Sri Krishna God

‘श्रीकृष्ण’ को अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

  1. उत्तर प्रदेश में कृष्ण या गोपाल गोविन्द इत्यादि नामों से जानते है।
  2. राजस्थान में श्रीनाथजी या ठाकुरजी के नाम से जानते है।
  3. महाराष्ट्र में विट्ठल के नाम से भगवान् जाने जाते है।
  4. उड़ीसा में जगन्नाथ के नाम से जाने जाते है।
  5. बंगाल में गोपालजी के नाम से जाने जाते है।
  6. दक्षिण भारत में वेंकटेश या गोविन्दा के नाम से जाने जाते है।
  7. गुजरात में द्वारिकाधीश के नाम से जाने जाते है।
  8. असम, त्रिपुरा, नेपाल इत्यादि पूर्वोत्तर क्षेत्रो में कृष्ण नाम से ही पूजा होती है।
  9. मलेशिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंग्लैंड, फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है।
  10. गोविन्द या गोपाल में “गो” शब्द का अर्थ गाय एवं इन्द्रियों, दोनों से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद में गो का अर्थ होता है–‘मनुष्य की इन्द्रियाँ’…जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश में इन्द्रियाँ हो वही गोविन्द है गोपाल है
  11. ‘श्रीकृष्ण’ के पिता का नाम वसुदेव था इसलिए इन्हें आजीवन ‘वासुदेव’ के नाम से जाना गया। ‘श्रीकृष्ण’ के दादा का नाम शूरसेन था..
  12. ‘श्रीकृष्ण’ का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के राजा कंस की जेल में हुआ था।
  13. ‘श्रीकृष्ण’ के भाई बलराम थे लेकिन उद्धव और अंगिरस उनके चचेरे भाई थे, अंगिरस ने बाद में तपस्या की थी और जैन धर्म के तीर्थंकर नेमिनाथ के नाम से विख्यात हुए थे।
  14. ‘श्रीकृष्ण’ ने 16000 राजकुमारियों को असम के राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था और उन राजकुमारियों को आत्महत्या से रोकने के लिए मजबूरी में उनके सम्मान हेतु उनसे विवाह किया था। क्योंकि उस युग में हरण की गयी स्त्री अछूत समझी जाती थी और समाज उन स्त्रियों को अपनाता नहीं था।
  15. ‘श्रीकृष्ण’ की मूल पटरानी एक ही थी जिनका नाम रुक्मणी था जो महाराष्ट्र के विदर्भ राज्य के राजा रुक्मी की बहन थी।। रुक्मी शिशुपाल का मित्र था और ‘श्रीकृष्ण’ का शत्रु।
  16. दुर्योधन ‘श्रीकृष्ण’ का समधी था और उसकी बेटी लक्ष्मणा का विवाह ‘श्रीकृष्ण’ के पुत्र साम्ब के साथ हुआ था।
  17. ‘श्रीकृष्ण’ के धनुष का नाम सार्ङ्ग था। शंख का नाम पाञ्चजन्य था। चक्र का नाम सुदर्शन था। उनकी प्रेमिका का नाम राधारानी था जो बरसाना के सरपंच वृषभानु की बेटी थी। ‘श्रीकृष्ण’ राधारानी से निष्काम और निश्वार्थ प्रेम करते थे। राधारानी ‘श्रीकृष्ण’ से उम्र में बहुत बड़ी थी। लगभग 6 साल से भी ज्यादा का अन्तर था। ‘श्रीकृष्ण’ ने 14 वर्ष की उम्र में वृन्दावन छोड़ दिया था।। और उसके बाद वो राधा से कभी नहीं मिले।
  18. ‘श्रीकृष्ण’ विद्या अर्जित करने हेतु मथुरा से उज्जैन मध्य प्रदेश आये थे। और यहाँ उन्होंने उच्च कोटि के ब्राह्मण महर्षि सान्दीपनि से अलौकिक विद्याओ का ज्ञान अर्जित किया था।।
  19. ‘श्रीकृष्ण’ कुल 125 वर्ष धरती पर रहे। उनके शरीर का रंग गहरा काला था और उनके शरीर से 24 घण्टे पवित्र अष्टगन्ध महकता था। उनके वस्त्र रेशम के पीले रंग के होते थे और मस्तक पर मोरमुकुट शोभा देता था। उनके सारथि का नाम दारुक था और उनके रथ में चार घोड़े जुते होते थे। उनकी दोनो आँखों में प्रचण्ड सम्मोहन था।
  20. ‘श्रीकृष्ण’ के कुलगुरु महर्षि शाण्डिल्य थे।
  21. ‘श्रीकृष्ण’ का नामकरण महर्षि गर्ग ने किया था।
  22. ‘श्रीकृष्ण’ के बड़े पोते का नाम अनिरुद्ध था जिसके लिए ‘श्रीकृष्ण’ ने बाणासुर और भगवान् शिव से युद्ध करके उन्हें पराजित किया था।
  23. ‘श्रीकृष्ण’ ने गुजरात के समुद्र के बीचों-बीच द्वारिका नाम की राजधानी बसाई थी। द्वारिका पूरी सोने की थी और उसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया था।
  24. ‘श्रीकृष्ण’ को ज़रा नाम के शिकारी का बाण उनके पैर के अंगूठे मे लगा वो शिकारी पूर्व जन्म का बाली था, बाण लगने के पश्चात भगवान स्वलोक धाम को गमन कर गए।
  25. ‘श्रीकृष्ण’ ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अर्जुन को पवित्र गीता का ज्ञान रविवार शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मात्र 45 मिनट में दे दिया था।
  26. ‘श्रीकृष्ण’ ने सिर्फ एक बार बाल्यावस्था में नदी में नग्न स्नान कर रही स्त्रियों के वस्त्र चुराए थे और उन्हें अगली बार यूँ खुले में नग्न स्नान न करने की नसीहत दी थी।
  27. ‘श्रीकृष्ण’ के अनुसार गौ हत्या करने वाला असुर है और उसको जीने का कोई अधिकार नहीं।
  28. ‘श्रीकृष्ण’ अवतार नहीं थे बल्कि अवतारी थे….जिसका अर्थ होता है–‘पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्।’ न ही उनका जन्म साधारण मनुष्य की तरह हुआ था और न ही उनकी मृत्यु हुई थी।

सर्वान् धर्मान परित्यजम मामेकं शरणम् व्रज
अहम् त्वम् सर्व पापेभ्यो मोक्षस्यामी मा शुच–
(भगवद् गीता अध्याय 18)
‘श्रीकृष्ण’ कहते हैं–‘सभी धर्मो का परित्याग करके एकमात्र मेरी शरण ग्रहण करो, मैं सभी पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूँगा, डरो मत।’

🙏🌹🌹जय श्री राधे राधे 🌹🌹🙏🏻 हरे कृष्णा 🌹🌹🙏🏻

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અમૃતબિન્દુ

Red fort was constructed by Anang Pal- Prithviraj’s relative

दिल्लीकेसंस्थापकतोमरवंश के 10 वी शदी के 16 वे राजा #क्षत्रियसम्राटअनंगपाल_तोमर द्वितीय महाप्रतापी राजा का योगदान, उनकी भूमिका और चरित्र इतिहास में दबा रह गया। न जाने क्यों ?

पद्मविभूषण से अलंकृत पुरातत्वशास्त्री प्रो. बृजबासी लाल ने इस पर काफी शोध किया है, पुस्तक भी लिखी है। लेकिन इंद्रप्रस्थ के आंचल में ढिल्लिकापुरी बसी, फली-फूली और आज तक चली आ रही है दिल्ली के रूप में, यह कितने लोग जानते हैं?

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के ब्रिटिशकालीन अधिकारियों जैसे लार्ड कनिंघम से लेकर स्वातंत्र्योत्तर भारत में डॉ. बुद्ध रश्मि मणि तक अनेक विद्वान इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने ढिल्लिकापुरी के अनेक प्रस्तर अभिलेख और संस्कृत के उद्धरण उत्खनित कर खोज निकाले, जिनसे सिद्ध होता है कि राजपूत महाराजा अनंगपाल तोमर द्वितीय ने महरौली कुतुब मीनार के पास विष्णु स्तंभ की स्थापना कर जो नगरी बसाई वह स्वर्ग जैसी मनोहर ढिल्लिकापुरी थी।

वर्तमान राष्टपति भवन जब मूल वायसराय पैलेस के रूप में बन रहा था तो रायसीना के पास सरबन गांव में जो प्रस्तर अभिलेख मिले उनमें ढिल्लिकापुरी का मनोहारी वर्णन है। ये प्रस्तर खंड पुराना किला के संग्रहालय में आज भी सुरक्षित हैं। इनमें से एक पर लिखा है- (जो विक्रम संवत् 1384 की तिथि बताता है)

देशास्ति हरियाणाख्य: पृथिव्यां स्वर्गसन्नमि:।
ढिल्लिकाख्या पुरी तत्र तोमरैरस्ति निर्मिता।।

इस धरती पर हरियाणा नाम का प्रदेश है, जो स्वर्ग के सदृश है, राजपूत तोमरों द्वारा निर्मित ढिल्लिका नाम का नगर है। वही ढिल्लिका कालांतर में दिल्ली नाम से जानी गई, जिसे अंग्रेजों के समय अलग अंग्रेजी वर्तनी के साथ देहली कहा गया। महाराजा अनंगपाल तोमर का बड़ा पराक्रमी और शौर्यवान इतिहास है। उन्होंने महरौली के पास 27 विराट सनातनी, जैन मंदिर बनवाए थे। उनके द्वारा एक सुंदर छोटी झील अनंगताल का निर्माण किया गया। फरीदाबाद के पास अनंगपुर गांव है, अनंग बांध है और अनंगपुर दुर्ग है। महाराजा अनंगपाल द्वितीय के द्वारा जैन भक्ति का प्रकटीकरण भी प्रचुर मात्रा में हुआ। कुतुब मीनार तथा कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद इन्हीं मंदिरों को तोड़कर उन मूर्तियों को दीवारों में लगाकर बनाई गई। आज भी वहां गणपति की अपमानजनक ढंग से लगाई गई मूर्तियां, महावीर, जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां, दशावतार, नवग्रह आदि के शिल्प दीवारों तथा छतों पर स्पष्ट रूप से लगे दिखते हैं। कुतुबुद्दीन ऐबक ने अनंगपाल के 300 साल बाद उनके द्वारा बनाए मंदिरों का ध्वंस कर कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद बनवाई थी

महाराजा अनंगपाल द्वितीय राजपूत तोमर वंश के राजा थे। इन्होंने 1051 से 1080 ई. तक यानी 29 साल 6 माह और 18 दिन दिल्ली पर शासन किया और इसे समृद्ध बनाया। कुव्वत-उल-इस्लाम और अन्य मौखिक किंवदंतियों के अनुसार, अनंगपाल द्वितीय ने 27 मंदिर और एक महल का निर्माण कराया था। जोकि राजपूत वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है, इनमें से एक विख्यात योगमाया मंदिर कुतुब मीनार के पीछे स्थित है। अमीर खुसरो ने भी महाराजा अनंगपाल द्वितीय के बनवाए महल का उल्लेख किया है।

दिल्ली के संस्थापक मुगल नहीं थे, बल्कि अनंगपाल द्वितीय द्वारा स्थापित ढिल्लिका/ ढिल्ली ही आज की दिल्ली है। इसके बारे में बिजौलिया, सरबन और अन्य संस्कृत शिलालेखों में उल्लेख मिलता है। 10वीं सदी में प्रतिहारो के पतन के बाद तोमर वंश अस्तित्व में आया। इस वंश ने यमुना के किनारे अरावली पहाड़ियों के दक्षिण में योगिनीपुरा में अपने साम्राज्य की स्थापना की। प्रतिहारों के बाद इस वंश ने कन्नौज पर भी शासन किया। इंद्रप्रस्थ के वैभव खोने के बाद महाराजा अनंगपाल द्वितीय ने अरावली के पिछले हिस्से में 10 वीं सदी के मध्य में लाल कोटोर (लाल कोट) नामक सशक्त नगर बसाया था, जो ढिल्ली/ढिल्लिका का हिस्सा था।

इतिहासकार कनिंघम ने अबुल फजल द्वारा लिखित ‘आइन-ए-अकबरी’ तथा बीकानेर, ग्वालियर, कुमाऊं और गढ़वाल से मिली पाण्डुलिपियों से तोमर वंश का पता लगाया था। इन दस्तावेजों के अनुसार, तोमर वंश के शासनकाल की शुरुआत 8वीं सदी में ही हुई थी। इस वंश के 19 शासकों की सूची में महाराजा अनंगपाल तोमर द्वितीय का उल्लेख है। उन्हें तोमर वंश का 16वां राजा माना जाता है। पालम बावली से मिले साक्ष्य स्पष्ट रूप से बताते हैं कि तोमर वंश ने सबसे पहले हरियाणका (हरियाणा) की भूमि पर शासन किया। यहां से प्राप्त अभिलेख में ढिल्लीपुरा का उल्लेख है, जिसे योगिनीपुरा नाम से भी जाना जाता था।

गुप्त-प्रतिहार काल के ये पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि इस क्षेत्र में एक मंदिर था, जिसे योगिनीपुरा कहा जाता था। बाद में तोमर वंश के शासन काल में इसका नाम ढिल्ली या ढिल्लिका पड़ा। इसके अलावा, मुहम्मद बिन तुगलक कालीन 1328 ई. का सरबन शिलालेख भी इसका अंतिम प्रमाण है। यह शिलालेख सरबन सराय में पाया गया था, जो आज राजपथ कहलाता है। इस अभिलेख के अनुसार, सरबन इंद्रप्रस्थ के प्रतिगण (परगना) में पड़ता था। ।
अनंगपाल केवल अपने विराट, सुंदर महलों और मंदिरों के लिए ही नहीं जाने गए, बल्कि वे लौह स्तंभ, जो वस्तुत: विष्णु ध्वज स्तंभ है, 1052 ई. में मथुरा से लाए। यह बात विष्णु ध्वज स्तंभ पर अंकित लेख से स्पष्ट है। कनिंघम ने उस लेख को सम् दिहालि 1109 अन्तगपाल वहि पढ़ा था और अर्थ किया था संवत् 1109 अर्थात् 1052 ई. में अनंगपाल ने दिल्ली बसाई।और 1060 ई के लगभग लालकोट यानी लालकिला बनवाया ।

प्रसिद्ध इतिहासकार व निदेशक शोध प्रशासन डॉ. ओम जी उपाध्याय का कहना है कि महाराज अनंगपाल द्वितीय के समय श्रीधर ने पार्श्वनाथ चरित नामक ग्रंथ की रचना की तथा उसमें अपने आश्रयदाता नट्टुल साहू का प्रशंसात्मक विवरण देने के बाद दिल्ली का भी वर्णन किया। इस ग्रंथ में अनंगपाल द्वारा हम्मीर को पराजित किए जाने से संबंधित पंक्तियां लिखी हैं, जिनका अर्थ विद्वानों ने अलग-अलग प्रकार से किया है। इस क्रम में अपभ्रंश के मान्य विद्वान और विश्व भारती शांति निकेतन के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. राम सिंह तोमर ने जो अनुवाद किया, वह निम्नवत है- ‘‘मैं ऐसा समझता हूं- जहां प्रसिद्ध राजा अनंगपाल की श्रेष्ठ तलवार ने रिपुकपाल को तोड़ा, बढ़े हुए हम्मीर वीर का दलन किया, बुद्धिजन वृंद से चीन प्राप्त किया। बौद्ध-सिद्धों की रचनाओं में एक स्थान पर उभिलो चीरा मिलता है, जिसका अभिप्राय होता है- यशोगान किया या ध्वजा फहराई। इसका स्पष्ट अभिप्राय है कि दिल्ली के महाराज अनंगपाल द्वितीय ने तुर्क को पराजित किया था तथा यह तुर्क इब्राहिम ही था।’’

इस तरह देखा जाये तो दिल्ली के संस्थापक महाराज के रूप में अनंगपाल का स्मरण दिल्ली के मूल वास्तविक परिचय का स्मरण ही है।

बलात्कार और इस्लाम

बलात्कार और इस्लाम….
भारत में बलात्कार का इतिहास और इस्लाम
“आखिर भारत जैसे देश में, जहां कन्यापूजन किया जाता है, बलात्कार की गन्दी मानसिकता कहाँ से आयी?
आखिर रामायण, महाभारत जैसे हिन्दू धर्म ग्रंथों में बलात्कार का जिक्र क्यों नहीं है?
भगवान राम ने लंका पर विजय प्राप्त किया लेकिन उनकी सेना ने लंका की स्त्रियों को हाथ नहीं लगाया!
महाभारत में पांडवों की जीत हुयी लेकिन उनकी सेना ने कौरव सेना की विधवा स्त्रियों को हाथ नहीं लगाया!
अब आते हैं ईसापूर्व इतिहास में~
220-175 ईसापूर्व में यूनान के शासक “डेमेट्रियस प्रथम” ने भारत पर आक्रमण किया ! 183 ईसापूर्व उसने पंजाब को जीतकर साकल को अपनी राजधानी बनाया और पंजाब-सिन्ध पर राज किया। लेकिन उसके शासन काल में बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।
इसके बाद “युक्रेटीदस” ने भी भारत के कुछ भागों को जीतकर “तक्षशिला” को अपनी राजधानी बनाया लेकिन बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।
“डेमेट्रियस” के वंश के मीनेंडर (ईपू 160-120) ने नौवें बौद्ध शासक “वृहद्रथ” को पराजित कर सिन्धु के पार पंजाब और स्वात घाटी से लेकर मथुरा तक राज किया लेकिन उसके शासनकाल में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं मिलता।
“सिकंदर” ने भारत पर लगभग 326-327 ई .पू आक्रमण किया जिसमें हजारों सैनिक मारे गए । युद्ध जीतने के बाद भी राजा “पुरु” की बहादुरी से प्रभावित होकर सिकंदर ने जीता हुआ राज्य पुरु को वापस दे दिया और “बेबिलोन” वापस चला गया! विजेता होने के बाद भी उसकी सेना ने किसी भी महिला के साथ बलात्कार नहीं किया और न ही “धर्म परिवर्तन” करवाया ।
इसके बाद “शकों” ने भारत पर आक्रमण किया (जिन्होंने ई.78 से शक संवत शुरू किया था)। “सिन्ध” नदी के तट पर स्थित “मीननगर” को उन्होंने अपनी राजधानी बनाकर गुजरात क्षेत्र के सौराष्ट्र , अवंतिका, उज्जयिनी, गंधार, सिन्ध, मथुरा समेत महाराष्ट्र के बहुत बड़े भू भाग पर 130 ईस्वी से 188 ईस्वी तक शासन किया। परन्तु इनके राज्य में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं मिलता है!
इसके बाद तिब्बत के “युइशि” (यूची) कबीले की लड़ाकू प्रजाति “कुषाणों” ने “काबुल” और “कंधार” को जीत लिया। जिसमें “कनिष्क प्रथम” (127-140ई.) नाम का सबसे शक्तिशाली सम्राट हुआ। जिसका राज्य “कश्मीर से उत्तरी सिन्ध” तथा “पेशावर से सारनाथ” तक फैला था। कुषाणों ने भी भारत पर लम्बे समय तक विभिन्न क्षेत्रों में शासन किया। परन्तु इतिहास में कहीं नहीं लिखा कि इन्होंने भारतीय स्त्रियों का बलात्कार किया ।
इसके बाद “अफगानिस्तान” से होते हुए भारत तक आये “हूणों” ने 520 AD में भारत पर अधिसंख्य आक्रमण किए और यहाँ पर राज भी किया। ये हमारी सेना के लिये क्रूर थे लेकिन महिलाओं का सम्मान करते थे!
इसके अतिरिक्त हजारों साल के इतिहास में और भी कई आक्रमणकारी आये जिन्होंने भारत में बहुत मार-काट मचाया जैसे “नेपालवंशी” “शक्य” आदि। लेकिन किसी ने भी महिलाओं की इज्जत नहीं लूटा!
अब आते हैं मध्यकालीन भारत में और यहीं से शुरू होता है भारत में बलात्कार का प्रचलन ।
सबसे पहले 711 ईस्वी में “मुहम्मद बिन कासिम” ने सिंध पर हमला करके राजा “दाहिर” को हराने के बाद उनकी दोनों “बेटियों” को “यौनदासी” के रूप में “खलीफा” को तोहफा दे दिया। तब शायद भारत की स्त्रियों का पहली बार बलात्कार जैसे कुकर्म से सामना हुआ जिसमें “हारे हुए राजा की बेटियों” और “साधारण भारतीय स्त्रियों” का “जीती हुयी इस्लामी सेना” द्वारा बुरी तरह से बलात्कार और अपहरण किया गया ।
फिर आया 1001 इस्वी में “गजनवी”। इसने “इस्लाम फ़ैलाने” के उद्देश्य से ही आक्रमण किया था। “सोमनाथ मंदिर” को तोड़ने के बाद इसकी सेना ने हजारों “हिंदू औरतों” का बलात्कार किया और उन्हें अफगानिस्तान ले जाकर बाजारों में जानवरों की तरह नीलाम कर दिया ।
फिर “गौरी” ने 1192 में “पृथ्वीराज चौहान” को हराने के बाद भारत में “इस्लाम का प्रकाश” फैलाने के लिए “हजारों हिंदुओ” को मौत के घाट उतर दिया और उसकी “फौज” ने “अनगिनत हिन्दू स्त्रियों” के साथ बलात्कार कर उनका “धर्म-परिवर्तन” करवाया।
मुहम्मद बिन कासिम, बख्तियार खिलजी, जूना खाँ उर्फ अलाउद्दीन खिलजी, फिरोजशाह, तैमूरलंग, आरामशाह, इल्तुतमिश, रुकुनुद्दीन फिरोजशाह, मुइजुद्दीन बहरामशाह, अलाउद्दीन मसूद, नसीरुद्दीन महमूद, गयासुद्दीन बलबन, जलालुद्दीन खिलजी, शिहाबुद्दीन उमर खिलजी, कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी, नसरत शाह तुगलक, महमूद तुगलक, खिज्र खां, मुबारक शाह, मुहम्मद शाह, अलाउद्दीन आलम शाह, बहलोल लोदी, सिकंदर शाह लोदी, बाबर, नूरुद्दीन सलीम जहांगीर ! ये सब अपने साथ औरतों को लेकर नहीं आए थे।
अपने हरम में “8000 रखैल रखने वाला शाहजहाँ”।
इसके आगे अपने ही दरबारियों और कमजोर मुसलमानों की औरतों से अय्याशी करने के लिए “मीना बाजार” लगवाने वाला “जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर”।
मुहम्मद से लेकर औरंगजेब तक, बलात्कारियों की ये सूची बहुत लम्बी है। जिनकी फौजों ने हारे हुए राज्य की लाखों “महिलाओं” का बेरहमी से बलात्कार किया और “जेहाद के इनाम” के तौर पर कभी “सिपहसालारों” में बांटा तो कभी बाजारों में “जानवरों की तरह उनकी कीमत लगायी” गई।
ये असहाय और बेबस महिलाएं “हरमों” से लेकर “वेश्यालयों” तक में पहुँची। इनकी संतानें भी हुईं पर वो अपने मूलधर्म में कभी वापस नहीं पहुँच पायीं।
एकबार फिर से बता दूँ कि मुस्लिम “आक्रमणकारी” अपने साथ “औरतों” को लेकर नहीं आए थे।
वास्तव में मध्यकालीन भारत में मुगलों द्वारा “पराजित स्त्रियों का बलात्कार” करना एक आम बात थी क्योंकि वे इसे “अपनी जीत” या “जिहाद का इनाम” (माल-ए-गनीमत) मानते थे।
इन अत्याचारों और असंख्य बलात्कारों को वामपंथी इतिहासकार भी जानते हैं लेकिन लिखते नहीं हैं! जबकि खुद उन सुल्तानों के साथ रहने वाले लेखकों ने बड़े ही शान से अपनी कलम चलायीं और बड़े घमण्ड से अपने मालिकों द्वारा काफिरों को सबक सिखाने का विस्तृत वर्णन किया।
इनके सैकड़ों वर्षों के खूनी शासनकाल में भारत की हिन्दू जनता अपनी महिलाओं का सम्मान बचाने के लिए देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भागती और बसती रहीं।
इन मुस्लिम बलात्कारियों से सम्मान-रक्षा के लिए हजारों की संख्या में हिन्दू महिलाओं ने स्वयं को जौहर की ज्वाला में जलाकर भस्म कर लिया।
ठीक इसी काल में मुस्लिम सैनिकों की दृष्टि से बचाने के लिए बाल-विवाह रात्रि-विवाह और पर्दा-प्रथा की शुरूआत हुई। अंग्रेजों ने भी भारत को खूब लूटा लेकिन वे महिलाओं की आबरू नहीं लूटते थे!
1946 में मुहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन प्लान और 1947 विभाजन के दंगों से लेकर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम तक तो लाखों हिंदू महिलाओं का बलात्कार हुआ और फिर उनका अपहरण हो गया।
इस दौरान स्थिती ऐसी हो गयी थी कि “पाकिस्तान समर्थित मुस्लिम बहुल इलाकों” से “बलात्कार” किये बिना एक भी “हिंदू स्त्री” वहां से वापस नहीं आ सकती थी।
विभाजन के समय पाकिस्तान के कई स्थानों में सड़कों पर हिंदू स्त्रियों की नग्न यात्राएं निकाली गयीं और बाज़ार सजाकर उनकी बोलियाँ लगायी गयीं और 10 लाख महिलाओं को खरीदा बेचा गया। 20 लाख से ज्यादा महिलाओं को जबरन मुस्लिम बना कर अपने घरों में रखा गया। (इसका कुछ वर्णन फिल्म पिंजर में भी है)
भारत विभाजन के दौर में हिन्दुओं को मारने वाले सबके सब विदेशी नहीं थे। इन्हें मारने वाले स्थानीय मुस्लिम भी थे। समूहों में कत्ल से पहले हिन्दुओं के अंग-भंग करना, आंखें निकालना, नाखुन खींचना, बाल नोचना, जिंदा जलाना, चमड़ी खींचना खासकर महिलाओं का बलात्कार करने के बाद उनके “स्तनों को काटकर” तड़पा-तड़पा कर मारना आम बात थी।
अंत में कश्मीर की बात~19 जनवरी 1990~
कश्मीरी हिंदुओं के घर के दरवाजों पर नोट लगा दिया गया – “या तो मुस्लिम बन जाओ या मरने के लिए तैयार हो जाओ या फिर कश्मीर छोड़कर भाग जाओ लेकिन अपनी औरतों को यहीं छोड़कर ” लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी हिंदू संजयजी उस मंजर को याद करते हुए आज भी सिहर जाते हैं। वह कहते हैं कि “मस्जिदों के लाउडस्पीकर” से लगातार तीन दिन तक एक ही आवाज आ रही थी – “यहां क्या चलेगा, निजाम-ए-मुस्तफा”, “आजादी का मतलब क्या – ला इलाहा इलल्लाह”, “कश्मीर में अगर रहना है तो अल्लाह-ओ-अकबर” कहना है और ‘असि गच्ची पाकिस्तान, बताओ “रोअस ते बतानेव सान” जिसका मतलब था कि हमें यहां अपना पाकिस्तान बनाना है, कश्मीरी पंडितों के बिना लेकिन कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ।
सदियों का भाईचारा कुछ ही समय में समाप्त हो गया जहाँ पंडितों से ही तालीम हासिल किए लोग उनकी ही महिलाओं की अस्मत लूटने को तैयार हो गए थे। सारे कश्मीर की मस्जिदों में एक टेप चलाया गया। जिसमें मुस्लिमों को कहा गया की वो हिन्दुओं को कश्मीर से निकाल बाहर करें। उसके बाद कश्मीरी मुस्लिम सड़कों पर उतर आये।
मुस्लिमों ने हिंदुओ के घरों को जला दिया, महिलाओ का बलात्कार करके, फिर उनकी हत्या करके उनके “नग्न शरीर को पेड़ पर लटका दिया गया”। कुछ महिलाओं को बलात्कार कर जिन्दा जला दिया गया और कुछ को लोहे के गरम सलाखों से मार दिया गया।
कश्मीरी पंडित नर्स, जो श्रीनगर के सौर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में काम करती थी, का सामूहिक बलात्कार किया गया और मार मार कर उसकी हत्या कर दी गयी!बच्चों को उनकी माँ के सामने ही स्टील के तार से गला घोंटकर मार दिया गया।
आप जिस धरती के जन्नत का मजे लेने जाते हैं उसी हसीन वादियों में हजारों हिन्दू बहू-बेटियों की बेबस कराहें गूंजती हैं, जिन्हें केवल हिंदू होने की सजा मिली। घर, बाजार, मैदान से लेकर उन खूबसूरत वादियों में न जाने कितनी जुल्मों की दास्तानें दफन हैं जो आज तक अनकही हैं। विस्थापित हिंदू के घर और बगीचों पर वहां के मुसलमानों ने कब्जा कर लिया और सबसे बड़ी बात तो यह है कि वे बलात्कारी और हत्यारे खुलेआम सड़कों पर मौज मस्ती कर रहे हैं! झेलम का बहता हुआ पानी उन रातों की वहशियत के गवाह हैं जिसने कभी न खत्म होने वाले दाग इंसानियत के दिल पर दिए।
लखनऊ में विस्थापित रविन्द्रजी के चेहरे पर अविश्वास की सैकड़ों लकीरें पीड़ा की शक्ल में उभरती हुईं बयान करती हैं कि यदि आतंक के उन दिनों में घाटी की मुस्लिम आबादी ने उनका साथ दिया होता, जब उन्हें वहां से खदेड़ा जा रहा था, उनके साथ कत्लेआम हो रहा था तो किसी भी आतंकवादी में ये हिम्मत नहीं होती कि वह किसी कश्मीरी हिंदू को चोट पहुंचाने की सोच पाता लेकिन तब उन्होंने हमारा साथ देने के बजाय कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेक दिए और उनके ही लश्कर में शामिल हो गए थे।
अभी हाल में ही आपलोगों ने टीवी पर “अबू बकर अल बगदादी” के जेहादियों को काफिर “यजीदी महिलाओं” को रस्सियों से बाँधकर कौड़ियों के भाव बेचते देखा होगा। पाकिस्तान में खुलेआम हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर सार्वजनिक रूप से मौलवियों द्वारा धर्मपरिवर्तन कर निकाह कराते देखा होगा।
बांग्लादेश से भारत भागकर आये हिन्दुओं के मुँह से महिलाओं के बलात्कार की मार्मिक घटनाएँ सुनी होंगी!यहाँ तक कि म्यांमार में भी बौद्ध महिलाओं के बलात्कार और हत्या के बाद शुरू हुई हिंसा के भीषण दौर को देखा होगा।
केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनियाँ में इस सोच ने मोरक्को से ले कर हिन्दुस्तान तक सभी देशों पर आक्रमण कर वहाँ के निवासियों को धर्मान्तरित किया, संपत्तियों को लूटा तथा इन देशों में पहले से फल फूल रही हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता का विनाश कर दिया।
परन्तु पूरी दुनियाँ में इसकी सबसे ज्यादा सजा महिलाओं को ही भुगतनी पड़ी और वह भी बलात्कार के रूप में!आज सैकड़ों साल की गुलामी के बाद समय बीतने के साथ धीरे-धीरे ये बलात्कार करने की मानसिक बीमारी भारत के पुरुषों में भी फैलने लगी।
जिस देश में कभी नारी जाति शासन करती थीं, सार्वजनिक रूप से शास्त्रार्थ करती थीं, स्वयंवर द्वारा स्वयं अपना वर चुनती थीं, जिन्हें देवियों के रूप में श्रद्धा से पूजा जाता था, आज उसी देश में छोटी-छोटी बच्चियों का बलात्कार होने लगा, इससे स्पस्ट है कि हिंदुस्तान में भी हिंदू सभ्यता लगातार कमजोर हो रही है!
साभार Ashwini upadhyay”।

शक्तिपीठों में प्रमुख कामाख्या देवी मंदिर

भारत के 10 प्रमुख रहस्यमयी मंदिरों में से एक और 51 शक्तिपीठों में प्रमुख कामाख्या देवी मंदिर असम राज्य की राजधारी दिसपुर के समीप गुवाहाटी से 8 किलोटिर दूर स्थित है। इस मंदिर से काफी रहस्य जुड़े हैं। यहां हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। मान्यता है कि सती देवी का योनि भाग गिरा था। इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है, यहां पर देवी के योनि भाग की ही पूजा की जाती है। मंदिर में साल में एक बार लगने वाला अंबुवाची मेला 22 जून से शुरू हो गया था और उसके साथ ही मंदिर के कपाट भी बंद कर दिए गए थे। अब 26 जून को कपाट फिर खुल जाएंगे और श्रद्धालु फिर से देवी कामाख्या के दर्शन कर सकेंगे। मंदिर के कपाट बंद होने की वजह यह है कि इन दिनों में देवी रजस्वला रहती हैं। इस मेले में दुनिया भर के तांत्रिक तंत्र साधना और सिद्धियों के लिए यहां मौजूद रहते हैं।

मान्यता है कि मेले के दौरान कामाख्या देवी के मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं। तीन दिन तक माता रजस्वला रहती हैं। चौथे दिन देवी के स्नान पूजा के बाद मंदिर के कपाट खुल जाते हैं और भक्तों को प्रसाद वितरण होता है। भक्तों को प्रसाद स्वरूप गीला कपड़ा मिलता है, जो अंबुबाची वस्त्र कहलाता है। माता जब रजस्वला होती हैं तो मंदिर के अंदर श्वेत वस्त्र बिछाते हैं और मान्यता है कि तीन दिन बाद वह वस्त्र लाल हो जाता है। उसे ही भक्तों को प्रसाद स्वरूप बांटा जाता है। यह प्रसाद जिसे मिलता है, उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

पवित्र शक्ति पीठ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर स्थापित हैं। देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है। देवी भागवत में जहां 108 और देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का वर्णन मिलता है, वहीं तन्त्र चूडामणि में 52 शक्तिपीठ बताए गए हैं। देवी पुराण में 51 शक्तिपीठ की ही चर्चा की गई है। इन 51 शक्तिपीठों में से कुछ विदेश में भी हैं। वर्तमान में भारत में 42, पाकिस्तान में 1, बांग्लादेश में 4, श्रीलंका में 1, तिब्बत में 1 तथा नेपाल में 2 शक्ति पीठ है।

कैसे बने यह शक्तिपीठ, पढ़ें यह पौराणिक कथा :—

देवी माता के 51 शक्तिपीठों के बनने के सन्दर्भ में पौराणिक कथा प्रचलित है। राजा प्रजापति दक्ष की पुत्री के रूप में माता जगदम्बिका ने सती के रूप में जन्म लिया था और भगवान शिव से विवाह किया। एक बार मुनियों के एक समूह ने यज्ञ आयोजित किया। यज्ञ में सभी देवताओं को बुलाया गया था। जब राजा दक्ष आए तो सभी लोग खड़े हो गए लेकिन भगवान शिव खड़े नहीं हुए। भगवान शिव दक्ष के दामाद थे। यह देख कर राजा दक्ष बेहद क्रोधित हुए। अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए सती के पिता राजा प्रजापति दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया था। उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता और सती के पति भगवान शिव को इस यज्ञ में शामिल होने के लिए निमंत्रण नहीं भेजा। भगवान शिव इस यज्ञ में शामिल नहीं हुए। नारद जी से सती को पता चला कि उनके पिता के यहां यज्ञ हो रहा है लेकिन उन्हें निमंत्रित नहीं किया गया है। इसे जानकर वे क्रोधित हो उठीं। नारद ने उन्हें सलाह दी कि पिता के यहां जाने के लिए बुलावे की जरूरत नहीं होती है। जब सती अपने पिता के घर जाने लगीं तब भगवान शिव ने उन्हें समझाया लेकिन वह नहीं मानी तो स्वयं जाने से इंकार कर दिया।

शंकरजी के रोकने पर भी जिद कर सती यज्ञ में शामिल होने चली गई। यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा और पिता से उग्र विरोध प्रकट किया। इस पर दक्ष, भगवान शंकर के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें करने लगे। इस अपमान से पीड़ित सती ने यज्ञ-कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी।

भगवान शंकर को जब पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया। सर्वत्र प्रलय व हाहाकार मच गया। भगवान शंकर के आदेश पर वीरभद्र ने दक्ष का सिर काट दिया और अन्य देवताओं को शिव निंदा सुनने की भी सज़ा दी। भगवान शिव ने यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कंधे पर उठा लिया और दुःखी हुए सम्पूर्ण भूमंडल पर भ्रमण करने लगे।

भगवती सती ने अन्तरिक्ष में शिव को दर्शन दिए और कहा कि जिस-जिस स्थान पर उनके शरीर के अंग विभक्त होकर गिरेंगे, वहां महाशक्तिपीठ का उदय होगा। सती का शव लेकर शिव पृथ्वी पर विचरण करते हुए तांडव नृत्य भी करने लगे, जिससे पृथ्वी पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न होने लगी। पृथ्वी समेत तीनों लोकों को व्याकुल देखकर भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंड-खंड कर धरती पर गिराते गए। जब-जब शिव नृत्य मुद्रा में पैर पटकते, विष्णु अपने चक्र से सती शरीर का कोई अंग काटकर उसके टुकड़े पृथ्वी पर गिरा देते।

‘तंत्र-चूड़ामणि’ के अनुसार इस प्रकार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आया। इस तरह कुल 51 स्थानों में माता की शक्तिपीठों का निर्माण हुआ। अगले जन्म में सती ने हिमवान राजा के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या कर शिव को पुन: पति रूप में प्राप्त किया।

51- निम्न शक्तिपीठ (51 Shakti Peethas) देश बिदेश में है

  1. किरीट शक्तिपीठ (Kirit Shakti Peeth) :
    किरीट शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल के हुगली नदी के तट लालबाग कोट पर स्थित है। यहां सती माता का किरीट यानी शिराभूषण या मुकुट गिरा था। यहां की शक्ति विमला अथवा भुवनेश्वरी तथा भैरव संवर्त हैं। (शक्ति का मतलब माता का वह रूप जिसकी पूजा की जाती है तथा भैरव का मतलब शिवजी का वह अवतार जो माता के इस रूप के साथ हैं )
  2. कात्यायनी शक्तिपीठ (Katyayani Shakti Peeth ) :वृन्दावन, मथुरा के भूतेश्वर में स्थित है कात्यायनी वृन्दावन शक्तिपीठ जहां सती का केशपाश गिरे थे। यहां की शक्ति देवी कात्यायनी हैं तथा भैरव भूतेश है।
  3. करवीर शक्तिपीठ (Karveer shakti Peeth) :
    महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का त्रिनेत्र गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव क्रोधशिश हैं। यहां महालक्ष्मी का निज निवास माना जाता है।
  4. श्री पर्वत शक्तिपीठ (Shri Parvat Shakti Peeth) : इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतान्तर है कुछ विद्वानों का मानना है कि इस पीठ का मूल स्थल लद्दाख है, जबकि कुछ का मानना है कि यह असम के सिलहट में है जहां माता सती का दक्षिण तल्प यानी कनपटी गिरी थी। यहां की शक्ति श्री सुन्दरी एवं भैरव सुन्दरानन्द हैं।
  5. विशालाक्षी शक्तिपीठ (Vishalakshi Shakti Peeth) :उत्तर प्रदेश, वाराणसी के मीरघाट पर स्थित है शक्तिपीठ जहां माता सती के दाहिने कान के मणि गिरे थे। यहां की शक्ति विशालाक्षी तथा भैरव काल भैरव हैं।
  6. गोदावरी तट शक्तिपीठ (Godavari Shakti Peeth) :आंध्रप्रदेश के कब्बूर में गोदावरी तट पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का वामगण्ड यानी बायां कपोल गिरा था। यहां की शक्ति विश्वेश्वरी या रुक्मणी तथा भैरव दण्डपाणि हैं।
  7. शुचीन्द्रम शक्तिपीठ (Suchindram shakti Peeth) :तमिलनाडु, कन्याकुमारी के त्रिसागर संगम स्थल पर स्थित है यह शुची शक्तिपीठ, जहां सती के मतान्तर से पृष्ठ भाग गिरे थे। यहां की शक्ति नारायणी तथा भैरव संहार या संकूर हैं।
  8. पंच सागर शक्तिपीठ (Panchsagar Shakti Peeth) :इस शक्तिपीठ का कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है लेकिन यहां माता के नीचे के दांत गिरे थे। यहां की शक्ति वाराही तथा भैरव महारुद्र हैं।
  9. ज्वालामुखी शक्तिपीठ (Jwalamukhi Shakti Peeth) :हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां सती की जीभ गिरी थी। यहां की शक्ति सिद्धिदा व भैरव उन्मत्त हैं।
  10. भैरव पर्वत शक्तिपीठ (Bhairavparvat Shakti Peeth) :इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतदभेद है। कुछ गुजरात के गिरिनार के निकट भैरव पर्वत को तो कुछ मध्य प्रदेश के उज्जैन के निकट क्षिप्रा नदी तट पर वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं, जहां माता का ऊपर का ओष्ठ गिरा है।यहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण हैं।
  11. अट्टहास शक्तिपीठ ( Attahas Shakti Peeth) :
    अट्टहास शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के लाबपुर में स्थित है। जहां माता का अध्रोष्ठ यानी नीचे का होंठ गिरा था। यहां की शक्ति फुल्लरा तथा भैरव विश्वेश हैं।
  12. जनस्थान शक्तिपीठ (Janasthan Shakti Peeth) :
    महाराष्ट्र नासिक के पंचवटी में स्थित है जनस्थान शक्तिपीठ जहां माता का ठुड्डी गिरी थी। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव विकृताक्ष हैं।
  13. कश्मीर शक्तिपीठ या अमरनाथ शक्तिपीठ (Kashmir Shakti Peeth or Amarnath Shakti Peeth) :
    जम्मू-कश्मीर के अमरनाथ में स्थित है यह शक्तिपीठ जहां माता का कण्ठ गिरा था। यहां की शक्ति महामाया तथा भैरव त्रिसंध्येश्वर हैं।
  14. नन्दीपुर शक्तिपीठ (Nandipur Shakti Peeth) :
    पश्चिम बंगाल के सैन्थया में स्थित है यह पीठ, जहां देवी की देह का कण्ठहार गिरा था। यहां की शक्ति नन्दनी और भैरव निन्दकेश्वर हैं।
  15. श्री शैल शक्तिपीठ (Shri Shail Shakti Peeth ) :
    आंध्रप्रदेश के कुर्नूल के पास है श्री शैल का शक्तिपीठ, जहां माता की ग्रीवा गिरी थी। यहां की शक्ति महालक्ष्मी तथा भैरव संवरानन्द अथवा ईश्वरानन्द हैं।
  16. नलहटी शक्तिपीठ (Nalhati Shakti Peeth) :
    पश्चिम बंगाल के बोलपुर में है नलहटी शक्तिपीठ, जहां माता की उदरनली गिरी थी। यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव योगीश हैं।
  17. मिथिला शक्तिपीठ (Mithila Shakti Peeth ) :
    इसका निश्चित स्थान अज्ञात है। स्थान को लेकर मन्तातर है तीन स्थानों पर मिथिला शक्तिपीठ को माना जाता है, वह है नेपाल के जनकपुर, बिहार के समस्तीपुर और सहरसा, जहां माता का वाम स्कंध गिरा था। यहां की शक्ति उमा या महादेवी तथा भैरव महोदर हैं।
  18. रत्नावली शक्तिपीठ (Ratnavali Shakti Peeth) :इसका निश्चित स्थान अज्ञात है, बंगाज पंजिका के अनुसार यह तमिलनाडु के चेन्नई में कहीं स्थित है रत्नावली शक्तिपीठ जहां माता का दक्षिण स्कंध गिरा था। यहां की शक्ति कुमारी तथा भैरव शिव हैं।
  19. अम्बाजी शक्तिपीठ (Ambaji Shakti Peeth) :
    गुजरात गूना गढ़ के गिरनार पर्वत के शिखर पर देवी अम्बिका का भव्य विशाल मन्दिर है, जहां माता का उदर गिरा था। यहां की शक्ति चन्द्रभागा तथा भैरव वक्रतुण्ड है। ऐसी भी मान्यता है कि गिरिनार पर्वत के निकट ही सती का उर्ध्वोष्ठ गिरा था, जहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण है।
  20. जालंधर शक्तिपीठ (Jalandhar Shakti Peeth) :पंजाब के जालंधर में स्थित है माता का जालंधर शक्तिपीठ। जहां माता का वामस्तन गिरा था। यहां की शक्ति त्रिपुरमालिनी तथा भैरव भीषण हैं।
  21. रामागिरि शक्तिपीठ (Ramgiri Shakti Peeth) :
    इस शक्ति पीठ की स्थिति को लेकर भी विद्वानों में मतान्तर है। कुछ उत्तर प्रदेश के चित्रकूट तो कुछ मध्यप्रदेश के मैहर में मानते हैं, जहां माता का दाहिना स्तन गिरा था। यहां की शक्ति शिवानी तथा भैरव चण्ड हैं।
  22. वैद्यनाथ शक्तिपीठ (Vaidhnath Shakti Peeth) : झारखण्ड के गिरिडीह, देवघर स्थित है वैद्यनाथ शक्तिपीठ, जहां माता का हृदय गिरा था। यहां की शक्ति जयदुर्गा तथा भैरव वैद्यनाथ है। एक मान्यतानुसार यहीं पर सती का दाह-संस्कार भी हुआ था।
  23. वक्त्रेश्वर शक्तिपीठ (Varkreshwar Shakti Peeth) :माता का यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के सैन्थया में स्थित है जहां माता का मन गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमर्दिनी तथा भैरव वक्त्रानाथ हैं।
  24. कन्याकुमारी शक्तिपीठ (Kanyakumari Shakti Peeth) :तमिलनाडु के कन्याकुमारी के तीन सागरों हिन्द महासागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी के संगम पर स्थित है कण्यकाश्रम शक्तिपीठ, जहां माता की पीठ गिरी थी। यहां की शक्ति शर्वाणि या नारायणी तथा भैरव निमषि या स्थाणु हैं।
  25. बहुला शक्तिपीठ (Bahula Shakti Peeth) :
    पश्चिम बंगाल के कटवा जंक्शन के निकट केतुग्राम में स्थित है बहुला शक्तिपीठ, जहां माता का वाम बाहु गिरा था। यहां की शक्ति बहुला तथा भैरव भीरुक हैं।
  26. उज्जयिनी शक्तिपीठ (Ujjaini Shakti Peeth) :
    मध्यप्रदेश के उज्जैन के पावन क्षिप्रा के दोनों तटों पर स्थित है उज्जयिनी हरसिद्धि शक्तिपीठ। जहां माता की कोहनी गिरी थी। यहां की शक्ति मंगल चण्डिका तथा भैरव मांगल्य कपिलांबर हैं।
  27. मणिवेदिका शक्तिपीठ (Manivedika Shakti Peeth) : राजस्थान के पुष्कर में स्थित है मणिदेविका शक्तिपीठ, जिसे गायत्री मन्दिर के नाम से जाना जाता है यहां माता की कलाइयां गिरी थीं। यहां की शक्ति गायत्री तथा भैरव शर्वानन्द हैं।
  28. प्रयाग शक्तिपीठ (Prayag Shakti peeth) :
    उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद में स्थित है। यहां माता की हाथ की अंगुलियां गिरी थी। लेकिन, स्थानों को लेकर मतभेद है। इसे अक्षयवट, मीरापुर और अलोपी स्थानों पर गिरा माना जाता है। तीनों शक्तिपीठ की शक्ति ललिता हैं तथा भैरव भव है।
  29. उत्कल शक्तिपीठ (Utakal Shakti Peeth) :
    उड़ीसा के पुरी और याजपुर में माना जाता है जहां माता की नाभि गिरी था। यहां की शक्ति विमला तथा भैरव जगन्नाथ पुरुषोत्तम हैं।
  30. कांची शक्तिपीठ (Kanchi Shakti Peeth) :
    तमिलनाडु के कांचीवरम् में स्थित है माता का कांची शक्तिपीठ, जहां माता का कंकाल शरीर गिरा था। यहां की शक्ति देवगर्भा तथा भैरव रुरु हैं।
  31. कालमाधव शक्तिपीठ (Kalmadhav Shakti Peeth) :
    इस शक्तिपीठ के बारे कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है। परन्तु, यहां माता का वाम नितम्ब गिरा था। यहां की शक्ति काली तथा भैरव असितांग हैं।
  32. शोण शक्तिपीठ (Shondesh Shakti Peeth) :
    मध्यप्रदेश के अमरकंटक के नर्मदा मन्दिर शोण शक्तिपीठ है। यहां माता का दक्षिण नितम्ब गिरा था। एक दूसरी मान्यता यह है कि बिहार के सासाराम का ताराचण्डी मन्दिर ही शोण तटस्था शक्तिपीठ है। यहां सती का दायां नेत्रा गिरा था ऐसा माना जाता है। यहां की शक्ति नर्मदा या शोणाक्षी तथा भैरव भद्रसेन हैं।
  33. कामाख्या शक्तिपीठ (Kamakhya Shakti peeth) :
    कामगिरि असम गुवाहाटी के कामगिरि पर्वत पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता की योनि गिरी थी। यहां की शक्ति कामाख्या तथा भैरव उमानन्द हैं।
  34. जयंती शक्तिपीठ (Jayanti Shakti Peeth) :
    जयन्ती शक्तिपीठ मेघालय के जयंतिया पहाडी पर स्थित है, जहां माता की वाम जंघा गिरी थी। यहां की शक्ति जयन्ती तथा भैरव क्रमदीश्वर हैं।
  35. मगध शक्तिपीठ (Magadh Shakti Peeth) :
    बिहार की राजधनी पटना में स्थित पटनेश्वरी देवी को ही शक्तिपीठ माना जाता है जहां माता की दाहिना जंघा गिरी थी। यहां की शक्ति सर्वानन्दकरी तथा भैरव व्योमकेश हैं।
  36. त्रिस्तोता शक्तिपीठ (Tristotaa Shakti Peeth) :
    पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी के शालवाड़ी गांव में तीस्ता नदी पर स्थित है त्रिस्तोता शक्तिपीठ, जहां माता का वामपाद गिरा था। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव ईश्वर हैं।
  37. त्रिपुरी सुन्दरी शक्तिपीठ (Tripura Sundari Shakti Peeth) :त्रिपुरा के राध किशोर ग्राम में स्थित है त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ, जहां माता का दक्षिण पाद गिरा था। यहां की शक्ति त्रिपुर सुन्दरी तथा भैरव त्रिपुरेश हैं।

38 . विभाषा शक्तिपीठ (Vibhasha Shakti Peeth) :पश्चिम बंगाल के मिदनापुर के ताम्रलुक ग्राम में स्थित है विभाषा शक्तिपीठ, जहां माता का वाम टखना गिरा था। यहां की शक्ति कपालिनी, भीमरूपा तथा भैरव सर्वानन्द हैं।

  1. कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ (Kurukshetra Shakti Peeth) :हरियाणा के कुरुक्षेत्र जंक्शन के निकट द्वैपायन सरोवर के पास स्थित है कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ, जिसे श्रीदेवीकूप भद्रकाली पीठ के नाम से भी जाना जाता है। यहां माता के दाहिने चरण गिरे थे। यहां की शक्ति सावित्री तथा भैरव स्थाणु हैं।
  2. युगाद्या शक्तिपीठ, क्षीरग्राम शक्तिपीठ ( Yugadhya Shakti Peeth) :पश्चिम बंगाल के बर्दमान जिले के क्षीरग्राम में स्थित है युगाद्या शक्तिपीठ, यहां सती के दाहिने चरण का अंगूठा गिरा था। यहां की शक्ति जुगाड़या और भैरव क्षीर खंडक है।
  3. विराट अम्बिका शक्तिपीठ (Virat Shakti Peeth) :
    राजस्थान के गुलाबी नगरी जयपुर के वैराटग्राम में स्थित है विराट शक्तिपीठ, जहां सती के ‘दाहिने पैर की अंगुलियां गिरी थीं।। यहां की शक्ति अंबिका तथा भैरव अमृत हैं।
  4. कालीघाट शक्तिपीठ (Kalighat Shakti Peeth) :
    पश्चिम बंगाल, कोलकाता के कालीघाट में कालीमन्दिर के नाम से प्रसिद्ध यह शक्तिपीठ, जहां माता के दाहिने पैर के अंगूठे को छोड़ 4 अन्य अंगुलियां गिरी थीं। यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव नकुलेश हैं।
  5. मानस शक्तिपीठ (Manas Shakti Peeth) :
    तिब्बत के मानसरोवर तट पर स्थित है मानस शक्तिपीठ, जहां माता की दाहिनी हथेली गिरी थी। यहां की शक्ति द्राक्षायणी तथा भैरव अमर हैं।
  6. लंका शक्तिपीठ (Lanka Shakti Peeth) :
    श्रीलंका में स्थित है लंका शक्तिपीठ, जहां माता के नूपुर यानी पायल गिरे थे। यहां की शक्ति इन्द्राक्षी तथा भैरव राक्षसेश्वर हैं। लेकिन,वह ज्ञात नहीं है कि श्रीलंका के किस स्थान पर गिरे थे।
  7. गण्डकी शक्तिपीठ (Gandaki Shakti Peeth) :
    नेपाल में गण्डकी नदी के उद्गम पर स्थित है गण्डकी शक्तिपीठ, जहां सती का दक्षिण कपोल गिरा था। यहां शक्ति गण्डकी´ तथा भैरवचक्रपाणि´ हैं।
  8. गुह्येश्वरी शक्तिपीठ (Guhyeshwari Shakti Peeth) : नेपाल के काठमाण्डू में पशुपतिनाथ मन्दिर के पास ही स्थित है गुह्येश्वरी शक्तिपीठ है, जहां माता सती के दोनों घुटने गिरे थे। यहां की शक्ति महामाया´ और भैरवकपाल´ हैं।
  9. हिंगलाज शक्तिपीठ (Hinglaj Shakti Peeth) :
    पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में स्थित है माता हिंगलाज शक्तिपीठ, जहां माता का ब्रह्मरन्ध्र (सिर का ऊपरी भाग) गिरा था। यहां की शक्ति कोट्टरी और भैरव भीमलोचन है।
  10. सुगंध शक्तिपीठ (Sugandha Shakti Peeth) :
    बांग्लादेश के खुलना में सुगंध नदी के तट पर स्थित है उग्रतारा देवी का शक्तिपीठ, जहां माता की नासिका गिरी थी। यहां की देवी सुनन्दा(मतांतर से सुगंधा) है तथा भैरव त्रयम्बक हैं।
  11. करतोया शक्तिपीठ (Kartoya Shakti Peeth) :
    बंग्लादेश भवानीपुर के बेगड़ा में करतोया नदी के तट पर स्थित है करतोयाघाट शक्तिपीठ, जहां माता की वाम तल्प गिरी थी। यहां देवी अपर्णा रूप में तथा शिव वामन भैरव रूप में वास करते हैं।
  12. चट्टल शक्तिपीठ (Chatal Shakti Peeth) :
    बंग्लादेश के चटगांव में स्थित है चट्टल का भवानी शक्तिपीठ, जहां माता की दाहिनी भुजा गिरी थी। यहां की शक्ति भवानी तथा भैरव चन्द्रशेखर हैं।
  13. यशोर शक्तिपीठ (Yashor Shakti Peeth) :
    बांग्लादेश के जैसोर खुलना में स्थित है माता का यशोरेश्वरी शक्तिपीठ, जहां माता की बायीं हथेली गिरी थी। यहां शक्ति यशोरेश्वरी तथा भैरव चन्द्र हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार कामाख्या में यहाँ पर माता सती का योनि भाग यहां गिरा था। यहां पर मंदिर में चट्टान के बीच बनी आकृति देवी की योनि को दर्शाता है, जिसके पास में एक झरना मौजूद है। योनि भाग से जल धार हल्की बहती रहती है। श्रद्धालुओं की मानें तो इस जल का पान करने से हर प्रकार के रोग एवं बीमारी दूर होती है।
इस वर्ष आज 26 जून सायंकाल से मंदिर पुनः शुरू होगा देश बिदेश से हजारों तात्रिक यहाँ हर वर्ष आते और दुर दुर से श्रद्धालुओं का अंम्बुवाची मे ताता लगा रहता है!
🙏🙏जय माता जी सभी का कल्याण करे 🙏🙏

Shiva Lingam-“Not phallus”- decoded meanings | HINDUISM AND SANATAN DHARMA

  What is Shiva Lingam? The Sanskrit word ‘Lingam’ means symbol. Thus the literal meaning of Shiva Lingam is the symbol of Shiva. The Supreme Shiva doesn’t have a form and every form is his form. The Shiva Lingam represents him, the Supreme Shiva¸ who is formless. The way when we see a smoke, we…
— Read on pparihar.com/2018/03/17/shiva-lingam-science/

बुद्ध और ब्राह्मण

Sanatan Dharm and Hinduism's avatarHINDUISM AND SANATAN DHARMA

सलंग्न चित्र- महात्मा बुद्ध यज्ञोपवीत धारण किये हुए।

बुद्ध ने आर्यधर्म को महान कहा है । इसके विपरीत डॉ अंबेडकर आर्यों को विदेशी नहीं मानते थे। अपितु आर्यों होने की बात को छदम कल्पना मानते थे। महात्मा बुद्ध ब्राह्मण, धर्म, वेद, सत्य, अहिंसा , यज्ञ, यज्ञोपवीत आदि में पूर्ण विश्वास रखने वाले थे। महात्मा बुद्ध के उपदेशों का संग्रह धम्मपद के ब्राह्मण वग्गो 18 का में ऐसे अनेक प्रमाण मिलते है कि बुद्ध के ब्राह्मणों के प्रति क्या विचार थे।

१:-न ब्राह्नणस्स पहरेय्य नास्स मुञ्चेथ ब्राह्नणो।

धी ब्राह्नणस्य हंतारं ततो धी यस्स मुञ्चति।।

( ब्राह्मणवग्गो श्लोक ३)

‘ब्राह्नण पर वार नहीं करना चाहिये। और ब्राह्मण को प्रहारकर्ता पर कोप नहीं करना चाहिये। ब्राह्मण पर प्रहार करने वाले पर धिक्कार है।’

२:- ब्राह्मण कौन है:-

यस्स कायेन वाचाय मनसा नत्थि दुक्कतं।

संबुतं तीहि ठानेहि तमहं ब्रूमि ब्राह्नणं।।

( श्लोक ५)

‘जिसने काया,वाणी और मन से कोई दुष्कृत्य नहीं करता,जो तीनों कर्मपथों…

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Leadership in Sri Bhagvat Gita and future of Hindus

Hindu Varna system

New World order-? Russia’s Putin is the man!-Baba Wenga’s prediction

New World order to come- Baba Wenga predicted Russia to establish new world order

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According to Baba Vanga, Putin will one day ‘rule the world’ and nobody could stop Russia from becoming the ‘lord of the world’

Russiawould become the “lord of the world” whereas Europe would become a “wasteland”,Baba Vanga told writer Valentin Sidorov.

“All will thaw, as if ice, only one remain untouched – Vladimir’s glory, the glory of Russia,” she said in a possible reference to Putin, adding, “Too much it is brought in a victim. Nobody can stop Russia.”

Looks like a mini world war is coming and an Atomic war will happen when parts of Europe will be destroyed also, and hopefully, the USA will remain outside and not get involved directly.

Nicknamed the ‘Nostradamus of the Balkans’, Baba Vanga has made several prophecies. The mystic claimed that after losing her eyesight at a very young age, she discovered her ability to foresee the future. Vanga has made prophecies dating thousands…

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Benefits of extended fasting

Sanatan Dharm and Hinduism's avatarHINDUISM AND SANATAN DHARMA

Stage 1

In the few hours after eating, your insulin levels will rise, telling your body to break down glucose for energy. But after 12 hours of fasting, your insulin will drop. A hormone called leptin, which is responsible for telling you you’re full, will also fall, while ghrelin, the hormone that signals hunger, will rise.

Stage Two: 18 Hours

All glycogen is burned and now the body has to use alternative sources -fats and lipolysis begin. Insulin levels is low, but your glucagon – a hormone that controls blood sugar levels – will start to rise 

Stage Three: 24 Hours

Autophagy begins when the body and cells get rid of old damaged cells. This is a way to reduce inflammation, cancer cells, misfolded proteins that are responsible for Alzheimer’s dementia.

Stage Four: 48 Hours

Growth hormone levels will go up, help muscle repair and preserve lean muscle mass, is…

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