Red fort was constructed by Anang Pal- Prithviraj’s relative

दिल्लीकेसंस्थापकतोमरवंश के 10 वी शदी के 16 वे राजा #क्षत्रियसम्राटअनंगपाल_तोमर द्वितीय महाप्रतापी राजा का योगदान, उनकी भूमिका और चरित्र इतिहास में दबा रह गया। न जाने क्यों ?

पद्मविभूषण से अलंकृत पुरातत्वशास्त्री प्रो. बृजबासी लाल ने इस पर काफी शोध किया है, पुस्तक भी लिखी है। लेकिन इंद्रप्रस्थ के आंचल में ढिल्लिकापुरी बसी, फली-फूली और आज तक चली आ रही है दिल्ली के रूप में, यह कितने लोग जानते हैं?

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के ब्रिटिशकालीन अधिकारियों जैसे लार्ड कनिंघम से लेकर स्वातंत्र्योत्तर भारत में डॉ. बुद्ध रश्मि मणि तक अनेक विद्वान इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने ढिल्लिकापुरी के अनेक प्रस्तर अभिलेख और संस्कृत के उद्धरण उत्खनित कर खोज निकाले, जिनसे सिद्ध होता है कि राजपूत महाराजा अनंगपाल तोमर द्वितीय ने महरौली कुतुब मीनार के पास विष्णु स्तंभ की स्थापना कर जो नगरी बसाई वह स्वर्ग जैसी मनोहर ढिल्लिकापुरी थी।

वर्तमान राष्टपति भवन जब मूल वायसराय पैलेस के रूप में बन रहा था तो रायसीना के पास सरबन गांव में जो प्रस्तर अभिलेख मिले उनमें ढिल्लिकापुरी का मनोहारी वर्णन है। ये प्रस्तर खंड पुराना किला के संग्रहालय में आज भी सुरक्षित हैं। इनमें से एक पर लिखा है- (जो विक्रम संवत् 1384 की तिथि बताता है)

देशास्ति हरियाणाख्य: पृथिव्यां स्वर्गसन्नमि:।
ढिल्लिकाख्या पुरी तत्र तोमरैरस्ति निर्मिता।।

इस धरती पर हरियाणा नाम का प्रदेश है, जो स्वर्ग के सदृश है, राजपूत तोमरों द्वारा निर्मित ढिल्लिका नाम का नगर है। वही ढिल्लिका कालांतर में दिल्ली नाम से जानी गई, जिसे अंग्रेजों के समय अलग अंग्रेजी वर्तनी के साथ देहली कहा गया। महाराजा अनंगपाल तोमर का बड़ा पराक्रमी और शौर्यवान इतिहास है। उन्होंने महरौली के पास 27 विराट सनातनी, जैन मंदिर बनवाए थे। उनके द्वारा एक सुंदर छोटी झील अनंगताल का निर्माण किया गया। फरीदाबाद के पास अनंगपुर गांव है, अनंग बांध है और अनंगपुर दुर्ग है। महाराजा अनंगपाल द्वितीय के द्वारा जैन भक्ति का प्रकटीकरण भी प्रचुर मात्रा में हुआ। कुतुब मीनार तथा कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद इन्हीं मंदिरों को तोड़कर उन मूर्तियों को दीवारों में लगाकर बनाई गई। आज भी वहां गणपति की अपमानजनक ढंग से लगाई गई मूर्तियां, महावीर, जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां, दशावतार, नवग्रह आदि के शिल्प दीवारों तथा छतों पर स्पष्ट रूप से लगे दिखते हैं। कुतुबुद्दीन ऐबक ने अनंगपाल के 300 साल बाद उनके द्वारा बनाए मंदिरों का ध्वंस कर कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद बनवाई थी

महाराजा अनंगपाल द्वितीय राजपूत तोमर वंश के राजा थे। इन्होंने 1051 से 1080 ई. तक यानी 29 साल 6 माह और 18 दिन दिल्ली पर शासन किया और इसे समृद्ध बनाया। कुव्वत-उल-इस्लाम और अन्य मौखिक किंवदंतियों के अनुसार, अनंगपाल द्वितीय ने 27 मंदिर और एक महल का निर्माण कराया था। जोकि राजपूत वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है, इनमें से एक विख्यात योगमाया मंदिर कुतुब मीनार के पीछे स्थित है। अमीर खुसरो ने भी महाराजा अनंगपाल द्वितीय के बनवाए महल का उल्लेख किया है।

दिल्ली के संस्थापक मुगल नहीं थे, बल्कि अनंगपाल द्वितीय द्वारा स्थापित ढिल्लिका/ ढिल्ली ही आज की दिल्ली है। इसके बारे में बिजौलिया, सरबन और अन्य संस्कृत शिलालेखों में उल्लेख मिलता है। 10वीं सदी में प्रतिहारो के पतन के बाद तोमर वंश अस्तित्व में आया। इस वंश ने यमुना के किनारे अरावली पहाड़ियों के दक्षिण में योगिनीपुरा में अपने साम्राज्य की स्थापना की। प्रतिहारों के बाद इस वंश ने कन्नौज पर भी शासन किया। इंद्रप्रस्थ के वैभव खोने के बाद महाराजा अनंगपाल द्वितीय ने अरावली के पिछले हिस्से में 10 वीं सदी के मध्य में लाल कोटोर (लाल कोट) नामक सशक्त नगर बसाया था, जो ढिल्ली/ढिल्लिका का हिस्सा था।

इतिहासकार कनिंघम ने अबुल फजल द्वारा लिखित ‘आइन-ए-अकबरी’ तथा बीकानेर, ग्वालियर, कुमाऊं और गढ़वाल से मिली पाण्डुलिपियों से तोमर वंश का पता लगाया था। इन दस्तावेजों के अनुसार, तोमर वंश के शासनकाल की शुरुआत 8वीं सदी में ही हुई थी। इस वंश के 19 शासकों की सूची में महाराजा अनंगपाल तोमर द्वितीय का उल्लेख है। उन्हें तोमर वंश का 16वां राजा माना जाता है। पालम बावली से मिले साक्ष्य स्पष्ट रूप से बताते हैं कि तोमर वंश ने सबसे पहले हरियाणका (हरियाणा) की भूमि पर शासन किया। यहां से प्राप्त अभिलेख में ढिल्लीपुरा का उल्लेख है, जिसे योगिनीपुरा नाम से भी जाना जाता था।

गुप्त-प्रतिहार काल के ये पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि इस क्षेत्र में एक मंदिर था, जिसे योगिनीपुरा कहा जाता था। बाद में तोमर वंश के शासन काल में इसका नाम ढिल्ली या ढिल्लिका पड़ा। इसके अलावा, मुहम्मद बिन तुगलक कालीन 1328 ई. का सरबन शिलालेख भी इसका अंतिम प्रमाण है। यह शिलालेख सरबन सराय में पाया गया था, जो आज राजपथ कहलाता है। इस अभिलेख के अनुसार, सरबन इंद्रप्रस्थ के प्रतिगण (परगना) में पड़ता था। ।
अनंगपाल केवल अपने विराट, सुंदर महलों और मंदिरों के लिए ही नहीं जाने गए, बल्कि वे लौह स्तंभ, जो वस्तुत: विष्णु ध्वज स्तंभ है, 1052 ई. में मथुरा से लाए। यह बात विष्णु ध्वज स्तंभ पर अंकित लेख से स्पष्ट है। कनिंघम ने उस लेख को सम् दिहालि 1109 अन्तगपाल वहि पढ़ा था और अर्थ किया था संवत् 1109 अर्थात् 1052 ई. में अनंगपाल ने दिल्ली बसाई।और 1060 ई के लगभग लालकोट यानी लालकिला बनवाया ।

प्रसिद्ध इतिहासकार व निदेशक शोध प्रशासन डॉ. ओम जी उपाध्याय का कहना है कि महाराज अनंगपाल द्वितीय के समय श्रीधर ने पार्श्वनाथ चरित नामक ग्रंथ की रचना की तथा उसमें अपने आश्रयदाता नट्टुल साहू का प्रशंसात्मक विवरण देने के बाद दिल्ली का भी वर्णन किया। इस ग्रंथ में अनंगपाल द्वारा हम्मीर को पराजित किए जाने से संबंधित पंक्तियां लिखी हैं, जिनका अर्थ विद्वानों ने अलग-अलग प्रकार से किया है। इस क्रम में अपभ्रंश के मान्य विद्वान और विश्व भारती शांति निकेतन के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. राम सिंह तोमर ने जो अनुवाद किया, वह निम्नवत है- ‘‘मैं ऐसा समझता हूं- जहां प्रसिद्ध राजा अनंगपाल की श्रेष्ठ तलवार ने रिपुकपाल को तोड़ा, बढ़े हुए हम्मीर वीर का दलन किया, बुद्धिजन वृंद से चीन प्राप्त किया। बौद्ध-सिद्धों की रचनाओं में एक स्थान पर उभिलो चीरा मिलता है, जिसका अभिप्राय होता है- यशोगान किया या ध्वजा फहराई। इसका स्पष्ट अभिप्राय है कि दिल्ली के महाराज अनंगपाल द्वितीय ने तुर्क को पराजित किया था तथा यह तुर्क इब्राहिम ही था।’’

इस तरह देखा जाये तो दिल्ली के संस्थापक महाराज के रूप में अनंगपाल का स्मरण दिल्ली के मूल वास्तविक परिचय का स्मरण ही है।

कुतुबुद्दीन ऐबक और क़ुतुबमीनार

कुतुबुद्दीन ऐबक और क़ुतुबमीनार—

किसी भी देश पर शासन करना है तो उस देश के लोगों का ऐसा ब्रेनवाश कर दो कि वो अपने देश, अपनी संस्कृति और अपने पूर्वजों पर गर्व करना छोड़ दें. इस्लामी हमलावरों और उनके बाद अंग्रेजों ने भी भारत में यही किया. हम अपने पूर्वजों पर गर्व करना भूलकर उन अत्याचारियों को महान समझने लगे जिन्होंने भारत पर बेहिसाब जुल्म किये थे।

अगर आप दिल्ली घुमने गए है तो आपने कभी विष्णू स्तम्भ (क़ुतुबमीनार) को भी अवश्य देखा होगा. जिसके बारे में बताया जाता है कि उसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनबाया था. हम कभी जानने की कोशिश भी नहीं करते हैं कि कुतुबुद्दीन कौन था, उसने कितने बर्ष दिल्ली पर शासन किया, उसने कब विष्णू स्तम्भ (क़ुतुबमीनार) को बनवाया या विष्णू स्तम्भ (कुतूबमीनार) से पहले वो और क्या क्या बनवा चुका था ?

कुतुबुद्दीन ऐबक, मोहम्मद गौरी का खरीदा हुआ गुलाम था. मोहम्मद गौरी भारत पर कई हमले कर चुका था मगर हर बार उसे हारकर वापस जाना पडा था. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की जासूसी और कुतुबुद्दीन की रणनीति के कारण मोहम्मद गौरी, तराइन की लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को हराने में कामयाबी रहा और अजमेर / दिल्ली पर उसका कब्जा हो गया।

अजमेर पर कब्जा होने के बाद मोहम्मद गौरी ने चिश्ती से इनाम मांगने को कहा. तब चिश्ती ने अपनी जासूसी का इनाम मांगते हुए, एक भव्य मंदिर की तरफ इशारा करके गौरी से कहा कि तीन दिन में इस मंदिर को तोड़कर मस्जिद बना कर दो. तब कुतुबुद्दीन ने कहा आप तीन दिन कह रहे हैं मैं यह काम ढाई दिन में कर के आपको दूंगा।

कुतुबुद्दीन ने ढाई दिन में उस मंदिर को तोड़कर मस्जिद में बदल दिया. आज भी यह जगह “अढाई दिन का झोपड़ा” के नाम से जानी जाती है. जीत के बाद मोहम्मद गौरी, पश्चिमी भारत की जिम्मेदारी “कुतुबुद्दीन” को और पूर्वी भारत की जिम्मेदारी अपने दुसरे सेनापति “बख्तियार खिलजी” (जिसने नालंदा को जलाया था) को सौंप कर वापस चला गय था।

कुतुबुद्दीन कुल चार साल (१२०६ से १२१० तक) दिल्ली का शासक रहा. इन चार साल में वो अपने राज्य का विस्तार, इस्लाम के प्रचार और बुतपरस्ती का खात्मा करने में लगा रहा. हांसी, कन्नौज, बदायूं, मेरठ, अलीगढ़, कालिंजर, महोबा, आदि को उसने जीता. अजमेर के विद्रोह को दबाने के साथ राजस्थान के भी कई इलाकों में उसने काफी आतंक मचाया।

जिसे क़ुतुबमीनार कहते हैं वो महाराजा वीर विक्रमादित्य की वेदशाला थी. जहा बैठकर खगोलशास्त्री वराहमिहर ने ग्रहों, नक्षत्रों, तारों का अध्ययन कर, भारतीय कैलेण्डर “विक्रम संवत” का आविष्कार किया था. यहाँ पर २७ छोटे छोटे भवन (मंदिर) थे जो २७ नक्षत्रों के प्रतीक थे और मध्य में विष्णू स्तम्भ था, जिसको ध्रुव स्तम्भ भी कहा जाता था।

दिल्ली पर कब्जा करने के बाद उसने उन २७ मंदिरों को तोड दिया।विशाल विष्णु स्तम्भ को तोड़ने का तरीका समझ न आने पर उसने उसको तोड़ने के बजाय अपना नाम दे दिया। तब से उसे क़ुतुबमीनार कहा जाने लगा. कालान्तर में यह यह झूठ प्रचारित किया गया कि क़ुतुब मीनार को कुतुबुद्दीन ने बनबाया था. जबकि वो एक विध्वंशक था न कि कोई निर्माता।

अब बात करते हैं कुतुबुद्दीन की मौत की।इतिहास की किताबो में लिखा है कि उसकी मौत पोलो खेलते समय घोड़े से गिरने पर से हुई. ये अफगान / तुर्क लोग “पोलो” नहीं खेलते थे, पोलो खेल अंग्रेजों ने शुरू किया. अफगान / तुर्क लोग बुजकशी खेलते हैं जिसमे एक बकरे को मारकर उसे लेकर घोड़े पर भागते है, जो उसे लेकर मंजिल तक पहुंचता है, वो जीतता है।

कुतबुद्दीन ने अजमेर के विद्रोह को कुचलने के बाद राजस्थान के अनेकों इलाकों में कहर बरपाया था. उसका सबसे कडा विरोध उदयपुर के राजा ने किया, परन्तु कुतुबद्दीन उसको हराने में कामयाब रहा. उसने धोखे से राजकुंवर कर्णसिंह को बंदी बनाकर और उनको जान से मारने की धमकी देकर, राजकुंवर और उनके घोड़े शुभ्रक को पकड कर लाहौर ले आया।

एक दिन राजकुंवर ने कैद से भागने की कोशिश की, लेकिन पकड़ा गया. इस पर क्रोधित होकर कुतुबुद्दीन ने उसका सर काटने का हुकुम दिया. दरिंदगी दिखाने के लिए उसने कहा कि बुजकशी खेला जाएगा लेकिन इसमें बकरे की जगह राजकुंवर का कटा हुआ सर इस्तेमाल होगा. कुतुबुद्दीन ने इस काम के लिए, अपने लिए घोड़ा भी राजकुंवर का “शुभ्रक” चुना।

कुतुबुद्दीन “शुभ्रक” घोडे पर सवार होकर अपनी टोली के साथ जन्नत बाग में पहुंचा. राजकुंवर को भी जंजीरों में बांधकर वहां लाया गया. राजकुंवर का सर काटने के लिए जैसे ही उनकी जंजीरों को खोला गया, शुभ्रक घोडे ने उछलकर कुतुबुद्दीन को अपनी पीठ से नीचे गिरा दिया और अपने पैरों से उसकी छाती पर क् बार किये, जिससे कुतुबुद्दीन वहीं पर मर गया।

इससे पहले कि सिपाही कुछ समझ पाते राजकुवर शुभ्रक घोडे पर सवार होकर वहां से निकल गए. कुतुबुदीन के सैनिको ने उनका पीछा किया मगर वो उनको पकड न सके. शुभ्रक कई दिन और कई रात दौड़ता रहा और अपने स्वामी को लेकर उदयपुर के महल के सामने आ कर रुका. वहां पहुंचकर जब राजकुंवर ने उतर कर पुचकारा तो वो मूर्ति की तरह शांत खडा रहा।

वो मर चुका था, सर पर हाथ फेरते ही उसका निष्प्राण शरीर लुढ़क गया. कुतुबुद्दीन की मौत और शुभ्रक की स्वामिभक्ति की इस घटना के बारे में हमारे स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाता है लेकिन इस घटना के बारे में फारसी के प्राचीन लेखकों ने काफी लिखा है. *धन्य है भारत की भूमि जहाँ इंसान तो क्या जानवर भी अपनी स्वामी भक्ति के लिए प्राण दांव पर लगा देते हैं।

।।साभार।।

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