Warrior Queen Nayaki Devi, who defeated Muhammad Ghori

Warrior Queen Nayaki Devi, who defeated Muhammad Ghori

Indian History in text books was written mostly by people who were not patriots not only that but behind every history text books there are political and western influences.
There are many dynasties who ruled for centuries, but few invaders who ruled for lesser years got more coverage.
Many warriors, especially females were neglected and never included in history.
One such is Nayaki Devi, the queen of Gujarat. She defeated Muhammad of Ghori 14 years before he faced Prithviraj Chauhan.

Muhammad Ghori defeated by Nayaki Devi. 🙏

It is well known that Muhammad Ghori defeated Prithviraj Chauhan at the 2nd Battle of Tarain in 1192 CE.
However, he was defeated by Nayaki Devi, a Goa born, Queen of Gujarat.
Nayaki Devi belonged to Chalukya Clan and was widow of Solanki King Ajaya Pala, who ruled for a short period of 4 years around 1170 CE.

She was the daughter of the Kadamba ruler Mahamandalesvara Permadi of Goa and after the death of her husband, Nayaki Devi served as a Queen Regent as her son Mularaja II was just a child.
Their capital was Anahilapataka (modern Patan in Gujarat).
Gujarati court poet Someshwara, who served in the court of the later Solanki kings mentions that the infant king Mularaja (Nayaki Devi’s son) defeated an army of mlechhas (Ghori invaders).

However, the most exact description of Nayaki Devi defeating Muhammad Ghori’s army comes from works of the 14th CE Jain scholar Merutunga . In his work, Prabandha Chintamani he mentions how Nayaki Devi, the Queen and mother of Mularaja II, fought the armies of the mleccha king at Gadararaghatta or Kyara near the foot of Mount Abu.

The 13th century Persian chronicler Minhaj-i-Siraj from Ghor, who later served as chronicler to the Slave dynasty of Delhi, mentions that Muhammad Ghori marched towards Nahrwala (the Solanki capital Anhilwara) via Uchchha and Multan.
The ‘Rae of Nahrwala’ (the Solanki king) was young, but commanded a huge army with elephants. In the ensuing battle, ‘the army of Islam was defeated and put to rout,’ and the invading ruler had to return to without any accomplishment.

Nayaki Devi on Elephant.

Nayaki Devi was the daughter of Goa Kadamba King Shivachitta Paramardi.
Nayaki Devi needed a strategy to defeat the enemy. She chose the site of the battle- the hilly passes of Gadaraghatta at the foot of Mount Abu near the village of Kasahrada, known was modern day Kyara in Sirohi district, 65 km away from Anahilavada. The narrow passes gained a huge advantage and the odds were balanced- the invading army was at great disadvantage.
The Chaulukya army was headed by Nayaki Devi with the boy king sitting on her lap. Her army and the troop of war-elephant crushed the massive army, which once defeated the mighty sultans of Multan like child’s play. Nayaki Devi killed several enemy soldiers forcing them to flee.
Muhammad Ghori fled with a handful of bodyguards. This battle was known as Battle of Kasahrada.

Due to this defeat, Ghori changed his plan while invading India next time. The following year, Muhammad Ghori entered India through Khyber pass, captured Peshawar followed by Lahore.

There are two Sanskrit inscriptions of Gujarat, where Mulraja-II is invariably mentioned as the conqueror of Garjanakas [dwellers of Ghazni]. One inscription states that “even a woman could defeat the Hammira [Amir], during the reign of Mulraja II..”
Few years later, Nayaki Devi’s daughter Kurma Devi defeated Qutbuddin Aibak in another battle. Jai Bhawani.

दिल्ली के संस्थापक तोमर वंश

दिल्ली के संस्थापक तोमर वंश के 10 वी शादी के 16 वे राजा अनंगपाल तोमर द्वितीय महाप्रतापी राजा का योगदान, उनकी भूमिका और चरित्र इतिहास में दबा रह गया। न जाने क्यों ?

पद्मविभूषण से अलंकृत पुरातत्वशास्त्री प्रो. बृजबासी लाल ने इस पर काफी शोध किया है, पुस्तक भी लिखी है। लेकिन इंद्रप्रस्थ के आंचल में ढिल्लिकापुरी बसी, फली-फूली और आज तक चली आ रही है दिल्ली के रूप में, यह कितने लोग जानते हैं?

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के ब्रिटिशकालीन अधिकारियों जैसे लार्ड कनिंघम से लेकर स्वातंत्र्योत्तर भारत में डॉ. बुद्ध रश्मि मणि तक अनेक विद्वान इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने ढिल्लिकापुरी के अनेक प्रस्तर अभिलेख और संस्कृत के उद्धरण उत्खनित कर खोज निकाले, जिनसे सिद्ध होता है कि राजपूत महाराजा अनंगपाल तोमर द्वितीय ने महरौली कुतुब मीनार के पास विष्णु स्तंभ की स्थापना कर जो नगरी बसाई वह स्वर्ग जैसी मनोहर ढिल्लिकापुरी थी।

वर्तमान राष्टपति भवन जब मूल वायसराय पैलेस के रूप में बन रहा था तो रायसीना के पास सरबन गांव में जो प्रस्तर अभिलेख मिले उनमें ढिल्लिकापुरी का मनोहारी वर्णन है। ये प्रस्तर खंड पुराना किला के संग्रहालय में आज भी सुरक्षित हैं। इनमें से एक पर लिखा है- (जो विक्रम संवत् 1384 की तिथि बताता है)

देशास्ति हरियाणाख्य: पृथिव्यां स्वर्गसन्नमि:।
ढिल्लिकाख्या पुरी तत्र तोमरैरस्ति निर्मिता।।

इस धरती पर हरियाणा नाम का प्रदेश है, जो स्वर्ग के सदृश है, राजपूत तोमरों द्वारा निर्मित ढिल्लिका नाम का नगर है। वही ढिल्लिका कालांतर में दिल्ली नाम से जानी गई, जिसे अंग्रेजों के समय अलग अंग्रेजी वर्तनी के साथ देहली कहा गया। महाराजा अनंगपाल तोमर का बड़ा पराक्रमी और शौर्यवान इतिहास है। उन्होंने महरौली के पास 27 विराट सनातनी, जैन मंदिर बनवाए थे। उनके द्वारा एक सुंदर छोटी झील अनंगताल का निर्माण किया गया। फरीदाबाद के पास अनंगपुर गांव है, अनंग बांध है और अनंगपुर दुर्ग है। महाराजा अनंगपाल द्वितीय के द्वारा जैन भक्ति का प्रकटीकरण भी प्रचुर मात्रा में हुआ। कुतुब मीनार तथा कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद इन्हीं मंदिरों को तोड़कर उन मूर्तियों को दीवारों में लगाकर बनाई गई। आज भी वहां गणपति की अपमानजनक ढंग से लगाई गई मूर्तियां, महावीर, जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां, दशावतार, नवग्रह आदि के शिल्प दीवारों तथा छतों पर स्पष्ट रूप से लगे दिखते हैं। कुतुबुद्दीन ऐबक ने अनंगपाल के 300 साल बाद उनके द्वारा बनाए मंदिरों का ध्वंस कर कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद बनवाई थी

महाराजा अनंगपाल द्वितीय राजपूत तोमर वंश के राजा थे। इन्होंने 1051 से 1080 ई. तक यानी 29 साल 6 माह और 18 दिन दिल्ली पर शासन किया और इसे समृद्ध बनाया। कुव्वत-उल-इस्लाम और अन्य मौखिक किंवदंतियों के अनुसार, अनंगपाल द्वितीय ने 27 मंदिर और एक महल का निर्माण कराया था। जोकि राजपूत वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है, इनमें से एक विख्यात योगमाया मंदिर कुतुब मीनार के पीछे स्थित है। अमीर खुसरो ने भी महाराजा अनंगपाल द्वितीय के बनवाए महल का उल्लेख किया है।

दिल्ली के संस्थापक मुगल नहीं थे, बल्कि अनंगपाल द्वितीय द्वारा स्थापित ढिल्लिका/ ढिल्ली ही आज की दिल्ली है। इसके बारे में बिजौलिया, सरबन और अन्य संस्कृत शिलालेखों में उल्लेख मिलता है। 10वीं सदी में प्रतिहारो के पतन के बाद तोमर वंश अस्तित्व में आया। इस वंश ने यमुना के किनारे अरावली पहाड़ियों के दक्षिण में योगिनीपुरा में अपने साम्राज्य की स्थापना की। प्रतिहारों के बाद इस वंश ने कन्नौज पर भी शासन किया। इंद्रप्रस्थ के वैभव खोने के बाद महाराजा अनंगपाल द्वितीय ने अरावली के पिछले हिस्से में 10 वीं सदी के मध्य में लाल कोटोर (लाल कोट) नामक सशक्त नगर बसाया था, जो ढिल्ली/ढिल्लिका का हिस्सा था।

इतिहासकार कनिंघम ने अबुल फजल द्वारा लिखित ‘आइन-ए-अकबरी’ तथा बीकानेर, ग्वालियर, कुमाऊं और गढ़वाल से मिली पाण्डुलिपियों से तोमर वंश का पता लगाया था। इन दस्तावेजों के अनुसार, तोमर वंश के शासनकाल की शुरुआत 8वीं सदी में ही हुई थी। इस वंश के 19 शासकों की सूची में महाराजा अनंगपाल तोमर द्वितीय का उल्लेख है। उन्हें तोमर वंश का 16वां राजा माना जाता है। पालम बावली से मिले साक्ष्य स्पष्ट रूप से बताते हैं कि तोमर वंश ने सबसे पहले हरियाणका (हरियाणा) की भूमि पर शासन किया। यहां से प्राप्त अभिलेख में ढिल्लीपुरा का उल्लेख है, जिसे योगिनीपुरा नाम से भी जाना जाता था।

गुप्त-प्रतिहार काल के ये पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि इस क्षेत्र में एक मंदिर था, जिसे योगिनीपुरा कहा जाता था। बाद में तोमर वंश के शासन काल में इसका नाम ढिल्ली या ढिल्लिका पड़ा। इसके अलावा, मुहम्मद बिन तुगलक कालीन 1328 ई. का सरबन शिलालेख भी इसका अंतिम प्रमाण है। यह शिलालेख सरबन सराय में पाया गया था, जो आज राजपथ कहलाता है। इस अभिलेख के अनुसार, सरबन इंद्रप्रस्थ के प्रतिगण (परगना) में पड़ता था। ।
अनंगपाल केवल अपने विराट, सुंदर महलों और मंदिरों के लिए ही नहीं जाने गए, बल्कि वे लौह स्तंभ, जो वस्तुत: विष्णु ध्वज स्तंभ है, 1052 ई. में मथुरा से लाए। यह बात विष्णु ध्वज स्तंभ पर अंकित लेख से स्पष्ट है। कनिंघम ने उस लेख को सम् दिहालि 1109 अन्तगपाल वहि पढ़ा था और अर्थ किया था संवत् 1109 अर्थात् 1052 ई. में अनंगपाल ने दिल्ली बसाई।और 1060 ई के लगभग लालकोट यानी लालकिला बनवाया ।

प्रसिद्ध इतिहासकार व निदेशक शोध प्रशासन डॉ. ओम जी उपाध्याय का कहना है कि महाराज अनंगपाल द्वितीय के समय श्रीधर ने पार्श्वनाथ चरित नामक ग्रंथ की रचना की तथा उसमें अपने आश्रयदाता नट्टुल साहू का प्रशंसात्मक विवरण देने के बाद दिल्ली का भी वर्णन किया। इस ग्रंथ में अनंगपाल द्वारा हम्मीर को पराजित किए जाने से संबंधित पंक्तियां लिखी हैं, जिनका अर्थ विद्वानों ने अलग-अलग प्रकार से किया है। इस क्रम में अपभ्रंश के मान्य विद्वान और विश्व भारती शांति निकेतन के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. राम सिंह तोमर ने जो अनुवाद किया, वह निम्नवत है- ‘‘मैं ऐसा समझता हूं- जहां प्रसिद्ध राजा अनंगपाल की श्रेष्ठ तलवार ने रिपुकपाल को तोड़ा, बढ़े हुए हम्मीर वीर का दलन किया, बुद्धिजन वृंद से चीन प्राप्त किया। बौद्ध-सिद्धों की रचनाओं में एक स्थान पर उभिलो चीरा मिलता है, जिसका अभिप्राय होता है- यशोगान किया या ध्वजा फहराई। इसका स्पष्ट अभिप्राय है कि दिल्ली के महाराज अनंगपाल द्वितीय ने तुर्क को पराजित किया था तथा यह तुर्क इब्राहिम ही था।’’

इस तरह देखा जाये तो दिल्ली के संस्थापक महाराज के रूप में अनंगपाल का स्मरण दिल्ली के मूल वास्तविक परिचय का स्मरण ही है।

https://www.youtube.com/channel/UCntYd5pyvUBVkzSao2WAZQA

वीर प्रतिहार राजवंश, Pratihar dynasty

वीर प्रतिहार राजवंश
प्रतिहार क्षत्रिय राजवंश का इतिहास

प्रतिहार क्षत्रिय (राजपूत) एक ऐसा वंश है जिसकी उत्पत्ति पर कई इतिहासकारों ने शोध किए जिनमे से कुछ अंग्रेज भी थे और वे अपनी सीमित मानसिक क्षमताओं तथा भारतीय समाज के ढांचे को न समझने के कारण इस वंश की उतपत्ति पर कई तरह के विरोधाभास उतपन्न कर गए। प्रतिहार एक शुद्ध क्षत्रिय वंश है जिसने गुर्जरादेश से गुज्जरों को खदेड़ कर गुर्जरदेश के स्वामी बने। इन्हे बेवजह ही गूजर जाति से जोड दिया जाता रहा है। जबकि प्रतिहारों ने अपने को कभी भी गुजर जाति का नही लिखा है। बल्कि नागभट्ट प्रथम के सेनापति गल्लक के शिलालेख जिसकी खोज डा. शांता रानी शर्मा जी ने की थी जिसका संपूर्ण विवरण उन्होंने अपनी पुस्तक ” Society and culture Rajasthan c. AD. 700 – 900 पर किया है। इस शिलालेख मे नागभट्ट प्रथम के द्वारा गुर्जरों की बस्ती को उखाड फेकने एवं प्रतिहारों के गुर्जरों को बिल्कुल भी नापसंद करने की जानकारी दी गई है।
मनुस्मृति में प्रतिहार,परिहार, पडिहार तीनों शब्दों का प्रयोग हुआ हैं। परिहार एक तरह से क्षत्रिय शब्द का पर्यायवाची है। क्षत्रिय वंश की इस शाखा के मूल पुरूष भगवान राम के भाई लक्ष्मण जी हैं। लक्ष्मण का उपनाम, प्रतिहार, होने के कारण उनके वंशज प्रतिहार, कालांतर में परिहार कहलाएं। ये सूर्यवंशी कुल के क्षत्रिय हैं। हरकेलि नाटक, ललित विग्रह नाटक, हम्मीर महाकाव्य पर्व, कक्कुक प्रतिहार का अभिलेख, बाउक प्रतिहार का अभिलेख, नागभट्ट प्रशस्ति, वत्सराज प्रतिहार का शिलालेख, मिहिरभोज की ग्वालियर प्रशस्ति आदि कई महत्वपूर्ण शिलालेखों एवं ग्रंथों में परिहार वंश को सूर्यवंशी एवं साफ – साफ लक्ष्मण जी का वंशज
बताया गया है।
लक्ष्मण के पुत्र अंगद जो कि कारापथ (राजस्थान एवं पंजाब) के शासक थे,उन्ही के वंशज प्रतिहार है। इस वंश की 126 वीं पीढ़ी में राजा हरिश्चन्द्र प्रतिहार (लगभग 590 ईस्वीं) का उल्लेख मिलता है। इनकी दूसरी पत्नी भद्रा से चार पुत्र थे।जिन्होंने कुछ धनसंचय और एक सेना का संगठन कर अपने पूर्वजों का राज्य माडव्यपुर को जीत लिया और मंडोर राज्य का निर्माण किया, जिसका राजा रज्जिल प्रतिहार बना। इसी का पौत्र नागभट्ट प्रतिहार था, जो अदम्य साहसी,महात्वाकांक्षी और असाधारण योद्धा था।
इस वंश में आगे चलकर कक्कुक राजा हुआ, जिसका राज्य पश्चिम भारत में सबल रूप से उभरकर सामने आया। पर इस वंश में प्रथम उल्लेखनीय राजा नागभट्ट प्रथम है, जिसका राज्यकाल 730 से 760 माना जाता है। उसने जालौर को अपनी राजधानी बनाकर एक शक्तिशाली परिहार राज्य की नींव डाली। इसी समय अरबों ने सिंध प्रांत जीत लिया और मालवा और गुर्जरात्रा राज्यों पर आक्रमण कर दिया। नागभट्ट ने इन्हे सिर्फ रोका ही नहीं, इनके हाथ से सैंनधन,सुराष्ट्र, उज्जैन, मालवा भड़ौच आदि राज्यों को मुक्त करा लिया। 750 में अरबों ने पुनः संगठित होकर भारत पर हमला किया और भारत की पश्चिमी सीमा पर त्राहि-त्राहि मचा दी। लेकिन नागभट्ट कुद्ध्र होकर गया और तीन हजार से ऊपर डाकुओं को मौत के घाट उतार दिया जिससे देश ने राहत की सांस ली। भारत मे अरब शक्ति को रौंदकर समाप्त करने का श्रेय अगर किसी क्षत्रिय वंश को जाता है वह केवल परिहार ही है जिन्होने अरबों से 300 वर्ष तक युद्ध किया एवं वैदिक सनातन धर्म की रक्षा की इसीलिए भारत का हर नागरिक इनका हमेशा रिणी रहेगा।
इसके बाद इसका पौत्र वत्सराज (775 से 800) उल्लेखनीय है, जिसने प्रतिहार साम्राज्य का विस्तार किया। उज्जैन के शासक भण्डि को पराजित कर उसे परिहार साम्राज्य की राजधानी बनाया। उस समय भारत में तीन महाशक्तियां अस्तित्व में थी।
1 प्रतिहार साम्राज्य- उज्जैन, राजा वत्सराज
2 पाल साम्राज्य- बंगाल , राजा धर्मपाल
3 राष्ट्रकूट साम्राज्य- दक्षिण भारत , राजा ध्रुव
अंततः वत्सराज ने पालवंश के धर्मपाल पर आक्रमण कर दिया और भयानक युद्ध में उसे पराजित कर अपनी अधीनता स्वीकार करने को विवश किया। लेकिन ई. 800 में ध्रुव और धर्मपाल की संयुक्त सेना ने वत्सराज को पराजित कर दिया और उज्जैन एवं उसकी उपराजधानी कन्नौज पर पालों का अधिकार हो गया।
लेकिन उसके पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने उज्जैन को फिर बसाया। उसने कन्नौज पर आक्रमण कर उसे पालों से छीन लिया और कन्नौज को अपनी प्रमुख राजधानी बनाया। उसने 820 से 825-826 तक दस भयावाह युद्ध किए और संपूर्ण उत्तरी भारत पर अधिकार कर लिया। इसने यवनों, तुर्कों को भारत में पैर नहीं जमाने दिया। नागभट्ट द्वितीय का समय उत्तम शासन के लिए प्रसिद्ध है। इसने 120 जलाशयों का निर्माण कराया-लंबी सड़के बनवाई। बटेश्वर के मंदिर जो मुरैना (मध्य प्रदेश) मे है इसका निर्माण भी इन्हीं के समय हआ, अजमेर का सरोवर उसी की कृति है, जो आज पुष्कर तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। यहां तक कि पूर्व काल में क्षत्रिय (राजपूत) योद्धा पुष्कर सरोवर पर वीर पूजा के रूप में नागभट्ट की पूजा कर युद्ध के लिए प्रस्थान करते थे।
नागभट्ट द्वितीय की उपाधि ‘‘परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर थी। नागभट्ट के पुत्र रामभद्र प्रतिहार ने पिता की ही भांति साम्राज्य सुरक्षित रखा। इनके पश्चात् इनका पुत्र इतिहास प्रसिद्ध सनातन धर्म रक्षक मिहिरभोज सम्राट बना, जिसका शासनकाल 836 से 885 माना जाता है। सिंहासन पर बैठते ही मिहिरभोज प्रतिहार ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में मिहिरभोज को ‘सम्राट’ उपाधि मिली थी।
अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे सम्राट भोज, मिहिर, प्रभास, भोजराज, वाराहवतार, परम भट्टारक, महाराजाधिराज परमेश्वर आदि विशेषणों से वर्णित किया गया है। इतने विशाल और विस्तृत साम्राज्य का प्रबंध अकेले सुदूर कन्नौज से कठिन हो रहा था। अस्तु मिहिरभोज ने साम्राज्य को चार भागो में बांटकर चार उप राजधानियां बनाई। कन्नौज- मुख्य राजधानी, उज्जैन और मंडोर को उप राजधानियां तथा ग्वालियर को सह राजधानी बनाया। प्रतिहारों का नागभट्ट प्रथम के समय से ही एक राज्यकुल संघ था, जिसमें कई क्षत्रिय राजें शामिल थे। पर मिहिरभोज के समय बुंदेलखण्ड और कांलिजर मण्डल पर चंदलों ने अधिकार जमा रखा था। मिहिरभोज का प्रस्ताव था कि चंदेल भी राज्य संघ के सदस्य बने, जिससे सम्पूर्ण उत्तरी पश्चिमी भारत एक विशाल शिला के रूप में खड़ा हो जाए और यवन, तुर्क, हूण, कुषाण आदि शत्रुओं को भारत प्रवेश से पूरी तरह रोका जा सके पर चंदेल इसके लिए तैयार नहीं हुए। अंततः मिहिरभोज ने कालिंजर पर आक्रमण कर दिया और इस क्षेत्र के चंदेलों को हरा दिया।
मिहिरभोज परम देश भक्त थे- उन्होने प्रण किया था कि उनके जीते जी कोई विदेशी शत्रु भारत भूमि को अपावन न कर पायेगा। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले आक्रमण कर उन राजाओं को ठीक किया जो कायरतावश यवनों को अपने राज्य में शरण लेने देते थे। इस प्रकार राजपूताना से कन्नौज तक एक शक्तिशाली राज्य के निर्माण का श्रेय सम्राट मिहिरभोज को जाता है। मिहिरभोज के शासन काल में कन्नौज साम्राज्य की सीमा रमाशंकर त्रिपाठी की पुस्तक हिस्ट्री ऑफ कन्नौज के अनुसार, पेज नं. 246 में, उत्तर पश्चिम् में सतलज नदी तक, उत्तर में हिमालय की तराई, पूर्व में बंगाल तक, दक्षिण पूर्व में बुंदेलखण्ड और वत्स राज्य तक, दक्षिण पश्चिम में सौराष्ट्र और राजपूतानें के अधिक भाग तक विस्तृत थी। अरब इतिहासकार सुलेमान ने तवारीख अरब में लिखा है, कि हिंदू क्षत्रिय राजाओं में मिहिरभोज प्रतिहार भारत में अरब एवं इस्लाम धर्म का सबसे बडा शत्रु है सुलेमान आगे यह भी लिखता है कि हिंदुस्तान की सुगठित और विशालतम सेना मिहिरभोज की ही थी-
इसमें हजारों हाथी, हजारों घोड़े और हजारों
रथ थे। मिहिरभोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। मिहिरभोज का तृतीय अभियान पाल राजाओ के विरूद्ध हुआ। इस समय बंगाल में पाल वंश का शासक देवपाल था। वह वीर और यशस्वी था- उसने अचानक कालिंजर पर आक्रमण कर दिया और कालिंजर में तैनात मिहिरभोज की सेना को परास्त कर किले पर कब्जा कर लिया। मिहिरभोज ने खबर पाते ही देवपाल को सबक सिखाने का निश्चय किया। कन्नौज और ग्वालियर दोनों सेनाओं को इकट्ठा होने का आदेश दिया और चैत्र मास सन् 850 ई. में देवपाल पर आक्रमण कर दिया। इससे देवपाल की सेना न केवल पराजित होकर बुरी तरह भागी, बल्कि वह मारा भी गया। मिहिरभोज ने बिहार समेत सारा क्षेत्र कन्नौज में मिला लिया। मिहिरभोज को पूर्व में उलझा देख पश्चिम भारत में पुनः उपद्रव और षड्यंत्र शुरू हो गये।
इस अव्यवस्था का लाभ अरब डकैतों ने
उठाया और वे सिंध पार पंजाब तक लूट पाट करने लगे। मिहिरभोज ने अब इस ओर प्रयाण किया। उसने सबसे पहले पंजाब के उत्तरी भाग पर राज कर रहे थक्कियक को पराजित किया, उसका राज्य और 2000 घोड़े छीन लिए। इसके बाद गूजरावाला के विश्वासघाती सुल्तान अलखान को बंदी बनाया- उसके संरक्षण में पल रहे 3000 तुर्की और हूण डाकुओं को बंदी बनाकर खूंखार और हत्या के लिए अपराधी पाये गए पिशाचों को मृत्यु दण्ड दे दिया। तदनन्तर टक्क देश के शंकरवर्मा को हराकर सम्पूर्ण पश्चिमी भारत को कन्नौज साम्राज्य का अंग बना लिया। चतुर्थ अभियान में मिहिरभोज ने प्रतिहार क्षत्रिय वंश की मूल गद्दी मण्डोर की ओर ध्यान दिया।
त्रवाण,बल्ल और माण्ड के राजाओं के सम्मिलित ससैन्य बल ने मण्डोर पर आक्रमण कर दिया। उस समय मण्डोर का राजा बाउक प्रतिहार पराजित ही होने वाला था कि मिहिरभोज ससैन्य सहायता के लिए पहुंच गया। उसने तीनों राजाओं को बंदी बना लिया और उनका राज्य कन्नौज में मिला लिया। इसी अभियान में उसने गुर्जरात्रा, लाट, पर्वत आदि राज्यों को भी समाप्त कर साम्राज्य का अंग बना लिया।
नोट : मंडोर के प्रतिहार (परिहार) कन्नौज के साम्राज्यवादी प्रतिहारों के सामंत के रुप मे कार्य करते थे। कन्नौज के प्रतिहारों के वंशज मंडोर से आकर कन्नौज को भारत देश की राजधानी बनाकर 220 वर्ष शासन किया एवं हिंदू सनातन धर्म की रक्षा की।
== प्रतिहार / परिहार क्षत्रिय वंश का परिचय ==
वर्ण – क्षत्रिय
राजवंश – प्रतिहार वंश
वंश – सूर्यवंशी
गोत्र – कौशिक (कौशल, कश्यप)
वेद – यजुर्वेद
उपवेद – धनुर्वेद
गुरु – वशिष्ठ
कुलदेव – श्री रामचंद्र जी , विष्णु भगवान
कुलदेवी – चामुण्डा देवी, गाजन माता
नदी – सरस्वती
तीर्थ – पुष्कर राज ( राजस्थान )
मंत्र – गायत्री
झंडा – केसरिया
निशान – लाल सूर्य
पशु – वाराह
नगाड़ा – रणजीत
अश्व – सरजीव
पूजन – खंड पूजन दशहरा
आदि पुरुष – श्री लक्ष्मण जी
आदि गद्दी – माण्डव्य पुरम ( मण्डौर , राजस्थान )
ज्येष्ठ गद्दी – बरमै राज्य नागौद ( मध्य प्रदेश)
== भारत मे प्रतिहार / परिहार क्षत्रियों की रियासत जो 1950 तक काबिज रही ==
नागौद रियासत – मध्यप्रदेश
अलीपुरा रियासत – मध्यप्रदेश
खनेती रियासत – हिमांचल प्रदेश
कुमारसैन रियासत – हिमांचल प्रदेश
मियागम रियासत – गुजरात
उमेटा रियासत – गुजरात
एकलबारा रियासत – गुजरात
== प्रतिहार / परिहार वंश की वर्तमान स्थिति==
भले ही यह विशाल प्रतिहार क्षत्रिय (राजपूत) साम्राज्य 15 वीं शताब्दी के बाद में छोटे छोटे राज्यों में सिमट कर बिखर हो गया हो लेकिन इस वंश के वंशज आज भी इसी साम्राज्य की परिधि में मिलते हैँ।
आजादी के पहले भारत मे प्रतिहार क्षत्रिय वंश के कई राज्य थे। जहां आज भी ये अच्छी संख्या में है।
मण्डौर, राजस्थान
जालौर, राजस्थान
लोहियाणागढ , राजस्थान
बाडमेर , राजस्थान
भीनमाल , राजस्थान
माउंट आबू, राजस्थान
पाली, राजस्थान
बेलासर, राजस्थान
शेरगढ , राजस्थान
चुरु , राजस्थान
कन्नौज, उतर प्रदेश
हमीरपुर उत्तर प्रदेश
प्रतापगढ, उत्तर प्रदेश
झगरपुर, उत्तर प्रदेश
उरई, उत्तर प्रदेश
जालौन, उत्तर प्रदेश
इटावा , उत्तर प्रदेश
कानपुर, उत्तर प्रदेश
उन्नाव, उतर प्रदेश
उज्जैन, मध्य प्रदेश
चंदेरी, मध्य प्रदेश
ग्वालियर, मध्य प्रदेश
जिगनी, मध्य प्रदेश
नीमच , मध्य प्रदेश
झांसी, मध्य प्रदेश
अलीपुरा, मध्य प्रदेश
नागौद, मध्य प्रदेश
उचेहरा, मध्य प्रदेश
दमोह, मध्य प्रदेश
सिंगोरगढ़, मध्य प्रदेश
एकलबारा, गुजरात
मियागाम, गुजरात
कर्जन, गुजरात
काठियावाड़, गुजरात
उमेटा, गुजरात
दुधरेज, गुजरात
खनेती, हिमाचल प्रदेश
कुमारसैन, हिमाचल प्रदेश
खोटकई , हिमांचल प्रदेश
जम्मू , जम्मू कश्मीर
डोडा , जम्मू कश्मीर
भदरवेह , जम्मू कश्मीर
करनाल , हरियाणा
खानदेश , महाराष्ट्र
जलगांव , महाराष्ट्र
फगवारा , पंजाब
परिहारपुर , बिहार
रांची , झारखंड
== मित्रों आइए अब जानते है प्रतिहार/परिहार वंश की शाखाओं के बारे में ==
भारत में परिहारों की कई शाखा है जो अब भी आवासित है। जो अभी तक की जानकारी मे है जिससे आज प्रतिहार/परिहार वंश पूरे भारत वर्ष में फैल गये। भारत मे परिहार लगभग 1000 हजार गांवो से भी ज्यादा जगहों में निवास करते है।
== प्रतिहार/परिहार क्षत्रिय वंश की शाखाएँ ==
(1) ईंदा प्रतिहार
(2) देवल प्रतिहार
(3) मडाड प्रतिहार
(4) खडाड प्रतिहार
(5) लूलावत प्रतिहार
(7) रामावत प्रतिहार
(8) कलाहँस प्रतिहार
(9) तखी प्रतिहार (परहार)
यह सभी शाखाएँ परिहार राजाओं अथवा परिहार ठाकुरों के नाम से है।
आइए अब जानते है प्रतिहार वंश के महान योद्धा शासको के बारे में जिन्होंने अपनी मातृभूमि, सनातन धर्म, प्रजा व राज्य के लिए सदैव ही न्यौछावर थे।
** प्रतिहार/परिहार क्षत्रिय वंश के महान राजा **
(1) राजा हरिश्चंद्र प्रतिहार
(2) राजा रज्जिल प्रतिहार
(3) राजा नरभट्ट प्रतिहार
(4) राजा नागभट्ट प्रथम
(5) राजा यशोवर्धन प्रतिहार
(6) राजा शिलुक प्रतिहार
(7) राजा कक्कुक प्रतिहार
(8) राजा बाउक प्रतिहार
(9) राजा वत्सराज प्रतिहार
(10) राजा नागभट्ट द्वितीय
(11) राजा मिहिरभोज प्रतिहार
(12) राजा महेन्द्रपाल प्रतिहार
(13) राजा महिपाल प्रतिहार
(14) राजा विनायकपाल प्रतिहार
(15) राजा महेन्द्रपाल द्वितीय
(16) राजा विजयपाल प्रतिहार
(17) राजा राज्यपाल प्रतिहार
(18) राजा त्रिलोचनपाल प्रतिहार
(19) राजा यशपाल प्रतिहार
(20) राजा मेदिनीराय प्रतिहार (चंदेरी राज्य)
(21) राजा वीरराजदेव प्रतिहार (नागौद राज्य के संस्थापक )
प्रतिहार क्षत्रिय वंश का बहुत ही वृहद इतिहास रहा है इन्होने हमेशा ही अपनी मातृभूमि के लिए बलिदान दिया है, एवं अपने नाम के ही स्वरुप प्रतिहार यानी रक्षक बनकर हिंदू सनातन धर्म को बचाये रखा एवं विदेशी आक्रमणकारियों को गाजर मूली की तरह काटा डाला, हमे गर्व है ऐसे हिंदू राजपूत वंश पर जिसने कभी भी मुश्किल घडी मे अपने आत्म विश्वास को नही खोया एवं आखरी सांस तक हिंदू धर्म की रक्षा की।
संदर्भ :
(1) राजपूताने का इतिहास – डा. गौरीशंकर हीराचंद ओझा
(2) विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का ऐतिहासिक अनुशीलन – डा. अनुपम सिंह
(3) भारत के प्रहरी – प्रतिहार – डा. विंध्यराज चौहान
(4) प्राचीन भारत का इतिहास – डा. विमलचंद पांडे
(5) उचेहरा (नागौद) का प्रतिहार राज्य – प्रो. ए. एच. निजामी
(6) राजस्थान का इतिहास – डा. गोपीनाथ शर्मा
(7) कन्नौज का इतिहास – डा. रमाशंकर त्रिपाठी
(8) Society and culture Rajasthan (700 -900) – Dr. Shanta Rani sharma
(9) Origin of Rajput – Dr. J. N. Asopa
(10) Glory that was Gurjardesh – Dr. K. M. Munshi.
प्रतिहार/परिहार क्षत्रिय वंश ।।
आप सभी ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ।।
जय नागभट्ट।।
जय मिहिरभोज।।

दिये गये लिंक पर क्लिक करके इस्टांग्राम पर हमे फॉलो करें 👇👇👇
https://www.instagram.com/thakur_shab_773/

King Maan Singh

भारत पर विशाल आक्रमण करने केलिए, गजनवी की तरह ही भारत को लूटने के लिए काबुल के हकीम खान ने तुरान के शाशक अब्दुल्लाह से संधि कर ली ।

जून 1581 ईसवी में राजा मानसिंह आमेर अपने कच्छवाहा राजपूतों की एक विशाल सेना रूपी विजय वाहिनी लेकर काबुल के विद्रोही मिर्जा हकीम के विरुद्ध सिंधु नदी के उस पार पेशावर के लिए रवाना हुए।

इस अवसर पर राजा मानसिंह की सेना को अटक नदी (सिंधु नदी) को पार कर दूसरी तरफ जाना था, लेकिन कच्छवाहा राजपूत सैनिक अटक के उस पार जाने में संकोच व आनाकानी करने लगे। उनका मत था कि उस युग में भारत के बाहर जाना धर्म विरुद्ध माना जाता था।

उक्त अवसर पर मान सिंह ने अपने सैनिकों को समझाया और उनका संदेश दूर किया।

राजा मानसिंह इस अवसर पर कहते हैं कि –

सबै भूमि गोपाल की , या में अटक कहां?
जा के मन में अटक है, सोई अटक रहा।

तुरान देश में वर्तमान में जो देश आते है, उनका नाम भी जान लीजिए,

तुर्की, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कज्जकिस्तान, आदि बड़े देश आते है, इनके साथ ईरान भी हो लिया, काबुल अफगानिस्तान था ही, वर्तमान बलूचिस्तान, जो पाकिस्तान का लगभग 70% है, वह भी भारत पर आक्रमण को तैयार था, वर्तमान पाकिस्तान का साथ तो निश्चित था ही,

और उस समय मुस्लिम आक्रमणकारियों की जनसंख्या का अनुपात राजपूत वीरो से बहुत ज्यादा था,

अनुपात देखे, तो भारत के एक एक सैनिक को मारने के लिए 150-150 मुसलमान थे का अनुपात था 1 राजपूत v/s 150 मुसलमान, ऐसे भयंकर आक्रमण को मानसिंहः जी ने रौका था, अगर मेवाड़ के चक्कर मे मानसिंहः रह जाते, तो ना तो मेवाड़ बचता, ओर ना भारत !!

ओर भारत मे राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, बिहार, गुजरात के मुसलमान और इनके साथ होते सो अलग, जब मानसिंहः जी ने यह खबर सुनी, तो वह तुरंत अफगानिस्तान के लिए रवाना हुए

ओर उन्होंने तुर्की, अफगानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान, कज्जकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, तजाकिस्तान उज्बेकिस्तान जैसे देशों को परास्त किया । यह उस समय मिलकर पांच देश बनते थे इन्ही देशों का झंडा छीनकर जयपुर घराने का पंचरंगा ध्वज बना है,

तुर्की तक तो विजय ना किसी राजा ने पिछले 1000 सालों में प्राप्त की – ना ऐसा प्रयास कोई कर पाया, वो किया आमेर नरेश ने,

मालवा के शेरखान फौलादी को परास्त किया, इख्तियार उल मुल्क को परास्त किया, पटना के मुसलमान शासक को मारा, सिंध लाहौर तथा पंजाब से पठानों को भगाया, बंगाल तथा उड़ीसा के मुसलमान राजाओ पर विजय प्राप्त की,

झारखंड में आजकल जो साहिबगंज कहा जाता है, वह राजा मानसिंहः जी ने ही बसाया था, उसका नाम पहले “राजमहल” हुआ करता था, जो बंगाल की राजधानी हुआ करती थी, उसके बाद अकबर के बेटे जहांगीर ने राजधानी वहां से शिफ्ट कर ढाका बनाई थी, राजमहल पर भी मुसलमानो का अधिकार हो गया, ओर उसका नाम बदलकर साहिबगंज कर दिया, झारखंड के राजमहल (साहिबगंज) में मानसिंहः जी का बनाया हुआ किला आज लगभग पूरी तरह मिट चुका है,

मानसिंहः जी की वीरता का पूरा वर्णन लिखना संभव ही नहीं है, पूरा क्या अधूरा का आधा भी नहीं लिखा गया है,

महाराज मानसिंहः जी आमेर महाधर्नुधर दिग्विजयी राजा थे, उनके स्मृतिचिन्ह इस संसार मे चिरकाल तक बने रहेंगे, दान, दासा, नरु, किशना, हरपाल, ईश्वरदास जैसे कवियों को उन्होंने एक एक करोड़ रुपया उस समय दान दिया था, उनके काल मे छापा चारण जैसे उनके दास 100-100 हाथियों के स्वामी हो गए थे, मान के गौदान की सम्पूर्ण संख्या 1 लाख थी, अपनी आयु के 44 साल तो उन्होंने युद्ध मे ही बिताएं, कई बार तो उन्होंने एक एक लाख की सेना वाले मुसलमान राजाओ को परास्त किया, जिसमे एक भी जिंदा वापस नही जा सका था, शीलामाता आदि का सम्मान, ओर उद्धार करने में भी उनका नाम अमर है, देश के अधिकांश शहर, गांव, कस्वे, तालाब आदि उन्ही के नाम पर है, बंगाल में मानभूमि , वीरभूमि, सिंहभूमि, आमेर में मानसागर, मानसरोवर, मानतालाब, मानकुण्ड, काशी में मानघाट ओर मानमंदिर, मानगांव, काबुल में माननगर, मानपुरा, अन्यत्र मान-देवीमंदिर, मानबाग, मानदरवाजा, मानमहल, मानझरोखा, ओर मानशस्त्र आदि है !! इसके अलावा शीलामाता का मंदिर – गोविन्ददेव जी मंदिर, कालामहादेव मंदिर, हर्षनाथभैरव मंदिर, आमेरमहल, जगतशिरोमणि मंदिर तथा वहां के किले, 8 परकोटे, जयगढ़, सांगानेर की नींव, पुष्कर, अजमेर, दिल्ली, आगरा के किलो की मरम्मत, मथुरा, वृंदावन, काशी, पटना ओर हरिद्वार के घाटों का निर्माण भी मानसिंहः जी ने ही करवाया है !!

● राजा मान सिंह ने उड़ीसा में #जगन्नाथ_मंदिर समेत 7000 मंदिरों से ज़्यादा मंदिरों की रक्षा की ।

● राजा मान ने हिंदुओं का मुक्ति स्थल #गयाजी की न केवल रक्षा की, बल्कि वहां कई मंदिर बनवाये भी ।

●राजा मान ने एशिया की सबसे बड़ी शक्ति अफगान मूलवंश बंगाल सल्तनत का नाश किया

● राजा मान ने गुजरात को 300 साल बाद अफगान शासकों से आजादी दिलवाई

● राजा मान ने द्वारिकाधीश मंदिर को मस्जिद से पुनः मंदिर बनाया

● तुलसीदास का सरंक्षक राजा मान था । उन्ही के संरक्षण के कारण तुलसीदास रामायण लिखने में सफल हो पाए ।

● राजा मान ने काशी में हजारो मंदिरो का निर्माण करवाया

● राजा मान ने मीराबाई को पूरा सम्मान दिया, उनका भव्य मंदिर अपने ही राज्य में बनवाया

● राजा मान ने अफगानिस्तान को तबाह करके रख दिया, जहां से पिछले 500 वर्षों से आक्रमण हो रहे थे ।

● राजा मान ने ही पूर्वी UP से लेकर बिहार, झारखंड की रक्षा की

● राजा मान ने ही सोमनाथ मंदिर का दुबारा उद्धार किया था, हालांकि बाद में औरंगजेब ने इसे तोड़ डाला

●राजा मान ने ही हिंदुओ पर लगा हुआ 300 वर्ष से चल रहा जजिया कर हटवाया

● राजा मान ने ही मथुरा का उद्धार किया ।।

● राजा मान की प्रजा ही सबसे सुखी सुरक्षित और सम्पन्न प्रजा थी ।।

लेकिन राजा मान के सम्मान में सबके मुँह में दही जम जाता है, क्यो की उन्होंने इतना काम किया, की पिछले 500 वर्षों में उनके जोड़ का योद्धा ओर धर्मरक्षक आज तक पैदा नही हुआ ।।

लेकिन जब मैने मानसिंह की तारीफ शुरू की, तो एक सज्जन आकर बोलने लगे, राजा मानसिंह के कारण हम अपने सभी राजाओ का सम्मान दाव पर नही लगा सकते, तो इसका अच्छा अर्थ मुझे समझ आया, सबका सम्मान बचाने के लिए राजा मानसिंह को बलि का बकरा बना दो, ओर उनका अपमान करो ? उनके अपमान से सबकी कमियां ढक जाएगी …

जबकि हक़ीक़त यह है, की 1576 ईस्वी तक, जो हल्दीघाटी युद्धकाल समय था, उस समय तक मुगल तो मुट्ठीभर थे, भारत मे अफगान वंश के मुस्लिम कब्जा करके बैठे थे । मुगल तो यहां 100 साल भी ढंग से राज नही कर पाए ….

इतिहास का विश्लेषण कीजिये, ऐसा न हो कहीं हम कर्नल टॉड ओर चाटुकार इतिहासकारो का इतिहास पढ़कर भारत के वीर पुत्रो का अपमान कर रहे हो………………

भारत के सनातन धर्म रक्षक, महापराक्रमी, रघुकुल तिलक आमेर नरेश महाराज मानसिंह जी कछवाहा

बहुत छुपाया शोर्य तेरा झुठे इतिहासकारों ने।
बहुत बताया गलत तुम्हें इन बिके हुए गद्दारों ने।
राजा मान सिंह गद्दार नही बस झुठा भर्म फैलाया था।
था समझौता मजबुरी का पर बुद्धि से धर्म बचाया था।
गद्दारों की हार मान सिंह यु उनका गुस्सा फुटा था
कितने मंदिर हुए सुरक्षित ना फेर जनेऊ टुटा था।

https://m.youtube.com/channel/UCntYd5pyvUBVkzSao2WAZQA

गजनी अफगानिस्तान-यदुवंशीभाटियों के पूर्वजो ने यहां तीनहजार साल राज किया

गजनी अफगानिस्तान-यदुवंशी, भाटियों के पूर्वजो ने यहां तीनहजार साल राज किया

नवरात्रि के दिन चल रहे हैं, देवी स्वरूपों के दर्शन करते-करते, देश-दुनिया के संग्रहालयों में रखी देवी मूर्तियों के विभिन्न स्वरूप भी ध्यान आकर्षित करते हैं, कितने कुशल कारीगर थे और कितनी श्रद्धा भक्ति से उन्हें मंदिरों में स्थापित करा गया था, आज खण्डित होकर भी उनमें सम्मोहन शक्ति मौजूद है। ऐसी ही देवी की एक खण्डित मूर्ति, काबुल संग्रहालय की तस्वीरों में देखने को मिलती है जो 80 के दशक में गजनी शहर के पास उत्खनन में मिली थी। इस मूर्ति के प्रति जैसलमेरी होने से आकर्षण और भी बढ़ जाता है क्योंकि जैसलमेर के इतिहास में अफ़ग़ानिस्तान के गजनी का महत्वपूर्ण स्थान है। यदुवंश की पौराणिक राजधानियों से ऐतिहासिक राजधानियों का जुड़ाव इस गजनी शहर में ही होता है, जैसलमेर में मान्यता है की यदुवंशी राजा गज ने वहाँ दुर्ग की स्थापना करी थी और उसे यदुवंश की चौथी राजधानी बनाकर गजनी नाम दिया था , जिसे बाद में खुरासान(ख़्वारिज्म) और रुम(बायजेंटियम) के संयुक्त मोर्चे ने जीत लिया था। आज भी 10वी सदी से पहले के ऐतिहासिक साक्ष्यों की कमी के कारण कुछ इतिहासकार गजनी से जैसलमेर के जुड़ाव को किंवदंती मानकर अस्वीकार कर देते हैं। लेकिन एक सदी पूर्व तक जैसलमेर के विभिन्न समाजों और व्यापार के सम्बन्ध उस शहर से थे, जैसलमेर से बुखारा-मध्य एशिया जाने वाले प्रमुख व्यापारिक मार्ग पर यह महत्वपूर्ण पड़ाव था। विभिन्न प्राचीन पुस्तकों और आधुनिक पुरातात्विक खोजों से गजनी के इतिहास के कुछ रोचक तथ्यों के बारे में जानकारी मिलती है जो इस प्रकार है-

  1. गजनी का सबसे प्राचीन उल्लेख यूनानी(ग्रीक) भूगोलविद पटोल्मी द्वारा दूसरी ईस्वी शताब्दी में अपनी किताब जीयोग्राफिया में मिलता है, जहाँ इसका यूनानी भाषा मे नाम ग़जका लिखा गया है।
  2. ईस्वी वर्ष 629 में चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनत्सांग इस शहर में रुका था, अपने आलेखों में उसने चीनी भाषा में इसका नाम हो-सी-ना लिखा है, जो रेशम मार्ग पर एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था।
  3. ईस्वी वर्ष 950 में गजनी का उल्लेख भारत के महत्वपूर्ण स्मृद्ध व्यापारिक केंद्र और बिना बगीचों वाले खूबसूरत शहर के रूप में, बग़दाद के यात्री अबू ईशाक ईब्राहिम ईश्तकारी ने अपनी किताब, किताब-अल-मसलिक-वल-मामलिक में करा है।
  4. ईस्वी वर्ष 988 में अरबी लेखक इब्न हवकाल ने अपनी किताब सूरत-अल-अर्ज में वर्ष 961 से 966 ईस्वी तक गजनी पर तुर्क योद्धा अल्प्टिजिन के घेरे व हमले के बाद विध्वंस का जिक्र करा है, लेकिन फिर भी यह व्यापार का मुख्य केंद्र था और तुर्क समुदाय का मुख्य गढ़ बन चुका था।
  5. उन्ही वर्षों में लिखी फारसी किताब हुदूद-अल-आलम में ग़ज़नी का उल्लेख मिलता है जो उस वक्त तक खोरासान के दक्षिण-पूर्व में सीमांत बामियान प्रान्त के अधीन था और महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था इसका उपनाम फ़ूर्दत-अल-हिन्द था जिसका मतलब भारत का व्यापारिक केंद्र होता है। इस किताब में इसे ग़जना नाम से उल्लेखित करा गया है और इस किताब के लेखन के समय अल्पतजिन की मृत्यु के बाद उसके दास सबुक्तजिन को गद्दी पर बैठाया जा चुका था।
  6. इसके बाद सबुक्तजिन के उत्तराधिकारी, महमूद के शासनकाल में गजनी एक शक्तिशाली साम्राज्य की राजधानी के रूप में उभरा, जिसका उल्लेख महमूद के दरबारियों की किताबों में उल्लेखित हैं, विशेषकर अल-बेरुनी की किताब-उल-हिन्द में।
  7. लेकिन गजनी का वह वैभव एक सदी में ही खत्म होने लगा जब गुर के शासक हुसैन जहाँसोज ने ईस्वी वर्ष 1151 में शहर को आग के हवाले कर दिया।
  8. लेकिन एक बार फिर से यह नगर भारत के व्यापारियों से गुलजार हो गया और इसकी स्मृद्धि ने ईस्वी वर्ष 1221 में मंगोलों के हमले को प्रेरित करा, जिसका उल्लेख अरबी लेखक याकूत-अल-हमवी की किताब, किताब मुज्ज्म-अल-बुलदान में मिलता है।
  9. ईस्वी वर्ष 1332 में इब्नबतूता के समय यह शहर भूतहा खण्डहर बन चुका था और यहाँ रहने वाले कुछ हजार लोग भी सर्दियों में इसे छोड़कर कंधार चले जाते थे।
  10. ईस्वी वर्ष 1504 में बाबरनामा में इसका उल्लेख मिलता है, जहाँ बाबर आश्चर्य व्यक्त करता है कि रेशम मार्ग के इस महत्वपूर्ण पड़ाव को हिंदुस्तान और खुरासान के राजाओं ने कभी राजधानी क्यों नहीं बनाया, शायद उसे इसके इतिहास की सही जानकारी नहीं थी।
  11. यही आश्चर्य ईस्वी वर्ष 1832 में इसे पहली बार देखने वाले यूरोपीय यात्री चार्ल्स मैसन ने भी अपने यात्रा विवरण में व्यक्त करा है।
  12. ईस्वी वर्ष 1839 में सदियों से जीर्ण शीर्ण प्राचीन दुर्ग, खण्डहरों और इमारतों को अंग्रेजी फौज ने प्रथम अंग्रेज-अफ़ग़ान युद्धों में गोला बारूद से काफी नुकसान पहुँचाया था।
  13. आधुनिक काल मे 1960 से 2003 तक ईटली के पुरातत्वविदों की टीम ने जियोवानी वेरार्दी के निर्देशन में उत्खनन कार्य करे और नगर के प्राचीन इतिहास विशेषकर 6ठी सदी काल के कुछ अवशेष खोज निकाले, जिनमें प्राचीन दुर्ग के पास सरदार टेपे नाम के टीले से ईसा की दूसरी शताब्दी काल में कुषाण काल में बने महाराज कनिक विहार नाम के बौद्ध विहार और स्तूप के अवशेष, 15 मीटर लम्बी बुद्ध की लेटी मूर्ति के अवशेष, विभिन्न मूर्तियाँ, एक अन्य स्थान पर शिव मंदिर के अवशेष, दुर्गा जी की विशाल मूर्ति का सिर और महिषासुर की मूर्ति के अवशेष मिले।

इन विवरणों से यह स्पष्ट है कि गजनी ईसा की दूसरी शताब्दी में कुषाण काल में स्थापित हो चुका था और इसकी ख्याति महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र के रूप में यूनान तक पहुँच चुकी थी। जैसलमेर के इतिहास पर शोध करने वाले इतिहासकारों से विनती है गजनी के दूसरी शताब्दी से नौंवी शताब्दी तक के इतिहास को प्राचीन फ़ारसी, अरबी, चीनी, बाइजेंटाइन, आर्मेनियन, तुर्की ग्रन्थों और विदेशी पुरातत्वविदों के सहयोग से प्राप्त कर नई जानकारियों से यदुवंश के इतिहास की गुमशुदा कड़ियों पर खोजबीन करने की।

दिये गये लिंक पर क्लिक करके हमारे यूट्यूब चैनल को subscribe करें 👇👇👇

https://m.youtube.com/channel/UCntYd5pyvUBVkzSao2WAZQA

King Man Singh

भारत पर विशाल आक्रमण करने केलिए, गजनवी की तरह ही भारत को लूटने के लिए काबुल के हकीम खान ने तुरान के शाशक अब्दुल्लाह से संधि कर ली ।

जून 1581 ईसवी में राजा मानसिंह आमेर अपने कच्छवाहा राजपूतों की एक विशाल सेना रूपी विजय वाहिनी लेकर काबुल के विद्रोही मिर्जा हकीम के विरुद्ध सिंधु नदी के उस पार पेशावर के लिए रवाना हुए।

इस अवसर पर राजा मानसिंह की सेना को अटक नदी (सिंधु नदी) को पार कर दूसरी तरफ जाना था, लेकिन कच्छवाहा राजपूत सैनिक अटक के उस पार जाने में संकोच व आनाकानी करने लगे। उनका मत था कि उस युग में भारत के बाहर जाना धर्म विरुद्ध माना जाता था।

उक्त अवसर पर मान सिंह ने अपने सैनिकों को समझाया और उनका संदेश दूर किया।

राजा मानसिंह इस अवसर पर कहते हैं कि –

सबै भूमि गोपाल की , या में अटक कहां?
जा के मन में अटक है, सोई अटक रहा।

तुरान देश में वर्तमान में जो देश आते है, उनका नाम भी जान लीजिए,

तुर्की, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कज्जकिस्तान, आदि बड़े देश आते है, इनके साथ ईरान भी हो लिया, काबुल अफगानिस्तान था ही, वर्तमान बलूचिस्तान, जो पाकिस्तान का लगभग 70% है, वह भी भारत पर आक्रमण को तैयार था, वर्तमान पाकिस्तान का साथ तो निश्चित था ही,

और उस समय मुस्लिम आक्रमणकारियों की जनसंख्या का अनुपात राजपूत वीरो से बहुत ज्यादा था,

अनुपात देखे, तो भारत के एक एक सैनिक को मारने के लिए 150-150 मुसलमान थे का अनुपात था 1 राजपूत v/s 150 मुसलमान, ऐसे भयंकर आक्रमण को मानसिंहः जी ने रौका था, अगर मेवाड़ के चक्कर मे मानसिंहः रह जाते, तो ना तो मेवाड़ बचता, ओर ना भारत !!

ओर भारत मे राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, बिहार, गुजरात के मुसलमान और इनके साथ होते सो अलग, जब मानसिंहः जी ने यह खबर सुनी, तो वह तुरंत अफगानिस्तान के लिए रवाना हुए

ओर उन्होंने तुर्की, अफगानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान, कज्जकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, तजाकिस्तान उज्बेकिस्तान जैसे देशों को परास्त किया । यह उस समय मिलकर पांच देश बनते थे इन्ही देशों का झंडा छीनकर जयपुर घराने का पंचरंगा ध्वज बना है,

तुर्की तक तो विजय ना किसी राजा ने पिछले 1000 सालों में प्राप्त की – ना ऐसा प्रयास कोई कर पाया, वो किया आमेर नरेश ने,

मालवा के शेरखान फौलादी को परास्त किया, इख्तियार उल मुल्क को परास्त किया, पटना के मुसलमान शासक को मारा, सिंध लाहौर तथा पंजाब से पठानों को भगाया, बंगाल तथा उड़ीसा के मुसलमान राजाओ पर विजय प्राप्त की,

झारखंड में आजकल जो साहिबगंज कहा जाता है, वह राजा मानसिंहः जी ने ही बसाया था, उसका नाम पहले “राजमहल” हुआ करता था, जो बंगाल की राजधानी हुआ करती थी, उसके बाद अकबर के बेटे जहांगीर ने राजधानी वहां से शिफ्ट कर ढाका बनाई थी, राजमहल पर भी मुसलमानो का अधिकार हो गया, ओर उसका नाम बदलकर साहिबगंज कर दिया, झारखंड के राजमहल (साहिबगंज) में मानसिंहः जी का बनाया हुआ किला आज लगभग पूरी तरह मिट चुका है,

मानसिंहः जी की वीरता का पूरा वर्णन लिखना संभव ही नहीं है, पूरा क्या अधूरा का आधा भी नहीं लिखा गया है,

महाराज मानसिंहः जी आमेर महाधर्नुधर दिग्विजयी राजा थे, उनके स्मृतिचिन्ह इस संसार मे चिरकाल तक बने रहेंगे, दान, दासा, नरु, किशना, हरपाल, ईश्वरदास जैसे कवियों को उन्होंने एक एक करोड़ रुपया उस समय दान दिया था, उनके काल मे छापा चारण जैसे उनके दास 100-100 हाथियों के स्वामी हो गए थे, मान के गौदान की सम्पूर्ण संख्या 1 लाख थी, अपनी आयु के 44 साल तो उन्होंने युद्ध मे ही बिताएं, कई बार तो उन्होंने एक एक लाख की सेना वाले मुसलमान राजाओ को परास्त किया, जिसमे एक भी जिंदा वापस नही जा सका था, शीलामाता आदि का सम्मान, ओर उद्धार करने में भी उनका नाम अमर है, देश के अधिकांश शहर, गांव, कस्वे, तालाब आदि उन्ही के नाम पर है, बंगाल में मानभूमि , वीरभूमि, सिंहभूमि, आमेर में मानसागर, मानसरोवर, मानतालाब, मानकुण्ड, काशी में मानघाट ओर मानमंदिर, मानगांव, काबुल में माननगर, मानपुरा, अन्यत्र मान-देवीमंदिर, मानबाग, मानदरवाजा, मानमहल, मानझरोखा, ओर मानशस्त्र आदि है !! इसके अलावा शीलामाता का मंदिर – गोविन्ददेव जी मंदिर, कालामहादेव मंदिर, हर्षनाथभैरव मंदिर, आमेरमहल, जगतशिरोमणि मंदिर तथा वहां के किले, 8 परकोटे, जयगढ़, सांगानेर की नींव, पुष्कर, अजमेर, दिल्ली, आगरा के किलो की मरम्मत, मथुरा, वृंदावन, काशी, पटना ओर हरिद्वार के घाटों का निर्माण भी मानसिंहः जी ने ही करवाया है !!

● राजा मान सिंह ने उड़ीसा में #जगन्नाथ_मंदिर समेत 7000 मंदिरों से ज़्यादा मंदिरों की रक्षा की ।

● राजा मान ने हिंदुओं का मुक्ति स्थल #गयाजी की न केवल रक्षा की, बल्कि वहां कई मंदिर बनवाये भी ।

●राजा मान ने एशिया की सबसे बड़ी शक्ति अफगान मूलवंश बंगाल सल्तनत का नाश किया

● राजा मान ने गुजरात को 300 साल बाद अफगान शासकों से आजादी दिलवाई

● राजा मान ने द्वारिकाधीश मंदिर को मस्जिद से पुनः मंदिर बनाया

● तुलसीदास का सरंक्षक राजा मान था । उन्ही के संरक्षण के कारण तुलसीदास रामायण लिखने में सफल हो पाए ।

● राजा मान ने काशी में हजारो मंदिरो का निर्माण करवाया

● राजा मान ने मीराबाई को पूरा सम्मान दिया, उनका भव्य मंदिर अपने ही राज्य में बनवाया

● राजा मान ने अफगानिस्तान को तबाह करके रख दिया, जहां से पिछले 500 वर्षों से आक्रमण हो रहे थे ।

● राजा मान ने ही पूर्वी UP से लेकर बिहार, झारखंड की रक्षा की

● राजा मान ने ही सोमनाथ मंदिर का दुबारा उद्धार किया था, हालांकि बाद में औरंगजेब ने इसे तोड़ डाला

●राजा मान ने ही हिंदुओ पर लगा हुआ 300 वर्ष से चल रहा जजिया कर हटवाया

● राजा मान ने ही मथुरा का उद्धार किया ।।

● राजा मान की प्रजा ही सबसे सुखी सुरक्षित और सम्पन्न प्रजा थी ।।

लेकिन राजा मान के सम्मान में सबके मुँह में दही जम जाता है, क्यो की उन्होंने इतना काम किया, की पिछले 500 वर्षों में उनके जोड़ का योद्धा ओर धर्मरक्षक आज तक पैदा नही हुआ ।।

लेकिन जब मैने मानसिंह की तारीफ शुरू की, तो एक सज्जन आकर बोलने लगे, राजा मानसिंह के कारण हम अपने सभी राजाओ का सम्मान दाव पर नही लगा सकते, तो इसका अच्छा अर्थ मुझे समझ आया, सबका सम्मान बचाने के लिए राजा मानसिंह को बलि का बकरा बना दो, ओर उनका अपमान करो ? उनके अपमान से सबकी कमियां ढक जाएगी …

जबकि हक़ीक़त यह है, की 1576 ईस्वी तक, जो हल्दीघाटी युद्धकाल समय था, उस समय तक मुगल तो मुट्ठीभर थे, भारत मे अफगान वंश के मुस्लिम कब्जा करके बैठे थे । मुगल तो यहां 100 साल भी ढंग से राज नही कर पाए ….

इतिहास का विश्लेषण कीजिये, ऐसा न हो कहीं हम कर्नल टॉड ओर चाटुकार इतिहासकारो का इतिहास पढ़कर भारत के वीर पुत्रो का अपमान कर रहे हो………………

भारत के सनातन धर्म रक्षक, महापराक्रमी, रघुकुल तिलक आमेर नरेश महाराज मानसिंह जी कछवाहा

बहुत छुपाया शोर्य तेरा झुठे इतिहासकारों ने।
बहुत बताया गलत तुम्हें इन बिके हुए गद्दारों ने।
राजा मान सिंह गद्दार नही बस झुठा भर्म फैलाया था।
था समझौता मजबुरी का पर बुद्धि से धर्म बचाया था।
गद्दारों की हार मान सिंह यु उनका गुस्सा फुटा था
कितने मंदिर हुए सुरक्षित ना फेर जनेऊ टुटा था।

Truth about Grand Trunk Road-Not Shershah built it!

Sanatan Dharm and Hinduism's avatarHINDUISM AND SANATAN DHARMA

India’s distorted history was started by Mughals and then completely changed by British and carried over by people, especially Romilla Thapar and Muslim education minister during Nehru reign and Nehru himself. With internet as free education, all falsehood is coming before eyes incuding Qutub Minar’s story as it is stated that Muslim ruler Qutubddin Eibak built it but he barely ruled Delhi for few years and Qutub Minar was an observatory built during Ashoka’s time as evidenced by many Hindu Gods still preserved in complex as well as there is a never rusted Iron Piller built by Ashoka. Same story is of Taj Mahal which was Shive Temple built by King Jai Sing Sisodiya and it was taken over by Shahjaha and converted to Musoleum. Real story is underneath where no body is allowed as they want to gide facts. Same story is for Red Forte. If Muslims were that…

View original post 1,126 more words

हथियारों से लैस होना जरूरी, वरना भेड़िये तो राह चलते साधुओं पर भी अकारण झपट्टा मारते हैं: दिनकर ने क्यों कहा था ऐसा?

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर एक ऐसे लेखक थे, जो गद्य और पद्य – दोनों ही विधाओं में समान रूप से पारंगत थे। विद्रोह और क्रांति हो या फिर श्रृंगार और प्रेम, उन्होंने कविता की हर विधा में साहित्य रचे और अपनी कुशलता दिखाई। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर को इतिहास का अच्छा ज्ञान था और द्वापर युग से उनका लगाव इतना था कि उन्होंने खुद स्वीकारा है कि वो समसामयिक समस्याओं के समाधान के लिए दौड़े-दौड़े हमेशा वहीं चले जाते हैं।

बेगूसराय के सिमरिया में जन्मे दिनकर संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू – हिंदी के अलावा इन चार भाषाओं के भी जानकार थे। मुजफ्फरपुर कॉलेज में बतौर हिंदी विभागाध्यक्ष और भागलपुर कॉलेज में बतौर उपकुलपति काम करने के बाद उन्होंने भारत सरकार के हिंदी सलाहकार के रूप में सेवाएँ दीं। स्वाधीनता के बाद वो बिहार विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष रहे। 12 वर्षों तक सांसद रहे। फिर वो भागलपुर यूनिवर्सिटी में वो बतौर कुलपति लौटे।

यहाँ हम उन रामधारी सिंह दिनकर की बात करेंगे, जो राज्यसभा सांसद थे और जिन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान सत्ता से सवाल पूछने और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की गलतियों पर ऊँगली उठाने में कभी झिझक महसूस नहीं की। भारत-चीन युद्ध इतिहास का एक ऐसा ही प्रसंग है, जब नेहरू के मन से ये भ्रम मिट गया था कि अब अहिंसा का युग आ गया है और भारत को हथियारों व सेना की ज़रूरत ही नहीं है।

फ़रवरी 21, 1963 में राज्यसभा में दिए अपने भाषण में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने समझाया था कि अहिंसा का अर्थ क्या होता है। उन्होंने बताया था कि गाँधी की अहिंसा मात्र अहिंसा ही नहीं थी बल्कि उसमें आग थी, क़ुर्बानी का तेज था और आहुति-धर्म की ज्वाला थी।

उन्होंने कहा था कि हम अहिंसा के मार्ग पर चलेंगे, लेकिन साथ ही हम हथियारों से लैस होकर भी चलेंगे, ताकि हम उन भेड़ियों से अपनी प्राण-रक्षा कर सकें, जो राह चलते साधुओं पर भी अकारण झपट्टा मारते हैं।

ऐसा नहीं है कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने ये बात सिर्फ संसद में ही कही थी, बल्कि उनकी कविताओं में भी ये भाव दिखता है। शांति और अहिंसा की उन्होंने हमेशा प्रशंसा की है लेकिन साथ ही खुद की रक्षा के लिए, आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए और राष्ट्र के लिए हथियार उठाने के भी उन्होंने प्रेरित किया है।

उन्होंने ये स्वीकार करने में हिचक महसूस नहीं की कि भारत ने आज़ादी के बाद 15 वर्षों तक इस व्यावहारिक-धर्म की उपेक्षा की। ‘कुरुक्षेत्र’ की ये पंक्तियाँ देखिए, जो उनके संसद में कही गई बातों से एकदम मिलती-जुलती है:

छीनता हो सत्व कोई, और तू
त्याग-तप के काम ले यह पाप है।
पुण्य है विच्छिन्न कर देना उसे
बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ हो।
बद्ध, विदलित और साधनहीन को
है उचित अवलम्ब अपनी आह का;
गिड़गिड़ाकर किन्तु, माँगे भीख क्यों
वह पुरुष, जिसकी भुजा में शक्ति हो?
युद्ध को तुम निन्द्य कहते हो, मगर,
जब तलक हैं उठ रहीं चिनगारियाँ
भिन्न स्वर्थों के कुलिश-संघर्ष की,
युद्ध तब तक विश्व में अनिवार्य है।

रामधारी सिंह दिनकर ने ‘कुरुक्षेत्र’ में भीष्म के शब्दों में आज के सत्ताधीशों को शासन करने का तरीका सिखाया है और शत्रु से निपटने का गुर बताया है। भला इसके लिए उन्हें शरशैया पर पड़े भारतवर्ष के उस बूढ़े महावीर से अच्छा कौन मिलता, जिसने महाभारत जैसे पूरे युद्ध को देखा हो, उसमें हिस्सा लिया हो और कुरुवंश की कई पीढ़ियों को अपना मार्गदर्शन दिया हो। कुरुक्षेत्र में दिनकर शांति की वकालत करते हैं लेकिन ऐसी परिस्थितियों की भी बात करते हैं, जब युद्ध को टाला ही नहीं जा सके।

संसद में जब वो हथियारों से लैस होने की बात करते हैं तो ‘कुरुक्षेत्र’ में भीष्म पितामह के मुँह से भी यही कहलवाते हैं कि अपनी तरफ बढ़ रहे हाथ को विछिन्न कर देना पुण्य है, इसमें कोई पाप नहीं है। जिसकी भुजा में शक्ति है, उसे भला गिड़गिड़ा कर भीख माँगने की क्या आवश्यकता है? अगर कोई आपके साथ हिंसा कर रहा हो और आप त्याग-तप से ही काम चलाते रहें तो ये पाप है, ये ठीक नहीं है।

आज जब भारत-चीन का तनाव चरम पर है, हमें रामधारी सिंह दिनकर के इस भाषण को ज़रूर पढ़ना चाहिए। बल्कि आज सरकार पर सवाल उठा रहे विपक्ष को भी इससे सीख लेनी चाहिए। उन्होंने बड़े ही आसान तरीके से समझा दिया कि भारत ने क्या गलतियाँ कीं। दिनकर ने कहा कि दुनिया भर के देश अपने खाने के दाँत अलग और दिखाने के दाँत अलग रखते हैं लेकिन हमने सिधाई में आकर अपने दिखाने के दाँत को ही असली मान लिया।

रामधारी सिंह दिनकर ने तब के सत्ताधीशों को समझाया कि जो बातें हम नहीं समझ सके, उन्हें चीन ने हमारी आँखों में उँगली डाल कर समझा दिया। आखिर रामधारी सिंह दिनकर ने क्यों कहा था कि महात्मा गाँधी, सम्राट अशोक और तथागत बुद्ध, ये सभी इस देश के रक्षक नहीं है, बल्कि ये सब तो खुद रक्षणीय हैं। दिनकर इन तीनों को देश की शोभा, संस्कार, गौरव और अभिमान तो मानते थे लेकिन उनका कहना था कि इस संस्कार की रक्षा तभी होगी, जब गुरु गोविन्द सिंह, छत्रपति शिवाजी, रानी लक्ष्मीबाई और भगत सिंह जैसे बटालियन हर वक़्त तैयार रहें।

दिनकर मानते थे कि हमारी सीमा पर हमें खतरा है लेकिन वो ये भी कहते थे कि खतरा हमारे प्रजातंत्र और जीवन-पद्धति पर भी है। उन्होंने सरकार से कहा था कि शारीरिक बल और बाहुबल की रक्षा के लिए हमने कुछ नहीं किया। उनका जोर था कि दंड, कुश्ती, बैठक और गदका, तलवार, पट्टा, भाल इत्यादि का युवाओं और बच्चों को प्रशिक्षण दिया जाए। विश्व शांति की वो पैरवी करते थे लेकिन कहते थे कि ये किसी एक देश की जिम्मेदारी थोड़े है।

दिनकर को इस बात से दिक्कत थी कि जब नेता लोग विश्व शांति पर बोलने लगते हैं तो वो ऐसी बातें बोल जाते हैं, जो कवियों और संतों को बोलनी चाहिए। रामधारी सिंह दिनकर ने अपने उस ऐतिहासिक भाषण में कहा था कि अहिंसा और शांति बड़े ही श्रेष्ठ गुण हैं, लेकिन शरीर के आभाव में ये दुर्गति को प्राप्त होती है। तभी तो उन्होंने कहा था कि जिसके हाथ में बन्दूक नहीं है, वो शांति का समर्थ रक्षक सिद्ध नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा था:

“एक और बीमारी जो हमारे देश में पनप रही है, वो है अंतरराष्ट्रीयता की अति आराधना की बीमारी। जिसके भीतर राष्ट्रीयता नहीं है, वो अंतरराष्ट्रीय भी नहीं हो सकता। धरती की दो गतियाँ हैं। पृथ्वी अपनी धुरी के चारों ओर घूमती है, जो मनुष्य के राष्ट्रीय भाव का द्योतक है। पृथ्वी सूर्य के भी चारों भी परिक्रमा करती है, ये मनुष्य के अंतरराष्ट्रीय भाव का पर्याय है। जिस दिन ये पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमना बंद कर दे, उस दिन उसका सूर्य के चारों ओर घूमना भी अपने-आप बंद हो जाएगा। जिस व्यक्ति ने अपनी राष्ट्रीयता को तिलांजलि दे दी, उसकी अंतरराष्ट्रीयता छूछी है। देश को उन लोगों से सावधान रहना चाहिए, जो ये कहते फिरते हैं कि वो राष्ट्रीयता नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीयता के प्रहरी हैं। मैं उस विचारधारा का भी समर्थन नहीं करता, जो कहता है कि चीन के आक्रमण से जो व्यथित हैं, वो प्रतिक्रियागामी है और जो अपमान पीकर जीन के लिए तैयार है, वो प्रगतिशील है।”

तो ये थी रामधारी सिंह दिनकर की राष्ट्रवाद को लेकर सोच। उनके कहने का मतलब था कि जो अपने देश का नहीं हुआ, वो विश्व का कैसे हो सकता है? पृथ्वी का उदाहरण देकर उन्होंने इसे भली-भाँति समझाया। आज जब अरुंधति रॉय जैसे लोग और उनके अनुयायी खुद को ‘वैश्विक नागरिक’ साबित करने की होड़ में भारत को हर मंच से भला-बुरा कहते हैं, आज दिनकर होते तो ऐसे लोगों को ज़रूर देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताते।

उनका सीधा मानना था कि अपमान पीकर जीने की बात करने वाले जो कथित ‘प्रगतिशील’ हैं, वो चीन की करतूतों पर पर्दा डालना चाहते हैं। आज भी कॉन्ग्रेस और वामपंथी दल हैं, जो अपने बयानों में चीन की निंदा करना तो दूर की बात, अपने सरकार और सेना के बयानों तक का साथ नहीं देते। दिनकर कहते थे कि ऐसे लोग भारत को उसी हालत में ले जाना चाहते हैं, जो चीन के साथ फिर से भाई-भाई का नाता बैठा लें। ये तंज नेहरू पर था।

उनका कहना था कि जब बात देश की रक्षा की हो तो कैसी विचारधारा? कैसा दक्षिणपंथ और कैसा वामपंथ? आपकी विचारधारा दाएँ की हो या बाएँ की, देश की सेवा करने की तो इन दोनों को ही ज़रूरत है न? आज जब भारत-चीन तनाव के बीच ऐसी शक्तियाँ फिर से प्रबल होने की कोशिश में लगी हैं, याद कीजिए – शांति और अहिंसा के लिए भी बन्दूक रखना ज़रूरी है वरना भेड़िये तो अकारण राह चलते साधुओं पर भी झपट्टा मारते हैं।

Www.opindia.in

Rajput history and savior of Bharat

पन्ना धाय से कम न था रानी बाघेली का बलिदान

भारतीय इतिहास में खासकर राजस्थान के इतिहास में बलिदानों की गौरव गाथाओं की एक लम्बी श्रंखला है इन्ही गाथाओं में आपने मेवाड़ राज्य की स्वामिभक्त पन्ना धाय का नाम तो जरुर सुना होगा जिसने अपने दूध पिते पुत्र का बलिदान देकर चितौड़ के राजकुमार को हत्या होने से बचा लिया था | ठीक इसी तरह राजस्थान के मारवाड़ (जोधपुर) राज्य के नवजात राजकुमार अजीतसिंह को औरंगजेब से बचाने के लिए मारवाड़ राज्य के बलुन्दा ठिकाने की रानी बाघेली ने अपनी नवजात दूध पीती राजकुमारी का बलिदान देकर राजकुमार अजीतसिंह के जीवन की रक्षा की व राजकुमार अजीतसिंह का औरंगजेब के आतंक के बावजूद लालन पालन किया, पर पन्नाधाय के विपरीत रानी बाघेली के इस बलिदान को इतिहासकारों ने अपनी कृतियों में जगह तो दी है पर रानी बाघेली के त्याग और बलिदान व जोधपुर राज्य के उतराधिकारी की रक्षा करने का वो एतिहासिक और साहित्यक सम्मान नहीं मिला जिस तरह पन्ना धाय को | रानी बाघेली पर लिखने के मामले में इतिहासकारों ने कंजूसी बरती है और यही कारण है कि रानी के इस अदम्य त्याग और बलिदान से देश का आमजन अनभिज्ञ है |

28 नवम्बर 1678 को अफगानिस्तान के जमरूद नामक सैनिक ठिकाने पर जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह का निधन हो गया था उनके निधन के समय उनके साथ रह रही दो रानियाँ गर्भवती थी इसलिए वीर शिरोमणि दुर्गादास सहित जोधपुर राज्य के अन्य सरदारों ने इन रानियों को महाराजा के पार्थिव शरीर के साथ सती होने से रोक लिया | और इन गर्भवती रानियों को सैनिक चौकी से लाहौर ले आया गया जहाँ इन दोनों रानियों ने 19 फरवरी 1679 को एक एक पुत्र को जन्म दिया,बड़े राजकुमार नाम अजीतसिंह व छोटे का दलथंभन रखा गया | इन दोनों नवजात राजकुमारों व रानियों को लेकर जोधपुर के सरदार अपने दलबल के साथ अप्रेल 1679 में लाहौर से दिल्ली पहुंचे | तब तक औरंगजेब ने कूटनीति से पूरे मारवाड़ राज्य पर कब्ज़ा कर लिया और जगह जगह मुग़ल चौकियां स्थापित कर दी और राजकुमार अजीतसिंह को जोधपुर राज्य के उतराधिकारी के तौर पर मान्यता देने में आनाकानी करने लगा |

तब जोधपुर के सरदार दुर्गादास राठौड़,बलुन्दा के ठाकुर मोहकम सिंह,खिंची मुकंदास आदि ने औरंगजेब के षड्यंत्र को भांप लिया उन्होंने शिशु राजकुमार को जल्द जल्द से दिल्ली से बाहर निकलकर मारवाड़ पहुँचाने का निर्णय लिया पर औरंगजेब ने उनके चारों और कड़े पहरे बिठा रखे थे ऐसी परिस्थितियों में शिशु राजकुमार को दिल्ली से बाहर निकलना बहुत दुरूह कार्य था | उसी समय बलुन्दा के मोहकमसिंह की रानी बाघेली भी अपनी नवजात शिशु राजकुमारी के साथ दिल्ली में मौजूद थी वह एक छोटे सैनिक दल से हरिद्वार की यात्रा से आते समय दिल्ली में ठहरी हुई थी | उसने राजकुमार अजीतसिंह को बचाने के लिए राजकुमार को अपनी राजकुमारी से बदल लिया और राजकुमार को राजकुमारी के कपड़ों में छिपाकर खिंची मुकंददास व कुंवर हरीसिंह के साथ दिल्ली से निकालकर बलुन्दा ले आई | यह कार्य इतने गोपनीय तरीके से किया गया कि रानी ,दुर्गादास,ठाकुर मोहकम सिंह,खिंची मुकंदास,कु.हरिसिघ के अलावा किसी को कानों कान भनक तक नहीं लगी यही नहीं रानी ने अपनी दासियों तक को इसकी भनक नहीं लगने दी कि राजकुमारी के वेशभूषा में जोधपुर के राजकुमार अजीतसिंह का लालन पालन हो रहा है |

छ:माह तक रानी राजकुमार को खुद ही अपना दूध पिलाती,नहलाती व कपडे पहनाती ताकि किसी को पता न चले पर एक दिन राजकुमार को कपड़े पहनाते एक दासी ने देख लिया और उसने यह बात दूसरी रानियों को बता दी,अत: अब बलुन्दा का किला राजकुमार की सुरक्षा के लिए उचित न जानकार रानी बाघेली ने मायके जाने का बहाना कर खिंची मुक्न्दास व कु.हरिसिंह की सहायता से राजकुमार को लेकर सिरोही के कालिंद्री गाँव में अपने एक परिचित व निष्टावान जयदेव नामक पुष्करणा ब्रह्मण के घर ले आई व राजकुमार को लालन-पालन के लिए उसे सौंपा जहाँ उसकी (जयदेव)की पत्नी ने अपना दूध पिलाकर जोधपुर के उतराधिकारी राजकुमार को बड़ा किया |

यही राजकुमार अजीतसिंह बड़े होकर जोधपुर का महाराजा बने|इस तरह रानी बाघेली द्वारा अपनी कोख सूनी कर राजकुमार को अपनी राजकुमारी से बदलकर जोधपुर राज्य के उतराधिकारी को सुरक्षित बचा कर जोधपुर राज्य में वही भूमिका अदा की जो पन्ना धाय ने मेवाड़ राज्य के उतराधिकारी उदयसिंह को बचाने में की थी | हम कल्पना कर सकते है कि बलुन्दा ठिकाने की वह रानी बाघेली उस वक्त की नजाकत को देख अपनी पुत्री का बलिदान देकर राजकुमार अजीतसिंह को औरंगजेब के चुंगल से बचाकर मारवाड़ नहीं पहुंचाती तो मारवाड़ का आज इतिहास क्या होता?

नमन है भारतभूमि की इस वीरांगना रानी बाघेली जी और इनके इस अद्भुत त्याग व बलिदान को

बंद हो जिहादी सूफियों को ‘संत’ कहना

*मंदिर तोड़े, गाँव के गाँव मुस्लिम बना दिए•
*राजाओं का भी किया धर्मांतरण•
*बंद हो जिहादी सूफियों को ‘संत’ कहना•
*वामपंथियों ने किया गुणगान•


भारत में अक्सर ‘सूफी परंपरा’ की तुलना ‘भक्ति आंदोलन’ से की जाती रही है। ऐसा जानबूझ कर किया जाता है, ताकि रैदास और चैतन्य महाप्रभु जैसों की तुलना में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती और चाँद मियाँ जैसों को खड़ा किया जा सके। सूफियों को ‘संत’ कहा जाता है, ताकि हिन्दू भी उनका सम्मान करें, उनकी पूजा करें और उनके मजार पर जाकर मत्था टेकें। क्या वाकई में ये सूफी इतने महान थे? इन्हिने हिन्दू-मुस्लिम एकता बढ़ाई और गरीबों की सेवा की?

असल में इन सूफी फकीरों को भेजा ही इसीलिए जाता था, ताकि वो गरीबों को बहला-फुसला कर और उनके साथ प्रेमपूर्वक बर्ताव कर के इस्लामी धर्मांतरण कराएँ। जैसे इस्लामी शासन खून-खराबे से साम्राज्य विस्तार करते चलते थे, इन सूफियों को समाज को तोड़ने के लिए लगाया जाता था। वो अच्छी-अच्छी बातें करते थे, ताकि लोग उन्हें ‘संत’ मानें। उद्देश्य इस्लामी आक्रांताओं और सूफियों का समान ही था – इस्लाम का विस्तार।

लेखिका तस्लीमा नसरीन ने भी अपनी पुस्तक ‘निषिद्ध’ में लिखा है कि सूफियों के ‘प्रेमपूर्वक बर्ताव’ के कारण कई हिन्दुओं ने धर्मांतरण किया। इसका एक उदाहरण देखिए। पेंटर अकबर पद्ममसी के पूर्वज कभी हिन्दू हुआ करते थे, लेकिन 17वीं शताब्दी सूफी पीर सददीन ने उनके परिवार का इस्लामी धर्मांतरण करा के उन्हें मुस्लिम बना दिया। पूरे परिवार के मन में बिठा दिया गया कि पैगंबर मुहम्मद, विष्णु के 11वें अवतार हैं।

आइए, एक उदाहरण बंगाल से भी लेते हैं। बंगाल में एक राजा गणेश हुए हैं। उनके राज्य में भी क़ुतुब अल आलम नाम का सूफी फ़कीर आकर रहता था और उसने अपनी ‘चमत्कारी’ छवि बना रखी थी। आक्रांताओं के खतरे को कम करने के लिए राजा ‘चमत्कार’ का सहारा लेने पहुँचे। सूफी ने कह दिया कि राजा गणेश का बेटा जदु यदि इस्लाम अपना कर राज्य चलाता है तो सारे खतरे टल जाएँगे।

फिर क्या था, जदु को ‘जलालुद्दीन मुहम्मद शाह’ बना कर गद्दी पर बिठा दिया गया। क़ुतुब अल आलम की मौत के बाद राजा गणेश ने पूरे विधि-विधान से उसे हिन्दू धर्म में वापस लाने की प्रक्रिया पूरी की और ‘दनुजमर्दन देव’ नाम से उसका नया नामकरण किया। हालाँकि, ‘सूफी’ का प्रभाव उस पर ऐसा पड़ा था कि पिता की मौत के बाद उसने फिर इस्लाम अपना लिया। उसका बेटा ‘शमशुद्दीन अहमद शाह’ हुआ। 15वीं शताब्दी के दूसरे दशक में हुए इस उथल-पुथल ने बंगाल में इस्लाम का विस्तार शुरू किया।

इसी तरह 14वीं शताब्दी के कुछ शिलालेख शाह जलाल मुजर्रद की बातें करते हैं। बताया गया है कि वो ‘जिहाद’ और ‘काफिरों के खिलाफ युद्ध’ के लिए भारत आया था। साथ ही कहा गया था कि ‘दारुल हरब (नॉन-इस्लाम के राज वाली भूमि)’ में शहीद होकर वो ‘गाजी’ बन सकता है, ऐसी उसे शिक्षा मिली थी। वो युद्ध लड़ता था और अपने जीत होने पर अपने अनुयायियों के साथ इस्लाम का झंडा गाड़ता था।

इसी तरह बंगाल के एक और तथाकथित ‘सूफी संत’ शेख जलाल अल-दीन तबरीजी को देखिए। 13वीं शताब्दी में वो दिल्ली आया था, लेकिन वहाँ भाव न मिलने पर बंगाल आ गया। उसके पक्ष में दलीलें दी जा सकती हैं कि उसने अस्पताल व सामुदायिक किचन बनवाए, लेकिन उसके बारे में समकालीन स्रोतों ने ये भी लिखा है कि उसने एक ‘काफिर’ द्वारा बनवाए गए मंदिर को ध्वस्त कर दिया और उसकी जगह वहाँ ‘सूफी तकिया (रेस्ट हाउस)’ बनवाया। लिखा है कि उसने कई ‘काफिरों’ का इस्लामी धर्मांतरण कराया था।

ये भारत में आने वाले सबसे शुरुआती सूफी लोग थे। जब शुरुआत ही ऐसी थी तो फिर उसके बाद क्या सब हुआ होगा, ये आप समझ सकते हैं। असल में ये सूफी इस्लामी आक्रांताओं का मुखौटा होते थे, जो समाज को प्रदूषित करते हुए हिन्दू राजाओं के विरुद्ध माहौल तैयार करते थे। कभी-कभी ये युद्ध भी लड़ते थे। इस्लामी आक्रांताओं का राज आने पर इन्हें महत्वपूर्ण स्थान मिलता था, इसीलिए गरीब लोग भी इन्हें अपना सब कुछ मान लेते थे।

आइए, अब उन दो सूफी संतों की बात करते हैं, जिन्हें भारत में आज भी पूजा जाता है। स्पष्ट है कि पहला नाम इसमें अजमेर के ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का है। ये महज ‘संयोग’ ही था या कुछ और कि जिस साल मोहम्मद गोरी हार कर भागा, उसके अगले ही साल या कुछ ही दिनों बाद एक सूफी संत ने अजमेर में डेरा जमाया, पृथ्वीराज चौहान की राजधानी में। वहाँ वह कई चमत्कार करने लगा। आस-पास के लोगों में उसके प्रति जिज्ञासा जागी। वह लोगों से काफी अच्छे से पेश आता। गाँव के गाँव इस्लाम में धर्मांतरित होने शुरू हो गए।

बिना हथियार उठाए चिश्ती ने वो जमीन तैयार कर दी, जहाँ वो अगले 44 वर्षों तक इस्लाम का प्रचार-प्रसार करता रहा। 1191 में गोरी हारा और 1192 में दोबारा लौट कर आया। इसी अवधि के बीच चिश्ती ने अजमेर में डेरा जमाया। आखिर ऐसे संवेदनशील समय में चिश्ती भारत क्यों आया था? वो अपने चेलों-शागिर्दों के साथ पहुँचा था। चिश्ती ‘काफिरों के खिलाफ इस्लामी जिहाद’ के लिए भारत आया था।

तभी तो पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद ‘ख्वाजा’ मोईनुद्दीन चिश्ती ने जीत का श्रेय लेते हुए कहा था, “हमने पिथौरा (पृथ्वीराज चौहान) को जिंदा दबोच लिया और उसे इस्लाम की फौज के हवाले कर दिया।” पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ गद्दारी वाला युद्ध लड़ने के लिए ही मोईनुद्दीन चिश्ती भारत आया था, ताकि वो मोहम्मद गोरी की तरफ से उसकी सहायता कर सके और उसका काम आसान कर सके।

इसी तरह बहराइच में गाजी सैयद सालार मसूद उर्फ़ गाजी मियाँ की दरगाह है, जिसने हिन्दुओं का कत्लेआम किया था और धर्म ग्रंथों को तहस-नहस किया था। उसे महाराजा सुहेलदेव ने सन् 1034 के एक युद्ध में मार गिराया था। गाजी भारत में कई बार आक्रमण करने वाले मौमूद गजनवी का भांजा था। इस्लामी आक्रांता फिरोजशाह तुगलक ने उसका मजार बनवाया था। वामपंथियों की मानें तो हिन्दू उसे प्यार से ‘बाले मियाँ’ और ‘हठीला’ कहते थे, बाल श्रीकृष्ण से उसकी तुलना करते थे।

उसने ज़ुहरा बीबी नाम की एक लड़की से शादी की थी। दावा किया जाता है कि उसने उस लड़की का अंधापन ठीक कर दिया था। हालाँकि, आपको भारत में आए सूफियों और फकीरों के बारे में कई ऐसी कहानियाँ मिलेंगी, जहाँ उन्होंने किसी लड़की या उसके परिवार पर इस तरह का ‘चमत्कार’ कर के उससे शादी की हो। इतिहासकार एना सुवोरोवा ने तो गाजी मियाँ की तुलना श्रीकृष्ण और श्रीराम तक से कर दी है और कहा है कि हिन्दू उसे इसी रूप में देखते थे।

‘दैनिक जागरण’ में वरिष्ठ लेखक व पत्रकार अनंत विजय ने भी अपने एक स्तंभ में लेखक सुधीश पचौरी के हवाले से लिखा है कि ये सूफी इस्लाम के प्रचारक थे। वो सुल्तानों के साथ आते थे, और कट्टर से इतर नरम रुख अपनाते थे। सुल्तान जहाँ जाते थे, वहाँ सूफी इस्लाम को मजबूर करने निकल पड़ते थे। हिंदी साहित्य में भी ‘संत’ बता कर उनका महिमामंडन किया गया। अब समय आ गया है कि इन सूफियों को ‘संत’ न कहा जाए।
(26 September, 2021अनुपम कुमार सिंहआप इण्डिया काम)