Human body has GODS inside

मानव शरीर में कौन कौन से देवताओं का वास है और उनके कार्य क्या हैं
मानव शरीर एक देवालय (मंदिर) है

ईश्वर ने अपनी माया से चौरासी लाख योनियों की रचना की लेकिन जब उन्हें संतोष न हुआ तो उन्होंने मनुष्य शरीर की रचना की।
मनुष्य शरीर की रचना करके ईश्वर बहुत ही प्रसन्न हुए क्योंकि मनुष्य ऐसी बुद्धि से युक्त है जिससे वह ईश्वर के साथ साक्षात्कार कर सकता है।

हमारे ज्ञानवान पाठक जानते हैं कि मानव शरीर एक देवालय है। ईश्वर ने पंचभूतों (आकाश ,वायु ,अग्नि भूमि और जल ) से मानव शरीर का निर्माण कर उसमें भूख-प्यास भर दी।

आकाश की सूक्ष्म शरीर से, भूमि की हड्डियों, flesh से और अग्नि की body heat के साथ तुलना की गयी है।

देवताओं ने ईश्वर से कहा कि हमारे रहने योग्य कोई स्थान बताएं जिसमें रह कर हम अपने भोज्य-पदार्थ का भक्षण कर सकें। देवताओं के आग्रह पर जल से गौ और अश्व बाहर आए पर देवताओं ने यह कह कर उन्हें ठुकरा दिया कि यह हमारे रहने के योग्य नहीं हैं।

जब मानव शरीर प्रकट हुआ तब सभी देवता प्रसन्न हो गए।
तब ईश्वर ने कहा—अपने रहने योग्य स्थानों में तुम प्रवेश करो ।

तब सूर्य नेत्रों में ज्योति (प्रकाश) बन कर, वायु छाती और नासिका-छिद्रों में प्राण बन कर,
अग्नि मुख में वाणी और उदर में जठराग्नि बन कर,
दिशाएं श्रोत्रेन्द्रिय (सुनना ) बन कर कानों में,
औषधियां और वनस्पति लोम (रोम) बन कर त्वचा में,
चन्द्रमा मन होकर हृदय में, मृत्यु (मलद्वार) होकर नाभि में और जल देवता वीर्य होकर पुरुषेन्द्रिय में प्रविष्ट हो गए।

तैंतीस देवता अंश रूप में आकर मानव शरीर में निवास करते हैं ।

उपनिषद् का निम्नलिखित कथानक मानव शरीर के देवालय होने की पुष्टि करता है :

हमारा शरीर भगवान का मंदिर है। यही वह मंदिर है, जिसके बाहर के सब दरवाजे बंद हो जाने पर जब भक्ति का भीतरी पट खुलता है, तब यहां ईश्वर ज्योति रूप में प्रकट होते हैं और मनुष्य को भगवान के दर्शन होते हैं।

आइये देखें मानव शरीर में कौन कौन से देवताओं का वास है और उनके कार्य क्या हैं :

संसार में जितने देवता हैं, उतने ही देवता मानव शरीर में “अप्रकट” रूप से स्थित हैं, किन्तु दस इन्द्रियों (पांच ज्ञानेन्द्रिय और पांच कर्मेन्द्रियां) के और चार अंतकरण (भीतरी इन्द्रियां—बुद्धि, अहंकार, मन और चित्त) के अधिष्ठाता देवता प्रकट रूप में हैं। इस सभी इन्द्रियों का टोटल किया जाये तो 14 बनता है।

आइए इन देवताओं के बारे में संक्षेप में जानकारी प्राप्त करें ,इतनी संक्षेप में कि साधारण मनुष्य को भी समझ आ जाये। सभी कठिन शब्दों को सरल करने का प्रयास तो किया है लेकिन जिनका सरलीकरण नहीं किया गया है वह केवल इस लिए कि सरलीकरण के बाद और अधिक कठिनता देखी गयी थी।

  1. नेत्रेन्द्रिय (चक्षुरिन्द्रिय) के देवता—भगवान सूर्य नेत्रों में निवास करते हैं और उनके अधिष्ठाता देवता हैं; इसीलिए नेत्रों के द्वारा किसी के रूप का दर्शन सम्भव हो पाता है । नेत्र विकार में चाक्षुषोपनिषद्, सूर्योपनिषद् की साधना और सूर्य की उपासना से लाभ होता है ।
  2. घ्राणेन्द्रिय (नासिका) के देवता—नासिका के अधिष्ठाता देवता अश्विनीकुमार हैं । इनसे गन्ध का ज्ञान होता है ।
  3. श्रोत्रेन्द्रिय (कान) के देवता—श्रोत-कान के अधिष्ठाता देवता दिक् देवता (दिशाएं) हैं । इनसे शब्द सुनाई पड़ता है ।
  4. जिह्वा के देवता—जिह्वा में वरुण देवता का निवास है, इससे रस का ज्ञान होता है ।
  5. त्वगिन्द्रिय (त्वचा) के देवता—त्वगिन्द्रिय के अधिष्ठाता वायु देवता हैं । इससे जीव स्पर्श का अनुभव करता है ।
  6. हस्तेन्द्रिय (हाथों) के देवता—मनुष्य के अधिकांश कर्म हाथों से ही संपन्न होते हैं । हाथों में इन्द्रदेव का निवास है ।
  7. चरणों के देवता—चरणों के देवता उपेन्द्र (वामन, श्रीविष्णु) हैं । चरणों में विष्णु का निवास है ।
  8. वाणी के देवता—जिह्वा में दो इन्द्रियां हैं, एक रसना जिससे स्वाद का ज्ञान होता है और दूसरी वाणी जिससे सब शब्दों का उच्चारण होता है । वाणी में सरस्वती का निवास है और वे ही उसकी अधिष्ठाता देवता हैं ।
  9. उपस्थ (मेढ़ू) के देवता—इस गुह्येन्द्रिय के देवता प्रजापति हैं । इससे प्रजा की सृष्टि (संतानोत्पत्ति) होती है ।
  10. गुदा के देवता—इस इन्द्रिय में मित्र, मृत्यु देवता का निवास है । यह मल निस्तारण कर शरीर को शुद्ध करती है ।
  11. बुद्धि इन्द्रिय के देवता—बुद्धि इन्द्रिय के देवता ब्रह्मा हैं । गायत्री मंत्र में सद्बुद्धि की कामना की गई है इसीलिए यह ‘ब्रह्म-गायत्री’ कहलाती है । जैसे-जैसे बुद्धि निर्मल होती जाती है, वैसे-वैसे सूक्ष्म ज्ञान होने लगता है, जो परमात्मा का साक्षात्कार भी करा सकता है ।
  12. अहंकार के देवता—अहं के अधिष्ठाता देवता रुद्र हैं । अहं से ‘मैं’ का बोध होता है ।
    1. मन के देवता—मन के अधिष्ठाता देवता चन्द्रमा हैं । मन ही मनुष्य में संकल्प-विकल्प को जन्म देता है । मन का निग्रह परमात्मा की प्राप्ति करा देता है और मन के हारने पर मनुष्य निराशा के गर्त में डूब जाता है ।
  13. चित्त के देवता—प्रकृति-शक्ति, चिच्छत्ति ही चित्त के देवता हैं । चित्त ही चैतन्य या चेतना है । शरीर में जो कुछ भी स्पन्दन (चलन, चेतना) होती है, सब उसी चित्त के द्वारा होती है ।

भगवान ने ब्रह्माण्ड बनाया और समस्त देवता आकर इसमें स्थित हो गए, किन्तु तब भी ब्रह्माण्ड में चेतना नहीं आई और वह विराट् मनुष्य उठा नहीं। जब चित्त के अधिष्ठाता देवता ने चित्त में प्रवेश किया तो विराट् पुरुष उसी समय उठ कर खड़ा हो गया। इस प्रकार भगवान संसार में सभी क्रियाओं का संचालन करने वाले देवताओं के साथ इस शरीर में विराजमान हैं

अब मनुष्य का कर्तव्य है कि वह भगवान द्वारा बनाए गए इस देवालय को कैसे साफ-सुथरा रखे ? इसके लिए निम्न कार्य किए जाने चाहिए:

  1. नकारात्मक विचारों और मनोविकारों-काम,क्रोध,लोभ,मोह,ईर्ष्या,अहंकार से दूर रहे ।
  2. योग साधना, व्यायाम व सूर्य नमस्कार करके अधिक-से-अधिक पसीना बहाकर शरीर की आंतरिक गंदगी दूर करें ।
  3. अनुलोम-विलोम व सूक्ष्म क्रियाएं करके ज्यादा-से ज्यादा शुद्ध हवा का सेवन करे ।
  4. शुद्ध सात्विक भोजन सही समय पर व सही मात्रा में करके पेट को साफ रखें ।

नीचे दिए गए विवरण को पढ़ते समय आप सोच रहे होंगें कि ऊपर दी गयी जानकारी रिपीट हो रही है। हाँ कुछ तथ्य रिपीट अवश्य हो रहे हैं लेकिन इनका अध्ययन करना लाभदायक ही होगा।

हम जानते हैं कि मनुष्य का शरीर एक देवालय है। इस देवालय के आठ चक्र और नौ द्वार हैं। अर्थववेद में कहा गया है-

“अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या,तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः”

जिसका अर्थ है कि आठ चक्र और नौ द्वारों वाली अयोध्या देवों की पुरी है, उसमें प्रकाश वाला कोष है जो आनन्द और प्रकाश से युक्त है अर्थात आठ चक्रों और नौ द्वारों से युक्त यह देवों की अयोध्या नामक नगरी है।

विज्ञान के अनुसार मनुष्य का जन्म माता-पिता के संयोग से संभव हो पाता है।

लेकिन क्या केवल संयोग से ही मनुष्य की रचना हो जाती हैं, बिलकुल नहीं ! इसके लिए देवी-देवताओं का सहयोग भी होता है। 33 कोटी के देवी-देवता जैसे कि सूर्य, पृथ्वी, वायु, जल, आकाश, चन्द्र आदि हमारे जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है।

हमारी माता के गर्भ में ये देव अपने एक-एक अंश से बच्चा पैदा करने और उसका पालन पोषण करने में सहयोग करते हैं।

ज़रा कल्पना करें कि अगर वायुदेव माँ के गर्भ में न पहुंच पाए तो क्या गर्भ में जीवन संभव हो सकता है। यही बात जल की है,यही बात अग्नि आदि देवों के बारे में भी लागू होती है। इन सभी देवों को एक-एक करके समझने के लिए तो विज्ञान और अध्यात्म की बैकग्राउंड होनी चाहिए ,अग्निदेव का अर्थ यह कदापि न लिया जाए कि माँ के गर्भ में कोई स्टोव या भट्टी स्थापित है और वह बच्चे के लिए खाना पका रही है। बेसिक साइंस का ज्ञान बताता है कि भोजन का पचना (digestion),उससे रक्त का बनना, एनर्जी का पैदा होना एक प्रकार का combustion/ burning/ignition process है।

अथर्ववेद के 5वें कांड में लिखा है:

सूर्य मेरी आँखें हैं, वायु मेरे प्राण हैं,अन्तरिक्ष मेरी आत्मा है और पृथ्वी मेरा शरीर है। इस तरह दिव्यलोक का सूर्य, अंतरिक्ष लोक की वायु और पृथ्वी लोक के पदार्थ क्रमशः मेरी आँखें और प्राण स्थूल शरीर में आकर रह रहे है और हाथ जो तीनों लोकों के सूक्ष्म अंश हैं, हमारे शरीर में अवतरित हुए हैं। इसीलिए ज्ञानी मनुष्य मानव शरीर को ब्रह्म मानता है क्योंकि सभी देवता इसमें वैसे ही रहते हैं जैसे गोशाला में गायें रहती हैं। माँ के गर्भ में 33 देवता अपने-अपने सूक्ष्म अंशों से रहते हैं परन्तु यह गर्भ तभी स्थिर (ठोस) होने लगता है जब परमात्मा अपने अंश से गर्भ में जीवात्मा को अवतरित करते हैं | उस समय सभी देवता गर्भ में उस परमात्मा की स्तुति करते हैं और उसकी रक्षा व् वृद्धि करते है | सभी देवता प्रार्थना करते हैं कि- हे जीव ! आप अपने साथ अन्य जीवों का भी कल्याण करना,परन्तु जन्म के समय के कठिन कष्ट के कारण मनुष्य इन बातों को भूल जाता है |

वेद का मंत्र हमें यह स्मरण दिलाता है मैं अमर अथवा अदम्य शक्ति से युक्त हूँ। हमारा शरीर ऐसा दिव्य और मनोहारी मनुष्य शरीर होता है। तभी तो उपनिषदों में ऋषियों का अमर संदेश गूंजता है: अहं ब्रह्मास्मि तत्वमसि | इसी तरह सभी जीवों की उत्पत्ति होती है। अतः देवता यह घोषणा करते हैं कि सृष्टि का हर प्राणी परमात्मा का ही अंश है इसलिए हम सभी को इसी भगवानमय दृष्टि से एक दूसरे को देखना चाहिए। इस वाक्य को पढ़कर आज के मानव पर घृणा तो आती है कि हमारे वेद, पुराण, उपनिषद ,देवता क्या शिक्षा देते हैं, कैसे इतने परिश्रम से सृष्टि की स्थापना करते हैं,लेकिन मानव
महामानव और देवमानव बनने के बजाय दैत्यमानव बनने में कोई कसर नहीं छोड़ता। शायद उस मानव को यह नहीं मालूम की सृष्टि के नियम, विधाता की अदालत में एक-एक प्राणी के एक-एक कर्म का लेखा लिखा जा रहा है। कर्म अपने कर्ता को ढूंढ ही निकालता है, सज़ा या इनाम मिल कर ही रहते हैं। कर्म की थ्योरी इतनी strong है कि इससे तो देवता क्या भगवान तक भी बच नहीं पाए।

ॐ नमः शिवाय 🙏
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🙏🏻

Black hole sound

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Devi Pisachi | Bhairav Says…

When we hea rthe word “Pisachi” we start to imagine a fearful looking female, perhaps with long protruding canine tooth, flesh eating and vampirish. Or  some bhoot , pret, ghost or some other spooky being comes to the imaginative mind. But actually one of presiding goddess’s form of heart chakra is Pisachi Devi who has…
— Read on kaulabhairav.wordpress.com/2013/07/05/devi-pisachi/

History of Bharat needs to be rewritten

If our ancestors keep losing the war,
So how have we been alive 1200 years?

Nowadays people have become a thinking that
Rajputs fought,
But they were a lost warrior,
Who ever lost to Alauddin,
Sometimes lost to Babar, sometimes to Akbar,
Ever from Aurangzeb…

Is it really like this?

Even in society many of these
He is a confused Rajput,
Joe Maharana Pratap, Prithviraj Chauhan
As timeless warriors are called great,
But in their minds they have lost warriors!

Such lines about Maharana Pratap are proudly recited :-

“Don’t talk about win or lose,
Focus on the struggles “

“Some people lose even after winning,
Some win even after losing”

The real thing is that we are taught the same history, in which we lost, because our morale is low,
This evil act was done by the leftists.

Rana Sanga of Mewar fought more than 100 wars,
The world knows about the same war which was defeated in only one war,
The history of Rana Sanga is started with the same war and ends with the same…

When it comes to wars like Khandar, Ahmednagar, Bari, Gagaron, Bayana, Idar, Khatauli fought by Rana Sanga, we probably won’t be able to tell and if we can tell, not as much as we can tell about Khanwa.

Even if Rana Sanga loses one hand and one leg in the war of Khatauli and chases Delhi’s Ibrahim Lodi to Delhi, it doesn’t matter.
Babar had to run away in the war of Bayana
Even then she is minor…

What matters for them is the war of Khanwa in which Mughal King Babar defeated Rana Sanga!

When it comes to Emperor Prithviraj Chauhan, Gauri defeated Prithviraz Chauhan in the second war of Tarain!

The war of Tarain was the last war fought by Prithviraj Chauhan, before that how much do we know about the wars they fought?

If Maharana Pratap is mentioned in the same way, the name Haldighati is heard first.

Although the results of this war were controversial from the beginning, sometimes undefined, sometimes Akbar considered winner and recently Maharana was considered winner!

Baharhal, Maharana Pratap won a total of 21 big wars like Gogunda, Chawand, Mohi, Madaria, Kumbhalgarh, Idar, Mandal, Diver and destroyed more than 300 Mughal camps!

At the time of Maharana Pratap, there were about 50 fortresses in Mewar, out of which almost all of them were ruled by Mughals and 26 forts were changed to Muslim names, such as Udaipur became Muhammadabad, Chittorgarh became Akbarabad…

Then how do we know Udaipur as Udaipur today?…
Nobody tells us this!

Actually Maharana Pratap had conquered all except 2 of these 50 forts
And almost had the entire Mewad authority again!

In a war like Diver, even if Maharana’s son Amarsingh has discarded Akbar’s uncle Sultan Khan with a spear attack, but he will only teach us the history of Haldighati war,
The rest of the wars are all minor after this!

Maharana Amarsingh fought 17 big wars with the Mughal King Jahangir and destroyed more than 100 Mughal posts, but we are only taught that 1615 E. Maharana Amarsingh made treaty with Mughals.
Nobody will tell that 1597 E. From 1615 E. What happened in between..!

Maharana Kumbha built 32 forts, wrote many books, built victory pillars, we know this, but can you name the 4-5 wars he fought?

Maharana Kumbha fought with Abu, Mandalgarh, Khatkad, Jahanajpur, Gagaron, Mandu, Narana, Malarana, Ajmer, Modalgarh, khatu, Jangal Pradesh, Kansli, Nardiyanagar, Hamirpur, Shonyanagari, Vaasa, Pindwara, Shakambhari, Sambhar, Chatsu, Khandela, Amer, Sehare, Joginipur, Vishal Nagar, Janagar, Kotda, Mallargarh, Ranthambh, Dungarpur, Nagar, Hamirnagar, Kotra, Dungarh, Nagarh, Hundi, Hundi and Hameer, Hoodi, Kotrah, Ranagar, Ranagarh, Ranagarh, Bundi, Budi, Budh, Budi He has never seen defeat in any battle in his entire lifetime!

When it comes to Chittorgarh fort, only 3 wars are discussed:
1) Alauddin defeated Rawal Ratansingh,
2) Bahadur Shah won Chittorgarh fort at the time of Rana Vikramaditya;
3) Akbar defeated Maharana Uday Singh and captured the fort!

Have there ever been any attacks on Chittorgarh other than these three wars?

In this way, the war that Rajputs have lost, we are taught the same thing in history.

Many people give us knowledge that Rajputs ancestors did not work with right strategy, used poor weapons that is why always losers…

Now in what words should I explain to them that with the same weapons Rajputs have won countless wars, anointed the motherland with blood, for hundreds of years have faced fire spitting cannons of foreign enemies with their swords and repeatedly dusted the enemies.

India has increased more than one warrior,
There was a name among them “Sea Secret” whose name was confined to a corner of history, called Napoleon of India,
Set out for world conquer 3 times,
But such a warrior was made anonymous.

We know that really our history is not written by the ideology loving India,
And somewhere else to the full history of bias
Recognition has also been achieved in our country…
Now history should be reevaluated by scholars.

So that you and we can read the real history about our glorious Chakraborty emperors and great men of India and the coming generations will understand us as who we really were and bow down to those real heroes of India!

#rewritehistoryofbharat

Shiv Tandav Stotram -शिव तांडव स्तोत्र

Shiv Tandav Stotram: शिव तांडव स्तोत्र  की रचना लंकापति रावण ने की थी। कहते हे की रावण ने ब्रम्हाजी से शक्तिया हासिल की थी। उस समय अपने शक्तियों के मध चूर होकर उसने कैलाश पर्वतउठा लिया था तब भगवान शिव ने अपने केवल एक अंगूठेसे उसे निचे दबा दिया था। तब रावण के हात उसके निचे दब गए उसे बहोत पीड़ा हो रही थी तब उसने Shiv Tandav शिव तांडव गाना शुरू किया उससे शिव बहोत कुश हुए और अपना अंगूठा निकल लिया और रावण को वर दे दिया।

 Shiv Tandav Stotram Hindi 

जटा टवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले, गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्ग तुङ्ग मालिकाम् ।

डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं, चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिम्प निर्झरी, विलो लवी चिवल्लरी विराजमान मूर्धनि । 

धगद् धगद् धगज्ज्वलल् ललाट पट्ट पावके किशोर चन्द्र शेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥

धरा धरेन्द्र नंदिनी विलास बन्धु बन्धुरस् फुरद् दिगन्त सन्तति प्रमोद मानमानसे ।

कृपा कटाक्ष धोरणी निरुद्ध दुर्धरापदि क्वचिद् दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥

लता भुजङ्ग पिङ्गलस् फुरत्फणा मणिप्रभा कदम्ब कुङ्कुमद्रवप् रलिप्तदिग्व धूमुखे ।

मदान्ध सिन्धुरस् फुरत् त्वगुत्तरीयमे दुरे मनो विनोद मद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥

सहस्र लोचनप्रभृत्य शेष लेखशेखर प्रसून धूलिधोरणी विधूस राङ्घ्रि पीठभूः ।

भुजङ्ग राजमालया निबद्ध जाटजूटक श्रियै चिराय जायतां चकोर बन्धुशेखरः ॥

ललाट चत्वरज्वलद् धनञ्जयस्फुलिङ्गभा निपीत पञ्चसायकं नमन्निलिम्प नायकम् ।

सुधा मयूखले खया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदे शिरोज टालमस्तु नः ॥

कराल भाल पट्टिका धगद् धगद् धगज्ज्वल द्धनञ्जयाहुती कृतप्रचण्ड पञ्चसायके ।

धरा धरेन्द्र नन्दिनी कुचाग्र चित्रपत्रक प्रकल्प नैक शिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥

नवीन मेघ मण्डली निरुद् धदुर् धरस्फुरत्- कुहू निशीथि नीतमः प्रबन्ध बद्ध कन्धरः ।

निलिम्प निर्झरी धरस् तनोतु कृत्ति सिन्धुरः कला निधान बन्धुरः श्रियं जगद् धुरंधरः ॥

प्रफुल्ल नीलपङ्कज प्रपञ्च कालिम प्रभा- वलम्बि कण्ठकन्दली रुचिप्रबद्ध कन्धरम् ।

स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छि दांध कच्छिदं तमंत कच्छिदं भजे ॥

अखर्व सर्व मङ्गला कला कदंब मञ्जरी रस प्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम् ।

स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्त कान्ध कान्त कं तमन्त कान्त कं भजे ॥

जयत् वदभ्र विभ्रम भ्रमद् भुजङ्ग मश्वस – द्विनिर्ग मत् क्रमस्फुरत् कराल भाल हव्यवाट् ।

धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥

स्पृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्- – गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।

तृष्णारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः ( समं प्रवर्तयन्मनः) कदा सदाशिवं भजे ॥

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् ।

विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥

इदम् हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् ।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ॥

पूजा वसान समये दशवक्त्र गीतं यः शंभु पूजन परं पठति प्रदोषे ।

तस्य स्थिरां रथगजेन्द्र तुरङ्ग युक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शंभुः इति श्रीरावण- कृतम् शिव- ताण्डव- स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

Ancient Bharatiya Sciences and Technology

In this article, I would like to cover the achievements of great scientists of our ancient culture, whose contributions not only helped shape a …

Ancient Bharatiya Sciences and Technology

Vijñāna-bhairava-tantra

pparihar.com/2023/04/21/vijnana-bhairava-tantra/

God in Vedas | HINDUISM AND SANATAN DHARMA

ईश्वर कैसा है,कहाँ रहता है,उसका रंग कैसा है,कोई उसका रूप या हुलिया तो बताइये?जब तक इन बातों का ज्ञान न हो जाय,तब तक अपने प्रियतम को कैसे पहचाने?कैसे समझे कि हम किसके दर्शन कर रहे हैं या हमें दर्शन हो गए?याज्ञवल्क्य ने एक बार गार्गी से कहा था-“ब्रह्म के जाननेवाले उसे अक्षर,अविनाशी,कूटस्थ कहते हैं।वह न…
— Read on pparihar.com/2022/07/18/god-in-vedas/

Future Badrinath and God Narsimha of Joshimath connection

Sanatan Dharm and Hinduism's avatarHINDUISM AND SANATAN DHARMA

Badrinath finds mention in the first chapter of second skanda of ‘Skanda Purana’.

The 57th shloka says, “The Ashram of lord Narayan was called ‘Muktipada’ in Satyuga, ‘Yogasiddha’ in Treta, ‘Vishal’ in Dwapar and ‘Badrikaashram’ in Kaliyug.”

In Vaman Purana, sage Pulastya says that ‘Dharma’ the divine body, manifested from the heart of Lord Brahma and married to ‘Murti’, daughter of Daksh. She gave birth to 4 sons, 2 of them being Nar and Narayan. Nar and Narayan reached Badrinath and performed penance.

It is believed that this is the same place where Ved Vyas compiled the Vedas and wrote Purans assisted by Bhagwan Ganesh. In Dwapar, Pandavas along with Draupadi too visited here when they were on their ascent to heaven (Swargarohini yatra).

According to Hindu scriptures, Bhakt Narad got salvation in Badrinath and the sages like Gautam, Kashyap and Kapil, who was himself the incarnation of lord Vishnu…

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Ayodhya and Ram in Atharved

Ayodhya and Ram and Atharv Veda

Sanatan Dharm and Hinduism's avatarHINDUISM AND SANATAN DHARMA

Ayodhya founded by Manu, in Atharva Veda called City of the Gods, capital of solar dynasty and Ikshvakus, Sarayu great river in Rigveda.

Ayodhyā (Hindi: अयोध्या) is an ancient city of India, the old capital of Awadh, in the current Faizabad district of Uttar Pradesh. Ayodhya is the birth place of Hindu God Shri Ram, and the capital of Kosala Kingdom. This Hindu holy city is described as early as in the Hindu Epics. During the time of Gautama Buddha the city was called Ayojjhā (Pali). Under Muslim rule, it was the seat of the governor of Awadh, and later during the British Raj the city was known as Ajodhya or Ajodhia and was part of the United Provinces of Agra and Oudh, it was also the seat of a small ‘talukdari’ state. It is on the right bank of the river Sarayu, 555 km east…

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