Osho’s famous discourses

Sanatan Dharm and Hinduism's avatarHINDUISM AND SANATAN DHARMA

There is a lot to write about Osho Rajneesh Tiwari. I have nothing to write but provide a link where , who wants to learn and yearn, could. He is beyond from many.

http://www.oshofragrance.org

I read and listened his thoughts on “Sarvsaar Upnishad”. Link is http://www.oshofragrance.org/db/books/files/Osho_Rajneesh_Sarvasar_Upanishad.pdf

Audio book https://osho-sandesh.blogspot.com/2018/08/sarvsar-upanishad.html?m=1

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हरिसिंह नलवा एकबाहुबलीका स्मरण

एकबाहुबलीका_स्मरण

1699 में जब पिता दशमेश ने ‘खालसा’ सजाई थी तो उसके साथ विजय हुंकार करते हुए कहा था “राज करेगा खालसा, आकि रहे न कोई”।

एक ने उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से जो ‘देबबंद’ से शुरू होकर ‘कश्मीर’ तक जाता था, वहां के हिन्दुओं को अभय दिया तो दूसरे ने पंजाब के बाद पेशावर तक के हिन्दू और सिखों को अपनी सुरक्षा छाया में निर्भय कर दिया। “पिता दशमेश” की आकांक्षा को पूर्ण करने वाला एक “संन्यासी” था और दूसरा “क्षत्रिय सिख” जिसने “गुरदयाल उप्पल” और “धर्मा कौर” के घर जन्म लिया था और बड़े सामान्य परिवार में जन्मा ये वीर अपनी योग्यता से केवल 14 साल की उम्र में “धर्म के सूर्य” सम्राट रणजीत सिंह की आँखों का ऐसा तारा बन गया था कि महाराज उसके बिना रह ही नहीं पाते थे।

पिता दशमेश के इस “जयघोष” के संकल्प को मूर्त रूप देने को प्रस्तुत हुए “बाबा बंदा सिंह बहादुर” और “हरिसिंह नलवा”।

पूर्ण वैदिक और पूर्ण पौराणिक “महाराज रणजीत सिंह” ने शिकार के दौरान उनपर हमला करने वाले एक शेर को अकेले ही मार गिराने के बाद हरिसिंह को “नलवा” (प्रतापी सम्राट नल नाम पर) नाम दिया था और इस अजेय सेनापति ने उनके लिए उस अफगानिस्तान को जीत लिया जिसे अजेय और दुर्गम समझा जाता रहा था।

“महाराज रणजीत सिंह” ने भारत-भूमि की सीमा का पश्चिमी दिशा में जहाँ तक विस्तार का स्वप्न देखा, ‘नलवा’ की तलवार उसे साकार करती गई।

स्पेन के फर्डिनांड, बप्पा रावल, नागभट्ट द्वितीय और बंदा सिंह बहादुर के बाद हरिसिंह नलवा ही थे, जिनके नाम से आकियों (आक्रान्ताओं) की रातों की नींद उड़ जाया करती थी।

शोले फिल्म का मशहूर डायलॉग “यहाँ से पचास-पचास मील दूर जब कोई बच्चा रोता है तो माँ कहती है, सो जा नहीं तो गब्बर आ जायेगा” दरअसल हरिसिंह नलवा के जीवनवृत से चुराया हुआ है। अफ़गानी माएं अपने बच्चों को सुलाते हुए कहा करतीं थी :- “सो जा नहीं तो नलवा आ जायेगा”।

“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” “कटक से अटक” तक के जिस भारत के सांस्कृतिक एक्य की बात अपने बौद्धिक सत्रों में करता है उसे राजनैतिक रूप से सदियों बाद “नलवा” ने एक कर साकार कर दिया था।

1813 ई. में अटक, 1818 ई. में मुल्तान,1819 .में कश्मीर और फिर 1823 ई. में पेशावर …..एक के बाद इन प्रदेशों को जीतकर रणजीत सिंह की सीमा का विस्तार हरिसिंह नलवा ने ही किया था।

एक कुशल सेनापति “सरदार हरि सिंह नलवा” एक संत भी थे जो नानक जी के “सरबत का भला” से लेकर पिता दशमेश के स्वप्न “राज करेगा ख़ालसा” के “रणंजय” भी थे। इन दोनों महान गुणों को एकसाथ शिरोधार्य करने वाले “नलवा” ‘बंदा सिंह बहादुर’ की श्रेणी में थे।

आज के दिन यानि #30_अप्रैल को 1837 ईo में जमरूद में भयंकर लड़ाई हुई, हरिसिंह नलवा उस वक़्त गंभीर रूप से बीमार थे पर “रणंजय” नलवा ने बिस्तर पर पड़े रहने की बजाये युद्ध-भूमि में जाना स्वीकार किया और जैसे ही अफ़गानों ने सुना कि “नलवा” युद्धभूमि में आ गया है, वो भागने शुरू हो गए, जो भागे नहीं उनके हाथ से भय से तलवारें छूटने लगी। इस बुखार की हालत में भी उन्होंने अफगानों की 14 तोपें छीन लीं पर छल से दो गोलियां उन्हें मारी गई और उन्होंने शरीर छोड़ दिया। शरीर त्यागने के बाद अफगान उत्साहित न हों और उनकी अपनी सेना हतोत्साहित न हो इसके लिए उनकी इच्छा के अनुरूप उनके “शरीरांत” की बात छुपाई गई और उनके मृत शरीर को किले के परकोटे पर तीन दिनों तक बैठे हुए अवस्था में लाकर रखा गया मानो ये वीर वहीं से सेना का निरीक्षण कर रहे हों।

युद्धभूमि में उनकी इस उपस्थिति से जीत की ओर बढ़ रहे अफ़गानों को पराजय का सामना करना पड़ा और अपनी सेना को विजयश्री का वरण करवाकर ही उनकी आत्मा ने स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया।

“31 अक्तूबर 1987, नागपुर के विदर्भ क्रिकेट स्टेडियम में सुनील गावस्कर ने न्यूजीलैंड के खिलाफ 103 रनों की नाबाद पारी खेली थी। इस दिन सुनील गावस्कर को 102 डिग्री बुखार था”

गावस्कर के संदर्भ में ये “बुखार में शतक” वाली बात भारत के बच्चे-बड़े सबको पता है पर 19 वीं सदी के एक वीर हरिसिंह ने भी “बुखार” में राष्ट्र बचाया था, राष्ट्र की सीमाओं को विस्तृत किया था और समर-भूमि में बलिदान देकर अमर हो गए थे, ये बात हममें से कितनों को पता है?

आत्मचिंतन करिये, अपने वीरों के प्रति अपनी कृतघ्नताओं पर सोचिये और हो सके तो आज “हरिसिंह नलवा” को उनकी पुण्यतिथि पर कुछ देर के लिए ही सही याद कर लीजिए; ताकि हमारे कुछ पापों का परिमार्जन हो सके।

Mamta Yas

Common Accupuncture sites

सूर्य 12 प्रकार के होते हैं

• 12:00 बजने के स्थान पर आदित्या: लिखा हुआ है, जिसका अर्थ यह है कि सूर्य 12 प्रकार के होते हैं…
अंशुमान, अर्यमन, इंद्र, त्वष्टा, धातु, पर्जन्य, पूषा, भग, मित्र, वरुण, विवस्वान और विष्णु।

• 1:00 बजने के स्थान पर ब्रह्म लिखा हुआ है, इसका अर्थ यह है कि ब्रह्म एक ही प्रकार का होता है।
एकोब्रह्मद्वितीयो_नास्ति।

• 2:00 बजने की स्थान पर अश्विनौ लिखा हुआ है जिसका तात्पर्य यह है कि अश्विनी कुमार दो हैं।
नासत्यऔरद्स्त्र।

• 3:00 बजने के स्थान पर त्रिगुणा: लिखा हुआ है, जिसका तात्पर्य यह है कि गुण तीन प्रकार के हैं।
सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण।

• 4:00 बजने के स्थान पर चतुर्वेदा: लिखा हुआ है, जिसका तात्पर्य यह है कि वेद चार प्रकार के होते हैं।
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।

• 5:00 बजने के स्थान पर पंचप्राणा: लिखा हुआ है, जिसका तात्पर्य है कि प्राण पांच प्रकार के होते हैं।
अपान, समान, प्राण, उदान और व्यान।

• 6:00 बजने के स्थान पर षड्र्सा: लिखा हुआ है, इसका तात्पर्य है कि रस 6 प्रकार के होते हैं।
मधुर, अमल, लवण, कटु, तिक्त और कसाय।

• 7:00 बजे के स्थान पर सप्तर्षय: लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि सप्त ऋषि 7 हुए हैं।
कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ।

• 8:00 बजने के स्थान पर अष्ट_सिद्धिय: लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि सिद्धियां आठ प्रकार की होती है।
अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा,

प्राप्ति, प्राकाम्य, इशित्व और वशित्व।

• 9:00 बजने के स्थान पर नवद्रव्याणि अभियान लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि 9 प्रकार की निधियां होती हैं।
पद्म, महापद्म, नील, शंख, मुकुंद, नंद, मकर, कच्छप, खर्व।

• 10:00 बजने के स्थान पर दशदिशः लिखा हुआ है, इसका तात्पर्य है कि दिशाएं 10 होती है।
पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, नैऋत्य, वायव्य, आग्नेय, आकाश, पाताल।

• 11:00 बजने के स्थान पर #रुद्रा:
लिखा हुआ है, इसका तात्पर्य है कि रुद्र 11 प्रकार के हुए हैं।
कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, अहिर्बुध्न्य, शम्भु, चण्ड और भव।

BHṚGUBINDU

BHṚGUBINDU

Bhṛgubindu, often designated as BB in a Kuṇḍalī is a sensitive point in a Kuṇḍalī. It is the midpoint between Rāhu and Candra. This concept is popularised by Pt. CS Patel, a stalwart in Jyotiṣaśāstra, and one who has contributed immensely to this subject through his painstaking research. He includes a chapter in Bhṛgubindu in chapter 14 of Nāḍī Astrology. He quotes Bhṛgu Nandi Nāḍī, stating “… the native suffers from Meha and phlegmatic troubles. He gets rid of troubles with the aid of a friend… This happens when Bṛhaspati transits the midpoint of Rāhu and Candra”. This, he states, is from page 363 of the cyclostyled translation of Bhṛgu Nandi Nāḍī by Pt. RG Rao.

The Bhṛgubindu is the midpoint between Rāhu and Candra (note, not between Candra and Rāhu, which is the opposite point of Bhṛgubindu). To determine this, we need to determine how far Candra is from Rāhu. Divide it by two and add it to Rāhu’s sphuṭa. For instance, if in a Kuṇḍalī Candra is 226.6336 and Rāhu is 231.9001. The distance of Candra from Rāhu is Candra – Rāhu = 226.6336 – 231.9001 = -5.2665. Since the result is negative, we must add 360 to it, which makes it 354.7335. The half of the distance is 177.36675, which when added to Rāhu becomes 177.36675 + 231.9001 = 409.26685. Since it is more than 360, we must subtract from it 360. This gives us 49.26685°, which is the Sphuṭa of Bhṛgubindu. Therefore, the formula is Rāhu + (Candra – Rāhu) / 2.

Some scholars advise finding the Bhṛgubindu by adding the Sphuṭa of Candra and Rāhu and dividing the sum by 2. For instance, in our example it is (226.6336 + 231.9001)/2 = 229.2669. This is certainly not the answer that we are looking for. Because, in this case, the Bhṛgubindu is (Candra + Rāhu)/2 + 180 = 229.2669 + 180 = 409.2669 = 49.2669. Therefore, there are two formulae for determining the Bhṛgubindu: (1) If Candra is ahead of Rāhu, i.e., within 180° of Rāhu, then the formula is (Candra + Rāhu)/2, and (2) If Candra is behind Rāhu, i.e., above 180° of Rāhu, then the formula is (Candra + Rāhu)/2 + 180.

What is the speed of Bhṛgubindu? According to Sūryasiddhānta, the number of revolutions of Candra in a Mahāyuga is 57753336 and that of Rāhu is -232238. Therefore, the relative speed of Candra from Rāhu is 57753336 + 232238 = 57985574. This means Candra makes 57985574 revolutions with regards to Rāhu in a Mahāyuga. The Bhṛgubindu does half of it, i.e., 28992787. However, there is a peculiar trait of this sensitive point, which is, it jumps 180° every time Candra crosses Rāhu. Nonetheless, in 1577917828 sidereal days, the revolution of Bhṛgubindu is 28992787, therefore, in one day it is, 28992787 / 1577917828 = 0.01837408 revolutions = 0.01837408 * 360 = 6.614669°. Therefore, the speed of Bhṛgubindu is 6.614669°/ day.

How this sensitive point is used? It can be used in two different ways, (1) Judging the Gocara of Grahas with regards to the Janma Bhṛgubindu, and (2) Judging the Bhṛgubindu’s Gocara on the Natal Grahas. Pt. Patel gives an example of the assassination of Smt. Indira Gandhi, whereby Janma Bhṛgubindu is 8r 23° 5’ and at the time of her assassination, Maṅgala was in 8r 24°50’, and Śani was having his 3rd dṛṣṭi on this sensitive point from 6r 24°5’.

Śrī RG Rao explains in the principle given from Bhṛgu Nandi Nāḍī that, the native can overcome his ailment when Bṛhaspati transits the Bhṛgubindu. This tells us that when the Bhṛgubindu is transited by Śubhagrahas, the native can overcome troubles. Besides the Gocara analysis, Bhṛgubindu should be assessed in the Janmakuṇḍalī as well as Daśā. In the Janmakuṇḍalī, the Bhṛgubindu’s Rāśi, Nakṣatra and Bhāva tell us about the area in life where the native is heavily involved, so much so that the Kārakatva of the Bhāva, Rāśi and Nakṣatra hardly leaves the person. This is because, Rāhu shows the unfinished Karma that we brought from the past life, and Candra denotes the mind that manifests the Karma. The native finds himself/ herself drawn towards the indications of the Bhāva too frequently.

Om Tat Sat

By varahmihir

Iran and God Ram connection

HOD Ram and Hanuman in Sumeria now Iraq

इराक में प्राप्त धनुर्धारी #श्रीराम और #हनुमान की प्रतिमा वर्षों से #पुरातत्त्ववेत्ताओं और #इतिहासकारों को आकृष्ट कर रही है। इस प्रतिमा का एक बड़ा चित्र #सुलयमानियाम्यूजियम (सलीम स्ट्रीट, सुलयमालिया) में प्रदर्शित है और आकर्षण का केन्द्र है। विदेशी पुरातत्त्ववेत्ताओं ने इस प्रतिमा को #अक्कडियनसाम्राज्य (2334-2154 ई.पू.) के सुमेरियन शासकों से सम्बद्ध किया है, लेकिन एक दृष्टि में यह श्रीराम और हनुमान ही प्रतीत होते हैं। यह प्रतिमा #बृहत्तर_भारत और #सुमेर के गहरे राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों का पुष्ट प्रमाण है।

यह कोई कवि-कल्पना नहीं है कि एक समय पूरे विश्व में हिन्दुओं का साम्राज्य और शासन था। यही कारण है कि आए दिन पुरातत्त्ववेत्ताओं को #पश्चिमीएशिया, #दक्षिणअमेरिका, #रूस, #ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में हिन्दू देवी-देवताओं की प्राचीन प्रतिमाएं, उत्खनन में प्राप्त हो रही

लगभग 1×1 मीटर आकार की यह विख्यात प्रतिमा #इराकईरान सीमा पर स्थित #कुर्दिस्तान जिले के सुलयमानिया नगर के दक्षिण-पश्चिम में #बेलुलादर्रे में ‘होरेन शेखान’ क्षेत्र के ‘दरबन्द-ए-बेुलला’ की चट्टान पर उत्कीर्ण है। इसका निर्देशांक 34°52’3.61″N, 45°44’2.77″E है।

जाने-माने ब्रिटिश_पुरातत्त्ववेत्ता सर चार्ल्स लिओनार्ड वूली (1880-1960) ने इराक के ‘उर’ क्षेत्र के उत्खनन के दौरान इस प्रतिमा का पता लगाया था।

By Mamta Yas

क‍िसान आंदोलन में व‍िदेशी हाथ, Greta Thunberg ने खुद ही ऐसे खोल दी पोल – News AajTak

देश इस वक्त एक ग्लोबल साजिश से लड़ रहा है. इसमें भारत विरोधी ताकतें लगी हुई हैं. इसमें दुनिया के बड़े बड़े लोग शामिल हैं. ये लोग किसान आंदोलन का नाम ले रहे हैं और भारत को बदनाम कर रहे हैं, लेकिन पिछले 24 घंटे में गैंग का पर्दाफाश हो गया है. एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने गलती से इस साजिश की पोल खोल दी. ग्रेटा ने एक ट्वीट किया किसानों के नाम पर भारत विरोधी एजेंडा चलाने वाली टूलकिट है. इस टूलकिट में हर वो तरीका बताया गया, जिससे भारत विरोधी माहौल बनाया जाए. देखें ये रिपोर्ट.
— Read on www.aajtak.in/india/news/video/foreign-hands-in-farmers-protest-at-delhi-borders-greta-thunberg-revealed-the-plan-1203012-2021-02-05

निष्कलंक महादेव गुजरात का इतिहास

निष्कलंक महादेव गुजरात का इतिहास

गुजरात के भावनगर में कोलियाक तट से तीन किलोमीटर अंदर अरब सागर में स्थित हैं निष्कलंक महादेव। यहाँ पर अरब सागर की लहरें रोज़ शिवलिंगों का जलाभिषेक करती हैं। लोग पानी में पैदल चलकर ही इस मंदिर में दर्शन करने जाते हैं। इसके लिए उन्हें ज्वार के उतरने का इंतजार करना पड़ता है। भारी ज्वार के वक़्त केवल मंदिर की पताका और खम्भा ही नजर आता है। जिसे देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि पानी की नीचे समुद्र में महादेव का प्राचीन मंदिर स्थित हैं। यहाँ पर शिवजी के पाँच स्वयंभू शिवलिंग हैं।

इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। महाभारत के युद्ध में पांडवों ने कौरवों को मार कर युद्ध जीता। लेकिन युद्ध समाप्ति के पश्चात पांडव यह जानकर बड़े दुःखी हुए की उन्हें अपने ही सगे-संबंधियों की हत्या का पाप लगा है। इस पाप से छुटकारा पाने के लिए पांडव, भगवान श्रीकृष्ण से मिले। पाप से मुक्ति के लिए श्रीकृष्ण ने पांडवों को एक काला ध्वज और एक काली गाय दी और पांडवों को गाय का अनुसरण करने को कहा तथा बताया कि जब ध्वज और गाय दोनों का रंग काले से सफेद हो जाए तो समझ लेना कि तुम्हें पाप से मुक्ति मिल गई है। साथ ही श्रीकृष्ण ने उनसे यह भी कहा कि जिस जगह ऐसा हो वहाँ पर तुम सब भगवान शिव की तपस्या भी करना।

पाँचों भाई भगवान श्रीकृष्ण के कथनानुसार काली ध्वजा हाँथ में लिए काली गाय का अनुसरण करने लगे। इस क्रम में वो सब कई दिनों तक अलग – अलग जगह गए। लेकिन गाय और काली ध्वज का रंग नहीं बदला। लेकिन जब वो वर्तमान गुजरात में स्थित कोलियाक तट पर पहुंचे तो गाय और ध्वज का रंग सफेद हो गया। इससे पाँचों पांडव भाई बहुत खुश हुए और वहीं पर भगवान शिव का ध्यान करते हुए तपस्या करने लगे। भगवान भोलेनाथ उनकी तपस्या से खुश हुए और पाँचों भाईयों को लिंग रूप में अलग-अलग दर्शन दिए। वही पाँचों शिवलिंग अभी भी वहीं स्थित हैं। पाँचों शिवलिंग के सामने नंदी की प्रतिमा भी हैं। पांचों शिवलिंग एक वर्गाकार चबूतरे पर बने हुए हैं। तथा यह कोलियाक समुद्र तट से पूरब की ओर 3 किलोमीटर अंदर अरब सागर में स्थित है। इस चबूतरे पर एक छोटा सा पानी का तालाब भी है जिसे पांडव तालाब कहते हैं। श्रद्धालु पहले उसमें अपने हाँथ-पाँव धोते हैं और फिर शिवलिंगों की पूजा-अर्चना करते हैं।

चूँकि यहाँ पर आकर पांडवों को अपने भाइयों के कलंक से मुक्ति मिली थी। इसलिए इसे निष्कलंक महादेव कहते हैं। भादवे महीने की अमावस को यहाँ पर मेला लगता है, जिसे भाद्रवी कहा जाता है। प्रत्येक अमावस के दिन इस मंदिर में भक्तों की विशेष भीड़ रहती है। हालांकि पूर्णिमा और अमावस के दिन ज्वार अधिक सक्रिय रहता है, फिर भी श्रद्धालु उसके उतर जाने का इंतजार करते हैं और भगवान शिव का दर्शन करते हैं। लोगों की ऐसी मान्यता है कि यदि हम अपने किसी प्रियजन की चिता की राख शिवलिंग पर लगाकर जल प्रवाहित कर दें तो उसको मोक्ष मिल जाता है। मंदिर में भगवान शिव को राख, दूध, दही और नारियल चढ़ाए जाते हैं।

सालाना प्रमुख मेला भाद्रवी भावनगर के महाराजा के वंशजों के द्वारा मंदिर की पताका फहराने से शुरू होता है और फिर यही पताका मंदिर पर अगले एक साल तक फहराती है। और यह भी एक आश्चर्य की बात है कि साल भर एक ही पताका लगे रहने के बावजूद कभी भी इस पताका को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। यहाँ तक कि 2001 के विनाशकारी भूकंप में भी नहीं, जब यहाँ 50000 लोग मारे गए थे। यदि आपकी भोलेनाथ में आस्था है तो यह जगह आपके लिए जन्नत से कम नहीं है।

।।हर हर महादेव।।

By mamta yas

ब्रहदिश्वर मंदिर

इस अदभुत मंदिर में परछाई का रहस्य क्या है?

वेबसाईट पर तंजावूर के ब्रहदिश्वर मंदिर के बारे में पढ़ा है .
उसकी अदभुत निर्माण कला के सामने
पीसा की मीनार कहीं नहीं लगती.
इसी प्रकार दक्षिण में एक और मंदिर है,
जो अपनी वास्तु में एक अजब-गजब सा रहस्य छिपाए हुए है. मजे की बात यह है कि
800 वर्ष पूर्व बने इस मंदिर में
इतना उच्च कोटि का विज्ञान दिखाई देता है कि
कई भौतिक विज्ञानी और वास्तुविद अभी तक इसका रहस्य नहीं सुलझा पाए हैं.
हम बात कर रहे हैं

हैदराबाद से केवल सौ किमी दूर तेलंगाना के नलगोंडा जिले में स्थित
“छाया सोमेश्वर महादेव” मंदिर की.

इस की विशेषता यह है कि
दिन भर इस
मंदिर के शिवलिंग पर एक स्तम्भ की छाया पड़ती रहती है,
लेकिन वह छाया कैसे बनती है
यह आज तक कोई पता नहीं कर पाया.
जी हाँ!!
पढ़कर चौंक गए होंगे न आप,
लेकिन प्राचीन भारतीय वास्तुकला इतनी उन्नत थी कि
मंदिरों में ऐसे आश्चर्य भरे पड़े हैं.
उत्तर भारत के मंदिरों पर
इस्लामी आक्रमण का बहुत गहरा असर हुआ था,
और हजारों मंदिर तोड़े गए,
लेकिन दक्षिण में शिवाजी और अन्य तमिल-तेलुगु साम्राज्यों के कारण
इस्लामी आक्रान्ता नहीं पहुँच सके थे.
ज़ाहिर है कि
इसीलिए
दक्षिण में मुगलों की अधिक हैवानियत देखने को नहीं मिलती,
और इसीलिए दक्षिण के मंदिरों की वास्तुकला
आज भी अपने पुराने स्वरूप में मौजूद है.

छाया सोमेश्वर महादेव मंदिर को हाल ही में
तेलंगाना सरकार ने थोड़ा कायाकल्प किया है.
हालाँकि 800 वर्षों से अधिक पुराना होने के कारण मंदिर की दीवार पर कई दरारें हैं,
परन्तु फिर भी शिवलिंग पर पड़ने वाली रहस्यमयी छाया के आकर्षण में काफी पर्यटक इसको देखने आते हैं.
नालगोंडा के पनागल बस अड्डे से केवल दो किमी दूर यह मंदिर स्थित है.
वास्तुकला का आश्चर्य यह है कि
शिवलिंग पर जिस स्तम्भ की छाया पड़ती है,
वह स्तम्भ शिवलिंग और सूर्य के बीच में है ही नहीं.
मंदिर के गर्भगृह में कोई स्तम्भ है ही नहीं
जिसकी छाया शिवलिंग पर पड़े.
निश्चित रूप से मंदिर के बाहर जो स्तम्भ हैं,

उन्हीं का डिजाइन और स्थान कुछ ऐसा बनाया गया है कि
उन स्तंभों की आपसी छाया और सूर्य के कोण के अनुसार किसी स्तम्भ की परछाई शिवलिंग पर आती है.
यह रहस्य आज तक अनसुलझा ही है.

इस मंदिर का निर्माण चोल साम्राज्य के राजाओं ने बारहवीं शताब्दी में करवाया था.
इस मंदिर के सभी स्तंभों पर रामायण और महाभारत की कथाओं के चित्रों का अंकन किया गया है,
और इनमें से कोई एक रहस्यमयी स्तम्भ ऐसा है
जिसकी परछाई शिवलिंग पर पड़ती है.
कई वैज्ञानिकों ने इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास किया,
परन्तु वे केवल इस रहस्य की “थ्योरी” ही बता सके…
एकदम निश्चित रूप से आज तक कोई भी नहीं बता पाया कि आखिर वह कौन सा स्तम्भ है,
जिसकी परछाई शिवलिंग पर पड़ती है.
मंदिर सुबह छः बजे से बारह बजे तक और फिर दोपहर दो बजे से शाम छः बजे तक पर्यटकों के लिए खुला रहता है.
शिवभक्त मंदिर के प्रांगण में ध्यान वगैरह भी कर सकते हैं.
मंदिर में पण्डे कतई नहीं हैं,
केवल एक पुजारी है
जो सुबह-शाम पूजा करता है.
प्रकृति की गोद में स्थित इस मंदिर की छटा निराली ही है.
हमने देखा है कि
अधिकाँश मंदिरों में कई-कई सीढियाँ होती हैं,
परन्तु इस मंदिर की विशेषता यह भी है कि
इसमें केवल दो ही सीढियां हैं,
इसलिए वरिष्ठ नागरिक आराम से मंदिर के अन्दर पहुँच सकते हैं.
एक भौतिक विज्ञानी मनोहर शेषागिरी के अनुसार
मंदिर की दिशा पूर्व-पश्चिम है
और प्राचीन काल के कारीगरों ने
अपने वैज्ञानिक ज्ञान,
प्रकृति ज्ञान
तथा ज्यामिती
एवं सूर्य किरणों के परावृत्त होने के अदभुत ज्ञान का प्रदर्शन करते हुए
विभिन्न स्तंभों की स्थिति ऐसी रखी है,
जिसके कारण सूर्य किसी भी दिशा में हो,
मंदिर के शिवलिंग पर यह छाया पड़ती ही रहेगी.
लेकिन यह केवल थ्योरी है,
क्योंकि यदि आज की तारीख में
इसी मंदिर के पास ऐसा ही एक और मंदिर बनाने की चुनौती विदेशों से उच्च शिक्षा प्राप्त वास्तुविदों और इंजीनियरों को दे दी जाए,
तो वे पनाह माँगने लगेंगे.
ऐसा था हमारा भारतीय संस्कृति ज्ञान एवं उच्च कोटि का वास्तु-विज्ञान….
लेकिन फर्जी इतिहासकार आज भी
पीसा की मीनार
और ताजमहल को महिमामंडित करने के पीछे पड़े रहते हैं,
क्योंकि उन्हें भारत की मिट्टी से कोई लगाव है ही नहीं…….

रामप्यारी गुर्जरी

रामप्यारी गुर्जरी

तैमूर लंग का नाम लेते ही एक क्रूर और खतरनाक आक्रान्ता का चेहरा हमारे सामने आ जाता है। कहा जाता है कि तैमूर ने इतनी हत्याएं की थी कि दुनिया की आबादी में 3 फीसदी की कमी आ गई थी। वर्ष 1398 में भारत पर आक्रमण करने वाले तैमूर इतनी बर्बरता फैलायी थी कि उसके वर्णन मात्र से रूह कांप जाती है। लेकिन भारतवर्ष की एक वीरागंना ऐसी थी जिसने युद्ध में न सिर्फ तैमूर को उसी की भाषा में जवाब दिया बल्कि इस वीरांगना के युद्ध कौशल से डर कर तैमूर को भारत विजय का अभियान छोड़ कर जाना पड़ा। उस वीरांगना का नाम था रामप्यारी गुर्जरी।

बचपन से ही निडर और हठी थीं रामप्यारी गुर्जरी
सहारनपुर के चैहान गुर्जर परिवार में जन्मी रामप्यारी बचपन से ही निडर और हठी स्वभाव की थी। पुरूषों की वेशभूषा पसंद करने वाली रामप्यारी पहलवान बनना चाहती थी और प्रतिदिन अपनी मां से इस संबंध में सवाल पूछंती थी और नियमित व्यायाम करती थी। युवा होने तक रामप्यारी युद्धकौशल में भी दक्ष हो गई थी। उसकी बुद्धमिता और युद्ध कौशल के चर्चे आस-पास के सभी इलाकों में थे।

भारत में इस्लाम की ध्वजा लहराना तैमूर का था मुख्य उद्देश्य
वर्ष 1398 में भारतवर्ष पर तुगलक वंश के नसीरूद्दीन तुगलक का शासन हुआ करता था। उसी समय समरकन्द के क्रूर आक्रांता तैमूर लंग ने आक्रमण कर नसीरूद्दीन तुगलक को हरा दिया और दिल्ली में जीत का खुनी जश्न मनाया। दिल्ली में अनगिनत हिंदुओं को मारने के बाद तैमूर की नजर हिंदूओं के तीर्थों की ओर कीं। ब्रिटिश इतिहासकार विन्सेंट ए स्मिथ ने अपनी पुस्तक ‘द ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ इंडिया: फ्रोम द अर्लीएस्ट टाइम्स टू द एण्ड ऑफ 1911’ में लिखा है कि भारत में तैमूर के अभियान का मुख्य उद्देश्य था, सनातन समुदाय का विनाश कर भारत में इस्लाम की ध्वजा लहराना।

फिर तैयार की गई युद्ध लड़ने की रणनीति
यह सूचना जाट क्षेत्र में पहुंची, जाट क्षेत्र में आज का हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ भाग आते हैं। जाट क्षेत्र के तत्कालीन प्रमुख देवपाल ने महापंचायत का आयोजन किया। इस महापंचायत में जाट, गुर्जर, अहीर, वाल्मीकि, राजपूत, ब्राह्मण एवं आदिवासी जैसे अनेक समुदायों के सदस्य शामिल थे। महापंचायत में देवपाल ने न केवल तैमूर के अत्याचारों को सबके समक्ष उजागर करते हुए सनातन की रक्षा के लिए आपसी भेदभाव मिटा कर तैमूर को उसी की भाषा में जवाब देने की अपील की। इसके बाद जाट महापंचायत ने तैमूर की सेना ने छापामार युद्ध लड़ने की रणनीति बनाई।

रामप्यारी गुर्जरी बनीं महिला सैनिकों की टुकड़ी की सेनापति
रणनीति के मुताबिक महापंचायत की सेना में 80 हजार पुरूष योद्धा शामिल किए गए और जोगराज सिंह गुर्जर इस सेना के मुखिया व हरवीर सिंह गुलिया सेनापति बने और तय किया गया कि 40 हजार महिला सैनिकों की एक टुकड़ी भी तैयार की जाए। लेकिन समस्या यह थी कि महिला टुकड़ी का नेतृत्व कौन करेगा। तभी रामप्यारी गुर्जरी का नाम सामने आया और वह इस महिला सैनिकों की टुकड़ी की सेनापति बनाई गई।

तैमूर की सेना की जासूसी के लिए लगाए गए 500 युवा अश्वारोही
एक सुनियोजित योजना के अंतर्गत 500 युवा अश्वारोहियों को तैमूर की सेना पर जासूसी के लिए लगाया गया, जिससे उसकी योजनाओं और भविष्य के आक्रमणों के बारे में पता चल सके। योजना के मुताबिक तैमूर जिस स्थान पर हमला करने की योजना बनाता, तो उसके हमले से पहले ही रोगियों, वृद्धों और छोटे बच्चों को सुरक्षित स्थानों पर सभी मूल्यवान वस्तुओं सहित दूसरे स्थान पर पहुंचा दिया जाता।

वीर रामप्यारी गुर्जर ने देश हित में ली प्रतिज्ञा कि…
वीर रामप्यारी गुर्जर ने देशरक्षा हेतु शत्रु से लड़कर प्राण देने की प्रतिज्ञा की। जोगराज के नेतृत्व में बनी 40,000 ग्रामीण महिलाओं की सेना को युद्ध विद्या के प्रशिक्षण व निरीक्षण का दायित्व भी रामप्यारी चैहान गुर्जर के पास था, इनकी चार सहकर्मियां भी थीं, जिनके नाम थे हरदाई जाट, देवी कौर राजपूत, चंद्रों ब्राह्मण और रामदाई त्यागी।

रामप्यारी की हुंकार पर शामिल हुईं वीरांगनाएं
इन 40,000 महिलाओं में गुर्जर, जाट, अहीर, राजपूत, हरिजन, वाल्मीकि, त्यागी, तथा अन्य वीर जातियों की वीरांगनाएं शामिल थीं। इनमें से कई ऐसी महिलाएं भी थीं, जिन्होने कभी शस्त्र का मुंह भी नहीं देखा था पर रामप्यारी की हुंकार पर वह अपने को रोक ना पायी। जाट क्षेत्र के सभी गांवों के युवक-युवतियां अपने नेता के संरक्षण में प्रतिदिन शाम को गांव के अखाड़े पर एकत्र हो जाया करते थे और व्यायाम, मल्ल युद्ध तथा युद्ध विद्या का अभ्यास किया करते थे।

अंततः युद्ध का दिन समीप आ गया
अंततः युद्ध का दिन समीप आ गया, गुप्तचरों की सूचना के अनुसार तैमूर लंग अपनी विशाल सेना के साथ मेरठ की ओर कूच कर रहा था। सभी एक लाख 20 हजार पुरूष व महिला सैनिक केवल महाबली जोगराज सिंह गुर्जर के युद्ध आवाहन की प्रतीक्षा कर रहे थे। जोगराज सिंह गुर्जर ने कहा, हमारे राष्ट्र को तैमूर के अत्याचारों ने लहूलुहान किया है। योद्धाओं, उठो और क्षण भर भी विलंब न करो। शत्रुओं से युद्ध करो और उन्हें हमारी मातृभूमि से बाहर खदेड़ दो”।

तैमूर को देश के बाहर खदेड़ने की खाई कसम
सभी योद्धाओं ने शपथ ली कि वे किसी भी स्थिति में अपने सैन्य प्रमुख की आज्ञाओं की अवहेलना नहीं करेंगे, और वे तब तक नहीं बैठेंगे जब तक तैमूर और उसकी सेना को भारत भूमि से बाहर नहीं खदेड़ देते।

रामप्यारी गुर्जर ने तैयार की अपनी सेना की तीन टुकड़ियाँ
रामप्यारी गुर्जर ने अपनी सेना की तीन टुकड़ियाँ बनाई। जहां एक ओर कुछ महिलाओं पर सैनिकों के लिए भोजन और शिविर की व्यवस्था करने का दायित्व था, तो वहीं कुछ महिलाओं ने युद्धभूमि में लड़ रहे योद्धाओं को आवश्यक शस्त्र और राशन का बीड़ा उठाया। इसके अलावा रामप्यारी गुर्जर ने महिलाओं की एक और टुकड़ी को शत्रु सेना के राशन पर धावा बोलने का निर्देश दिया, जिससे शत्रु के पास न केवल खाने की कमी होगी, अपितु धीरे धीरे उनका मनोबल भी टूटने लगे, उसी टुकड़ी के पास विश्राम करने को आए शत्रुओं पर धावा बोलने का भी भार था।

20 हजार योद्धाओं ने तैमूर की सेना पर किया हमला
ईरानी इतिहासकार शरीफुद्दीन अली यजीदी द्वारा रचित ‘जफरनमा’ में इस युद्ध का उल्लेख भी किया गया है। महापंचायत के 20 हजार योद्धाओं ने उस समय तैमूर की सेना पर हमला किया, जब वह दिल्ली से मेरठ के लिए निकलने ही वाला था, 9 हजार से ज्यादा शत्रुओं को रात में ही मार दिया गया। इससे पहले कि तैमूर की सेना एकत्रित हो पाती, सूर्योदय होते ही महापंचायत के योद्धा गायब हो गए। क्रोध में विक्षिप्त सा हुआ तैमूर मेरठ की ओर निकल पड़ा, पर यहां भी उसे निराशा ही हाथ लगी। जिस रास्ते से तैमूर मेरठ पर आक्रमण करने वाला था, वो पूरा मार्ग और उस पर स्थित सभी गांव निर्जन पड़े थे।

महापंचायत की वीर सेना के आगे लाचार हुआ तैमूर
इससे तैमूर की सेना अधीर होने लगी, और इससे पहले वह कुछ समझ पाता, महापंचायत के योद्धाओं ने अचानक ही उन पर आक्रमण कर दिया। महापंचायत की इस वीर सेना ने शत्रुओं को संभलने का एक अवसर भी नहीं दिया और रणनीति भी ऐसी थी कि तैमूर कुछ कर ही ना सका, दिन में महाबली जोगराज सिंह गुर्जर के लड़ाके उसकी सेना पर आक्रमण कर देते, और रात को कुछ क्षण विश्राम के समय रामप्यारी गुर्जर और अन्य वीरांगनाएं उनके शिविरों पर आक्रमण कर देती। रामप्यारी की सेना का आक्रमण इतना सटीक और त्वरित होता था कि वे गाजर मूली की तरह काटे जाते थे और जो बचते थे वो रात रात भर ना सोने का कारण विक्षिप्त से हो जाते थे। महिलाओं के इस आक्रमण से तैमूर की सेना के अंदर युद्ध का मानो उत्साह ही क्षीण हो गया था।

और जब तैमूर की सेना मैदान छोड़ भागने पर हुई विवश
अर्धविक्षिप्त, थके हारे और घायल सेना के साथ आखिरकार हताश होकर तैमूर और उसकी सेना मेरठ से हरिद्वार की ओर निकाल पड़ी। पर यहां महापंचायत की सेना ने उन पर फिर से अचानक ही उन पर धावा बोल दिया, और इस बार तैमूर की सेना को मैदान छोड़कर भागने पर विवश होना पड़ा। इसी युद्ध में वीर हरवीर सिंह गुलिया ने सभी को चैंकाते हुये सीधा तैमूर पर धावा बोल दिया और अपने भाले से उसकी छाती छेद दी।

भारत विजय के उद्देश्य से हार तक का सफर
तैमूर के अंगरक्षक तुरंत हरवीर पर टूट पड़े, लेकिन हरवीर तब तक अपना काम कर चुके थे। जहां हरवीर उस युद्धभूमि में ही वीरगति को प्राप्त हुये, तो तैमूर उस घाव से कभी नहीं उबर पाया, और अंततः सन 1405 में उसी घाव में बढ़ते संक्रमण के कारण उसकी मृत्यु हो गयी। जो तैमूर लाखों की सेना के साथ भारत विजय के उद्देश्य से यहाँ आया था, वो महज कुछ हजार सैनिकों के साथ किसी तरह भारत से भाग पाया।