Vishnu in Russia

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Ancient Vishnu idol found in Russian town

An ancient statue of Lord Vishnu has been found during excavation in an old village in Russia ‘s Volga region, raising questions about the prevalent view on the origin of ancient Russia.

The statue found in Staraya (old) Maina village dates back to VII-X century AD. Staraya Maina village in Ulyanovsk region was a highly populated city 1700 years ago, much older than Kiev, so far believed to be the mother of all Russian cities.

“We may consider it incredible, but we have ground to assert that Middle-Volga region was the original land of Ancient Rus. This is a hypothesis, but a hypothesis, which requires thorough research,” Reader of Ulyanovsk State University’s archaeology department Alexander Kozhevin told state-run television Vesti.

Kozhevin, who has been conducting excavation in Staraya Maina for last seven years, said that every single square metre of the surroundings of…

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|| लोभ का कुआ ||

|| लोभ का कुआ ||
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एक बार राजा भोज के दरबार में एक सवाल उठा कि ‘ ऐसा कौन सा कुआं है जिसमें गिरने के बाद आदमी बाहर नहीं निकल पाता?’ इस प्रश्न का उत्तर कोई नहीं दे पाया।

आखिर में राजा भोज ने राज पंडित से कहा कि इस प्रश्न का उत्तर सात दिनों के अंदर लेकर आओ, वरना आपको अभी तक जो इनाम धन आदि दिया गया है,वापस ले लिए जायेंगे तथा इस नगरी को छोड़कर दूसरी जगह जाना होगा।

छः दिन बीत चुके थे।राज पंडित को जबाव नहीं मिला था।निराश होकर वह जंगल की तरफ गया। वहां उसकी भेंट एक गड़रिए से हुई। गड़रिए ने पूछा -” आप तो राजपंडित हैं, राजा के दुलारे हो फिर चेहरे पर इतनी उदासी क्यों?

यह गड़रिया मेरा क्या मार्गदर्शन करेगा?सोचकर पंडित ने कुछ नहीं कहा।इसपर गडरिए ने पुनः उदासी का कारण पूछते हुए कहा -” पंडित जी हम भी सत्संगी हैं,हो सकता है आपके प्रश्न का जवाब मेरे पास हो, अतः नि:संकोच कहिए।” राज पंडित ने प्रश्न बता दिया और कहा कि अगर कलतक प्रश्न का जवाब नहीं मिला तो राजा नगर से निकाल देगा।

गड़रिया बोला -” मेरे पास पारस है उससे खूब सोना बनाओ। एक भोज क्या लाखों भोज तेरे पीछे घूमेंगे।बस,पारस देने से पहले मेरी एक शर्त माननी होगी कि तुझे मेरा चेला बनना पड़ेगा।”

राज पंडित के अंदर पहले तो अहंकार जागा कि दो कौड़ी के गड़रिए का चेला बनूं? लेकिन स्वार्थ पूर्ति हेतु चेला बनने के लिए तैयार हो गया।

गड़रिया बोला -” *पहले भेड़ का दूध पीओ फिर चेले बनो। राजपंडित ने कहा कि यदि ब्राह्मण भेड़ का दूध पीयेगा तो उसकी बुद्धि मारी जायेगी। मैं दूध नहीं पीऊंगा। तो जाओ, मैं पारस नहीं दूंगा – गड़रिया बोला।

राज पंडित बोला -” ठीक है,दूध पीने को तैयार हूं,आगे क्या करना है?”

गड़रिया बोला-” अब तो पहले मैं दूध को झूठा करूंगा फिर तुम्हें पीना पड़ेगा।

राजपंडित ने कहा -” तू तो हद करता है! ब्राह्मण को झूठा पिलायेगा?” तो जाओ, गड़रिया बोला।

राज पंडित बोला -” मैं तैयार हूं झूठा दूध पीने को ।”

गड़रिया बोला-” वह बात गयी।अब तो सामने जो मरे हुए इंसान की खोपड़ी का कंकाल पड़ा है, उसमें मैं दूध दोहूंगा,उसको झूठा करूंगा, कुत्ते को चटवाऊंगा फिर तुम्हें पिलाऊंगा।तब मिलेगा पारस। नहीं तो अपना रास्ता लीजिए।”

राजपंडित ने खूब विचार कर कहा-” है तो बड़ा कठिन लेकिन मैं तैयार हूं।

गड़रिया बोला-” मिल गया जवाब। यही तो कुआं है!लोभ का, तृष्णा का जिसमें आदमी गिरता जाता है और फिर कभी नहीं निकलता। जैसे कि तुम पारस को पाने के लिए इस लोभ रूपी कुएं में गिरते चले गए।

|| ॐ नमः शिवायः ||

क्या हैं अष्ट सिद्धियाँ और नव निधियां

क्या हैं अष्ट सिद्धियाँ और नव निधियां

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१. अणिमा : अष्ट सिद्धियों में सबसे पहली सिद्धि अणिमा हैं, जिसका अर्थ! अपने देह को एक अणु के समान सूक्ष्म करने की शक्ति से हैं। जिस प्रकार हम अपने नग्न आंखों एक अणु को नहीं देख सकते, उसी तरह अणिमा सिद्धि प्राप्त करने के पश्चात दुसरा कोई व्यक्ति सिद्धि प्राप्त करने वाले को नहीं देख सकता हैं। साधक जब चाहे एक अणु के बराबर का सूक्ष्म देह धारण करने में सक्षम होता हैं।

२. महिमा : अणिमा के ठीक विपरीत प्रकार की सिद्धि हैं महिमा, साधक जब चाहे अपने शरीर को असीमित विशालता करने में सक्षम होता हैं, वह अपने शरीर को किसी भी सीमा तक फैला सकता हैं।

३. गरिमा : इस सिद्धि को प्राप्त करने के पश्चात साधक अपने शरीर के भार को असीमित तरीके से बढ़ा सकता हैं। साधक का आकार तो सीमित ही रहता हैं, परन्तु उसके शरीर का भार इतना बढ़ जाता हैं कि उसे कोई शक्ति हिला नहीं सकती हैं।

४. लघिमा : साधक का शरीर इतना हल्का हो सकता है कि वह पवन से भी तेज गति से उड़ सकता हैं। उसके शरीर का भार ना के बराबर हो जाता हैं।

५. प्राप्ति : साधक बिना किसी रोक-टोक के किसी भी स्थान पर, कहीं भी जा सकता हैं। अपनी इच्छानुसार अन्य मनुष्यों के सन्मुख अदृश्य होकर, साधक जहाँ जाना चाहें वही जा सकता हैं तथा उसे कोई देख नहीं सकता हैं।

६. पराक्रम्य : साधक किसी के मन की बात को बहुत सरलता से समझ सकता हैं, फिर सामने वाला व्यक्ति अपने मन की बात की अभिव्यक्ति करें या नहीं।

७. इसित्व : यह भगवान की उपाधि हैं, यह सिद्धि प्राप्त करने से पश्चात साधक स्वयं ईश्वर स्वरूप हो जाता हैं, वह दुनिया पर अपना आधिपत्य स्थापित कर सकता हैं।

८. वसित्व : वसित्व प्राप्त करने के पश्चात साधक किसी भी व्यक्ति को अपना दास बनाकर रख सकता हैं। वह जिसे चाहें अपने वश में कर सकता हैं या किसी की भी पराजय का कारण बन सकता हैं।

नव निधियां- पद्म निधि, महापद्म निधि, नील निधि, मुकुंद निधि, नन्द निधि, मकर निधि, कच्छप निधि, शंख निधि, खर्व निधि।

विनाश काले विपरीत पूजा-बहराइच का सबसे मुख्य गाजी बाबा

विनाश काले विपरीत पूजा

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सैकड़ों निर्दोष लोगों के हत्यारे कसाब को फांसी हो चुकी है ! मान लो एक खास संप्रदाय के लोग उसे शहीद का दर्जा दे देते है ! और उसकी मजार बना देते है फिर वहाँ रोज माथा टेकना शुरू कर देते है 10-15 साल बाद भीड़ को देखते हुए हिन्दू भी वहाँ माथा टेकने लग जाते है !!

पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक शहर है,बहराइच । बहराइच में हिन्दू समाज का सबसे मुख्य पूजा स्थल है गाजी बाबा की मजार। मूर्ख हिंदू लाखों रूपये हर वर्ष इस पीर पर चढाते है।इतिहास जानकार हर व्यक्ति जानता है,कि महमूद गजनवी के उत्तरी भारत को १७ बार लूटने व बर्बाद करने के कुछ समय बाद उसका भांजा सलार गाजी भारत को दारूल इस्लाम बनाने के उद्देश्य से भारत पर चढ़ आया ।
(कुरान के अनुसार दर-उल -इस्लाम = 100% मुस्लिम जनसँख्या )
वह पंजाब ,सिंध, आज के उत्तर प्रदेश को रोंद्ता हुआ बहराइच तक जा पंहुचा। रास्ते में उसने लाखों हिन्दुओं का कत्लेआम कराया,लाखों हिंदू औरतों के बलात्कार हुए, हजारों मन्दिर तोड़ डाले।
राह में उसे एक भी ऐसा हिन्दू वीर नही मिला जो उसका मान मर्दन कर सके। इस्लाम की जेहाद की आंधी को रोक सके। परंतु बहराइच के राजा सुहेल देव राजभार ने उसको थामने का बीडा उठाया । वे अपनी सेना के साथ सलार गाजी के हत्याकांड को रोकने के लिए जा पहुंचे । महाराजा व हिन्दू वीरों ने सलार गाजी व उसकी दानवी सेना को मूली गाजर की तरह काट डाला । सलार गाजी मारा गया। उसकी भागती सेना के एक एक हत्यारे को काट डाला गया।
हिंदू ह्रदय राजा सुहेल देव राजभार ने अपने धर्म का पालन करते हुए, सलार गाजी को इस्लाम के अनुसार कब्र में दफ़न करा दिया। कुछ समय पश्चात् तुगलक वंश के आने पर फीरोज तुगलक ने सलारगाजी को इस्लाम का सच्चा संत सिपाही घोषित करते हुए उसकी मजार बनवा दी।
आज उसी हिन्दुओं के हत्यारे, हिंदू औरतों के बलातकारी ,मूर्ती भंजन दानव को हिंदू समाज एक देवता की तरह पूजता है। सलार गाजी हिन्दुओं का गाजी बाबा हो गया है। हिंदू वीर शिरोमणि सुहेल देव भुला दिए गएँ है और सलार गाजी हिन्दुओं का भगवन बनकर हिन्दू समाज का पूजनीय हो गया है।
अब गाजी की मजार पूजने वाले ,ऐसे हिन्दुओं को मूर्ख न कहे तो क्या कहें ?
ऐसे ही अजमेर में मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है, जिसकी मदद से ही मोहम्मद गोरी आया था और पहले शरण देने के लिए पृथ्वी राज चौहान की पत्नी और बेटियों को धोखे से बुलवाया और फिर उसे मोहम्मद गोरी के सैनिकों के हवाले कर उनका बलात्कार होने दिया। बाद में उस चिश्ती को पृथ्वी राज चौहान की उन‌ बेटियों ने ही उसकी हत्या कर अपने माता-पिता की हत्या का बदला लिया। हालांकि बाद में उन्हें भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और कुकर्मी उनकी लाशों से भी अपनी हवस मिटाते रहे।
अतः हर हिन्दू से निवेदन है कि इतिहास से सबक लें और किसी भी दरगाह या मजार पर ना जायें।हमारे हर देवी-देवताओं के हाथों में शस्त्र की परिकल्पना की गई है उसका निहतार्थ समझें। ईश्वर आपके भीतर ही है और आपकी रक्षा करने वाला कोई और नहीं बल्कि आप खुद हैं। अतः कायरता का त्याग करें। शूर-वीर ही धरती पर अपना अस्तित्व बनाए रख सकते हैं। जब जीवन में शेष कुछ ना बचे तो भी बहुत कुछ बचता है, हम अपना जीवन राष्ट्र और धर्म को समर्पित कर सकते हैं। अपने बच्चे भले ही आपकी बात ना माने लेकिन हो सकता है कि किसी को आपके विचार अच्छे लगें। *वीर भोग्या वसुंधरा*।

 

Bharat during Ramayan era.

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* #श्रीराम #का #कूटनीतिज्ञ #स्वरूप *

प्रायः ये जनप्रवृत्ति रही है कि श्रीराम को सरल , करुणावत्सल और मर्यादारक्षक व्यक्तित्व के रूप में देखा गया जो सदैव सामाजिक और राजनैतिक मर्यादाओं की रक्षा करते हैं जबकि श्रीकृष्ण को एक चतुर , कूटनीतिज्ञ और लीलाधर के रूप में देखा गया जो धर्मस्थापना के लिये साध्य साधन औचित्य की किसी मर्यादा को मानने के लिये तैयार नहीं हैं । इसी तुलना के चलते भावुक भक्तों द्वारा चौदह और सोलह कलाओं जैसी अवधारणायें दी गयीं जबकि वास्तविकता यह है कि श्रीराम भी उतने ही घोर राजमर्मज्ञ थे जितने श्रीकृष्ण । अंतर केवल छवि का है । श्रीराम की सरल छवि के नीचे उनका धुर राजनीतिज्ञ रूप आच्छादित हो गया है जबकि श्रीकृष्ण की चपल छवि के कारण उनका कूटनीतिज्ञ रूप जनमानस में स्थापित हो गया है ।

एक वास्तविकता यह भी है कि श्रीराम और श्रीकृष्ण दोंनों की कूटनीतिक और रणनैतिक कार्यशैली एक…

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Jesus History- A myth decoded

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This post by Dr. David E. Lee originally appeared at Real Truth About Religion.


A big lie has been told to world about Jesus who was never existed out of bibilian books.

Many historians and Romans who recorded everything, there is no mention whatsoever of the New Testament Jesus other than the New Testament Bible.


Many verses of  New Testament were written to deceive us about Jesus was just false and forgery.

At time of before and after Jesus, Jerusalem was a major trade route and  foreign travelers were visiting that area but never and none recorded anywhere. Jerusalem was  Roman control and the Romans documented everything of even minute importance that took place within their empire. Only one mention of Jesus was written during regime of  governor Herod, a tax collection officer for Rome, where text claims Herod had received reports about Jesus. BUT no one recorded a…

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Catholic Priest Destroyed the Entire Mayan Written Language

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The Maya writing system was used in what is now Mexico and Central America for almost two thousand years, until after the arrival of Cortés. It was written in bark paper books, carved on public monuments and inscribed on personal objects of pottery, bone and jade. The invading Spanish outlawed the script and burned thousands of books, systematically wiping out literacy in the Maya script and severing the Maya people from the written record of their own extraordinary past.

mayan Close-up from the Dresden Codex, one of the four surviving Maya books.

n the nineteenth century the texts began to re-emerge, as buried cities and fantastic inscriptions were discovered in the jungles and rare Maya books plundered by the Spanish were re-discovered in the libraries of Europe.  Early scholars decoded the complex Maya calendar and identified glyphs for gods, planets, animals, colors and directions. But prejudice and misconceptions about the nature of the Maya people and their script kept the meaning of the…

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Yoga Upanishad

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YOGA-KUNDALINI UPANISHAD
Introduction
The Yoga-Kundalini Upanishad is the eighty-sixth among the 108 Upanishads. It forms part of the Krishna
Yajurveda. It deals with an exposition of Hatha and Lambika Yogas. It concludes with an account of the
non-qualified Brahman. The Non-dual Brahman is the quest of all seekers.
Though grouped among the minor Upanishads, the Yoga-Kundalini Upanishad is a very important work on
Kundalini Yoga. It begins with an analysis of the nature of Chitta. It maintains that Samskaras and
Vasanas on the one hand, and Prana, on the other, constitute the causes for the existence of Chitta. If
Vasanas are controlled, Prana is automatically controlled. If Prana is controlled, the Vasanas are
automatically controlled.
The Yoga-Kundalini Upanishad presents methods for the control of Prana. The Yogic student does not deal
with Vasanas. He concerns himself with the techniques of controlling the Prana.
The three…

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Sushruta:Father of surgery

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Sushruta:Father of surgery:300 different types of operations and 125 surgical instruments.

 



2600 years ago he and health scientists of his time conducted complicated surgeries like cesareans, cataract, artificial limbs, fractures, urinary stones and even plastic surgery and brain surgery. Usage of anesthesia was well known in ancient India. Over 125 surgical equipment were used. Deep knowledge of anatomy, etiology, embryology, digestion, metabolism, genetics and immunity is also found in many texts.

 
Sushruta (also spelt Susruta or Sushrutha) (c. 6th century BC) was a surgeon who lived in ancient India and is the author of the book Sushruta Samhita, in which he describes over 120 surgical instruments, 300 surgical procedures and classifies human surgery in 8 categories. He lived and taught and practiced his art on the banks of the Ganges in the area that corresponds to the present day city of Varanasi in North India.
In the Sushruta…

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