Thailand- where real Ram Rajya is-

भारत के बाहर थाईलेंड में आज भी संवैधानिक रूप में राम राज्य है । वहां भगवान राम के छोटे पुत्र कुश के वंशज सम्राट “भूमिबल अतुल्य तेज ” राज्य कर रहे हैं , जिन्हें नौवां राम कहा जाता है ।

-भगवान राम का संक्षिप्त इतिहास-
वाल्मीकि रामायण एक धार्मिक ग्रन्थ होने के साथ एक ऐतिहासिक ग्रन्थ भी है , क्योंकि महर्षि वाल्मीकि राम के समकालीन थे , रामायण के बालकाण्ड के सर्ग ,70 . 71 और 73 में राम और उनके तीनों भाइयों के विवाह का वर्णन है , जिसका सारांश है।

मिथिला के राजा सीरध्वज थे , जिन्हें लोग विदेह भी कहते थे उनकी पत्नी का नाम सुनेत्रा ( सुनयना ) था , जिनकी पुत्री सीता जी थीं , जिनका विवाह राम से हुआ था ।
राजा जनक के कुशध्वज नामके भाई थे । इनकी राजधानी सांकाश्य नगर थी जो इक्षुमती नदी के किनारे थी l इन्होंने अपनी बेटी
उर्मिला लक्षमण से, मांडवी भरत से, और श्रुतिकीति का विवाह शत्रुघ्न से करा दी थी।

केशव दास रचित ” रामचन्द्रिका “-पृष्ठ 354 ( प्रकाशन संवत 1715 ) .के अनुसार, राम और सीता के पुत्र लव और कुश, लक्ष्मण और उर्मिला के पुत्र अंगद और चन्द्रकेतु , भरत और मांडवी के पुत्र पुष्कर और तक्ष, शत्रुघ्न और श्रुतिकीर्ति के पुत्र सुबाहु और शत्रुघात हुए थे ।

भगवान राम के समय ही राज्यों बँटवारा इस प्रकार हुआ था —
पश्चिम में लव को लवपुर (लाहौर ), पूर्व में कुश को कुशावती, तक्ष को तक्षशिला, अंगद को अंगद नगर, चन्द्रकेतु को चंद्रावती। कुश ने अपना राज्य पूर्व की तरफ फैलाया और एक नाग वंशी कन्या से विवाह किया था । थाईलैंड के राजा उसी कुश के वंशज हैंl इस वंश को “चक्री वंश कहा जाता है l चूँकि राम को विष्णु का अवतार माना जाता है , और विष्णु का आयुध चक्र है इसी लिए थाईलेंड के लॉग चक्री वंश के हर राजा को “राम ” की उपाधि देकर नाम के साथ संख्या दे देते हैं l जैसे अभी राम (9 th ) राजा हैं जिनका नाम “भूमिबल अतुल्य तेज ” है।

थाईलैंड की अयोध्या–
लोग थाईलैंड की राजधानी को अंग्रेजी में बैंगकॉक ( Bangkok ) कहते हैं , क्योंकि इसका सरकारी नाम इतना बड़ा है , की इसे विश्व का सबसे बडा नाम माना जाता है , इसका नाम संस्कृत शब्दों से मिल कर बना है, देवनागरी लिपि में पूरा नाम इस प्रकार है –

“क्रुंग देव महानगर अमर रत्न कोसिन्द्र महिन्द्रायुध्या महा तिलक भव नवरत्न रजधानी पुरी रम्य उत्तम राज निवेशन महास्थान अमर विमान अवतार स्थित शक्रदत्तिय विष्णु कर्म प्रसिद्धि ”

थाई भाषा में इस पूरे नाम में कुल 163 अक्षरों का प्रयोग किया गया हैl इस नाम की एक और विशेषता ह । इसे बोला नहीं बल्कि गा कर कहा जाता हैl कुछ लोग आसानी के लिए इसे “महेंद्र अयोध्या ” भी कहते है l अर्थात इंद्र द्वारा निर्मित महान अयोध्या । थाई लैंड के जितने भी राम ( राजा ) हुए हैं सभी इसी अयोध्या में रहते आये हैं ।

असली राम राज्य थाईलैंड में है-
बौद्ध होने के बावजूद थाईलैंड के लोग अपने राजा को राम का वंशज होने से विष्णु का अवतार मानते हैं , इसलिए, थाईलैंड में एक तरह से राम राज्य है । वहां के राजा को भगवान श्रीराम का वंशज माना जाता है, थाईलैंड में संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना 1932 में हुई।

भगवान राम के वंशजों की यह स्थिति है कि उन्हें निजी अथवा सार्वजनिक तौर पर कभी भी विवाद या आलोचना के घेरे में नहीं लाया जा सकता है वे पूजनीय हैं। थाई शाही परिवार के सदस्यों के सम्मुख थाई जनता उनके सम्मानार्थ सीधे खड़ी नहीं हो सकती है बल्कि उन्हें झुक कर खडे़ होना पड़ता है. उनकी तीन पुत्रियों में से एक हिन्दू धर्म की मर्मज्ञ मानी जाती हैं।

थाईलैंड का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है
यद्यपि थाईलैंड में थेरावाद बौद्ध के लोग बहुसंख्यक हैं , फिर भी वहां का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है । जिसे थाई भाषा में ” राम-कियेन ” कहते हैं । जिसका अर्थ राम-कीर्ति होता है , जो वाल्मीकि रामायण पर आधारित है l इस ग्रन्थ की मूल प्रति सन 1767 में नष्ट हो गयी थी , जिससे चक्री राजा प्रथम राम (1736–1809), ने अपनी स्मरण शक्ति से फिर से लिख लिया था l थाईलैंड में रामायण को राष्ट्रिय ग्रन्थ घोषित करना इसलिए संभव हुआ ,क्योंकि वहां भारत की तरह दोगले हिन्दू नहीं है ,जो नाम के हिन्दू हैं , लेकिन उनके असली बाप का नाम उनकी माँ भी नहीं बता सकती , हिन्दुओं के दुश्मन यही लोग है l

थाई लैंड में राम कियेन पर आधारित नाटक और कठपुतलियों का प्रदर्शन देखना धार्मिक कार्य माना जाता है । राम कियेन के मुख्य पात्रों के नाम इस प्रकार हैं-

राम (राम), 2 लक (लक्ष्मण), 3 पाली (बाली), 4 सुक्रीप (सुग्रीव), 5 ओन्कोट (अंगद), 6 खोम्पून ( जाम्बवन्त ) ,7 बिपेक ( विभीषण ), 8 तोतस कन ( दशकण्ठ ) रावण, 9 सदायु ( जटायु ), 10 सुपन मच्छा ( शूर्पणखा ) 11मारित ( मारीच ),12इन्द्रचित ( इंद्रजीत )मेघनाद , 13 फ्र पाई( वायुदेव ), इत्यादि । थाई राम कियेन में हनुमान की पुत्री और विभीषण की पत्नी का नाम भी है, जो यहाँ के लोग नहीं जानते l

थाईलैंड का राष्ट्रीय चिन्ह गरुड़
गरुड़ एक बड़े आकार का पक्षी है , जो लगभग लुप्त हो गया है l अंगरेजी में इसे ब्राह्मणी पक्षी (The brahminy kite ) कहा जाता है , इसका वैज्ञानिक नाम “Haliastur indus ” है । फ्रैंच पक्षी विशेषज्ञ मथुरिन जैक्स ब्रिसन ने इसे सन 1760 में पहली बार देखा था, और इसका नाम Falco indus रख दिया था, इसने दक्षिण भारत के पाण्डिचेरी शहर के पहाड़ों में गरुड़ देखा था । इस से सिद्ध होता है कि गरुड़ काल्पनिक पक्षी नहीं है । इसीलिए भारतीय पौराणिक ग्रंथों में गरुड़ को विष्णु का वाहन माना गया है । चूँकि राम विष्णु के अवतार हैं , और थाईलैंड के राजा राम के वंशज है , और बौद्ध होने पर भी हिन्दू धर्म पर अटूट आस्था रखते हैं , इसलिए उन्होंने ” गरुड़ ” को राष्ट्रीय चिन्ह घोषित किया है । यहां तक कि थाई संसद के सामने गरुड़ बना हुआ है।

सुवर्णभूमि हवाई अड्डा
हम इसे हिन्दुओं की कमजोरी समझें या दुर्भाग्य , क्योंकि हिन्दू बहुल देश होने पर भी देश के कई शहरों के नाम मुस्लिम हमलावरों या बादशाहों के नामों पर हैं l यहाँ ताकि राजधानी दिल्ली के मुख्य मार्गों के नाम तक मुग़ल शाशकों के नाम पार हैं l जैसे हुमायूँ रोड , अकबर रोड , औरंगजेब रोड इत्यादि , इसके विपरीत थाईलैंड की राजधानी के हवाई अड्डे का नाम सुवर्ण भूमि है। यह आकार के मुताबिक दुनिया का दूसरे नंबर का एयर पोर्ट है । इसका क्षेत्रफल 563,000 स्क्वेअर मीटर है। इसके स्वागत हाल के अंदर समुद्र मंथन का दृश्य बना हुआ है। पौराणिक कथा के अनुसार देवोँ और ससुरों ने अमृत निकालने के लिए समुद्र का मंथन किया था l इसके लिए रस्सी के लिए वासुकि नाग, मथानी के लिए मेरु पर्वत का प्रयोग किया था l नाग के फन की तरफ असुर और पुंछ की तरफ देवता थेl मथानी को स्थिर रखने के लिए कच्छप के रूप में विष्णु थेl जो भी व्यक्ति इस ऐयर पोर्ट के हॉल जाता है वह यह दृश्य देख कर मन्त्र मुग्ध हो जाता है।

इस लेख का उदेश्य लोगों को यह बताना है कि असली सेकुलरज्म क्या होता है, यह थाईलैंड से सीखो। अपने धर्म की उपेक्षा करके और दुश्मनों की चाटुकारी करके सेकुलर बनने से तो मर जाना ही श्रेष्ठ है। और जिन लोगों को खुद के राम भक्त होने पर गर्व है ! विचार करें !

साभार : संजय द्विवेदी

तुलसीदास जी ने भी बाबरी मस्जिद का उल्लेख किया है

तुलसीदास जी ने भी बाबरी मस्जिद का उल्लेख किया है !!!

सच ये है कि कई लोग तुलसीदास जी की सभी रचनाओं से अनभिज्ञ हैं और अज्ञानतावश ऐसी बातें करते हैं l

वस्तुतः रामचरित मानस के अलावा तुलसीदास जी ने कई अन्य ग्रंथो की भी रचना की है।

तुलसीदास जी ने “तुलसी शतक” में इस घंटना का विस्तार से विवरण भी दिया है।

हमारे वामपंथी विचारकों तथा इतिहासकारों ने ये भ्रम की स्थिति उत्पन्न की, कि रामचरितमानस में ऐसी कोई घटना का वर्णन नहीं है।

श्री नित्यानंद मिश्रा ने जिज्ञासु के एक पत्र व्यवहार में “तुलसी दोहा शतक” का अर्थ इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्रस्तुत किया है। हमने भी उन अर्थों को आप तक पहुंचने का प्रयास किया है।

प्रत्येक दोहे का अर्थ उनके नीचे दिया गया है, ध्यान से पढ़ें:-

(1)

मन्त्र उपनिषद ब्राह्मनहुँ बहु पुरान इतिहास।

जवन जराये रोष भरि करि तुलसी परिहास॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि क्रोध से ओतप्रोत यवनों ने बहुत सारे मन्त्र (संहिता), उपनिषद, ब्राह्मणग्रन्थों (जो वेद के अंग होते हैं) तथा पुराण और इतिहास सम्बन्धी ग्रन्थों का उपहास करते हुये उन्हें जला दिया।

(2)

सिखा सूत्र से हीन करि बल ते हिन्दू लोग।

भमरि भगाये देश ते तुलसी कठिन कुजोग॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि ताकत से हिंदुओं की शिखा (चोटी) और यग्योपवीत से रहित करके उनको गृहविहीन कर अपने पैतृक देश से भगा दिया।

(3)

बाबर बर्बर आइके कर लीन्हे करवाल।

हने पचारि पचारि जन तुलसी काल कराल॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि हाँथ में तलवार लिये हुये बर्बर बाबर आया और लोगों को ललकार ललकार कर हत्या की। यह समय अत्यन्त भीषण था।

(4)

सम्बत सर वसु बान नभ ग्रीष्म ऋतु अनुमानि।

तुलसी अवधहिं जड़ जवन अनरथ किये अनखानि॥

(इस दोहा में ज्योतिषीय काल गणना में अंक दायें से बाईं ओर लिखे जाते थे, सर (शर) = 5, वसु = 8, बान (बाण) = 5, नभ = 1 अर्थात विक्रम सम्वत 1585 और विक्रम सम्वत में से 57 वर्ष घटा देने से ईस्वी सन 1528 आता है।

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि सम्वत् 1585 विक्रमी (सन 1528 ई) अनुमानतः ग्रीष्मकाल में जड़ यवनों अवध में वर्णनातीत अनर्थ किये। (वर्णन न करने योग्य)।

(5)

राम जनम महि मंदरहिं, तोरि मसीत बनाय।

जवहिं बहुत हिन्दू हते, तुलसी कीन्ही हाय॥

जन्मभूमि का मन्दिर नष्ट करके, उन्होंने एक मस्जिद बनाई। साथ ही तेज गति उन्होंने बहुत से हिंदुओं की हत्या की। इसे सोचकर तुलसीदास शोकाकुल हुये।

(6)

दल्यो मीरबाकी अवध मन्दिर रामसमाज।

तुलसी रोवत ह्रदय हति त्राहि त्राहि रघुराज॥

मीर बाकी ने मन्दिर तथा रामसमाज (राम दरबार की मूर्तियों) को नष्ट किया। राम से रक्षा की याचना करते हुए विदीर्ण ह्रदय तुलसी रोये।

(7)

राम जनम मन्दिर जहाँ तसत अवध के बीच।

तुलसी रची मसीत तहँ मीरबाकी खाल नीच॥

तुलसीदास जी कहते हैं कि अयोध्या के मध्य जहाँ राममन्दिर था वहाँ नीच मीर बाकी ने मस्जिद बनाई।

(8)

रामायन घरि घट जँह, श्रुति पुरान उपखान।

तुलसी जवन अजान तँह, कइयों कुरान अज़ान॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि जहाँ रामायण, श्रुति, वेद, पुराण से सम्बंधित प्रवचन होते थे, घण्टे, घड़ियाल बजते थे, वहाँ अज्ञानी यवनों की कुरआन और अज़ान होने लगे।

अब यह स्पष्ट हो गया कि गोस्वामी तुलसीदास जी की इस रचना में जन्मभूमि विध्वंस का विस्तृत रूप से वर्णन किया किया है !

सभी से विनम्र निवेदन है कि सभी देशवासियों को अपने सभ्यता के स्वर्णिम युग के गौरवशाली अतीत के बारे में बताइये।

🕉 🌹 🕉

Lakulisha : An Important Chapter of Bhartiya History

#Lakulisha : An Important Chapter of Bhartiya History
Vyaas Rshi is one of the center point of bhartiya civilization and especially for the history. There are conflicting claims floating on internet regarding the birth of the great Rshi Vyas. Kurma Puran, Ling Puran and few others gives 28 birth of Vyaas in seventh Manavantar and similarly 28 birth of Rudra as Rshi. As per Ling Puran, every chaturyuga has 4 Shisyas of both Vyaas and Rudra born in start and end of #Dwapar respectively. Vyaas and his four shisyas work was to propagate and teach four vedas and Rudra avataar and his shishyas work was to keep balance of earth/shrishti by teaching of Pashupat dharm. The influence of Pashupat Dharm can be seen in world’s oldest #Sindhu Civilization’s seal which was #Pashupati. The influence could also be seen in Rongorongo by comparing similarities between the Indus and Rapa Nui writing systems and their seals plus with Inga Stone of Brazil. 
The description of both avatar goes as follows:

1st Dwapar Vyaas was Manu or Shiv and Rudra avatar was Swet Muni

2nd Vyaas name was Satya and Rudra avatar was Sutaar

3rd Vyaas name was Usna/Bhargava/Sukrachry and Rudra avatar was Daman

4th Vyas name was Angira or Brishpti and Rudra avatar was Suhotra

5th Vyaas name was Savita and Rudra avatar was Kanak

6th Vyaas name was Mrtyu (yam) and Rudra avatar was Laugakshi

7th Vyaas name was Indra named Satritu and Rudra avatar was Vibhu Rshi

8th Vyaas name was Vashistha and Rudra avatar was Dadhivahan
Similarly others are mentioned in the pic. The 28th was #Dwaipayan and 28th avatar of Rudra was #Lakuli famous as Yogaatma #Lakulish. Lakulish is famous as promoter of #Pashupat Dharma after 28th Dwapar. Yogi Lakulish is mentioned in Linga puran as 28th avatar of Shiv/Rudra in end of 28th Dwapar and promoter of yog system. The Linga puran mentions four sons of Yogi Lakuli viz Garga, Kaurushya, Mitra and Kushika. Origin and history of Lakulish (Shiva with a wooden stick) traverse back to Gujarat region of current India. 
#Jageshwar was once the center of Lakulish Shaivism. There is no definite dating of the construction of Jageshwar group of temples. The temples were renovated during the reign of Katyuri King Shalivahandev. There is an inscription of Malla Kings in the main temple indicating their devotion to Jageshwar. The Katyuri Kings also donated villages to the temple priests for its maintenance. The Chand Kings of Kumaon were also patrons of the Jageshwar temple. Numerous Jageshwar temples were constructed or restored during the Gurjara Pratihara era. See the Pic. Lakulisha among his four disciples Kusika, Garga, Mitra, and Kaurushya, rock-cut stone relief, Cave Temple No. 2 at Badami, Karnataka. The principal text of the Pashupata sect, the Pāśupata Sūtra is attributed to Lakulisha. The manuscripts of this text and a commentary of it, the Pañcārtha Bhāṣya by Kaundinya were discovered in 1930. The account matches those narrated in the various historical references in Puranas where Lakulisha incarnates as 28th Avatar. 
The four disciples of Dwaipayan made famous the teachings of Vedas. Paail (Rgved), Vaispaayan (Yajur), Sumantu (Athrva), Jaimini (Sam) and Suta Muni the historical parts likes puranas. #Kusika, #Garga, #Mitra, and #Kaurushya are described as sons of Yogi Lakuli in Ling Puran all will spend their life teaching yogic activities, living in sync with nature, protecting animals and worshipping shivling. The teachings of Pashupati did made huge impact of Bhartiya civilization where an example could be seen as #PashupatiSeal of Sindhu Saraswati Civilization. The world oldest civilization could be pretty much seen as result of hard work based on yama-niyama done by Yogi Lakulisha and his sons. Yogi Lakulisha is believed to be born in land of #Gujarat. The site of #Kayavarohana is related to Lakulisha.

 

#Rajarani Temple, #Lingraj Temple and many ancient temples of #Bhubneshwar is dedicated to Yogi Lakulisha. When H. Tsiang visited #Varanasi he wrote Pashupatas as major followers which is true till date. He also wrote more than 100 temples were dedicated to Shiva. Varanasi is called as world’s only ancient city inhabited continuously. Lakulisha as Siva is often enshrined, his image on the face of a Sivalinga, seated in lotus posture, virilely naked, holding a danda in his left hand and a citron fruit in his right. One of the most ancient temple “Somnath” which has faced many cycles of destruction from Islamic invaders is one of the most revered temple. Pashupatinath Temple of Nepal is also one of the ancient temple dedicated to Pashupati Dharm.

   

About Yogi Lakulisha 

Yogi Lakulish was said to be born to a brahmin couple named Vishvarup and Sudarshana in Kayavarohan, Gujarat during end of Dwapar. This means that he must have lived not before 4000 BC. There ancestral line went back to the great ancient sage, Atri. Lakulish was born on the fourteenth day of the bright half of the moon in the Indian month of Chaitra after midnight. A sage named Atri took same task at the end of 12th Dwapar when Vyaas was Rshi Shattej. Tracing Yogi Lakulish and his son cum shishyas can solve many mysteries of our Bhartiya Civilizations. 

It is said in all the Agamas and Tantras, that a MukhaLinga should he made on the Pujabhaga of the Sarvasama-Linga and that it might have one, two, three, four or five faces corresponding to the five aspects viz, Vaaiadeva, Tatpurusha, Aghora, Sadyojata and Ishana, of Shiva. In 1940, archaeologist M.S. Vats discovered three Shiva Lingas at Harappa, dating more than 5,000 years old. It is known to us that Shiva was seated facing south when he taught the rishis and devotees Yoga and Jnana, includes science and arts because of this, such forms of Shiva are known as #DAKSHINAMURTI. An image representing this form of Shiva is found in the left window of the Lakulish temple, adjoining to the Main Shrine in Eklingji. The Shiva Purana, has laid down that the image of Lakulisha should carry Bijora In his right hand Staff in the left one. The Vishvakarma Vastusastra also confirms this description. The images found in old Kayavarohan Tirth, Gujarat, satisfys this description. The same type of image is found in the Papkantakeshvar temple, Achalgarh, Rajasthan, Kalika temple (Chittor Fort) wherein the deity holds a Bijora in his right hand and a staff in the left one. Lakulisha in Samgameshwara temple built under patronage of early Chalukyas. In Haryana’s Morni and Tikkar Tal Lakulisha images were excavated and can be found in Government Musem and Art Gallery, Chandigarh. The remains and fort of Morni Lake suggests a big civilization once propagated there. There is mention of Pasupatacharya named #Udita who was student of #Upamita who was student of #Kapila who belonged to Chandragupta period. The earliest images of Lakulisa from Mathura datable to 5th -6th CE show him seated with two arms can be seen in State Museum, Lucknow. 
Lakulisha and Kusika.

Lakulisha among his four disciples Kusika, Garga, Mitra, and Kaurushya; #Kushika is believed to be first disciple finds mention in Pasupata Sutra (PS) and Pancarthabhasya (Pbh). Both these texts talk about his getting directly initiated by Lakulisa in Ujjain. The Udaipur Inscription of Naravahana refers to Kusika and records that ascetics who besmear their bodies with ashes and wear barks and have matted hair, appeared in his line. The dynastic patronage to early Lakulisa-Pasupatas can be seen clearly at cave temples of #Jogesvari, #Elephanta, #Manddapesvar and later at #Ellora. In medieval South India, there was an influential sect called the #Kalamukhas some believe that Kalamukha sect was derived from, or was another name for, the Lakulisha-Pashupatas. According to some sources, Basavadeva, the reformer of Vira Shaivism, was initiated by a Kalamukha ascetic. Lakulisha and his Shishyas are very important historical figure which needs a good research for better understanding of Sapta Sidhu Civilizations and history of Pashupat history in this kaliyuga. 

==============================================

Notes and References

[1] Rudra Puran, Shiv Puran

[2]http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/74856/11/11_chapter%204.pdf

[3] http://www.hillsofmorni.com/history-of-morni/glimpses-of-history-excavations-at-morni-ka-tal/ 

[4]http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/58063/7/07_chapter%202.pdf

[5] Huntington Susan, ‘Art of AncientIndia ‘p. 75

[6] Spink Walter, ‘Ajanta to Ellora ‘1967

[7] http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Articles&ArticleID=13273

[8] http://www.ancient-wisdom.com/easterislandindusvalley1.htm

SRI RAM WAS REAL FORM OF VISHNU,NOT MYTHOLOGY

SHRI RAMA …WAS REAL KING …WHO LIVED AS EXAMPLE OF DHARMA …
Photo: JEWELS OF BHARATAM ....SERIES[TM]</p>
<p>SHRI RAMA ...WAS REAL KING ...WHO LIVED AS EXAMPLE OF DHARMA ...</p>
<p>Sri Rama was on this earth in 5114 BCE +/- 26,000 years before that or the similar period before that or the one before and so on and so forth..  </p>
<p>A solution to the apparent mismatch of dates can be found if we realize that because of a phenomenon known as the 'Precession of Equinoxes', stars as visualized from Earth, regain the same positions every 26,000 years! </p>
<p>Outside India, the millenia old story of Rama is still sung by people all over Asia. While traveling to different countries in this part of the world, there are many versions that are even older than the regional ones in India!!</p>
<p>    In China, collection of Jatak stories relating to various events of Ramayana, belonging to 251 AD were compiled by Kang Seng Hua based on the Buddhist texts mentioned earlier.</p>
<p>    Kumardasa, who ruled Srilanka in 617 BCE wrote the text called ‘Janakiharan’ which is the oldest Sanskrit literature available in Sri lanka.  </p>
<p>    Oldest written version of Ramayana, in Nepal is from 1075 BCE. </p>
<p>    Yama Zatdaw in Myanmar is considered the National epic and is a Burmese version of the story of Rama which has again given theme to dance and art forms including tapestries and puppets.(In fact Burmese people even stress that it is the true history of their land).</p>
<p>    Hikayat Seri Rama in Malaysia makes Dashrath the great-grandson of Adam, the first man! (which is not too far from the truth as both Dashrath and Manu, the First Man were from the Suryavanshi/Solar dynasty!),  </p>
<p>    In the Phra Lak Phra Lam of Laos, Buddha is regarded as an incarnation of Rama (again not completely false as both are incarnations of Lord Vishnu!).</p>
<p>    Reamker, is the most famous story of Khmer Literature of Cambodia and is the source of classical dance, theater, poetry and of course the famous sculptures of Angkor Wat. Various rock inscriptions belonging to about 700 CE are also found in the Khmer region of Cambodia.  </p>
<p>    Maradia Lawana in the Phillipines is based on the Ramayana, </p>
<p>    Ramakavaca in Bali is a major source of moral and spiritual guidance for the island and forms the basic story line of Balinese traditional dance, </p>
<p>    Kakawin Ramayana in Java, Indonesia (9th century CE) is a mixture of Sanskrit and Kawi languages and is the basis of traditional Indonesian ballet and performances that are famous the world over.</p>
<p>Ramakien in Thailand is again considered the National epic and adds an element of incest to the story by making Sita the daughter of Ravan and Mandodari who is thrown away in the Sea as she is prophesied to bring destruction to Ravan's Kingdom!!
Sri Rama was on this earth in 5114 BCE +/- 26,000 years before that or the similar period before that or the one before and so on and so forth..

A solution to the apparent mismatch of dates can be found if we realize that because of a phenomenon known as the ‘Precession of Equinoxes’, stars as visualized from Earth, regain the same positions every 26,000 years!

Outside India, the millenia old story of Rama is still sung by people all over Asia. While traveling to different countries in this part of the world, there are many versions that are even older than the regional ones in India!!

In China, collection of Jatak stories relating to various events of Ramayana, belonging to 251 AD were compiled by Kang Seng Hua based on the Buddhist texts mentioned earlier.

Kumardasa, who ruled Srilanka in 617 BCE wrote the text called ‘Janakiharan’ which is the oldest Sanskrit literature available in Sri lanka.

Oldest written version of Ramayana, in Nepal is from 1075 BCE.

Yama Zatdaw in Myanmar is considered the National epic and is a Burmese version of the story of Rama which has again given theme to dance and art forms including tapestries and puppets.(In fact Burmese people even stress that it is the true history of their land).

Hikayat Seri Rama in Malaysia makes Dashrath the great-grandson of Adam, the first man! (which is not too far from the truth as both Dashrath and Manu, the First Man were from the Suryavanshi/Solar dynasty!),

In the Phra Lak Phra Lam of Laos, Buddha is regarded as an incarnation of Rama (again not completely false as both are incarnations of Lord Vishnu!).

Reamker, is the most famous story of Khmer Literature of Cambodia and is the source of classical dance, theater, poetry and of course the famous sculptures of Angkor Wat. Various rock inscriptions belonging to about 700 CE are also found in the Khmer region of Cambodia.

Maradia Lawana in the Phillipines is based on the Ramayana,

Ramakavaca in Bali is a major source of moral and spiritual guidance for the island and forms the basic story line of Balinese traditional dance,

Kakawin Ramayana in Java, Indonesia (9th century CE) is a mixture of Sanskrit and Kawi languages and is the basis of traditional Indonesian ballet and performances that are famous the world over.

Ramakien in Thailand is again considered the National epic and adds an element of incest to the story by making Sita the daughter of Ravan and Mandodari who is thrown away in the Sea as she is prophesied to bring destruction to Ravan’s Kingdom!!

%d bloggers like this: