या पृथ्वी सच में शेषनाग पर टिकी हुई है ? क्या है इसका वैज्ञानिक रहस्य ?

क्या पृथ्वी सच में शेषनाग पर टिकी हुई है ? क्या है इसका वैज्ञानिक रहस्य ?


क्या पृथ्वी सच में शेषनाग पर टिकी हुई है ? चंद्रमा, आंतरिक्ष-स्टेशनो और सेट्लाइट से लिये गये पृथ्वी के फोटो में तो कोई भी शेषनाग (सर्प) दिखाई नहीं देते है फिर पुराणों और ग्रंथों में ऐसा क्यों कहा गया है कि पृथ्वी शेषनाग पर टिकी हुई है ?


इस विषय में श्रीरामचरित्रमानस, यथार्थ-गीता और भागवत-पुराण तीनों में बात की गयी है । यथार्थ-गीता के 10 अध्याय के 29 वे श्लोक के अनुसार, भागवत-पुराण में यह बताया गया है कि ‘पृथ्वी सरसों की दाने की तरह शेषनाग-नामक सर्प के ऊपर टिकी हुई है’ ।


इसी विषय में श्रीरामचरित्रमानस के बालकांड-दोहा-72 के दूसरे चौपाई में आया है कि :- …
तपबल संभु करहिं संघारा । तपबल सेषु धरइ महिभारा ॥ भावार्थ:- शेषजी तप के बल से ही पृथ्वी का भार धारण करते हैं॥2॥…….. ….. .


इस विषय का वैज्ञानिक तर्क निम्न प्रकार से है । हमारी पृथ्वी, 8 ग्रहों और सूर्य सहित सौरमंडल में स्थित है । यह सौरमंडल, अनेकों तारों सहित आकाशगंगा नामक मंदाकिनी में स्थित है । इस आकाशगंगा नामक मदाकिनी का आकार सर्पिलाकार (सर्प+अकार) है । शेषनाग वास्तव में तों एक सर्प ही तो है । हम सभी इस मंदाकिनी के शिकारी भुजा अर्थात मुख (ओरायन-सिग्रस) के पास स्थित है ।


हमारे सत्य-सनातन-धर्म के ॠषि-मुनी, आज के वैज्ञानिकों से अधिक ज्ञाता और योग्य थे । वे अपनी शक्ति से इस पृथ्वी लोक को छोड़कर अन्य लोकों में (एलियन-लोक) में विचरण करने में सक्षम थे । वे इस मंदाकिनी से बाहर जाकर, अकाशगंगा और पृथ्वी के स्थिति और अकार को स्पस्ट रुप में देखने में पुर्णतः सक्षम थे । वह यह भी देख सकते थे कि सर्प के अकार रुपी मंदाकिनी में, पृथ्वी सरसों के दाने की भाँति प्रतीत हो रही है ।


सौरमंडल के आकार औऱ मन्दाकिनी के आकार के संदर्भ में विज्ञान में आया है कि यदि सौरमण्डल को एक रुपया का सिक्का मान लिया जाय तो मन्दाकिनी का क्षेत्रफ़ल सम्पूर्ण भारत का 1.5 गुना होगा । इस अनुपात को शास्त्र भी मानता है ।


अकाशगंगा और पृथ्वी के इस अदभुत संरचना को असानी से समझाने के लिये, हमारे महर्षियों ने सर्प-माडल (शेषनाग-माडल) का नाम दे दिया था जैसे कि परमाणु-संरचना को समझाने के लिये जेजे टामसन ने तरबूज-माडल का नाम दे दिया था ।

Does the earth really rest on Sheshnag? What is its scientific secret?


Does the earth really rest on Sheshnag? No Sheshnag (serpent) is visible in the photos of the Earth taken from the Moon, Inner-stations and Satellites, then why is it said in the Puranas and texts that the Earth rests on Sheshnag?


This subject has been talked about in all three of Shri Ramcharitmanas, Reality-Gita and Bhagwat-Purana. According to the 29th verse of Chapter 10 of the Reality-Gita, it has been told in the Bhagavata-Purana that ‘the earth rests like a grain of mustard on a serpent named Sheshnag’.


In this subject it has come in the second chapter of Balkand-Doha-72 of Shri Ramcharitmanas that :- …
Tapabal sambhu karhin sanghara. Tapbal Seshu Dharai Mahibhara. Meaning:- Sheshji bears the weight of the earth only by the power of tenacity.


The scientific reasoning for this topic is as follows. Our Earth is located in the Solar System including 8 planets and the Sun. This solar system, with many stars, is located in a galaxy called a galaxy. The shape of this galaxy named Madakini is spiral (snake + shape). Sheshnag is actually a snake. All of us are situated near the hunter arm of this galaxy, that is, the mouth (Orion-Sigus).


The sages of our Satya-Sanatan-Dharma were more knowledgeable and capable than today's scientists. With his power, he was able to leave this earth and roam in other worlds (alien-lokas). He was able to go out of this galaxy and see clearly the position and size of the galaxy and the earth. He could also see that in the snake-shaped Mandakini, the earth looked like a mustard seed.


In the context of the size of the solar system and the size of the Mandakini, it has come in science that if the solar system is considered to be a one rupee coin, then the area of ​​the Mandakini will be 1.5 times that of the whole of India. Shastra also accepts this ratio.


To explain this amazing structure of galaxy and earth easily, our sages gave the name of snake-model (Sheshnag-model) like JJ Thomson gave the name of watermelon-model to explain atomic structure. .

महाभारत काल ,चीन,यूरोप

पूरी पोस्ट गम्भीरता से पढ़े ,चीन की सभ्यता 5000 साल पुरानी मानी जाती है, लगभग महाभारत काल का समय, तो चीन का उल्लेख महाभारत में क्यों नहीं है?
महाभारत काल में भारतीयों का विदेशों से संपर्क, प्रमाण जानकर चौंक जाएंगे


युद्ध तिथि : महाभारत का युद्ध और महाभारत ग्रंथ की रचना का काल अलग अलग रहा है। इससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न होने की जरूरत नहीं। यह सभी और से स्थापित सत्य है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग में लगभग 3112 ईसा पूर्व को हुआ हुआ। भारतीय खगोल वैज्ञानिक आर्यभट्ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ईसा पूर्व में हुआ और कलियुग का आरम्भ कृष्ण के निधन के 35 वर्ष पश्चात हुआ। महाभारत काल वह काल है जब सिंधुघाटी की सभ्यता अपने चरम पर थी।
विद्वानों का मानना है कि महाभारत में वर्णित सूर्य और चंद्रग्रहण के अध्ययन से पता चलता है कि युद्ध 31वीं सदी ईसा पूर्व हुआ था लेकिन ग्रंथ का रचना काल भिन्न भिन्न काल में गढ़ा गया। प्रारंभ में इसमें 60 हजार श्लोक थे जो बाद में अन्य स्रोतों के आधार पर बढ़ गए। इतिहासकार डी.एस त्रिवेदी ने विभिन्न ऐतिहासिक एवं ज्योतिष संबंधी आधारों पर बल देते हुए युद्ध का समय 3137 ईसा पूर्व निश्चित किया है। ताजा शोधानुसार ब्रिटेन में कार्यरत न्यूक्लियर मेडिसिन के फिजिशियन डॉ. मनीष पंडित ने महाभारत में वर्णित 150 खगोलीय घटनाओं के संदर्भ में कहा कि महाभारत का युद्ध 22 नवंबर 3067 ईसा पूर्व को हुआ था।…तो यह तो थी युद्ध तिथि। अब जानिए महाभारत काल में भारतीयों का विदेशियों से संपर्क।
महाभारत काल में अखंड भारत के मुख्यत: 16 महाजनपदों (कुरु, पंचाल, शूरसेन, वत्स, कोशल, मल्ल, काशी, अंग, मगध, वृज्जि, चे‍दि, मत्स्य, अश्मक, अवंति, गांधार और कंबोज) के अंतर्गत 200 से अधिक जनपद थे। दार्द, हूण, हुंजा, अम्बिस्ट आम्ब, पख्तू, कैकय, वाल्हीक बलख, अभिसार (राजौरी), कश्मीर, मद्र, यदु, तृसु, खांडव, सौवीर सौराष्ट्र, शल्य, यवन, किरात, निषाद, उशीनर, धनीप, कौशाम्बी, विदेही, अंग, प्राग्ज्योतिष (असम), घंग, मालव, कलिंग, कर्णाटक, पांडय, अनूप, विन्ध्य, मलय, द्रविड़, चोल, शिवि शिवस्थान-सीस्टान-सारा बलूच क्षेत्र, सिंध का निचला क्षेत्र दंडक महाराष्ट्र सुरभिपट्टन मैसूर, आंध्र, सिंहल, आभीर अहीर, तंवर, शिना, काक, पणि, चुलूक चालुक्य, सरोस्ट सरोटे, कक्कड़, खोखर, चिन्धा चिन्धड़, समेरा, कोकन, जांगल, शक, पुण्ड्र, ओड्र, क्षुद्रक, योधेय जोहिया, शूर, तक्षक व लोहड़ लगभग 200 जनपद से अधिक जनपदों का महाभारत में उल्लेख मिलता है।
महाभारत काल में म्लेच्छ और यवन को विदेशी माना जाता था। भारत में भी इनके कुछ क्षेत्र हो चले थे। हालांकि इन विदेशियों में भारत से बाहर जाकर बसे लोग ही अधिक थे। देखा जाए तो भारतीयों ने ही अरब और योरप के अधिकतर क्षेत्रों पर शासन करके अपने कुल, संस्कृति और धर्म को बढ़ाया था। उस काल में भारत दुनिया का सबसे आधुनिक देश था और सभी लोग यहां आकर बसने और व्यापार आदि करने के प्रति उत्सुक रहते थे। भारतीय लोगों ने भी दुनिया के कई हिस्सों में पहुंचकर वहां शासन की एक नए देश को गढ़ा है, इंडोनेशिया, सिंगापुर, मलेशिया, कंबोडिया, वियतनाम, थाईलैंड इसके बचे हुए उदाहरण है। भारत के ऐसे कई उपनिवेश थे जहां पर भारतीय धर्म और संस्कृति का प्रचलन था।
ऋषि गर्ग को यवनाचार्य कहते थे। यह भी कहा जाता है कि अर्जुन की आदिवासी पत्नी उलूपी स्वयं अमेरिका की थी। धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी कंदहार और पांडु की पत्नी माद्री ईरान के राजा सेल्यूकस (शल्य) की बहिन थी। ऐसे उल्लेख मिलता है कि एक बार मुनि वेद व्यास और उनके पुत्र शुकदेव आदि जो अमेरिका मेँ थे। शुक ने पिता से कोई प्रश्न पूछा। व्यास जी इस बारे मेँ चूंकि पहले बता चुके थे, अत उन्होंने उत्तर न देते हुए शुक को आदेश दिया कि शुक तुम मिथिला (नेपाल) जाओ और यही प्रश्न राजा जनक से पूछना।
तब शुक अमेरिका से नेपाल जाना पड़ा था। कहते हैं कि वे उस काल के हवाई जहाज से जिस मार्ग से निकले उसका विवरण एक सुन्दर श्लोक में है:- “मेरोहर्रेश्च द्वे वर्षे हेमवँते तत:। क्रमेणेव समागम्य भारतं वर्ष मासदत्।। सदृष्टवा विविधान देशान चीन हूण निषेवितान।
अर्थात शुकदेव अमेरिका से यूरोप (हरिवर्ष, हूण, होकर चीन और फिर मिथिला पहुंचे। पुराणों हरि बंदर को कहा है। वर्ष माने देश। बंदर लाल मुंह वाले होते हैं। यूरोपवासी के मुंह लाल होते हैं। अत:हरिवर्ष को यूरोप कहा है। हूणदेश हंगरी है यह शुकदेव के हवाई जहाज का मार्ग था।…अमेरिकन महाद्वीप के बोलीविया (वर्तमान में पेरू और चिली) में हिन्दुओं ने प्राचीनकाल में अपनी बस्तियां बनाईं और कृषि का भी विकास किया। यहां के प्राचीन मंदिरों के द्वार पर विरोचन, सूर्य द्वार, चन्द्र द्वार, नाग आदि सब कुछ हिन्दू धर्म समान हैं। जम्बू द्वीप के वर्ण में अमेरिका का उल्लेख भी मिलता है। पारसी, यजीदी, पैगन, सबाईन, मुशरिक, कुरैश आदि प्रचीन जाति को हिन्दू धर्म की प्राचीन शाखा माना जाता है।

ऋग्वेद में सात पहियों वाले हवाई जहाज का भी वर्णन है।- “सोमा पूषण रजसो विमानं सप्तचक्रम् रथम् विश्वार्भन्वम्।”… इसके अलावा ऋग्वेद संहिता में पनडुब्बी का उल्लेख भी मिलता है, “यास्ते पूषन्नावो अन्त:समुद्रे हिरण्मयी रन्तिरिक्षे चरन्ति। ताभिर्यासि दूतां सूर्यस्यकामेन कृतश्रव इच्छभान:”।
श्रीकृष्ण और अर्जुन अग्नि यान (अश्वतरी) से समुद्र द्वारा उद्धालक ऋषि को आर्यावर्त लाने के लिए पाताल गए। भीम, नकुल और सहदेव भी विदेश गए थे। अवसर था युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का। यह महान ऋषियोँ और राजाओँ को निमंत्रण देने गए। यह लोग चारों दिशाओं में गए। कृष्ण-अर्जुन का अग्नियान अति आधुनिक मोटर वोट थी। कहते हैं कि कृष्ण और बलराम एक बोट के सहारे ही नदी मार्ग से बहुत कम समय में मथुरा से द्वारिका में पहुंच जाते थे।
महाभारत में अर्जुन के उत्तर-कुरु तक जाने का उल्लेख है। कुरु वंश के लोगों की एक शाखा उत्तरी ध्रुव के एक क्षेत्र में रहती थी। उन्हें उत्तर कुरु इसलिए कहते हैं, क्योंकि वे हिमालय के उत्तर में रहते थे। महाभारत में उत्तर-कुरु की भौगोलिक स्थिति का जो उल्लेख मिलता है वह रूस और उत्तरी ध्रुव से मिलता-जुलता है। हिमालय के उत्तर में रशिया, तिब्बत, मंगोल, चीन, किर्गिस्तान, कजाकिस्तान आदि आते हैं। अर्जुन के बाद बाद सम्राट ललितादित्य मुक्तापिद और उनके पोते जयदीप के उत्तर कुरु को जीतने का उल्लेख मिलता है।
अर्जुन के अपने उत्तर के अभियान में राजा भगदत्त से हुए युद्ध के संदर्भ में कहा गया है कि चीनियों ने राजा भगदत्त की सहायता की थी। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ सम्पन्न के दौरान चीनी लोग भी उन्हें भेंट देने आए थे।
महाभारत में यवनों का अनेका बार उल्लेख हुआ है। संकेत मिलता है कि यवन भारत की पश्चिमी सीमा के अलाव मथुरा के आसपास रहते थे। यवनों ने पुष्यमित्र शुंग के शासन काल में भयंकर आक्रमण किया था। कौरव पांडवों के युद्ध के समय यवनों का उल्लेख कृपाचार्य के सहायकों के रूप में किया गया है। महाभारत काल में यवन, म्लेच्छ और अन्य अनेकानेक अवर वर्ण भी क्षत्रियों के समकक्ष आदर पाते थे। महाभारत काल में विदेशी भाषा के प्रयोग के संकेत भी विद्यमान हैं। कहते हैं कि विदुर लाक्षागृह में होने वाली घटना का संकेत विदेशी भाषा में देते हैं।
जरासंध का मित्र कालयवन खुद यवन देश का था। कालयवन ऋषि शेशिरायण और अप्सारा रम्भा का पुत्र था। गर्ग गोत्र के ऋषि शेशिरायण त्रिगत राज्य के कुलगुरु थे। काल जंग नामक एक क्रूर राजा मलीच देश पर राज करता था। उसे कोई संतान न थी जिसके कारण वह परेशान रहता था। उसका मंत्री उसे आनंदगिरि पर्वत के बाबा के पास ले गया। बाबा ने उसे बताया की वह ऋषि शेशिरायण से उनका पुत्र मांग ले। ऋषि शेशिरायण ने बाबा के अनुग्रह पर पुत्र को काल जंग को दे दिया। इस प्रकार कालयवन यवन देश का राजा बना।
महाभारत में उल्लेख मिलता है कि नकुल में पश्चिम दिशा में जाकर हूणों को परास्त किया था। युद्धिष्ठिर द्वारा राजसूय यज्ञ सम्पन्न करने के बाद हूण उन्हें भेंट देने आए थे। उल्लेखनीय है कि हूणों ने सर्वप्रथम स्कन्दगुप्त के शासन काल (455 से 467 ईस्वी) में भारत के भितरी भाग पर आक्रमण करके शासन किया था। हूण भारत की पश्‍चिमी सीमा पर स्थित थे। इसी प्रकार महाभारत में सहदेव द्वारा दक्षिण भारत में सैन्य अभियान किए जाने के संदर्भ में उल्लेख मिलता है कि सहदेव के दूतों ने वहां स्थित यवनों के नगर को वश में कर लिया था।
प्राचीनकाल में भारत और रोम के मध्य घनिष्ठ व्यापारिक संबंध था। आरिकामेडु ने सन् 1945 में व्हीलर द्वारा कराए गए उत्खनन के फलस्वरूप रोमन बस्ती का अस्तित्व प्रकाश में आया है। महाभारत में दक्षिण भारत की यवन बस्ती से तात्पर्य आरिकामेडु से प्राप्त रोमन बस्ती ही रही होगी। हालांकि महाभारत में एक अन्य स्थान पर रोमनों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इस उल्लेख के अनुसार रोमनों द्वारा युद्धिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के समापन में दौरान भेंट देने की बात कही गई है।
महाभारत में शकों का उल्लेख भी मिलता है। शक और शाक्य में फर्क है। शाक्य जाति तो नेपाल और भारत में प्रचीनकाल से निवास करने वाली एक जाति है। नकुल में पश्‍चिम दिशा में जाकर शकों को पराजित किया था। शकों ने भी राजसूय यज्ञ समापन पर युधिष्ठिर को भेंट दिया था। महाभारत के शांतिपर्व में शकों का उल्लेख विदेशी जातियों के साथ किया गया है। नकुल ने ही अपने पश्‍चिमी अभियान में शक के अलावा पहृव को भी पराजित किया था। पहृव मूलत: पार्थिया के निवासी थे।
प्राचीन भारत में सिंधु नदी का बंदरगाह अरब और भारतीय संस्कृति का मिलन केंद्र था। यहां से जहाज द्वारा बहुत कम समय में इजिप्ट या सऊदी अरब पहुंचा जा सकता था। यदि सड़क मार्ग से जाना हो तो बलूचिस्तान से ईरान, ईरान से इराक, इराक से जॉर्डन और जॉर्डन से इसराइल होते हुई इजिप्ट पहुंचा जा सकता था। हालांकि इजिप्ट पहुंचने के लिए ईरान से सऊदी अरब और फिर इजिप्ट जाया जा सकता है, लेकिन इसमें समुद्र के दो छोटे-छोटे हिस्सों को पार करना होता है।
यहां का शहर इजिप्ट प्राचीन सभ्यताओं और अफ्रीका, अरब, रोमन आदि लोगों का मिलन स्थल है। यह प्राचीन विश्‍व का प्रमुख व्यापारिक और धार्मिक केंद्र था। मिस्र के भारत से गहरे संबंध रहे हैं। मान्यता है कि यादवों के गजपत, भूपद, अधिपद नाम के 3 भाई मिस्र में ही रहते थे। गजपद के अपने भाइयों से झगड़े के चलते उसने मिस्र छोड़कर अफगानिस्तान के पास एक गजपद नगर बसाया था। गजपद बहुत शक्तिशाली था।
ऋग्वेद के अनुसार वरुण देव सागर के सभी मार्गों के ज्ञाता हैं। ऋग्वेद में नौका द्वारा समुद्र पार करने के कई उल्लेख मिलते हैं। एक सौ नाविकों द्वारा बड़े जहाज को खेने का उल्लेख भी मिलता है। ऋग्वेद में सागर मार्ग से व्यापार के साथ-साथ भारत के दोनों महासागरों (पूर्वी तथा पश्चिमी) का उल्लेख है जिन्हें आज बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर कहा जाता है। अथर्ववेद में ऐसी नौकाओं का उल्लेख है जो सुरक्षित, विस्तारित तथा आरामदायक भी थीं।
ऋग्वेद में सरस्वती नदी को ‘हिरण्यवर्तनी’ (सु्वर्ण मार्ग) तथा सिन्धु नदी को ‘हिरण्यमयी’ (स्वर्णमयी) कहा गया है। सरस्वती क्षेत्र से सुवर्ण धातु निकाला जाता था और उस का निर्यात होता था। इसके अतिरिक्त अन्य वस्तुओं का निर्यात भी होता था। भारत के लोग समुद्र के मार्ग से मिस्र के साथ इराक के माध्यम से व्यापार करते थे। तीसरी शताब्दी में भारतीय मलय देशों (मलाया) तथा हिन्द चीनी देशों को घोड़ों का निर्यात भी समुद्री मार्ग से करते थे।
भारतवासी जहाजों पर चढ़कर जलयुद्ध करते थे, यह ज्ञात वैदिक साहित्य में तुग्र ऋषि के उपाख्यान से, रामायण में कैवर्तों की कथा से तथा लोकसाहित्य में रघु की दिग्विजय से स्पष्ट हो जाती है।भारत में सिंधु, गंगा, सरस्वती और ब्रह्मपुत्र ऐसी नदियां हैं जिस पर पौराणिक काल में नौका, जहाज आदि के चलने का उल्लेख मिलता है।
कुछ विद्वानों का मत है कि भारत और शत्तेल अरब की खाड़ी तथा फरात (Euphrates) नदी पर बसे प्राचीन खल्द (Chaldea) देश के बीच ईसा से 3,000 वर्ष पूर्व जहाजों से आवागमन होता था। भारत के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में जहाज और समुद्रयात्रा के अनेक उल्लेख है (ऋक् 1. 25. 7, 1. 48. 3, 1. 56. 2, 7. 88. 3-4 इत्यादि)। याज्ञवल्क्य सहिता, मार्कंडेय तथा अन्य पुराणों में भी अनेक स्थलों पर जहाजों तथा समुद्रयात्रा संबंधित कथाएं और वार्ताएं हैं। मनुसंहिता में जहाज के यात्रियों से संबंधित नियमों का वर्णन है। ईसा से 3,000 वर्ष पूर्व का समय महाभारत का काल था।
अमेरिका का उल्लेख पुराणों में पाताललोक, नागलोक आदि कहकर बताया गया है। इस अंबरिष भी कहते थे। जैसे मेक्सिको को मक्षिका कहा जाता था। कहते हैं कि मेक्सिको के लोग भारतीय वंश के हैं। वे भारतीयों जैसी रोटी थापते हैं, पान, चूना, तमाखू आदि चबाते हैं। नववधू को ससुराल भेजने समय उनकी प्रथाएं, दंतकथाएं, उपदेश आदि भारतीयों जैसे ही होते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के एक ओर मेक्सिको है तो दूसरी ओर कनाडा। अब इस कनाडा नाम के बारे में कहा जाता है कि यह भारतीय ऋषि कणाद के नाम पर रखा गया था। यह बात डेरोथी चपलीन नाम के एक लेखक ने अपने ग्रंथ में उद्धत की थी। कनाडा के उत्तर में अलास्का नाम का एक क्षेत्र है। पुराणों अनुसार कुबेर की नगरी अलकापुरी हिमालय के उत्तर में थी। यह अलास्का अलका से ही प्रेरित जान पड़ता है।
अमेरिका में शिव, गणेश, नरसिंह आदि देवताओं की मूर्तियां तथा शिलालेख आदि का पाया जाने इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि प्रचीनकाल में अमेरिका में भारतीय लोगों का निवास था। इसके बारे में विस्तार से वर्णन आपको भिक्षु चमनलाल द्वारा लिखित पुस्तक ‘हिन्दू अमेरिका’ में चित्रों सहित मिलेगा। दक्षिण अमेरिका में उरुग्वे करने एक क्षेत्र विशेष है जो विष्णु के एक नाम उरुगाव से प्रेरित है और इसी तरह ग्वाटेमाल को गौतमालय का अपभ्रंष माना जाता है। ब्यूनस आयरिश वास्तव में भुवनेश्वर से प्रेरित है। अर्जेंटीना को अर्जुनस्थान का अपभ्रंष माना जाता है।
पांडवों का स्थापति मय दानव था। विश्‍वकर्मा के साथ मिलकर इसने द्वारिका के निर्माण में सहयोग दिया था। इसी ने इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया था। कहते हैं कि अमेरिका के प्रचीन खंडहर उसी के द्वारा निर्मित हैं। यही माया सभ्यता का जनक माना जाता है। इस सभ्यता का प्राचीन ग्रंथ है पोपोल वूह (popol vuh)। पोपोल वूह में सृष्टि उत्पत्ति के पूर्व की जो स्थिति वर्णित है कुछ कुछ ऐसी ही वेदों भी उल्लेखित है। उसी पोपोल वूह ग्रन्थ में अरण्यवासी यानि असुरों से देवों के संघर्ष का वर्णन उसी प्रकार से मिलता है जैसे कि वेदों में मिलता है।

Mamta Yas

BHṚGUBINDU

BHṚGUBINDU

Bhṛgubindu, often designated as BB in a Kuṇḍalī is a sensitive point in a Kuṇḍalī. It is the midpoint between Rāhu and Candra. This concept is popularised by Pt. CS Patel, a stalwart in Jyotiṣaśāstra, and one who has contributed immensely to this subject through his painstaking research. He includes a chapter in Bhṛgubindu in chapter 14 of Nāḍī Astrology. He quotes Bhṛgu Nandi Nāḍī, stating “… the native suffers from Meha and phlegmatic troubles. He gets rid of troubles with the aid of a friend… This happens when Bṛhaspati transits the midpoint of Rāhu and Candra”. This, he states, is from page 363 of the cyclostyled translation of Bhṛgu Nandi Nāḍī by Pt. RG Rao.

The Bhṛgubindu is the midpoint between Rāhu and Candra (note, not between Candra and Rāhu, which is the opposite point of Bhṛgubindu). To determine this, we need to determine how far Candra is from Rāhu. Divide it by two and add it to Rāhu’s sphuṭa. For instance, if in a Kuṇḍalī Candra is 226.6336 and Rāhu is 231.9001. The distance of Candra from Rāhu is Candra – Rāhu = 226.6336 – 231.9001 = -5.2665. Since the result is negative, we must add 360 to it, which makes it 354.7335. The half of the distance is 177.36675, which when added to Rāhu becomes 177.36675 + 231.9001 = 409.26685. Since it is more than 360, we must subtract from it 360. This gives us 49.26685°, which is the Sphuṭa of Bhṛgubindu. Therefore, the formula is Rāhu + (Candra – Rāhu) / 2.

Some scholars advise finding the Bhṛgubindu by adding the Sphuṭa of Candra and Rāhu and dividing the sum by 2. For instance, in our example it is (226.6336 + 231.9001)/2 = 229.2669. This is certainly not the answer that we are looking for. Because, in this case, the Bhṛgubindu is (Candra + Rāhu)/2 + 180 = 229.2669 + 180 = 409.2669 = 49.2669. Therefore, there are two formulae for determining the Bhṛgubindu: (1) If Candra is ahead of Rāhu, i.e., within 180° of Rāhu, then the formula is (Candra + Rāhu)/2, and (2) If Candra is behind Rāhu, i.e., above 180° of Rāhu, then the formula is (Candra + Rāhu)/2 + 180.

What is the speed of Bhṛgubindu? According to Sūryasiddhānta, the number of revolutions of Candra in a Mahāyuga is 57753336 and that of Rāhu is -232238. Therefore, the relative speed of Candra from Rāhu is 57753336 + 232238 = 57985574. This means Candra makes 57985574 revolutions with regards to Rāhu in a Mahāyuga. The Bhṛgubindu does half of it, i.e., 28992787. However, there is a peculiar trait of this sensitive point, which is, it jumps 180° every time Candra crosses Rāhu. Nonetheless, in 1577917828 sidereal days, the revolution of Bhṛgubindu is 28992787, therefore, in one day it is, 28992787 / 1577917828 = 0.01837408 revolutions = 0.01837408 * 360 = 6.614669°. Therefore, the speed of Bhṛgubindu is 6.614669°/ day.

How this sensitive point is used? It can be used in two different ways, (1) Judging the Gocara of Grahas with regards to the Janma Bhṛgubindu, and (2) Judging the Bhṛgubindu’s Gocara on the Natal Grahas. Pt. Patel gives an example of the assassination of Smt. Indira Gandhi, whereby Janma Bhṛgubindu is 8r 23° 5’ and at the time of her assassination, Maṅgala was in 8r 24°50’, and Śani was having his 3rd dṛṣṭi on this sensitive point from 6r 24°5’.

Śrī RG Rao explains in the principle given from Bhṛgu Nandi Nāḍī that, the native can overcome his ailment when Bṛhaspati transits the Bhṛgubindu. This tells us that when the Bhṛgubindu is transited by Śubhagrahas, the native can overcome troubles. Besides the Gocara analysis, Bhṛgubindu should be assessed in the Janmakuṇḍalī as well as Daśā. In the Janmakuṇḍalī, the Bhṛgubindu’s Rāśi, Nakṣatra and Bhāva tell us about the area in life where the native is heavily involved, so much so that the Kārakatva of the Bhāva, Rāśi and Nakṣatra hardly leaves the person. This is because, Rāhu shows the unfinished Karma that we brought from the past life, and Candra denotes the mind that manifests the Karma. The native finds himself/ herself drawn towards the indications of the Bhāva too frequently.

Om Tat Sat

By varahmihir

निष्कलंक महादेव गुजरात का इतिहास

निष्कलंक महादेव गुजरात का इतिहास

गुजरात के भावनगर में कोलियाक तट से तीन किलोमीटर अंदर अरब सागर में स्थित हैं निष्कलंक महादेव। यहाँ पर अरब सागर की लहरें रोज़ शिवलिंगों का जलाभिषेक करती हैं। लोग पानी में पैदल चलकर ही इस मंदिर में दर्शन करने जाते हैं। इसके लिए उन्हें ज्वार के उतरने का इंतजार करना पड़ता है। भारी ज्वार के वक़्त केवल मंदिर की पताका और खम्भा ही नजर आता है। जिसे देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि पानी की नीचे समुद्र में महादेव का प्राचीन मंदिर स्थित हैं। यहाँ पर शिवजी के पाँच स्वयंभू शिवलिंग हैं।

इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। महाभारत के युद्ध में पांडवों ने कौरवों को मार कर युद्ध जीता। लेकिन युद्ध समाप्ति के पश्चात पांडव यह जानकर बड़े दुःखी हुए की उन्हें अपने ही सगे-संबंधियों की हत्या का पाप लगा है। इस पाप से छुटकारा पाने के लिए पांडव, भगवान श्रीकृष्ण से मिले। पाप से मुक्ति के लिए श्रीकृष्ण ने पांडवों को एक काला ध्वज और एक काली गाय दी और पांडवों को गाय का अनुसरण करने को कहा तथा बताया कि जब ध्वज और गाय दोनों का रंग काले से सफेद हो जाए तो समझ लेना कि तुम्हें पाप से मुक्ति मिल गई है। साथ ही श्रीकृष्ण ने उनसे यह भी कहा कि जिस जगह ऐसा हो वहाँ पर तुम सब भगवान शिव की तपस्या भी करना।

पाँचों भाई भगवान श्रीकृष्ण के कथनानुसार काली ध्वजा हाँथ में लिए काली गाय का अनुसरण करने लगे। इस क्रम में वो सब कई दिनों तक अलग – अलग जगह गए। लेकिन गाय और काली ध्वज का रंग नहीं बदला। लेकिन जब वो वर्तमान गुजरात में स्थित कोलियाक तट पर पहुंचे तो गाय और ध्वज का रंग सफेद हो गया। इससे पाँचों पांडव भाई बहुत खुश हुए और वहीं पर भगवान शिव का ध्यान करते हुए तपस्या करने लगे। भगवान भोलेनाथ उनकी तपस्या से खुश हुए और पाँचों भाईयों को लिंग रूप में अलग-अलग दर्शन दिए। वही पाँचों शिवलिंग अभी भी वहीं स्थित हैं। पाँचों शिवलिंग के सामने नंदी की प्रतिमा भी हैं। पांचों शिवलिंग एक वर्गाकार चबूतरे पर बने हुए हैं। तथा यह कोलियाक समुद्र तट से पूरब की ओर 3 किलोमीटर अंदर अरब सागर में स्थित है। इस चबूतरे पर एक छोटा सा पानी का तालाब भी है जिसे पांडव तालाब कहते हैं। श्रद्धालु पहले उसमें अपने हाँथ-पाँव धोते हैं और फिर शिवलिंगों की पूजा-अर्चना करते हैं।

चूँकि यहाँ पर आकर पांडवों को अपने भाइयों के कलंक से मुक्ति मिली थी। इसलिए इसे निष्कलंक महादेव कहते हैं। भादवे महीने की अमावस को यहाँ पर मेला लगता है, जिसे भाद्रवी कहा जाता है। प्रत्येक अमावस के दिन इस मंदिर में भक्तों की विशेष भीड़ रहती है। हालांकि पूर्णिमा और अमावस के दिन ज्वार अधिक सक्रिय रहता है, फिर भी श्रद्धालु उसके उतर जाने का इंतजार करते हैं और भगवान शिव का दर्शन करते हैं। लोगों की ऐसी मान्यता है कि यदि हम अपने किसी प्रियजन की चिता की राख शिवलिंग पर लगाकर जल प्रवाहित कर दें तो उसको मोक्ष मिल जाता है। मंदिर में भगवान शिव को राख, दूध, दही और नारियल चढ़ाए जाते हैं।

सालाना प्रमुख मेला भाद्रवी भावनगर के महाराजा के वंशजों के द्वारा मंदिर की पताका फहराने से शुरू होता है और फिर यही पताका मंदिर पर अगले एक साल तक फहराती है। और यह भी एक आश्चर्य की बात है कि साल भर एक ही पताका लगे रहने के बावजूद कभी भी इस पताका को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। यहाँ तक कि 2001 के विनाशकारी भूकंप में भी नहीं, जब यहाँ 50000 लोग मारे गए थे। यदि आपकी भोलेनाथ में आस्था है तो यह जगह आपके लिए जन्नत से कम नहीं है।

।।हर हर महादेव।।

By mamta yas

ब्रहदिश्वर मंदिर

इस अदभुत मंदिर में परछाई का रहस्य क्या है?

वेबसाईट पर तंजावूर के ब्रहदिश्वर मंदिर के बारे में पढ़ा है .
उसकी अदभुत निर्माण कला के सामने
पीसा की मीनार कहीं नहीं लगती.
इसी प्रकार दक्षिण में एक और मंदिर है,
जो अपनी वास्तु में एक अजब-गजब सा रहस्य छिपाए हुए है. मजे की बात यह है कि
800 वर्ष पूर्व बने इस मंदिर में
इतना उच्च कोटि का विज्ञान दिखाई देता है कि
कई भौतिक विज्ञानी और वास्तुविद अभी तक इसका रहस्य नहीं सुलझा पाए हैं.
हम बात कर रहे हैं

हैदराबाद से केवल सौ किमी दूर तेलंगाना के नलगोंडा जिले में स्थित
“छाया सोमेश्वर महादेव” मंदिर की.

इस की विशेषता यह है कि
दिन भर इस
मंदिर के शिवलिंग पर एक स्तम्भ की छाया पड़ती रहती है,
लेकिन वह छाया कैसे बनती है
यह आज तक कोई पता नहीं कर पाया.
जी हाँ!!
पढ़कर चौंक गए होंगे न आप,
लेकिन प्राचीन भारतीय वास्तुकला इतनी उन्नत थी कि
मंदिरों में ऐसे आश्चर्य भरे पड़े हैं.
उत्तर भारत के मंदिरों पर
इस्लामी आक्रमण का बहुत गहरा असर हुआ था,
और हजारों मंदिर तोड़े गए,
लेकिन दक्षिण में शिवाजी और अन्य तमिल-तेलुगु साम्राज्यों के कारण
इस्लामी आक्रान्ता नहीं पहुँच सके थे.
ज़ाहिर है कि
इसीलिए
दक्षिण में मुगलों की अधिक हैवानियत देखने को नहीं मिलती,
और इसीलिए दक्षिण के मंदिरों की वास्तुकला
आज भी अपने पुराने स्वरूप में मौजूद है.

छाया सोमेश्वर महादेव मंदिर को हाल ही में
तेलंगाना सरकार ने थोड़ा कायाकल्प किया है.
हालाँकि 800 वर्षों से अधिक पुराना होने के कारण मंदिर की दीवार पर कई दरारें हैं,
परन्तु फिर भी शिवलिंग पर पड़ने वाली रहस्यमयी छाया के आकर्षण में काफी पर्यटक इसको देखने आते हैं.
नालगोंडा के पनागल बस अड्डे से केवल दो किमी दूर यह मंदिर स्थित है.
वास्तुकला का आश्चर्य यह है कि
शिवलिंग पर जिस स्तम्भ की छाया पड़ती है,
वह स्तम्भ शिवलिंग और सूर्य के बीच में है ही नहीं.
मंदिर के गर्भगृह में कोई स्तम्भ है ही नहीं
जिसकी छाया शिवलिंग पर पड़े.
निश्चित रूप से मंदिर के बाहर जो स्तम्भ हैं,

उन्हीं का डिजाइन और स्थान कुछ ऐसा बनाया गया है कि
उन स्तंभों की आपसी छाया और सूर्य के कोण के अनुसार किसी स्तम्भ की परछाई शिवलिंग पर आती है.
यह रहस्य आज तक अनसुलझा ही है.

इस मंदिर का निर्माण चोल साम्राज्य के राजाओं ने बारहवीं शताब्दी में करवाया था.
इस मंदिर के सभी स्तंभों पर रामायण और महाभारत की कथाओं के चित्रों का अंकन किया गया है,
और इनमें से कोई एक रहस्यमयी स्तम्भ ऐसा है
जिसकी परछाई शिवलिंग पर पड़ती है.
कई वैज्ञानिकों ने इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास किया,
परन्तु वे केवल इस रहस्य की “थ्योरी” ही बता सके…
एकदम निश्चित रूप से आज तक कोई भी नहीं बता पाया कि आखिर वह कौन सा स्तम्भ है,
जिसकी परछाई शिवलिंग पर पड़ती है.
मंदिर सुबह छः बजे से बारह बजे तक और फिर दोपहर दो बजे से शाम छः बजे तक पर्यटकों के लिए खुला रहता है.
शिवभक्त मंदिर के प्रांगण में ध्यान वगैरह भी कर सकते हैं.
मंदिर में पण्डे कतई नहीं हैं,
केवल एक पुजारी है
जो सुबह-शाम पूजा करता है.
प्रकृति की गोद में स्थित इस मंदिर की छटा निराली ही है.
हमने देखा है कि
अधिकाँश मंदिरों में कई-कई सीढियाँ होती हैं,
परन्तु इस मंदिर की विशेषता यह भी है कि
इसमें केवल दो ही सीढियां हैं,
इसलिए वरिष्ठ नागरिक आराम से मंदिर के अन्दर पहुँच सकते हैं.
एक भौतिक विज्ञानी मनोहर शेषागिरी के अनुसार
मंदिर की दिशा पूर्व-पश्चिम है
और प्राचीन काल के कारीगरों ने
अपने वैज्ञानिक ज्ञान,
प्रकृति ज्ञान
तथा ज्यामिती
एवं सूर्य किरणों के परावृत्त होने के अदभुत ज्ञान का प्रदर्शन करते हुए
विभिन्न स्तंभों की स्थिति ऐसी रखी है,
जिसके कारण सूर्य किसी भी दिशा में हो,
मंदिर के शिवलिंग पर यह छाया पड़ती ही रहेगी.
लेकिन यह केवल थ्योरी है,
क्योंकि यदि आज की तारीख में
इसी मंदिर के पास ऐसा ही एक और मंदिर बनाने की चुनौती विदेशों से उच्च शिक्षा प्राप्त वास्तुविदों और इंजीनियरों को दे दी जाए,
तो वे पनाह माँगने लगेंगे.
ऐसा था हमारा भारतीय संस्कृति ज्ञान एवं उच्च कोटि का वास्तु-विज्ञान….
लेकिन फर्जी इतिहासकार आज भी
पीसा की मीनार
और ताजमहल को महिमामंडित करने के पीछे पड़े रहते हैं,
क्योंकि उन्हें भारत की मिट्टी से कोई लगाव है ही नहीं…….

Time and universe

“Know nature to be Maya and the Ruler of this Maya is the Lord Himself.” — Svetasvatara Upanishad.( 5000 BC )

God lives in Time and Space and moves with Time (both are eternal ). Heavens, Earth, day and night all serve Time and Time controls All . (Rig Veda 1-95-7).

‘That which is above the sky, that which is beneath the earth, that which is between these two, sky and earth that which the people call the past, the present and future, across space is that woven like warp and weft. – Brhadaranyaka Upanisad 5000 BC

The theory of Maya is one of the grand pillars upon which Vedanta rests.

The word origin of MAYA is derived from the Sanskrit roots MA ( not ) and YA ( that ).

The term MAYA is mentioned 72 times in Rigveda written down in Sanskrit in 5000 BC. Maya is mentioned 29 times in the Atharva Veda.

In Puranas and Vaishnava theology, Maya is described as one of the nine shaktis of the reclining Vishnu.

Below: This giant golden idol was found at Padmanabha Swamy temple Kerala from a locked and forgotten vault.. Brahma sitting on a tender swaying lotus on the navel shows precession of the planet.

Qutab Minar, a Hindu monument– is meant to be viewed from TOP–from a helicopter hovering above the pillar. Islamic lies wont work anymore !

http://ajitvadakayil.blogspot.in/2013/01/mansa-musa-king-of-mali-and-sri.html

http://ajitvadakayil.blogspot.in/2014/09/qutab-minar-was-dhruv-stambh-vishnu.html

MAYA is the veritable fabric of duality, and she performs this role at the behest of BrahmAn, the morphogenetic consciousness field.. The Supreme God is not bound by Maya just as magicians do not believe the illusions of their own magic.

Swami Vivekananda had told Nikola tesla that science and religion would meet and shake hands. He told Tesla that when science meets the consciousness field of Vedanta written 7000 years ago, the last frontier of science can be breached.

I think that time has come to understand this profound truth , but this is possible only after understanding the concept of MAYA in Hinduism.

The universe is filled with an incomprehensible amount of energy and substance , most of which is imperceptible to our physical senses. Radio waves, microwaves, infrared waves and microscopic particles are just a few examples of the infinite aspects of reality that elude the perception of our 5 senses.

Our 5 senses serve as a filter allowing us to experience only what is absolutely necessary for our physical existence. The 5 senses create the set for the stage we call our lives. The senses squelch out , let we will have a breakdown due to excess information.

Maya is invisible and beyond sense-perception. No human can see beyond the quantum screen .

Dvaita Hinduism tells us about the duality of nature and existence . These dual poles of Tamas –Rajas ( Yin Yang ) are connected via consciousness. It is about the quantum possibility wave vibration between two poles.

This guarantees change, growth and evolution Lessening of Yin- always results in increase of Yang and vice versa. One cannot exist without the other and they are mutually dependant . Balance can never be permanent— Yin and Yang continuously devour each other – and life flows on.

Lila is a way of describing all reality, including the cosmos, as the outcome of creative play by BrahmAn, the intelligent empty space in which the electrons in an atom whiz around.

ONLY BRAHMAN CAN CREATE PERPETUAL MOTION

http://ajitvadakayil.blogspot.in/2016/12/perpetual-motion-of-orbiting-electrons.html

Maya may be understood as the phenomenal universe of perceived duality ( Dvaita Vedanta ) , a lesser reality-lens superimposed on the unity of BrahmAn ( Advaita Vedanta )

Instanbul Shem RocketShip

#Instanbul #Shem #RocketShip: Is this a replica (see photo) of an #ancient single-seat rocket-ship? That’s what it looks like to Zecharia Sitchin, the leading authority and scholar on the Ancient Astronaut theory. Hidden away in the Istanbul Archaeology Museum in Turkey for a quarter of a century, Sitchin recently convinced the Museum that this artifact may indeed be ancient, and not the modern forgery they concluded it must be, simply because our current view of our ancient history doesn’t include rocket-ships. In his article in Atlantis Rising Magazine, Issue 15, Sitchin describes this object as,”a sculpted scale model of what, to modern eyes, looks like a cone-nosed rocket-ship… Powered by a cluster of four exhaust engines in the back surrounding a larger exhaust engine, the rocket-ship has room for a sole pilot—actually shown and included in the sculpture.” He describes the pilot as sitting with legs folded toward his chest, and wearing a one-piece “ribbed pressure suit” which becomes boots at the feet, and gloves at the hands, and points out that since the pilot’s head is missing, we cannot know whether the pilot wore a helmet, goggles, or other headgear. The artifact measures 23 centimeters long, 9.5 cm high, 8 cm wide, or 5.7 inches long, 3.8 inches high, and 3.5 inches wide.Sitchin spent years tracking down the artifact, until he located it at the #Archaeology #Museum in #Istanbul. It was excavated at #Toprakkale, a city known in ancient times as Tuspa, where the kingdom of Urartu reigned briefly over 2500 years ago. The museum curators decided this small artifact must be a forgery because it differs from the era’s style, and more importantly, it looks like a space capsule. They reasoned that since there were no space capsules in ancient times, it must be a modern fake, a practical joke, made of plaster of Paris and marble powder.from “De Goden en de Broederschappen” However, during Sitchin’s visit to Istanbul and the Museum in September 1997, he met with the Director, Dr. Pasinli, who took the artifact from a drawer, and allowed Sitchin to examine and photograph it. It looked to Sitchin to be carved from a porous, volcanic ash stone, the details very precise. Dr. Pasinli asked Sitchin what he thought. It is not out of context, Sitchin told the Director and his colleagues, when you view various artifacts that also seem to represent an ancient, space faring civilization. In Sitchin’s “The Lost Realms,” you’ll find illustrations of artifacts that may represent bearded spacemen and rocket-ships from Mexico, and from Lebanon, what might be a rocket-ship on a landing platform. He advised the Museum directors to allow viewers to decide for themselves what it is, while stating their own doubt about the artifact’s authenticity.This was enough to convince the curators to finally put the object on public display. Be sure to have a look for yourself next time you are in Istanbul.These beings who rode in these spaceships where either the good gods who were with #Yahweh the creator, or the #serpent men that #rebelled against Yahweh.

Vedic scriptures and culture.


Revealed Vedic scriptures is original knowledge of this world but at present many Indians by believing in Aryan invasion theory, false western theories like Darwin evolution theory which Darwin himself could not prove and still remains challenged, are giving discredit to Vedic Sages. After independence atleast Indians should start believing in their culture & civilization then what western scientists say.

Perhaps Indians are ignorant about Puranic Manvantar history which calculates cyclical time as per 4 Yugas, Mahayugas, Manvantar & Kalpa and which disapproves evolution of humans from Apes which is a western Adamic-Abrahamic concept.

Infact advanced Aryan culture originated from the start of Bramha’s day during स्वयंभुव मनु or मन्वंतर in Northern India known as the land of ब्रम्हावर्त were the Vedic literatures were revealed to the Vedic Sages as is mentioned in Puranic history which are real history and not mythology.

The present 7th विवस्वान मन्वंतर started 120 million years ago and we are living now in 28 महायुग 5110 कलियुग year.

Vedic Aryans were never naked. Man was naked is western concept due to Out of Africa theory or Adamic history popular in West Asia in the dominant religion of Christianity and Islam. Sanatan Vedic Dharma God revealed Vedas to Aryans and God himself descended in various Avatars to protect Dharma from miscreants in various Yugas. So God cannot be created by humans. 

Manu is progenitor of mankind which is संस्कृत word from which english word Man or civilized human or मनुष्य or मानव having evovled mind originated in India known as Caucasoid or Aryan race in India while the Black race people originated in Africa and Mongols originated in East Asia.

कहानी गिलगमेश और उसके अमृतवा की खोज की (एक प्राचीन इराकी महागाथा)

गिलगमेश या बिलगमेश की वीरगाथा एक मेसोपोटामिया या प्राचीन इराक की वीरगाथा है ।
इस महागाथा को पत्थर की ईट पर लिखा गया था और वे 12 थी पर 12वि सही हालत में न होने के कारन कहानी का अंत कोई नहीं जानता।पर हाल ही में 12वि ईट मिली है और आज में आपको पूरी कहानी बताऊंगा।
ये कहानी है सुमेर शहर के राजा गिलगमेश (3000 ईसापूर्व )की साहसी कारनामो पर है।2500 ईसापूर्व में सर्गोन के पुरे मेसोपोटामिया को जीतने के बाद ये वीरगाथा काफी महसूर हुई ।
सिकंदर के फारस आक्रमण से पहले ये महागाथा वहा बहोत लोकप्रिय थी ।

कहानी

गिलगमेश सुमेर का 5वा एवं शक्तिशाली राजा था,वह आधा मानव और आधा देवता था।वह काफी सुन्दर और हस्त पुस्त था ।कई शहरों को जीतने के बाद उसने उरुक को अपनी राजधानी बनायीं
।अपनी सफलता के कारन और उसके जीतना इस पृथ्वी पर कोई शक्तिशाली न पाकर उसे घमंड हो गया और एक क्रूर राजा बन गया।
वह मजदूरो से अधिक काम कराता और किसी भी सुन्दर कन्या चाहे वो उसके किसी सेनापति की क्यों न हो उसकी इज्ज़त लूट लेता। आखिर लोगो के देवताओ से प्राथना के बाद देवताओ ने उनकी पुकार सुन गिलगमेश का संहार करने एंकि-दू भेज जो की गिलगमेश जितना शक्तिशाली था और एक वन्मनव था। वह जंगले में पशुओ के साथ रहता ।
एक दिन एक शिकारी गिलगमेश के पास गया और उसे बताया की एक वन मानुष है जो उनके फंदों से जानवरों को छुड़ा देता है।
गिलगमेश ने एक सुन्दर देवदासी शमश को एंकि-दू को लुभाकर उरुक लाने भेजा क्युकी उस समय यह मन जाता था की शराब और काम वाष्ण आदमी को सब्याता की और ले जा सकती है।
शमश एंकि-दू के साथ रही और उसे सभ्यता की और ले गयी अब एंकि-दू एक वन मानव नहीं एक सभ्य मानव था ।
उरुक पहोच शमश और एंकि-दू ने शादी कर ली ।
कई दिन उरुक ने रहने के बाद एंकि-दू को गिलगमेश के बारे में पता चला और उसके कुकर्मो के बारे में भी।
एंकि-दू गिलगमेश को चुनौती देने गया।
दोनों के बिच घमासान मल्य युद्ध हुआ आखिर में गिलगमेश को उसकी बुरे का एहसास हुआ और दोनों एक दुसरे की शक्ति से प्रवाहित हो मित्र बनगए।

दोनों मित्रो ने कई शहर जीते आखिर में गिलगमेश को देवताओ के देवदार के बाग़ से देवदार चुराने की शुजी ताकि उसकी लकड़ी से उरुक शहर के दरवाजे बनाये जाये।
एंकि-दू ने पहले तो मन किया पर बाद में मान गया।
दोनों मित्र रस्ते की कई बढाओ को पार कर बाग़ तक पहुचे पर एक मुस्किल थी बाग़ की रक्षा हुबाबा करता था जिसे प्राचीन इराक के वायु देव ने बनाया था।
दोनों हुबाबा से लदे आखिर हुबाबा की मृत्यु हो गयी।
दोनों ने मिल देवदार के वृक्ष कटे और कुछ लकड़ियो की सहयता से एक नाव बनाई ताकि वृष उसमे लाद ले जा सके ।
शहर पहोच गिलगमेश ने उसके दरवाजे बनाये इस बिच हुबाबा की मृयु की खबर देवताओ तक पहोची जिसे सुन इश्तार यानि प्यार की देवी गिलगमेश पर मोहित हो गयी और गिलगमेश के पास अपने प्यार का इज़हार करने गयी।
गिलगमेश ने उसे साफ माना कर दिया।
गिलगमेश ने कहा :- हे प्रेम की देवी इश्तार में तुम्हारे पिछले प्रमो के बारे में जानता हु साथ ही ये भी की जैसे ही तुम्हारा उनसे मन उबा वैसे ही उन सब को मृत्यु देखनी पड़ी।
यह सुन इश्तार अपने पिता अनु के पास गयी और उन्हें स्वर्ग का सांड उरुक पर भेजने के लिए कहा ।
अपने पिता के मन करने के बाद इश्तार ने अनु को धमकी दी की यदि उसके कहा अनुसार नहीं हुआ तो वह नर्क का दरवाजा खोल देगी जिससे हजारो जीन्द मृत(Zombies) बहार आयेंगे और तबाही मचा देंगे ।
विवस हो अनु ने उरुक पर सांड भेज दिया। सांड अपने साथ 7 वर्ष का सुखा लाया ।गिलगमेश और एंकि-दू उस सांड से लड़ने गए ,कई दिन लड़ने के बाद आखिर एंकि-दू ने उस सांड के सिंग पकड़ लिए (निचे दी हुई तस्वीर देखे)और गिलगमेश ने उसे मार डाला ।
पर एंकिदू बहोत घायल हो गया बिलकुल अर्ध्मारा सा इसीलिए वह अब शैया पर ही पड़ा रहता।
एक दिन उसे सपना आया की देवताओ ने सभा बुलाई है और वे कह रहे है की हुबाबा और स्वर्ग के सांड को मरने की वजह से गिलगमेश और एंकि दू ने अपरद किया है इसीलिए इन्हें सजा मिलनी चाहिए मृत्युदंड की पर गिलगमेश सुधर गया है उसे मरना सही नहीं रहेगा पर एंकिदू को तो गिलगमेश का संहार करने के लिए भेज था और अब जोकि गिलगमेश सुधर गया तो एंकिदू का कुछ काम नहीं ,उसका जीवन का लक्ष्य समाप्त हो गया है इसीलिए उसे मृत्युदंड दी जाए।
एंकिदू सपना देख खुदको कोसने लगा ।
वह कहता :- “क्यों में इस निर्दयी मानव दुनिया में आया मैं जंगले में उन पशुओ के साथ ज्यादा सुखी था ।
ह वह नारी शमश क्यों में उसके जाल में फसा नहीं उसके जसल में मैं फास्ता और नाही में उरुक आता।
पर वाही थी जिसने मुझे रोटी दी खाने के लिए और दूध दिया उसने मेरा कितना क्या रखा ,भगवन उसे सदा सुखी रखे।
और गिलगमेश मेरा मित्र मेरा भाई ओह उसने क्या क्या नहीं किया मेरे लिए। मेरे मरन उपरांत वह मेरे लिए सबसे सुन्दर शैया लायेगा। स्वर्ग में मेरा कयल रखने के लिए कई दसिय और रखेल भेजेगा (उस वक़्त किसी आमिर या राजा के साथ जिन्दा रखैले और दास दासिया दफनाई जाती क्युकी यह मन जस्ता था मरने के बाद स्वर्ग में उनकी आवश्कता पड़ेगी )भगवन उसे सदैव जीत दिलाये ।”
यह बात एंकिदू ने गिलगमेश को बताई ,गिलगमेश दुखी हो गया पर वह एंकिदू को दिलासा देता रहा की वह जीवित रहेंगा ।
एंकिदू बहोत बीमार पद गया और आखिर मर गया ।गिलगमेश उसके पास ही था ,उसके मरने के बाद वह उसे जगाने की कोशिस करता पर एंकिदू कुछ नहीं कहता,गिलगमेश ने एंकिदू की दिल की धड़कन देखि वह रुक चुकी थी।
कई दिन तक गिलगमेश उसकी लाश के बाजू में रहा आखिर जब एंकिदू की लाश सड़ने लगी और कीड़े उसे खाने लगे तब गिलगमेश ने उसे सम्मान सहित दफना दिया।
गिलगमेश को दक्खा लगे अपने मित्र की मौत पर वह सोचने लगा जिस कदर उसका प्यारा मित्र मरा क्या उसी कदर वह मरेगा ,गिलगमेश जीना चाहता था वह अमर होना चाहता था तब उसे अपने बड़े बुडो की कहानी याद आई जिउसुद्दु की जो की मनु का इराकी स्वरुप था।उसे याद आया स्वयं देवताओ ने उसे अमरता का राज बताया था ,गिलगमेश उसी का वंशज था जिउसुद्दु उसकी सहयता जरुर करेगा।
गिलगमेश दुनिया के आखिरी छोर की खोज में निकला जहा जिउसुद्दु रहता था।
कई महीनो तक चलने के बाद उसकी हालत भी एंकिदू सी हो गयी,वह स्वयं एंकिदू नजात आता। उसके सारे वस्त्र निकल गए थे और सरीर पर बड़े बड़े बाल आ गए थे।
गिलगमेश दो पहाड़ी के यहाँ पहोचा। उन पहाडियों के बीचो बिच एक गुफा थी जो जिउसिद्दु के घर की ओर जाता पर दो विशाल बिछुओ ने उसका रास्ता रोक लिया ।दोनों से युद्ध कर उन दोनों को गिलगमेश ने मर डाला और गुफा में चला गया।
गुफा में काफी अँधेरा था,बहोत दूर चलने के बाद एक छोर उसे रोशनी नजर आई। उसरी तरफ पहोच उसे एक सुन्दर बाग़ नजर आया ,बाग़ के पास एक सागर था जिसका नाम मृत्यु सागर था और उसके बिच में एक द्वीप पर था जिउसुद्दु का घर।
वह सागर के किनारे पहोच तो एक जल देवी  आई और उसे रोकते हुए बोली की चले जाओ वापस। गिलगमेश ने उसे वह आने का कारन बताया जिसे सुन उस देवी ने उसे समझाया पर वह नहीं माना और आगे चल दिया।
उसे सागर के किनारे एक नाव मिली इसमें जिउसुद्दु माझी था,उस माझी ने भी गिलगमेश को लाख समझाया पर वो मन नहीं आखिर माझी उसे जिउसिद्दु के पास ले गया।
जिउसुद्दु ने गिलगमेश को देखा तो कुश हुआ पर उसकी इच्छा सुन चिंतित हो गया।
गिलगमेश की जिद के बाद जिउसुद्दु मान गया पर एक शर्त राखी ,गिलगमेश को पूरा एक सप्ता बिना सोये बिताना था पर आखिर कुछ दिन न सोने की की कोशिश करने के बाद वह सो गया।
दुखी हो गिलगमेश जाने लगा पर जिउसुद्दु की बीवी ने जिउसिद्दु को गिलगमेश की थोड़ी मदत करने के लिए कहा ।
जिउसुद्दु ने गिलगमेश को रोका और उसे पास ही के अमृत सागर में जसने को कहा जिसकी ताल हटी में एक औषदी थी जो उसको दुबारा जवान बना देगी (बबुली और दुसरे इराकी की शहरों की कहानी अनुसार यह औषदी अमृत्व प्रदान करती है .यह पूरी तरह से सुमेरी कहानी है जो सबसे पहली और असली है )
गिलगमेश अमृत सागर गया और औषद प्राप्त कर उरुक की और गया।
उरुक जाते समय एक तलब आया रस्ते पर तो गिलगमेश उसमे नहाने के लिए गया।
पास ही एक सर्प था जो औषदी की गंद से मोहित हो गया और उसे खा गया। अब सर्प जवान और पहले से अधिक शक्तिशाली बन गया ।उसकी पुराणी केचुली उतर गयी और एक हस्त पुस्त सर्प निकला जो चला गया।
नहाके आने के बाद गिलगमेश ने पाया की औषदी वहा नहीं है साथ ही वहा सर्प की केचुली थी ।वह समझ गया क्या हुआ ।
उसे बहोत दुःख हुआ की उसकी मेहनत एक रेंगने वाले जीव ने नस्त कर दी ।
गिलगमेश उरुक पंहुचा उदास मन से और वह शाशन करने लगा,उसे एहसास हुआ की जग जितना आसन है पर दिल जीतना कठिन इसीलिए अब वह लोगो की भलाई का काम करता ।
कई साल बिड गए और गिलगमेश वृद्ध हो गया उसे अब यह चिंता सताने लगी की उसकी मृत्यु के बाद उसके शारीर और आत्मा का क्या होगा ।
गिलगमेश ने देवता नर्गल को याद किया। नर्गल ने उसे सरीर सहित नर्क में पंहुचा दिया। वहा वह भाधाए पर कर और नर्क के रक्षक को हराकर आगे बड़ा और उसे आखिर एंकिदू की आत्मा मिली।
नर्गल ने भूमि में दरार करदी जिस कारन दोनों मित्र नर्क से बहार आ गए।
गिलगमेश ने एंकिदू से अपना सवाल किया ,जवाब में एंकिदू ने कहा की गिलगमेश इसे सुन नहीं पायेंग पर गिलगमेश की जिद के कारन उसने बताया की इस सरीर को कीड़े खा जाते है और आत्मा पृथ्वी पर भटक मल और सदा हुआ पानी पीती है यदि उसकी कब्र पर रोज आहार न रखा जाये।
कुछ साल पहले तक यही कहानी का अंत मन जाता था की गिलगमेश को मरने के बाद होने वाले कास्ट का पता चलता है पर अभी अभी एक और ईट मिली है जिसके अनुशार गिलगमेश की भी मौत होती है और उसकी आत्मा नर्क में जाती है पर अछे कर्मो के कारन उसे नर्क का न्यायधीश(जज) बना दिया जाता है ।
जय माँ भारती

Ancient India before buddism and Jainism

महाजनपद :गणराज्य और साम्राज्य

By Aman

भारत में सरस्वती  नदी के सूखने के उपरांत लोग भारत के अनेक इलाको में प्रवास कर बसने लगे।
इनमे अधिकतर गणराज्य या राज्य होता इसीलिए इन्हें महाजनपद कहा गया क्युकी ये लोगो के प्रवास का केंद्र था|
महाजनपद असल में एक बड़े शक्तिशाली राज्य को कहते जो कई छोटे जनपदों को मिलकर बना था ,इसीलिए कई राज्यों ने साम्राज्यवाद अपनाया ताकि खुदके राज्यों को जनपद से उठाकर महाजनपद बना सके और यह उपलब्धि के 16 राज्यों को मिली |
महाजनपद का उल्लेख पहली बार पाणिनि द्वारा किया गया था ,उस वक़्त 22 महाजनपद थे और बाकि के छोटे राज्यों को जनपद कहा गया है।
पर 700 ईसापूर्व के आते आते ये केवल 16 रह गए ।
बोध और जैन में महाजनपदो का उल्लेख है पर बहोत से नाम अलग है।
इनमे मगध,गंधर ,कोसल,काशी और अवन्ती का नाम ही पाया जाता है।
600 ईसापूर्व के आते आते बिम्बिसार और अजातशत्रु  आये जिन्होंने मगध का विस्तार किया और मगध सभी जनपदों में मुख्य बन गया।
इससे पहले यह जगह काशी को प्राप्त थी।
यह वह वक़्त था जब भारत में लहे का उपयोग अधिक बड़ा और संस्कृत में प्रगति हुई।
इसी दौर में वैदिक धर्म दक्मगाने लगा और बोध धर्म का उदय हुआ।
जैन धर्म भी लोगो में काफी प्रशिध हुआ ।
निचे 16 महाजनपदो की सूचि है 700 ईसापूर्व से 300 ईसापूर्व के बिच की।
1. कुरु – मेरठ और थानेश्वर;
राजधानी इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुर ।

2. पांचाल – बरेली, बदायूं
और फ़र्रुख़ाबाद;
राजधानी अहिच्छत्र तथा
कांपिल्य ।

3. शूरसेन – मथुरा के
आसपास का क्षेत्र;
राजधानी मथुरा।

4. वत्स – इलाहाबाद और
उसके आसपास; राजधानी
कौशांबी ।

5. कोशल – अवध; राजधानी
साकेत और श्रावस्ती ।

6. मल्ल – ज़िला देवरिया;
राजधानी कुशीनगर और
पावा (आधुनिक पडरौना)

7. काशी – वाराणसी;
राजधानी वाराणसी।

8. अंग – भागलपुर; राजधानी
चंपा ।

9. मगध – दक्षिण बिहार,
राजधानी राजगृह और पाटलिपुत्र (नन्द काल में )

10. वृज्जि –
ज़िला दरभंगा और
मुजफ्फरपुर; राजधानी
मिथिला, जनकपुरी और
वैशाली ।

11. चेदि – बुंदेलखंड;
राजधानी शुक्तिमती
(वर्तमान बांदा के पास)।

12. मत्स्य – जयपुर;
राजधानी विराट नगर ।

13. अश्मक – गोदावरी घाटी;
राजधानी पांडन्य ।

14. अवंति – मालवा;
राजधानी उज्जयिनी।

15. गांधार – पाकिस्तान
स्थित पश्चिमोत्तर
क्षेत्र; राजधानी
तक्षशिला ।

16. कंबोज – कदाचित
आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान ;
राजधानी राजापुर।

भारत के सोलह महाजनपद

700 ईसापूर्व के आते आते कई कबीलों की जनसँख्या बड़ी। ये कबीला कृषको के थे। इनमे पंचायत राज चलता था इसीलिए जब ये राज्यों के तौर पर उभरे तो गन संघ या गणराज्य आया।
राज्य से उलट इसमें जनता का राज चलता ।
वैशाली गणराज्यो में मुख्य था।
यूनान से पहले और बेहतर लोकतंत्र भारत में था।
अब बात करते है गणराज्यो और राज्यों या साम्राज्यो की।

गणराज्य  


यूनानी लोकतंत्र या गणराज्य को प्रथम क्यों माना जाता है पता नहीं पर भारतीय गणराज्य यूनान से बेहतर थे।
यूनान में आप केवल राजा चुन सकते थे बस पर भारत में बहोत से कम जनता के इशारो पर होता। बाद में गणराज्य कमजोर पड गए और जनता राज चला गया।
गणराज्यो के प्रमुख को नायक या राजा ही कहा जाता।
इनका काम कर वसूलना था और जनता के लिए सड़क आदि बनवाना था।
बहुत से गणराज्यो में गणराज्य के प्रमुख केवल व्यापारी वर्ग के होते और केवल कर वसूलते।
वैशाली  और कलिंग को छोड़ बाकि गणराज्यो में केवल चुनिन्दा वर्ग के लोग ही संघ का हिस्सा बन सकते थे।
वैशाली  और कलिंग में चारो वर्ण को इज़ाज़त थी।
वैशाली  के संघ में 7707 नायक थे।
ये गणराज्य अधिकतर वैश्य वर्ण के लोगो के थे जो ब्राह्मण द्वारा थोपे गए राजा से मुक्ति और जनता का राज्य चाहते थे |
इनकी सभा बैठती थी और हर मसले पर चर्चा होती |
जो चुंगी या कर ये लेते |
बाद में इन्होने सेना की नियुक्ति शुरू कर दी |
वैशाली या वृज्जी गणसंघ 7 गणराज्य से बना था जिसमे से कुछ के नाम ही प्राप्त है |
इनमे से एक गणराज्य शक्य था जिसकी पूरी जनता ही सेना की तरह निपूर्ण थी |
गणराज्य अपने शिष्टाचार के लिए प्रशिध थे |
अधिकतर गणराज्य या गणसंघ बोद्ध धर्मी थे और वहा बोद्ध के नियम ही चलते |
वृज्जी गणसंघ में प्राणदंड की सजा किसी बड़े अपराध पर ही मिलती |यदि देखे तो वृज्जी के गणराज्यो को छोड़ अधिक गणराज्य में कुछ अलग जी नियम थे |
मालक ,शूद्रक और कलिंग में केवल एक ही व्यक्ति चुना जाता जो राजा कहलाता और राजा की तरह ही काम करता |
वृज्जी गणसंघ ,कलिंग ,मालक ,शूद्रक और अन्य कुछ गणराज्यो की नगर प्रणाली और नगर व्यवस्था बिलकुल सरस्वती सिन्धु सभ्यता जैसी थी जो इस बात का प्रमाण देता है की गणराज्य बसने वाले सिधु घटी के थे और आर्य थे नहीं विदेशी |

आप कुछ समानताये देख सकते है सिन्धु घाटी सभ्यता और महाजनपद के सिक्को में

सम्राट अजातशत्रु के काल में गणराज्यो का पतन शुरू हुआ |सम्राट अजातशत्रु ने 36 गणराज्यो को हराया |
मौर्य काल के आते आते के वल कुछ ही गणराज्य रह गए थे |गुप्त काल में वृज्जी के अंत के साथ भारत में गणराज्यो का अंत हुआ |महराज चन्द्रगुप्त ने वृज्जी की राजकुमारी कुमारदेवी से शादी की जिसके बाद वृज्जी एक प्रांत बनकर रह गया |वृज्जी के साथ रिश्ता काफी फायदे का पड़ा महाराज चन्द्रगुप्त क क्युकी वृज्जी के पास उस वक्त मगध का अधिक भाग था जो महाराज चन्द्रगुप्त को मिला |

साम्राज्य गणराज्य से उलट यहाँ महाराज की चलती ,साम्राज्यवादी लोग गणतांत्रिक राज्य वालो को घृणा की दृष्टी से देखते क्युकी उनके लिए गणराज्य के लोग सिर्फ लोभी होते साथ ही गणराज्यो में बोद्ध धर्म की ऐसी धूम मची की वे अधिक बोद्ध धर्म पलने लगे जिसके उपरांत हिन्दू धर्म वालो के लिए केवल साम्राज्य ही सहारा थे |
गणराज्यो में कला और विज्ञानं का उतना महत्व नहीं था जितना साम्राज्यों में थे इसीलिए जब भी भारत किसी साम्राज्य के अधीन रहता तभी कला और विज्ञान का विकास हुआ |
भारत में कई महान साम्राज्य जुए जैसे मौर्य साम्राज्य ,गुप्त साम्राज्य,शुंग साम्राज्य ,सातवाहन साम्राज्य ,विजयनगर साम्राज्य ,मराठा साम्राज्य  और कई अनेक साम्राज्य हुए |विदेशी साम्राज्यवाद से उलट न्हारत के साम्राज्यों ने नेतिकता  और धर्म का साम्राज्य खड़ा किया |
महाजनपदो कशी शुरुआत में सबसे शक्तिशाली था और कशी ने महाजनपदो में साम्राज्यवाद शुरू किया |
आखिरकार बिम्बिसार के काल में शक्ति मगध के हाथ आई ,बिम्बिसार के बाद उनके बेटे अजातशत्रु आये जिन्होंने 36 गणराज्य जीते \
मगध में कई वंश बदले और फिर आया नन्द वंश जिसके केवल दो ही राजाओ ने मगध की सीमा उत्तर में कश्मीर तक ,पूर्व में अरुणाचल प्रदेश तक ,पश्चिम में यमुना तक और दक्षिण में मध्यप्रदेश तक |

नन्द साम्राज्य
मौर्य साम्राज्य अशोक के शाशन में

नन्द वंश के बाद मौर्य वंश आया जिसने पुरे भरत को एक किया |चन्द्रगुप्त मौर्य पहले सम्राट थे मौर्य वंश के ,उन्होंने मगध की सीमाए अफगानिस्तान तक फैलाई ,उत्तर में आज का पूरा कश्मीर ,नेपाल ,तिब्बत के कुछ भाग थे ,दक्षिण कर्णाटक का मौर्य वंश का द्वाज लहराता था |
बिन्दुसार मौर्य  ने 16 छोटे राज्यों को जीता |बिन्दुसार के बाद उनका छोटा लड़का अशोक मौर्य सम्राट बना जिसने कलिंग जीत अखंड भारत पर राज किया |अशोक मौर्य अपनी शांतिप्रियता के लिए जाना जाता है साथ ही बोद्ध धर्म को बढावा देने की वजह से कई बोद्ध लोगो के लिए वह चहेता है |
अशोक मौर्य की मृत्यु के 50 वर्ष बाद ही मौर्य वंश समाप्त हुआ और भारत कई टुकडो में बत गया जिसे फिरसे गुप्तो ने जोड़ा |
मौर्य वंश के साथ ही महाजनपदो का युग खत्म हुआ ,मौर्य साम्राज्य के बाद सिधु नदी के किनारे कई विदेशी राज्यों ने हमला किया साथ ही भारत में कई छोटे छोटे राज्य बसे ,अब किसी को जनपद से महाजनपद नहीं बनना था क्युकी अब सबको साम्राज्य खड़ा करना था |