनापति के चरणों में उसने खून के छींटे दिये। उसने म्यान से बाहर अपनी तलवार निकालकर कहा “यह शत्रु का खून पीयेगी और म्यान में नहीं जायेगी।” इस वीर योद्धा धूला के भाषण से पंचायती सेना दल में जोश एवं साहस की लहर दौड़ गई और सबने जोर-जोर से मातृभूमि के नारे लगाये।

दूसरा उपप्रधान सेनापति हरबीरसिंह जाट था जिसका गोत्र गुलिया था। यह हरयाणा के जिला #रोहतक गांव #बादली का रहने वाला था। इसकी आयु 22 वर्ष की थी और इसका वजन 56 धड़ी (7 मन) था। यह निडर एवं शक्तिशाली वीर योद्धा था।

सेनापतियों का निर्वाचन – उनके नाम इस प्रकार हैं – (1) गजेसिंह जाट गठवाला (2) तुहीराम राजपूत (3) मेदा रवा (4) सरजू ब्राह्मण (5) उमरा तगा (त्यागी) (6) दुर्जनपाल अहीर।

जो उपसेनापति चुने गये – (1) कुन्दन जाट (2) धारी गडरिया जो धाड़ी था (3) भौन्दू सैनी (4) हुल्ला नाई (5) भाना जुलाहा (हरिजन) (6) अमनसिंह पुंडीर राजपुत्र (7) नत्थू पार्डर राजपुत्र (8) दुल्ला (धाड़ी) जाट जो हिसार, दादरी से मुलतान तक धाड़े मारता था। (9) मामचन्द गुर्जर (10) फलवा कहार।

सहायक सेनापति – भिन्न-भिन्न जातियों के 20 सहायक सेनापति चुने गये।

वीर कवि – प्रचण्ड विद्वान् चन्द्रदत्त भट्ट (भाट) को वीर कवि नियुक्त किया गया जिसने तैमूर के साथ युद्धों की घटनाओं का आंखों देखा इतिहास लिखा था।

प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर के ओजस्वी भाषण के कुछ अंश –

“वीरो! भगवान् कृष्ण ने गीता में अर्जुन को जो उपदेश दिया था उस पर अमल करो। हमारे लिए स्वर्ग (मोक्ष) का द्वार खुला है। ऋषि मुनि योग साधना से जो मोक्ष पद प्राप्त करते हैं, उसी पद को वीर योद्धा रणभूमि में बलिदान देकर प्राप्त कर लेता है। भारत माता की रक्षा हेतु तैयार हो जाओ। देश को बचाओ अथवा बलिदान हो जाओ, संसार तुम्हारा यशोगान करेगा। आपने मुझे नेता चुना है, प्राण रहते-रहते पग पीछे नहीं हटाऊंगा। पंचायत को प्रणाम करता हूँ तथा प्रतिज्ञा करता हूँ कि अन्तिम श्वास तक भारत भूमि की रक्षा करूंगा। हमारा देश तैमूर के आक्रमणों तथा अत्याचारों से तिलमिला उठा है। वीरो! उठो, अब देर मत करो। शत्रु सेना से युद्ध करके देश से बाहर निकाल दो।”

यह भाषण सुनकर वीरता की लहर दौड़ गई। 80,000 वीरों तथा 40,000 वीरांगनाओं ने अपनी तलवारों को चूमकर प्रण किया कि हे सेनापति! हम प्राण रहते-रहते आपकी आज्ञाओं का पालन करके देश रक्षा हेतु बलिदान हो जायेंगे।

मेरठ युद्ध – तैमूर ने अपनी बड़ी संख्यक एवं शक्तिशाली सेना, जिसके पास आधुनिक शस्त्र थे, के साथ दिल्ली से मेरठ की ओर कूच किया। इस क्षेत्र में तैमूरी सेना को पंचायती सेना ने दम नहीं लेने दिया। दिन भर युद्ध होते रहते थे। रात्रि को जहां तैमूरी सेना ठहरती थी वहीं पर पंचायती सेना धावा बोलकर उनको उखाड़ देती थी। वीर देवियां अपने सैनिकों को खाद्य सामग्री एवं युद्ध सामग्री बड़े उत्साह से स्थान-स्थान पर पहुंचाती थीं। शत्रु की रसद को ये वीरांगनाएं छापा मारकर लूटतीं थीं। आपसी मिलाप रखवाने तथा सूचना पहुंचाने के लिए 500 घुड़सवार अपने कर्त्तव्य का पालन करते थे। रसद न पहुंचने से तैमूरी सेना भूखी मरने लगी। उसके मार्ग में जो गांव आता उसी को नष्ट करती जाती थी। तंग आकर तैमूर हरद्वार की ओर बढ़ा।

हरिद्वार युद्ध – मेरठ से आगे मुजफ्फरनगर तथा सहारनपुर तक पंचायती सेनाओं ने तैमूरी सेना से भयंकर युद्ध किए तथा इस क्षेत्र में तैमूरी सेना के पांव न जमने दिये। प्रधान एवं उपप्रधान और प्रत्येक सेनापति अपनी सेना का सुचारू रूप से संचालन करते रहे। हरद्वार से 5 कोस दक्षिण में तुगलुकपुर-पथरीगढ़ में तैमूरी सेना पहुंच गई। इस क्षेत्र में पंचायती सेना ने तैमूरी सेना के साथ तीन घमासान युद्ध किए।

उप-प्रधानसेनापति हरबीरसिंह गुलिया ने अपने पंचायती सेना के 25,000 वीर योद्धा सैनिकों के साथ तैमूर के घुड़सवारों के बड़े दल पर भयंकर धावा बोल दिया जहां पर तीरों तथा भालों से घमासान युद्ध हुआ। इसी घुड़सवार सेना में तैमूर भी था। हरबीरसिंह गुलिया ने आगे बढ़कर शेर की तरह दहाड़ कर तैमूर की छाती में भाला मारा जिससे वह घोड़े से नीचे गिरने ही वाला था कि उसके एक सरदार खिज़र ने उसे सम्भालकर घोड़े से अलग कर लिया। (तैमूर इसी भाले के घाव से ही अपने देश समरकन्द में पहुंचकर मर गया)। वीर योद्धा हरबीरसिंह गुलिया पर शत्रु के 60 भाले तथा तलवारें एकदम टूट पड़ीं जिनकी मार से यह योद्धा अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ा।

(1) उसी समय प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर ने अपने 22000 मल्ल योद्धाओं के साथ शत्रु की सेना पर धावा बोलकर उनके 5000 घुड़सवारों को काट डाला। जोगराजसिंह ने स्वयं अपने हाथों से अचेत हरबीरसिंह को उठाकर यथास्थान पहुंचाया। परन्तु कुछ घण्टे बाद यह वीर योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गया। जोगराजसिंह को इस योद्धा की वीरगति से बड़ा धक्का लगा।

(2) हरिद्वार के जंगलों में तैमूरी सेना के 2805 सैनिकों के रक्षादल पर भंगी कुल के उपप्रधान सेनापति धूला धाड़ी वीर योद्धा ने अपने 190 सैनिकों के साथ धावा बोल दिया। शत्रु के काफी सैनिकों को मारकर ये सभी 190 सैनिक एवं धूला धाड़ी अपने देश की रक्षा हेतु वीरगति को प्राप्त हो गये।

(3) तीसरे युद्ध में प्रधान सेनापति जोगराजसिंह ने अपने वीर योद्धाओं के साथ तैमूरी सेना पर भयंकर धावा करके उसे अम्बाला की ओर भागने पर मजबूर कर दिया। इस युद्ध में वीर योद्धा जोगराजसिंह को 45 घाव आये परन्तु वह वीर होश में रहा। पंचायती सेना के वीर सैनिकों ने तैमूर एवं उसके सैनिकों को हरद्वार के पवित्र गंगा घाट (हर की पौड़ी) तक नहीं जाने दिया। तैमूर हरिद्वार से पहाड़ी क्षेत्र के रास्ते #अम्बाला की ओर भागा। उस भागती हुई तैमूरी सेना का पंचायती वीर सैनिकों ने अम्बाला तक पीछा करके उसे अपने देश हरियाणा से बाहर खदेड़ दिया।

वीर सेनापति दुर्जनपाल अहीर मेरठ युद्ध में अपने 200 वीर सैनिकों के साथ दिल्ली दरवाज़े के निकट स्वर्ग लोक को प्राप्त हुये।

इन युद्धों में बीच-बीच में घायल होने एवं मरने वाले सेनापति बदलते रहे थे। कच्छवाहे गोत्र के एक वीर राजपूत ने उपप्रधान सेनापति का पद सम्भाला था। तंवर गोत्र के एक जाट योद्धा ने प्रधान सेनापति के पद को सम्भाला था। एक रवा तथा सैनी वीर ने सेनापति पद सम्भाले थे। इस युद्ध में केवल 5 सेनापति बचे थे तथा अन्य सब देशरक्षा के लिए वीरगति को प्राप्त हुये।

इन युद्धों में तैमूर के ढ़ाई लाख सैनिकों में से हमारे वीर योद्धाओं ने 1,60,000 को मौत के घाट उतार दिया था और तैमूर की आशाओं पर पानी फेर दिया।

हमारी पंचायती सेना के वीर एवं वीरांगनाएं 35,000, देश के लिये वीरगति को प्राप्त हुए थे।

प्रधान सेनापति की वीरगति – वीर योद्धा प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर युद्ध के पश्चात् ऋषिकेश के जंगल में स्वर्गवासी हुये थे।

(सन्दर्भ-जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-३७९-३८३ )

ध्यान दीजिये। एक सवर्ण सेना का उपसेनापति वाल्मीकि था। अहीर, गुर्जर से लेकर 36 बिरादरी उसके महत्वपूर्ण अंग थे। तैमूर को हराने वाली सेना को हराने वाली कौन थे? क्या वो जाट थे?बनिए थे? क्या वो भंगी या वाल्मीकि थे? क्या वो जातिवादी थे?

नहीं वो सबसे पहले देशभक्त थे। धर्मरक्षक थे। श्री राम और श्री कृष्ण की संतान थे? गौ, वेद , जनेऊ और यज्ञ के रक्षक थे।

आज भी हमारा देश उसी संकट में आ खड़ा हुआ है। आज भी विधर्मी हमारी जड़ों को काट रहे है। आज भी हमें फिर से से एकजुट होकर अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपनी मातृभूमि की रक्षा का व्रत लेना हैं। यह तभी सम्भव है जब हम अपनी संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर सोचना आरम्भ करेंगे। आप में से कौन कौन मेरे साथ है?

लेखक : डा. विवेक आर्य

HistoryFacts : “The Tiger of Sundarban”.

HistoryFacts : “The Tiger of Sundarban”

The following chapter hasbeen taken from the historical accounts of :
▪︎Eaton, Richard. 2009. Forest clearing and the growth of Islam in Bengal. 375-389 Islam in South Asia in Practice edited by Barbara D. Metcalf, Princeton. Princeton University Press.
▪︎Ali, Momammad. 1979. Pun̐thi Sāhitye Baṅga Jayer Itihās o Gājī-Kālu-Campābatī [History of the Conquest of Bengal in Chapbook Literature and Gaji-Kalu-Champabati].. Bāgurā. Bāgurā Jelā Pariṣad
▪︎Anooshahr, Ali. 2008. The Ghazi Sultans and the Frontiers of Islam: A Comparative Study of the Late Medieval and Early Modern Periods. New York. Routledge 10.4324/9780203886656
▪︎Chattopadhyaya, Brajadulal. 2003. Studying Early India: Archeology, Texts and Historical Issues. New Delhi. Permanent Black.
▪︎”Dakshin-Ray”. nationalmuseumindia.gov.in. Retrieved December 25, 2017.
▪︎Eaton, Richard. 1993. The Rise of Islam and the Bengal Frontier, 1204–1760. Berkeley. University of California Press.

● In 1294 CE, the Nawab of #DelhiSultanate Jalal-ud-din-Firuz Khilji of the invading Turkic #KhiljiDynasty ordered his commander Zafar Khan Ghazi to capture Sundarban. Zafar Khan Ghazi along with his son Bara Khan Ghazi invaded Bengal, captured some territory neighbouring #Sundarban & started mass killings & forced conversions of the native population. When the invading Turk forces reached Shaktigarh, Maharaja Dakshin Ray of Bhati Bengal Kingdom defeated them in the Battle of Khaniya. In the ensuing battle, Zafar Khan Ghazi was beheaded by the Bengal-Chakma Army & Bara Khan Ghazi was made a prisoner.
Now, Zafar Khan Ghazi & his son Bara Khan Ghazi are referred to as Martyrs of Islam. Bara Khan Ghazi got the title ‘Shaheed Barkhan Gaji Shaheb’ & Zafar Khan Ghazi’s tomb still exist on the ruins of a Vishnu Temple in Tribeni, #WestBengal, India. Whereas, Maharaja Dakshin Ray’s legacy hasbeen erased from the history books of the Indian Subcontinent. However, still few small temples of Sundarban in India & Bangladesh have preserved Dakshin Ray’s statue as a sacred deity.

How India prevented from Muslim terrorism by Kshatriyas

स्वयं भी पढ़ें और अपने बच्चों को भी पढ़ाएं, ये आपकी आंखें खोल देगी…*

👉 622 ई से लेकर 634 ई तक मात्र 12 वर्ष में अरब के सभी मूर्तिपूजकों को मुहम्मद ने इस्लाम की तलवार के बल पर मुसलमान बना दिया।
👉 634 ईस्वी से लेकर 651 तक, यानी मात्र 16 वर्ष में सभी पारसियों को तलवार की नोक पर इस्लाम का कलमा पढ़वा दिया गया।
👉 640 में मिस्र में पहली बार इस्लाम ने पांव रखे, और देखते ही देखते मात्र 15 वर्षों में, 655 तक इजिप्ट के लगभग सभी लोग मुसलमान बना दिये गए।
👉 नार्थ अफ्रीकन देश जैसे – अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, मोरक्को आदि देशों को 640 से 711 ई तक पूर्ण रूप से इस्लाम धर्म मे बदल दिया गया, 3 देशों का सम्पूर्ण सुख चैन लेने में मुसलमानो ने मात्र 71 साल लगाए।
👉 711 ईस्वी में स्पेन पर आक्रमण हुआ, 730 ईस्वी तक स्पेन की 70% आबादी मुसलमान थी। मात्र 19 वर्षों में!
👉 तुर्क थोड़े से वीर निकले, तुर्को के विरुद्ध जिहाद 651 ईस्वी में शुरू हुआ, और अगले सौ वर्ष तक संघर्ष करते करते अंततः 751 ईस्वी तक सारे तुर्क मुसलमान बना दिये गए।
👉 इंडोनेशिया के विरुद्ध जिहाद मात्र 40 वर्ष में पूरा हुआ। 1260 में मुसलमानो ने इंडोनेशिया में मार काट मचाई, और 1300 ईस्वी तक सारे इंडोनेशियाई मुसलमान बन चुके थे।
👉 फिलिस्तीन, सीरिया, लेबनान, जॉर्डन आदि देशों को 634 से 650 के बीच मुसलमान बना दिया गया।
उसके बाद 700 ईस्वी में भारत के विरुद्ध जिहाद शुरू हुआ जो अब तक चल रहा है।
👉 अब आप भारत की स्थिति देखिये… जिस समय आक्रमणकारी ईरान तक पहुंचकर अपना बड़ा साम्राज्य स्थापित कर चुके थे, उस समय उनकी हिम्मत नही थी कि भारत के राजपूत साम्राज्य की और आंख उठाकर भी देख सकें..!!
👉 636 ईस्वी में खलीफा ने भारत पर पहला हमला बोला। एक भी आक्रांता जिंदा वापस नही जा पाया।
👉 कुछ वर्ष तक तो मुस्लिम आक्रान्ताओ की हिम्मत तक नही हुई कि भारत की ओर मुंह करके सोया भी जाएं, लेकिन कुछ ही वर्षो में गिद्धों ने अपनी जाति दिखा ही दी…!
👉 दोबारा आक्रमण हुआ, इस समय खलीफा की गद्दी पर उस्मान आ चुका था। उसने हाकिम नाम के सेनापति के साथ विशाल इस्लामी टिड्डिडल भारत भेजा। सेना का पूर्णतः सफाया हो गया, और सेनापति हाकिम बंदी बना लिया गया। हाकिम को भारतीय राजपूतो ने बहुत मारा, और बड़े बुरे हाल करके वापस अरब भेजा, जिससे उनकी सेना की दुर्गति का हाल, उस्मान तक पहुंच जाएं।
👉 यह सिलसिला लगभग 700 ईस्वी तक चलता रहा। जितने भी मुसलमानों ने भारत की तरफ मुँह किया, राजपूतो ने उनका सिर कंधे से नीचे उतार दिया ।।
👉 जब 7वी सदी इस्लाम की शुरू हुई, जब अरब से लेकर अफ्रीका, ईरान, कई यूरोपीए देश, सीरिया, मोरक्को, ट्यूनीशिया, तुर्की यह बड़े बड़े देश जब मुसलमान बन गए, भारत में “बप्पा रावल” महाराणा प्रताप के पितामह का जन्म हो चुका था। वे पूर्णतः योद्धा बन चुके थे, इस्लाम के पंजे में जकड़ गए अफगानिस्तान तक से मुसलमानों को उस वीर ने मार भगाया। केवल यही नही, वह लड़ते लड़ते खलीफा की गद्दी तक जा पहुंचे, जहां खुद खलीफा को अपनी जान की भीख मांगनी पड़ी।
👉 उसके बाद भी यह सिलसिला रुका नहीं। नागभट्ट प्रतिहार द्वितीय जैसे योद्धा भारत को मिले। जिन्होंने अपने पूरे जीवन राजपूत धर्म का पालन करते हुए पूरे भारत की न केवल रक्षा की, बल्कि हमारी शक्ति का डंका विश्व में बजाए रखा।
👉 पहले बप्पा रावल में साबित किया था कि अरब अपराजित नही हैं, लेकिन 836 ई के समय भारत में वह हुआ, जिससे विश्वविजेता मुसलमान थर्रा गए…। मुसलमानों ने अपने इतिहास में उन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन कहा है, वह सरदार भी राजपूत ही थे।
👉सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार। मिहिरभोज के बारे में कहा जाता है, कि उनका प्रताप ऋषि अगस्त्य से भी अधिक चमका..। ऋषि अगस्त्य वही है, जिन्होंने श्रीराम को वह अस्त्र दिया था, जिससे रावण का वध सम्भव था। राम के विजय अभियान के हिडन योद्धाओं में एक..! उन्होंने मुसलमानो को केवल 5 गुफाओं तक सीमित कर दिया।। यह वही समय था, जिस समय मुसलमान किसी युद्ध में केवल जीत हासिल करते थे, और वहां की प्रजा को मुसलमान बना देते, भारत के वीर राजपूत मिहिरभोज ने इन अक्रान्ताओ को अरब तक थर्रा दिया था।
👉 पृथ्वीराज चौहान तक इस्लाम के उत्कर्ष के 400 सालों बाद तक भारत के राजपूतो ने इस्लाम नाम की बीमारी भारत को नही लगने दी, उस युद्ध काल में भी भारत की अर्थव्यवस्था को गिरने नही दिया।। उसके बाद कुछ राजपूतों की आपसी खींच तान व दुश्मनी का शैतानी सहारा लेकर मुसलमान कुछ जगह घुसने में कामयाब भी हुए, लेकिन राजपूतों ने सत्ता गंवाकर भी हार नही मानी। एक दिन वह चैन से नही बैठे, अंतिम वीर दुर्गादास जी राठौड़ ने दिल्ली को झुकाकर, जोधपुर का किला मुगलों के हलक ने निकाल कर हिन्दू धर्म की गरिमा, वीरता और शौर्य को चार चांद लगा दिए ।।
👉 किसी भी देश को मुसलमान बनाने में मुसलमानो ने औसतन 20 वर्ष नही लिए। भारत में 500 वर्ष अलग अलग क्षेत्रों पर राज करने के बाद भी मेवाड़ के शेर महाराणा राजसिंह ने अपने घोड़े पर भी इस्लाम की मुहर नही लगने दी।
👉 महाराजा रणजीत सिंह के पराक्रम को कौन नहीं जानता जिन्होंने हर दुश्मन को पराजित किया
👉 महाराणा प्रताप, दुर्गादास राठौड़, मिहिरभोज, दुर्गावती, चौहान, परमार सहित लगभग सारे राजपूत अपनी मातृभूमि के लिए जान पर खेलते गए। एक समय तो ऐसा आ गया था जब लड़ते लड़ते राजपूत केवल 2% पर आकर ठहर गए ।।
👉 एक बार पूरी दुनिया की ओर देखें और आज अपना वर्तमान देखे…!! जिन मुसलमानो ने 20 वर्षों में लगभग आधे विश्व की आबादी को मुसलमान बना दिया, वह भारत में केवल पाकिस्तान बांग्लादेश तक सिमट कर ही क्यों रह गए ?
👉 मान लिया कि उस समय लड़ना राजपूत राजाओं का धर्म था, लेकिन जब राजाओं ने अपना धर्म निभा दिया, तो आज उनकी बेटियों, पोतियों पर काल्पनिक कहानियां गढ़कर उन योद्धाओं के वंशजो का हिंदुओ द्वारा ही अपमान किया गया। कुछ कथित सेकुलर हिन्दूओं द्वारा ही उन आक्रांताओं के थोपे गए झूंठे इतिहास का महिमामंडन करना बेहद शर्मनाक है।
👉 राजा भोज, विक्रमादित्य, नागभट्ट प्रथम, नागभट्ट द्वितीय, चंद्रगुप्त मौर्य, बिंदुसार, समुद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, छत्रसाल बुंदेला, आल्हा उदल, राजा भाटी, भूपत भाटी, चाचादेव भाटी, सिद्ध श्री देवराज भाटी, कानड़ देव चौहान, वीरमदेव चौहान, हठी हम्मीर देव चौहान, विग्रहराज चौहान, मालदेव सिंह राठौड़, विजय राव लांझा भाटी, भोजदेव भाटी, चूहड़ विजयराव भाटी, बलराज भाटी, घड़सी, रतनसिंह, राणा हमीर सिंह और अमर सिंह, अमर सिंह राठौड़, दुर्गादास राठौड़, जसवंत सिंह राठौड़ मिर्जा, राजा जयसिंह, राजा जयचंद, भीमदेव सोलंकी, सिद्ध श्री राजा जय सिंह सोलंकी, पुलकेशिन द्वितीय सोलंकी, रानी दुर्गावती, रानी कर्णावती, राजकुमारी रत्नाबाई, रानी रुद्रा देवी, हाड़ी रानी, पद्मावती, तोगा जी, वीरवर कल्लाजी, जयमल जी जेता कुपा, गोरा बादल राणा रतन सिंह, पजबन राय जी कच्छवा, मोहन सिंह मंढाड़, राजा पोरस, हर्षवर्धन बेस, सुहेलदेव बेस, राव शेखाजी, राव चंद्रसेन जी दोड़, राव चंद्र सिंह जी राठौड़, कृष्ण कुमार सोलंकी, ललितादित्य मुक्तापीड़, जनरल जोरावर सिंह कालुवारिया, धीर सिंह पुंडीर, बल्लू जी चंपावत, भीष्म रावत चुण्डा जी, रामसाह सिंह तोमर और उनका वंश, झाला राजा मान सिंह, महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर, स्वतंत्रता सेनानी राव बख्तावर सिंह अमझेरा वजीर सिंह पठानिया, राव राजा राम बक्स सिंह, व्हाट ठाकुर कुशाल सिंह, ठाकुर रोशन सिंह, ठाकुर महावीर सिंह, राव बेनी माधव सिंह, डूंगजी, भुरजी, बलजी, जवाहर जी, छत्रपति शिवाजी और हमारे न जाने अनगिनत लोक देवता और एक से बढ़कर एक योद्धा लोक देवताओं, संत, सती जुझार, भांजी जडेजा, अजय पाल देव जी।
👉 यह तो केवल कुछ ही नाम हैं जिन्हें हमने गलती से किसी इतिहास या फिर किसी पुस्तक में पढ़ लिया वरना स्कूल पाठ्यक्रम में तो इन वीरों नाम निशान नहीं मिलेगा। एक से बढ़कर एक योद्धा पैदा हुए हैं जिन्होंने 18 वर्ष की आयु से पहले ही अपना योगदान दे दिया घर के घर, गांव के गांव, ढाणी की ढाणी खाली हो गईं… जब कोई भी पुरुष नहीं बचा किसी गांव या ढाणी में पूरा का पूरा परिवार पूरे पूरे गांव कुर्बान हो गए… एक रणभेरी पर बच्चा बच्चा जान हथेली पर रखकर चल गया धर्म के लिए आहुति देने…।
👉 आज हमारे यहाँ हिन्दू, सिख, ईसाई आदि इन्हीं बलिदानियों के महान बलिदानों के कारण अस्तित्व में बचे हुए हैं।

*👉 सभी बंधुओं से निवेदन है कि यह जानकारी अधिक से अधिक शेयर करें क्योंकि ये जानकारी पाठ्यपुस्तकों में पढ़ने को नहीं मिलेगी। कारण यह है कि स्वतंत्र भारत के पहले पांच शिक्षा मंत्री उन आक्रांता मुगलों के प्रचारक थे!!

Read yourself and teach your children too, it will open your eyes…*

In just 12 years from 622 AD to 634 AD, Muhammad converted all the idolaters of Arabia to Islam on the strength of the sword of Islam.
From 634 AD to 651, that is, in just 16 years, all the Parsis were taught the Kalama of Islam at the tip of the sword.
Islam first set foot in Egypt in 640, and in just 15 years, by 655, almost all the people of Egypt were converted to Islam.
North African countries like – Algeria, Tunisia, Morocco etc. were completely converted to Islam from 640 to 711 AD, Muslims took only 71 years to take complete happiness of 3 countries.
Spain was invaded in 711 AD, by 730 AD 70% of the population of Spain was Muslim. In just 19 years!
The Turks turned out to be a little brave, the jihad against the Turks began in 651 AD, and after fighting for the next hundred years, all the Turks were finally converted to Muslims by 751 AD.
Jihad against Indonesia completed in just 40 years. In 1260, Muslims attacked Indonesia, and by 1300 AD all Indonesians had become Muslims.
Countries like Palestine, Syria, Lebanon, Jordan etc. were made Muslims between 634 and 650.
_ after that jihad against India started in 700 AD which is going on till now._
Now you see the condition of India… At the time when the invaders had established their big empire after reaching Iran, at that time they did not have the courage to see the Rajput empire of India even by raising their eyes..!!
In 636 AD, the Caliph launched the first attack on India. Not a single invader could go back alive.
For a few years, the Muslim invaders did not even dare to sleep facing India, but within a few years the vultures showed their caste…!
There was an attack again, at this time Osman had come to the throne of the Caliph. He sent a huge Islamic locust to India with a general named Hakim. The army was completely wiped out, and the commander Hakim was taken prisoner. The prince was killed a lot by the Indian Rajputs, and sent back to Arabia in a very bad condition, so that the condition of the misfortune of his army would reach Osman.
This process continued till about 700 AD. All the Muslims who turned their face towards India, Rajputs took their heads down from the shoulders.
When 7th century Islam started, when from Arabia to Africa, Iran, many Europa countries, Syria, Morocco, Tunisia, Turkey when these big countries became Muslims, “Bappa Rawal” Maharana Pratap’s grandfather was born in India It was over He had become a complete warrior, the Muslims were killed by that hero from Afghanistan, caught in the claws of Islam. Not only this, while fighting he reached the throne of the Caliph, where the Caliph himself had to beg for his life.
Even after that this process did not stop. India got warriors like Nagabhatta Pratihara II. Those who followed Rajput religion their whole life not only protected the whole of India, but also kept the sting of our power in the world.
It was first proved in Bappa Rawal that Arabs are not undefeated, but during 836 AD, it happened in India, which stunned the world-conquering Muslims. Muslims have called him their biggest enemy in their history, that Sardar was also a Rajput.
Emperor Mihirbhoja Pratihara. It is said about Mihirbhoja, that his majesty shone more than sage Agastya. Sage Agastya is the one who gave the weapon to Shri Ram, by which it was possible to kill Ravana. One of the hidden warriors of Rama’s conquest..! He limited the Muslims to only 5 caves. This was the same time, when the Muslims only won a war in a war, and would have made the people there Muslims, the brave Rajput of India, Mihirbhoj, shook these revolutionaries to Arabia.
Till 400 years after the rise of Islam till Prithviraj Chauhan, the Rajputs of India did not let the disease named Islam affect India, did not allow India’s economy to fall even during that war. After that, the Muslims managed to enter some places by taking the diabolical support of mutual tension and enmity of some Rajputs, but the Rajputs did not give up even after losing their power. One day he did not sit peacefully, the last hero Durgadas ji Rathore bowed down Delhi, the fort of Jodhpur was taken out by the circles of the Mughals, adding to the dignity, valor and valor of Hindu religion. .
Muslims did not take an average of 20 years to convert any country into a Muslim. Even after ruling over different regions in India for 500 years, Maharana Raj Singh, the lion of Mewar, did not allow the stamp of Islam even on his horse.
Who does not know the might of Maharaja Ranjit Singh who defeated every enemy
Almost all Rajputs including Maharana Pratap, Durgadas Rathod, Mihirbhoj, Durgavati, Chauhan, Parmar went on to play for their motherland. There was a time when the fighting Rajputs stopped at only 2%.
Look at the whole world once and see your present today…!! The Muslims who converted almost half of the world’s population into Muslims in 20 years, why did they remain confined to Pakistan and Bangladesh only in India?
It was accepted that fighting was the religion of the Rajput kings at that time, but when the kings performed their religion, today the descendants of those warriors were insulted by the Hindus by creating imaginary stories on their daughters and granddaughters. Glorifying the false history imposed by some so-called secular Hindus

बंद हो जिहादी सूफियों को ‘संत’ कहना

*मंदिर तोड़े, गाँव के गाँव मुस्लिम बना दिए•
*राजाओं का भी किया धर्मांतरण•
*बंद हो जिहादी सूफियों को ‘संत’ कहना•
*वामपंथियों ने किया गुणगान•


भारत में अक्सर ‘सूफी परंपरा’ की तुलना ‘भक्ति आंदोलन’ से की जाती रही है। ऐसा जानबूझ कर किया जाता है, ताकि रैदास और चैतन्य महाप्रभु जैसों की तुलना में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती और चाँद मियाँ जैसों को खड़ा किया जा सके। सूफियों को ‘संत’ कहा जाता है, ताकि हिन्दू भी उनका सम्मान करें, उनकी पूजा करें और उनके मजार पर जाकर मत्था टेकें। क्या वाकई में ये सूफी इतने महान थे? इन्हिने हिन्दू-मुस्लिम एकता बढ़ाई और गरीबों की सेवा की?

असल में इन सूफी फकीरों को भेजा ही इसीलिए जाता था, ताकि वो गरीबों को बहला-फुसला कर और उनके साथ प्रेमपूर्वक बर्ताव कर के इस्लामी धर्मांतरण कराएँ। जैसे इस्लामी शासन खून-खराबे से साम्राज्य विस्तार करते चलते थे, इन सूफियों को समाज को तोड़ने के लिए लगाया जाता था। वो अच्छी-अच्छी बातें करते थे, ताकि लोग उन्हें ‘संत’ मानें। उद्देश्य इस्लामी आक्रांताओं और सूफियों का समान ही था – इस्लाम का विस्तार।

लेखिका तस्लीमा नसरीन ने भी अपनी पुस्तक ‘निषिद्ध’ में लिखा है कि सूफियों के ‘प्रेमपूर्वक बर्ताव’ के कारण कई हिन्दुओं ने धर्मांतरण किया। इसका एक उदाहरण देखिए। पेंटर अकबर पद्ममसी के पूर्वज कभी हिन्दू हुआ करते थे, लेकिन 17वीं शताब्दी सूफी पीर सददीन ने उनके परिवार का इस्लामी धर्मांतरण करा के उन्हें मुस्लिम बना दिया। पूरे परिवार के मन में बिठा दिया गया कि पैगंबर मुहम्मद, विष्णु के 11वें अवतार हैं।

आइए, एक उदाहरण बंगाल से भी लेते हैं। बंगाल में एक राजा गणेश हुए हैं। उनके राज्य में भी क़ुतुब अल आलम नाम का सूफी फ़कीर आकर रहता था और उसने अपनी ‘चमत्कारी’ छवि बना रखी थी। आक्रांताओं के खतरे को कम करने के लिए राजा ‘चमत्कार’ का सहारा लेने पहुँचे। सूफी ने कह दिया कि राजा गणेश का बेटा जदु यदि इस्लाम अपना कर राज्य चलाता है तो सारे खतरे टल जाएँगे।

फिर क्या था, जदु को ‘जलालुद्दीन मुहम्मद शाह’ बना कर गद्दी पर बिठा दिया गया। क़ुतुब अल आलम की मौत के बाद राजा गणेश ने पूरे विधि-विधान से उसे हिन्दू धर्म में वापस लाने की प्रक्रिया पूरी की और ‘दनुजमर्दन देव’ नाम से उसका नया नामकरण किया। हालाँकि, ‘सूफी’ का प्रभाव उस पर ऐसा पड़ा था कि पिता की मौत के बाद उसने फिर इस्लाम अपना लिया। उसका बेटा ‘शमशुद्दीन अहमद शाह’ हुआ। 15वीं शताब्दी के दूसरे दशक में हुए इस उथल-पुथल ने बंगाल में इस्लाम का विस्तार शुरू किया।

इसी तरह 14वीं शताब्दी के कुछ शिलालेख शाह जलाल मुजर्रद की बातें करते हैं। बताया गया है कि वो ‘जिहाद’ और ‘काफिरों के खिलाफ युद्ध’ के लिए भारत आया था। साथ ही कहा गया था कि ‘दारुल हरब (नॉन-इस्लाम के राज वाली भूमि)’ में शहीद होकर वो ‘गाजी’ बन सकता है, ऐसी उसे शिक्षा मिली थी। वो युद्ध लड़ता था और अपने जीत होने पर अपने अनुयायियों के साथ इस्लाम का झंडा गाड़ता था।

इसी तरह बंगाल के एक और तथाकथित ‘सूफी संत’ शेख जलाल अल-दीन तबरीजी को देखिए। 13वीं शताब्दी में वो दिल्ली आया था, लेकिन वहाँ भाव न मिलने पर बंगाल आ गया। उसके पक्ष में दलीलें दी जा सकती हैं कि उसने अस्पताल व सामुदायिक किचन बनवाए, लेकिन उसके बारे में समकालीन स्रोतों ने ये भी लिखा है कि उसने एक ‘काफिर’ द्वारा बनवाए गए मंदिर को ध्वस्त कर दिया और उसकी जगह वहाँ ‘सूफी तकिया (रेस्ट हाउस)’ बनवाया। लिखा है कि उसने कई ‘काफिरों’ का इस्लामी धर्मांतरण कराया था।

ये भारत में आने वाले सबसे शुरुआती सूफी लोग थे। जब शुरुआत ही ऐसी थी तो फिर उसके बाद क्या सब हुआ होगा, ये आप समझ सकते हैं। असल में ये सूफी इस्लामी आक्रांताओं का मुखौटा होते थे, जो समाज को प्रदूषित करते हुए हिन्दू राजाओं के विरुद्ध माहौल तैयार करते थे। कभी-कभी ये युद्ध भी लड़ते थे। इस्लामी आक्रांताओं का राज आने पर इन्हें महत्वपूर्ण स्थान मिलता था, इसीलिए गरीब लोग भी इन्हें अपना सब कुछ मान लेते थे।

आइए, अब उन दो सूफी संतों की बात करते हैं, जिन्हें भारत में आज भी पूजा जाता है। स्पष्ट है कि पहला नाम इसमें अजमेर के ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का है। ये महज ‘संयोग’ ही था या कुछ और कि जिस साल मोहम्मद गोरी हार कर भागा, उसके अगले ही साल या कुछ ही दिनों बाद एक सूफी संत ने अजमेर में डेरा जमाया, पृथ्वीराज चौहान की राजधानी में। वहाँ वह कई चमत्कार करने लगा। आस-पास के लोगों में उसके प्रति जिज्ञासा जागी। वह लोगों से काफी अच्छे से पेश आता। गाँव के गाँव इस्लाम में धर्मांतरित होने शुरू हो गए।

बिना हथियार उठाए चिश्ती ने वो जमीन तैयार कर दी, जहाँ वो अगले 44 वर्षों तक इस्लाम का प्रचार-प्रसार करता रहा। 1191 में गोरी हारा और 1192 में दोबारा लौट कर आया। इसी अवधि के बीच चिश्ती ने अजमेर में डेरा जमाया। आखिर ऐसे संवेदनशील समय में चिश्ती भारत क्यों आया था? वो अपने चेलों-शागिर्दों के साथ पहुँचा था। चिश्ती ‘काफिरों के खिलाफ इस्लामी जिहाद’ के लिए भारत आया था।

तभी तो पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद ‘ख्वाजा’ मोईनुद्दीन चिश्ती ने जीत का श्रेय लेते हुए कहा था, “हमने पिथौरा (पृथ्वीराज चौहान) को जिंदा दबोच लिया और उसे इस्लाम की फौज के हवाले कर दिया।” पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ गद्दारी वाला युद्ध लड़ने के लिए ही मोईनुद्दीन चिश्ती भारत आया था, ताकि वो मोहम्मद गोरी की तरफ से उसकी सहायता कर सके और उसका काम आसान कर सके।

इसी तरह बहराइच में गाजी सैयद सालार मसूद उर्फ़ गाजी मियाँ की दरगाह है, जिसने हिन्दुओं का कत्लेआम किया था और धर्म ग्रंथों को तहस-नहस किया था। उसे महाराजा सुहेलदेव ने सन् 1034 के एक युद्ध में मार गिराया था। गाजी भारत में कई बार आक्रमण करने वाले मौमूद गजनवी का भांजा था। इस्लामी आक्रांता फिरोजशाह तुगलक ने उसका मजार बनवाया था। वामपंथियों की मानें तो हिन्दू उसे प्यार से ‘बाले मियाँ’ और ‘हठीला’ कहते थे, बाल श्रीकृष्ण से उसकी तुलना करते थे।

उसने ज़ुहरा बीबी नाम की एक लड़की से शादी की थी। दावा किया जाता है कि उसने उस लड़की का अंधापन ठीक कर दिया था। हालाँकि, आपको भारत में आए सूफियों और फकीरों के बारे में कई ऐसी कहानियाँ मिलेंगी, जहाँ उन्होंने किसी लड़की या उसके परिवार पर इस तरह का ‘चमत्कार’ कर के उससे शादी की हो। इतिहासकार एना सुवोरोवा ने तो गाजी मियाँ की तुलना श्रीकृष्ण और श्रीराम तक से कर दी है और कहा है कि हिन्दू उसे इसी रूप में देखते थे।

‘दैनिक जागरण’ में वरिष्ठ लेखक व पत्रकार अनंत विजय ने भी अपने एक स्तंभ में लेखक सुधीश पचौरी के हवाले से लिखा है कि ये सूफी इस्लाम के प्रचारक थे। वो सुल्तानों के साथ आते थे, और कट्टर से इतर नरम रुख अपनाते थे। सुल्तान जहाँ जाते थे, वहाँ सूफी इस्लाम को मजबूर करने निकल पड़ते थे। हिंदी साहित्य में भी ‘संत’ बता कर उनका महिमामंडन किया गया। अब समय आ गया है कि इन सूफियों को ‘संत’ न कहा जाए।
(26 September, 2021अनुपम कुमार सिंहआप इण्डिया काम)

हरिसिंह नलवा एकबाहुबलीका स्मरण

एकबाहुबलीका_स्मरण

1699 में जब पिता दशमेश ने ‘खालसा’ सजाई थी तो उसके साथ विजय हुंकार करते हुए कहा था “राज करेगा खालसा, आकि रहे न कोई”।

एक ने उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से जो ‘देबबंद’ से शुरू होकर ‘कश्मीर’ तक जाता था, वहां के हिन्दुओं को अभय दिया तो दूसरे ने पंजाब के बाद पेशावर तक के हिन्दू और सिखों को अपनी सुरक्षा छाया में निर्भय कर दिया। “पिता दशमेश” की आकांक्षा को पूर्ण करने वाला एक “संन्यासी” था और दूसरा “क्षत्रिय सिख” जिसने “गुरदयाल उप्पल” और “धर्मा कौर” के घर जन्म लिया था और बड़े सामान्य परिवार में जन्मा ये वीर अपनी योग्यता से केवल 14 साल की उम्र में “धर्म के सूर्य” सम्राट रणजीत सिंह की आँखों का ऐसा तारा बन गया था कि महाराज उसके बिना रह ही नहीं पाते थे।

पिता दशमेश के इस “जयघोष” के संकल्प को मूर्त रूप देने को प्रस्तुत हुए “बाबा बंदा सिंह बहादुर” और “हरिसिंह नलवा”।

पूर्ण वैदिक और पूर्ण पौराणिक “महाराज रणजीत सिंह” ने शिकार के दौरान उनपर हमला करने वाले एक शेर को अकेले ही मार गिराने के बाद हरिसिंह को “नलवा” (प्रतापी सम्राट नल नाम पर) नाम दिया था और इस अजेय सेनापति ने उनके लिए उस अफगानिस्तान को जीत लिया जिसे अजेय और दुर्गम समझा जाता रहा था।

“महाराज रणजीत सिंह” ने भारत-भूमि की सीमा का पश्चिमी दिशा में जहाँ तक विस्तार का स्वप्न देखा, ‘नलवा’ की तलवार उसे साकार करती गई।

स्पेन के फर्डिनांड, बप्पा रावल, नागभट्ट द्वितीय और बंदा सिंह बहादुर के बाद हरिसिंह नलवा ही थे, जिनके नाम से आकियों (आक्रान्ताओं) की रातों की नींद उड़ जाया करती थी।

शोले फिल्म का मशहूर डायलॉग “यहाँ से पचास-पचास मील दूर जब कोई बच्चा रोता है तो माँ कहती है, सो जा नहीं तो गब्बर आ जायेगा” दरअसल हरिसिंह नलवा के जीवनवृत से चुराया हुआ है। अफ़गानी माएं अपने बच्चों को सुलाते हुए कहा करतीं थी :- “सो जा नहीं तो नलवा आ जायेगा”।

“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” “कटक से अटक” तक के जिस भारत के सांस्कृतिक एक्य की बात अपने बौद्धिक सत्रों में करता है उसे राजनैतिक रूप से सदियों बाद “नलवा” ने एक कर साकार कर दिया था।

1813 ई. में अटक, 1818 ई. में मुल्तान,1819 .में कश्मीर और फिर 1823 ई. में पेशावर …..एक के बाद इन प्रदेशों को जीतकर रणजीत सिंह की सीमा का विस्तार हरिसिंह नलवा ने ही किया था।

एक कुशल सेनापति “सरदार हरि सिंह नलवा” एक संत भी थे जो नानक जी के “सरबत का भला” से लेकर पिता दशमेश के स्वप्न “राज करेगा ख़ालसा” के “रणंजय” भी थे। इन दोनों महान गुणों को एकसाथ शिरोधार्य करने वाले “नलवा” ‘बंदा सिंह बहादुर’ की श्रेणी में थे।

आज के दिन यानि #30_अप्रैल को 1837 ईo में जमरूद में भयंकर लड़ाई हुई, हरिसिंह नलवा उस वक़्त गंभीर रूप से बीमार थे पर “रणंजय” नलवा ने बिस्तर पर पड़े रहने की बजाये युद्ध-भूमि में जाना स्वीकार किया और जैसे ही अफ़गानों ने सुना कि “नलवा” युद्धभूमि में आ गया है, वो भागने शुरू हो गए, जो भागे नहीं उनके हाथ से भय से तलवारें छूटने लगी। इस बुखार की हालत में भी उन्होंने अफगानों की 14 तोपें छीन लीं पर छल से दो गोलियां उन्हें मारी गई और उन्होंने शरीर छोड़ दिया। शरीर त्यागने के बाद अफगान उत्साहित न हों और उनकी अपनी सेना हतोत्साहित न हो इसके लिए उनकी इच्छा के अनुरूप उनके “शरीरांत” की बात छुपाई गई और उनके मृत शरीर को किले के परकोटे पर तीन दिनों तक बैठे हुए अवस्था में लाकर रखा गया मानो ये वीर वहीं से सेना का निरीक्षण कर रहे हों।

युद्धभूमि में उनकी इस उपस्थिति से जीत की ओर बढ़ रहे अफ़गानों को पराजय का सामना करना पड़ा और अपनी सेना को विजयश्री का वरण करवाकर ही उनकी आत्मा ने स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया।

“31 अक्तूबर 1987, नागपुर के विदर्भ क्रिकेट स्टेडियम में सुनील गावस्कर ने न्यूजीलैंड के खिलाफ 103 रनों की नाबाद पारी खेली थी। इस दिन सुनील गावस्कर को 102 डिग्री बुखार था”

गावस्कर के संदर्भ में ये “बुखार में शतक” वाली बात भारत के बच्चे-बड़े सबको पता है पर 19 वीं सदी के एक वीर हरिसिंह ने भी “बुखार” में राष्ट्र बचाया था, राष्ट्र की सीमाओं को विस्तृत किया था और समर-भूमि में बलिदान देकर अमर हो गए थे, ये बात हममें से कितनों को पता है?

आत्मचिंतन करिये, अपने वीरों के प्रति अपनी कृतघ्नताओं पर सोचिये और हो सके तो आज “हरिसिंह नलवा” को उनकी पुण्यतिथि पर कुछ देर के लिए ही सही याद कर लीजिए; ताकि हमारे कुछ पापों का परिमार्जन हो सके।

Mamta Yas

रामप्यारी गुर्जरी

रामप्यारी गुर्जरी

तैमूर लंग का नाम लेते ही एक क्रूर और खतरनाक आक्रान्ता का चेहरा हमारे सामने आ जाता है। कहा जाता है कि तैमूर ने इतनी हत्याएं की थी कि दुनिया की आबादी में 3 फीसदी की कमी आ गई थी। वर्ष 1398 में भारत पर आक्रमण करने वाले तैमूर इतनी बर्बरता फैलायी थी कि उसके वर्णन मात्र से रूह कांप जाती है। लेकिन भारतवर्ष की एक वीरागंना ऐसी थी जिसने युद्ध में न सिर्फ तैमूर को उसी की भाषा में जवाब दिया बल्कि इस वीरांगना के युद्ध कौशल से डर कर तैमूर को भारत विजय का अभियान छोड़ कर जाना पड़ा। उस वीरांगना का नाम था रामप्यारी गुर्जरी।

बचपन से ही निडर और हठी थीं रामप्यारी गुर्जरी
सहारनपुर के चैहान गुर्जर परिवार में जन्मी रामप्यारी बचपन से ही निडर और हठी स्वभाव की थी। पुरूषों की वेशभूषा पसंद करने वाली रामप्यारी पहलवान बनना चाहती थी और प्रतिदिन अपनी मां से इस संबंध में सवाल पूछंती थी और नियमित व्यायाम करती थी। युवा होने तक रामप्यारी युद्धकौशल में भी दक्ष हो गई थी। उसकी बुद्धमिता और युद्ध कौशल के चर्चे आस-पास के सभी इलाकों में थे।

भारत में इस्लाम की ध्वजा लहराना तैमूर का था मुख्य उद्देश्य
वर्ष 1398 में भारतवर्ष पर तुगलक वंश के नसीरूद्दीन तुगलक का शासन हुआ करता था। उसी समय समरकन्द के क्रूर आक्रांता तैमूर लंग ने आक्रमण कर नसीरूद्दीन तुगलक को हरा दिया और दिल्ली में जीत का खुनी जश्न मनाया। दिल्ली में अनगिनत हिंदुओं को मारने के बाद तैमूर की नजर हिंदूओं के तीर्थों की ओर कीं। ब्रिटिश इतिहासकार विन्सेंट ए स्मिथ ने अपनी पुस्तक ‘द ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ इंडिया: फ्रोम द अर्लीएस्ट टाइम्स टू द एण्ड ऑफ 1911’ में लिखा है कि भारत में तैमूर के अभियान का मुख्य उद्देश्य था, सनातन समुदाय का विनाश कर भारत में इस्लाम की ध्वजा लहराना।

फिर तैयार की गई युद्ध लड़ने की रणनीति
यह सूचना जाट क्षेत्र में पहुंची, जाट क्षेत्र में आज का हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ भाग आते हैं। जाट क्षेत्र के तत्कालीन प्रमुख देवपाल ने महापंचायत का आयोजन किया। इस महापंचायत में जाट, गुर्जर, अहीर, वाल्मीकि, राजपूत, ब्राह्मण एवं आदिवासी जैसे अनेक समुदायों के सदस्य शामिल थे। महापंचायत में देवपाल ने न केवल तैमूर के अत्याचारों को सबके समक्ष उजागर करते हुए सनातन की रक्षा के लिए आपसी भेदभाव मिटा कर तैमूर को उसी की भाषा में जवाब देने की अपील की। इसके बाद जाट महापंचायत ने तैमूर की सेना ने छापामार युद्ध लड़ने की रणनीति बनाई।

रामप्यारी गुर्जरी बनीं महिला सैनिकों की टुकड़ी की सेनापति
रणनीति के मुताबिक महापंचायत की सेना में 80 हजार पुरूष योद्धा शामिल किए गए और जोगराज सिंह गुर्जर इस सेना के मुखिया व हरवीर सिंह गुलिया सेनापति बने और तय किया गया कि 40 हजार महिला सैनिकों की एक टुकड़ी भी तैयार की जाए। लेकिन समस्या यह थी कि महिला टुकड़ी का नेतृत्व कौन करेगा। तभी रामप्यारी गुर्जरी का नाम सामने आया और वह इस महिला सैनिकों की टुकड़ी की सेनापति बनाई गई।

तैमूर की सेना की जासूसी के लिए लगाए गए 500 युवा अश्वारोही
एक सुनियोजित योजना के अंतर्गत 500 युवा अश्वारोहियों को तैमूर की सेना पर जासूसी के लिए लगाया गया, जिससे उसकी योजनाओं और भविष्य के आक्रमणों के बारे में पता चल सके। योजना के मुताबिक तैमूर जिस स्थान पर हमला करने की योजना बनाता, तो उसके हमले से पहले ही रोगियों, वृद्धों और छोटे बच्चों को सुरक्षित स्थानों पर सभी मूल्यवान वस्तुओं सहित दूसरे स्थान पर पहुंचा दिया जाता।

वीर रामप्यारी गुर्जर ने देश हित में ली प्रतिज्ञा कि…
वीर रामप्यारी गुर्जर ने देशरक्षा हेतु शत्रु से लड़कर प्राण देने की प्रतिज्ञा की। जोगराज के नेतृत्व में बनी 40,000 ग्रामीण महिलाओं की सेना को युद्ध विद्या के प्रशिक्षण व निरीक्षण का दायित्व भी रामप्यारी चैहान गुर्जर के पास था, इनकी चार सहकर्मियां भी थीं, जिनके नाम थे हरदाई जाट, देवी कौर राजपूत, चंद्रों ब्राह्मण और रामदाई त्यागी।

रामप्यारी की हुंकार पर शामिल हुईं वीरांगनाएं
इन 40,000 महिलाओं में गुर्जर, जाट, अहीर, राजपूत, हरिजन, वाल्मीकि, त्यागी, तथा अन्य वीर जातियों की वीरांगनाएं शामिल थीं। इनमें से कई ऐसी महिलाएं भी थीं, जिन्होने कभी शस्त्र का मुंह भी नहीं देखा था पर रामप्यारी की हुंकार पर वह अपने को रोक ना पायी। जाट क्षेत्र के सभी गांवों के युवक-युवतियां अपने नेता के संरक्षण में प्रतिदिन शाम को गांव के अखाड़े पर एकत्र हो जाया करते थे और व्यायाम, मल्ल युद्ध तथा युद्ध विद्या का अभ्यास किया करते थे।

अंततः युद्ध का दिन समीप आ गया
अंततः युद्ध का दिन समीप आ गया, गुप्तचरों की सूचना के अनुसार तैमूर लंग अपनी विशाल सेना के साथ मेरठ की ओर कूच कर रहा था। सभी एक लाख 20 हजार पुरूष व महिला सैनिक केवल महाबली जोगराज सिंह गुर्जर के युद्ध आवाहन की प्रतीक्षा कर रहे थे। जोगराज सिंह गुर्जर ने कहा, हमारे राष्ट्र को तैमूर के अत्याचारों ने लहूलुहान किया है। योद्धाओं, उठो और क्षण भर भी विलंब न करो। शत्रुओं से युद्ध करो और उन्हें हमारी मातृभूमि से बाहर खदेड़ दो”।

तैमूर को देश के बाहर खदेड़ने की खाई कसम
सभी योद्धाओं ने शपथ ली कि वे किसी भी स्थिति में अपने सैन्य प्रमुख की आज्ञाओं की अवहेलना नहीं करेंगे, और वे तब तक नहीं बैठेंगे जब तक तैमूर और उसकी सेना को भारत भूमि से बाहर नहीं खदेड़ देते।

रामप्यारी गुर्जर ने तैयार की अपनी सेना की तीन टुकड़ियाँ
रामप्यारी गुर्जर ने अपनी सेना की तीन टुकड़ियाँ बनाई। जहां एक ओर कुछ महिलाओं पर सैनिकों के लिए भोजन और शिविर की व्यवस्था करने का दायित्व था, तो वहीं कुछ महिलाओं ने युद्धभूमि में लड़ रहे योद्धाओं को आवश्यक शस्त्र और राशन का बीड़ा उठाया। इसके अलावा रामप्यारी गुर्जर ने महिलाओं की एक और टुकड़ी को शत्रु सेना के राशन पर धावा बोलने का निर्देश दिया, जिससे शत्रु के पास न केवल खाने की कमी होगी, अपितु धीरे धीरे उनका मनोबल भी टूटने लगे, उसी टुकड़ी के पास विश्राम करने को आए शत्रुओं पर धावा बोलने का भी भार था।

20 हजार योद्धाओं ने तैमूर की सेना पर किया हमला
ईरानी इतिहासकार शरीफुद्दीन अली यजीदी द्वारा रचित ‘जफरनमा’ में इस युद्ध का उल्लेख भी किया गया है। महापंचायत के 20 हजार योद्धाओं ने उस समय तैमूर की सेना पर हमला किया, जब वह दिल्ली से मेरठ के लिए निकलने ही वाला था, 9 हजार से ज्यादा शत्रुओं को रात में ही मार दिया गया। इससे पहले कि तैमूर की सेना एकत्रित हो पाती, सूर्योदय होते ही महापंचायत के योद्धा गायब हो गए। क्रोध में विक्षिप्त सा हुआ तैमूर मेरठ की ओर निकल पड़ा, पर यहां भी उसे निराशा ही हाथ लगी। जिस रास्ते से तैमूर मेरठ पर आक्रमण करने वाला था, वो पूरा मार्ग और उस पर स्थित सभी गांव निर्जन पड़े थे।

महापंचायत की वीर सेना के आगे लाचार हुआ तैमूर
इससे तैमूर की सेना अधीर होने लगी, और इससे पहले वह कुछ समझ पाता, महापंचायत के योद्धाओं ने अचानक ही उन पर आक्रमण कर दिया। महापंचायत की इस वीर सेना ने शत्रुओं को संभलने का एक अवसर भी नहीं दिया और रणनीति भी ऐसी थी कि तैमूर कुछ कर ही ना सका, दिन में महाबली जोगराज सिंह गुर्जर के लड़ाके उसकी सेना पर आक्रमण कर देते, और रात को कुछ क्षण विश्राम के समय रामप्यारी गुर्जर और अन्य वीरांगनाएं उनके शिविरों पर आक्रमण कर देती। रामप्यारी की सेना का आक्रमण इतना सटीक और त्वरित होता था कि वे गाजर मूली की तरह काटे जाते थे और जो बचते थे वो रात रात भर ना सोने का कारण विक्षिप्त से हो जाते थे। महिलाओं के इस आक्रमण से तैमूर की सेना के अंदर युद्ध का मानो उत्साह ही क्षीण हो गया था।

और जब तैमूर की सेना मैदान छोड़ भागने पर हुई विवश
अर्धविक्षिप्त, थके हारे और घायल सेना के साथ आखिरकार हताश होकर तैमूर और उसकी सेना मेरठ से हरिद्वार की ओर निकाल पड़ी। पर यहां महापंचायत की सेना ने उन पर फिर से अचानक ही उन पर धावा बोल दिया, और इस बार तैमूर की सेना को मैदान छोड़कर भागने पर विवश होना पड़ा। इसी युद्ध में वीर हरवीर सिंह गुलिया ने सभी को चैंकाते हुये सीधा तैमूर पर धावा बोल दिया और अपने भाले से उसकी छाती छेद दी।

भारत विजय के उद्देश्य से हार तक का सफर
तैमूर के अंगरक्षक तुरंत हरवीर पर टूट पड़े, लेकिन हरवीर तब तक अपना काम कर चुके थे। जहां हरवीर उस युद्धभूमि में ही वीरगति को प्राप्त हुये, तो तैमूर उस घाव से कभी नहीं उबर पाया, और अंततः सन 1405 में उसी घाव में बढ़ते संक्रमण के कारण उसकी मृत्यु हो गयी। जो तैमूर लाखों की सेना के साथ भारत विजय के उद्देश्य से यहाँ आया था, वो महज कुछ हजार सैनिकों के साथ किसी तरह भारत से भाग पाया।

विनाश काले विपरीत पूजा-बहराइच का सबसे मुख्य गाजी बाबा

विनाश काले विपरीत पूजा

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सैकड़ों निर्दोष लोगों के हत्यारे कसाब को फांसी हो चुकी है ! मान लो एक खास संप्रदाय के लोग उसे शहीद का दर्जा दे देते है ! और उसकी मजार बना देते है फिर वहाँ रोज माथा टेकना शुरू कर देते है 10-15 साल बाद भीड़ को देखते हुए हिन्दू भी वहाँ माथा टेकने लग जाते है !!

पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक शहर है,बहराइच । बहराइच में हिन्दू समाज का सबसे मुख्य पूजा स्थल है गाजी बाबा की मजार। मूर्ख हिंदू लाखों रूपये हर वर्ष इस पीर पर चढाते है।इतिहास जानकार हर व्यक्ति जानता है,कि महमूद गजनवी के उत्तरी भारत को १७ बार लूटने व बर्बाद करने के कुछ समय बाद उसका भांजा सलार गाजी भारत को दारूल इस्लाम बनाने के उद्देश्य से भारत पर चढ़ आया ।
(कुरान के अनुसार दर-उल -इस्लाम = 100% मुस्लिम जनसँख्या )
वह पंजाब ,सिंध, आज के उत्तर प्रदेश को रोंद्ता हुआ बहराइच तक जा पंहुचा। रास्ते में उसने लाखों हिन्दुओं का कत्लेआम कराया,लाखों हिंदू औरतों के बलात्कार हुए, हजारों मन्दिर तोड़ डाले।
राह में उसे एक भी ऐसा हिन्दू वीर नही मिला जो उसका मान मर्दन कर सके। इस्लाम की जेहाद की आंधी को रोक सके। परंतु बहराइच के राजा सुहेल देव राजभार ने उसको थामने का बीडा उठाया । वे अपनी सेना के साथ सलार गाजी के हत्याकांड को रोकने के लिए जा पहुंचे । महाराजा व हिन्दू वीरों ने सलार गाजी व उसकी दानवी सेना को मूली गाजर की तरह काट डाला । सलार गाजी मारा गया। उसकी भागती सेना के एक एक हत्यारे को काट डाला गया।
हिंदू ह्रदय राजा सुहेल देव राजभार ने अपने धर्म का पालन करते हुए, सलार गाजी को इस्लाम के अनुसार कब्र में दफ़न करा दिया। कुछ समय पश्चात् तुगलक वंश के आने पर फीरोज तुगलक ने सलारगाजी को इस्लाम का सच्चा संत सिपाही घोषित करते हुए उसकी मजार बनवा दी।
आज उसी हिन्दुओं के हत्यारे, हिंदू औरतों के बलातकारी ,मूर्ती भंजन दानव को हिंदू समाज एक देवता की तरह पूजता है। सलार गाजी हिन्दुओं का गाजी बाबा हो गया है। हिंदू वीर शिरोमणि सुहेल देव भुला दिए गएँ है और सलार गाजी हिन्दुओं का भगवन बनकर हिन्दू समाज का पूजनीय हो गया है।
अब गाजी की मजार पूजने वाले ,ऐसे हिन्दुओं को मूर्ख न कहे तो क्या कहें ?
ऐसे ही अजमेर में मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है, जिसकी मदद से ही मोहम्मद गोरी आया था और पहले शरण देने के लिए पृथ्वी राज चौहान की पत्नी और बेटियों को धोखे से बुलवाया और फिर उसे मोहम्मद गोरी के सैनिकों के हवाले कर उनका बलात्कार होने दिया। बाद में उस चिश्ती को पृथ्वी राज चौहान की उन‌ बेटियों ने ही उसकी हत्या कर अपने माता-पिता की हत्या का बदला लिया। हालांकि बाद में उन्हें भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और कुकर्मी उनकी लाशों से भी अपनी हवस मिटाते रहे।
अतः हर हिन्दू से निवेदन है कि इतिहास से सबक लें और किसी भी दरगाह या मजार पर ना जायें।हमारे हर देवी-देवताओं के हाथों में शस्त्र की परिकल्पना की गई है उसका निहतार्थ समझें। ईश्वर आपके भीतर ही है और आपकी रक्षा करने वाला कोई और नहीं बल्कि आप खुद हैं। अतः कायरता का त्याग करें। शूर-वीर ही धरती पर अपना अस्तित्व बनाए रख सकते हैं। जब जीवन में शेष कुछ ना बचे तो भी बहुत कुछ बचता है, हम अपना जीवन राष्ट्र और धर्म को समर्पित कर सकते हैं। अपने बच्चे भले ही आपकी बात ना माने लेकिन हो सकता है कि किसी को आपके विचार अच्छे लगें। *वीर भोग्या वसुंधरा*।

 

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