Jainism is branch of Hinduism

भगवान ऋषभदेव के 10 रहस्य, हर मानुषों को जानना जरू हैं।
भारतीय संविधान के अनुसार जैन और हिन्दू दो अलग-अलग धर्म हैं, लेकिन दोनों ही एक ही कुल और खानदान से जन्मे धर्म हैं। भगवान ऋषभदेव स्वायंभुव मनु से 5वीं पीढ़ी में इस क्रम में हुए- स्वायंभुव मनु, प्रियव्रत, अग्नीन्ध्र,नाभि और फिर ऋषभ। जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए हैं। 24 तीर्थंकरों में से पहले तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव थे। ऋषभदेव को हिन्दू शास्त्रों में वृषभदेव कहा गया है।जानिए उनके बारे में ऐसे 10 रहस्य जिसे हर हिन्दू को भी जानना जरूरी है।

  1. श्रीभगवान के 24 अवतारों का उल्लेख भागवत पुराणों में मिलता है। भगवान विष्णु ने ऋषभदेव के रूप में 8वां अवतार लिया था। ऋषभदेव महाराज नाभि और मेरुदेवी के पुत्र थे। दोनों द्वारा किए गए यज्ञ से प्रसन्न होकर श्रीभगवान ने महाराज नाभि को वरदान दिया कि मैं ही तुम्हारे यहां पुत्र रूप में जन्म लूंगा। यज्ञ में परम ऋषियों द्वारा प्रसन्न किए जाने पर, परीक्षित स्वयं श्रीभगवान ने महारानी मेरुदेवी के गर्भ में आए। उन्होंनेये पवित्र अवतार जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव कहलाए।
  2. भगवान शिव और ऋषभदेव की वेशभूषा और चरित्र में लगभग समानता है। दोनों ही प्रथम कहे गए हैं अर्थात आदिदेव। दोनों को ही नाथों का नाथ आदिनाथ कहा जाता है। दोनों ही जटाधारी और दिगंबर हैं। दोनों के लिए ‘हर’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। आचार्य जिनसेन ने ‘हर’ शब्द का प्रयोग ऋषभदेव के लिए किया है। दोनों ही कैलाशवासी हैं। ऋषभदेव ने कैलाश पर्वत पर ही तपस्या कर कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया था। दोनों के ही दो प्रमुख पुत्र थे। दोनों का ही संबंध नंदी बैल से है। ऋषभदेव का चरण चिन्ह बैल है। शिव, पार्वती के संग हैं तो ऋषभ भी पार्वत्य वृत्ती के हैं। दोनों ही मयूर पिच्छिकाधारी हैं। दोनों की मान्यताओं में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी और चतुर्दशी का महत्व है। शिव चंद्रांकित है तो ऋषभ भी चंद्र जैसे मुखमंडल से सुशोभित है।
  3. आर्य और द्रविड़ में किसी भी प्रकार का फर्क नहीं है, यह डीएनए और पुरातात्विक शोध से सिद्ध हो चुका है। सिंधु घाटी की मूर्तियों में बैल की आकृतियों वाली मूर्ति को भगवान ऋषभनाथ से जोड़कर इसलिए देखा जाता। मोहन जोदड़ो और हड़प्पा से प्राप्त मोहरों में जो मुद्रा अंकित है, वह मथुरा की ऋषभदेव की मूर्ति के समान है व मुद्रा के नीचे ऋषभदेव का सूचक बैल का चिह्न भी मिलता है। मुद्रा के चित्रण को चक्रवर्ती सम्राट भरत से जोड़कर देखा जाता है। इसमें दाईं ओर नग्न कायोत्सर्ग मुद्रा में भगवान ऋषभदेव हैं जिनके शिरोभाग पर एक त्रिशूल है, जो त्रिरत्नत्रय जीवन का प्रतीक है। निकट ही शीश झुकाए उनके ज्येष्ठ पुत्र चक्रवर्ती भरत हैं, जो उष्णीब धारण किए हुए राजसी ठाठ में हैं। भरत के पीछे एक बैल है, जो ऋषभनाथ का चिन्ह है। अधोभाग में 7 प्रधान अमात्य हैं। हालांकि हिन्दू मान्यता अनुसार इस मुद्रा में राजा दक्ष का सिर भगवान शंकर के सामने रखा है और उस सिर के पास वीरभद्र शीश झुकाए बैठे हैं। यह सती के यज्ञ में दाह होने के बाद का चित्रण है।
  4. अयोध्या के राजा नाभिराज के पुत्र ऋषभ अपने पिता की मृत्यु के बाद राजसिंहासन पर बैठे। युवा होने पर कच्छ और महाकच्‍छ की 2 बहनों यशस्वती (या नंदा) और सुनंदा से ऋषभनाथ का विवाह हुआ। नंदा ने भरत को जन्म दिया, जो आगे चलकर चक्रवर्ती सम्राट बना। उसी के नाम पर हमारे देश का नाम ‘भारत’ पड़ा। सुनंदा ने बाहुबली को जन्म दिया जिन्होंने घनघोर तप किया और अनेक सिद्धियां प्राप्त कीं। इस प्रकार आदिनाथ ऋषभनाथ 100 पुत्रों और ब्राह्मी तथा सुंदरी नामक 2 पुत्रियों के पिता बने।
  5. उन्होंने कृषि, शिल्प, असि (सैन्य शक्ति), मसि (परिश्रम), वाणिज्य और विद्या- इन 6 आजीविका के साधनों की विशेष रूप से व्यवस्था की तथा देश व नगरों एवं वर्ण व जातियों आदि का सुविभाजन किया। इनके 2 पुत्र भरत और बाहुबली तथा 2 पुत्रियां ब्राह्मी और सुंदरी थीं जिन्हें उन्होंने समस्त कलाएं व विद्याएं सिखाईं। इसी कुल में आगे चलकर इक्ष्वाकु हुए और इक्ष्वाकु के कुल में भगवान राम हुए। ऋषभदेव की मानव मनोविज्ञान में गहरी रुचि थी। उन्होंने शारीरिक और मानसिक क्षमताओं के साथ लोगों को श्रम करना सिखाया। इससे पूर्व लोग प्रकृति पर ही निर्भर थे। वृक्ष को ही अपने भोजन और अन्य सुविधाओं का साधन मानते थे और समूह में रहते थे। ऋषभदेव ने पहली दफा कृषि उपज को सिखाया। उन्होंने भाषा का सुव्यवस्थीकरण कर लिखने के उपकरण के साथ संख्याओं का आविष्कार किया। नगरों का निर्माण किया।
  6. उन्होंने बर्तन बनाना, स्थापत्य कला, शिल्प, संगीत, नृत्य और आत्मरक्षा के लिए शरीर को मजबूत करने के गुर सिखाए, साथ ही सामाजिक सुरक्षा और दंड संहिता की प्रणाली की स्थापना की। उन्होंने दान और सेवा का महत्व समझाया। जब तक राजा थे उन्होंने गरीब जनता, संन्यासियों और बीमार लोगों का ध्यान रखा। उन्होंने चिकित्सा की खोज में भी लोगों की मदद की। नई-नई विद्याओं को खोजने के प्रति लोगों को प्रोत्साहित किया। भगवान ऋषभदेव ने मानव समाज को सभ्य और संपन्न बनाने में जो योगदान दिया है, उसके महत्व को सभी धर्मों के लोगों को समझने की आवश्यकता है।
  7. एक दिन राजसभा में नीलांजना नाम की नर्तकी की नृत्य करते-करते ही मृत्यु हो गई। इस घटना से ऋषभदेव को संसार से वैराग्य हो गया और वे राज्य और समाज की नीति और नियम की शिक्षा देने के बाद राज्य का परित्याग कर तपस्या करने वन चले गए। उनके ज्येष्ठ पु‍त्र भरत राजा हुए और उन्होंने अपने दिग्विजय अभियान द्वारा सर्वप्रथम चक्रवर्ती पद प्राप्त किया। भरत के लघु भ्राता बाहुबली भी विरक्त होकर तपस्या में प्रवृत्त हो गए। राजा भरत के नाम पर ही संपूर्ण जम्बूद्वीप को भारतवर्ष कहा जाने लगा। अंतत: ऋषभदेव के बाद उनके पुत्र भरत ने जहां पिता द्वारा प्रदत्त राजनीति और समाज के विकास और व्यवस्थीकरण के लिए कार्य किया, वहीं उनके दूसरे पुत्र #भगवान #बाहुबली ने पिता की श्रमण परंपरा को विस्तार दिया।
  8. ऋग्वेद में #ऋषभदेव की चर्चा #वृषभनाथ और कहीं-कहीं वातरशना मुनि के नाम से की गई है। शिव महापुराण में उन्हें शिव के 28 योगावतारों में गिना गया है। अंतत: माना यह जाता है कि ऋषभनाथ से ही श्रमण परंपरा की व्यवस्थित शुरुआत हुई और इन्हीं से सिद्धों, नाथों तथा शैव परंपरा के अन्य मार्गों की शुरुआत भी मानी गई है। इसलिए ऋषभनाथ जितने जैनियों के लिए महत्वपूर्ण हैं, उतने ही हिन्दुओं के लिए भी परम आदरणीय इतिहास पुरुष रहे हैं। हिन्दू और जैन धर्म के इतिहास में यह एक मील का पत्थर है।
  9. ऋषभनाथ नग्न रहते थे। अपने कठोर तपश्चर्या द्वारा कैलाश पर्वत क्षेत्र में उन्हें माघ कृष्ण-14 को कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ तथा उन्होंने दक्षिण कर्नाटक तक नाना प्रदेशों में परिभ्रमण किया। वे कुटकाचल पर्वत के वन में नग्न रूप में विचरण करते थे। उन्होंने भ्रमण के दौरान लोगों को धर्म और नीति की शिक्षा दी। उन्होंने अपने जीवनकाल में 4,000 लोगों को दीक्षा दी थी। भिक्षा मांगकर खाने का प्रचलन उन्हीं से शुरू हुआ माना जाता है। इति।
  10. जैन मान्यता है कि पूर्णता प्राप्त करने से पूर्व तक तीर्थंकर मौन रहते हैं अत: आदिनाथ को 1 वर्ष तक भूखे रहना पड़ा। इसके बाद वे अपने पौत्र श्रेयांश के राज्य हस्तिनापुर पहुंचे। श्रेयांस ने उन्हें गन्ने का रस भेंट किया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। वह दिन आज भी ‘अक्षय तृतीया’ के नाम से प्रसिद्ध है। #हस्तिनापुर में आज भी जैन धर्मावलंबी इस दिन गन्ने का रस पीकर अपना उपवास तोड़ते हैं। इस प्रकार कठोर तप करके ऋषभनाथ को कैवल्य ज्ञान (भूत, भविष्य और वर्तमान का संपूर्ण ज्ञान) प्राप्त हुआ। वे जिनेन्द्र बन गए। अपनी आयु के 14 दिन शेष रहने पर भगवान ऋषभनाथ हिमालय पर्वत के #कैलाश शिखर पर समाधिलीन हो गए और वहीं माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन उन्होंने निर्वाण (#मोक्ष) प्राप्त किया।

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निष्कलंक महादेव गुजरात का इतिहास

निष्कलंक महादेव गुजरात का इतिहास

गुजरात के भावनगर में कोलियाक तट से तीन किलोमीटर अंदर अरब सागर में स्थित हैं निष्कलंक महादेव। यहाँ पर अरब सागर की लहरें रोज़ शिवलिंगों का जलाभिषेक करती हैं। लोग पानी में पैदल चलकर ही इस मंदिर में दर्शन करने जाते हैं। इसके लिए उन्हें ज्वार के उतरने का इंतजार करना पड़ता है। भारी ज्वार के वक़्त केवल मंदिर की पताका और खम्भा ही नजर आता है। जिसे देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि पानी की नीचे समुद्र में महादेव का प्राचीन मंदिर स्थित हैं। यहाँ पर शिवजी के पाँच स्वयंभू शिवलिंग हैं।

इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। महाभारत के युद्ध में पांडवों ने कौरवों को मार कर युद्ध जीता। लेकिन युद्ध समाप्ति के पश्चात पांडव यह जानकर बड़े दुःखी हुए की उन्हें अपने ही सगे-संबंधियों की हत्या का पाप लगा है। इस पाप से छुटकारा पाने के लिए पांडव, भगवान श्रीकृष्ण से मिले। पाप से मुक्ति के लिए श्रीकृष्ण ने पांडवों को एक काला ध्वज और एक काली गाय दी और पांडवों को गाय का अनुसरण करने को कहा तथा बताया कि जब ध्वज और गाय दोनों का रंग काले से सफेद हो जाए तो समझ लेना कि तुम्हें पाप से मुक्ति मिल गई है। साथ ही श्रीकृष्ण ने उनसे यह भी कहा कि जिस जगह ऐसा हो वहाँ पर तुम सब भगवान शिव की तपस्या भी करना।

पाँचों भाई भगवान श्रीकृष्ण के कथनानुसार काली ध्वजा हाँथ में लिए काली गाय का अनुसरण करने लगे। इस क्रम में वो सब कई दिनों तक अलग – अलग जगह गए। लेकिन गाय और काली ध्वज का रंग नहीं बदला। लेकिन जब वो वर्तमान गुजरात में स्थित कोलियाक तट पर पहुंचे तो गाय और ध्वज का रंग सफेद हो गया। इससे पाँचों पांडव भाई बहुत खुश हुए और वहीं पर भगवान शिव का ध्यान करते हुए तपस्या करने लगे। भगवान भोलेनाथ उनकी तपस्या से खुश हुए और पाँचों भाईयों को लिंग रूप में अलग-अलग दर्शन दिए। वही पाँचों शिवलिंग अभी भी वहीं स्थित हैं। पाँचों शिवलिंग के सामने नंदी की प्रतिमा भी हैं। पांचों शिवलिंग एक वर्गाकार चबूतरे पर बने हुए हैं। तथा यह कोलियाक समुद्र तट से पूरब की ओर 3 किलोमीटर अंदर अरब सागर में स्थित है। इस चबूतरे पर एक छोटा सा पानी का तालाब भी है जिसे पांडव तालाब कहते हैं। श्रद्धालु पहले उसमें अपने हाँथ-पाँव धोते हैं और फिर शिवलिंगों की पूजा-अर्चना करते हैं।

चूँकि यहाँ पर आकर पांडवों को अपने भाइयों के कलंक से मुक्ति मिली थी। इसलिए इसे निष्कलंक महादेव कहते हैं। भादवे महीने की अमावस को यहाँ पर मेला लगता है, जिसे भाद्रवी कहा जाता है। प्रत्येक अमावस के दिन इस मंदिर में भक्तों की विशेष भीड़ रहती है। हालांकि पूर्णिमा और अमावस के दिन ज्वार अधिक सक्रिय रहता है, फिर भी श्रद्धालु उसके उतर जाने का इंतजार करते हैं और भगवान शिव का दर्शन करते हैं। लोगों की ऐसी मान्यता है कि यदि हम अपने किसी प्रियजन की चिता की राख शिवलिंग पर लगाकर जल प्रवाहित कर दें तो उसको मोक्ष मिल जाता है। मंदिर में भगवान शिव को राख, दूध, दही और नारियल चढ़ाए जाते हैं।

सालाना प्रमुख मेला भाद्रवी भावनगर के महाराजा के वंशजों के द्वारा मंदिर की पताका फहराने से शुरू होता है और फिर यही पताका मंदिर पर अगले एक साल तक फहराती है। और यह भी एक आश्चर्य की बात है कि साल भर एक ही पताका लगे रहने के बावजूद कभी भी इस पताका को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। यहाँ तक कि 2001 के विनाशकारी भूकंप में भी नहीं, जब यहाँ 50000 लोग मारे गए थे। यदि आपकी भोलेनाथ में आस्था है तो यह जगह आपके लिए जन्नत से कम नहीं है।

।।हर हर महादेव।।

By mamta yas

Pushpadanta – The author of the Shiva Mahima Stotra

Pushpadanta – The author of the Shiva Mahima Stotra
Long ago, there lived a gandharva by name Pushpadanta. Gandharvas were powerful magical beings, who could move in air and could even turn invisible to humans. Pushpadanta was an ardent devotee of Lord Shiva and was a great scholar and a poet. Because of his singing skills, Pushpadanta was appointed as the divine musician in the court of Lord Indra, the King of the Devas.
As a devotee of Lord Shiva, Pushpadanta loved worshiping Lord Shiva with plenty of different flowers.
Once as Pushpadanta was traveling around the world, he arrived at the kingdom of King Chitraratha. Pushpadanta was struck with the beauty of the kingdom. Slowly as he watched the kingdom he was stunned, the kingdom was surrounded by the most beautiful gardens and the flowers there was lovely to look at. He went to the palace of Chitraratha and was amazed to find the flowers even more beautiful there. When Pushpadanta saw the garden, he was unable to stop himself. He plucked as many flowers as possible…Pushpadanta felt bad that he was stealing flowers, but he could not help himself when he saw the flowers.
King Chitraratha to whom the gardens belonged, was also a devotee of Lord Shiva. He had developed this garden to pluck the flowers and use them for worshiping Lord Shiva daily.
However that day when he came to the gardens to worship Lord Shiva, he stared blankly as he saw most of the flowers gone. King Chitraratha called his guards, ‘What…What happened to the flowers?’
The guards looked nervously at each other and then at the king, ‘Sir! We do not know…We did not take it…We were doing the rounds of the palace. When we came…’ The guard shook his head, ‘the flowers were missing, your majesty!’
King Chitraratha looked at the guards and realized that they were telling the truth. He frowned as he plucked the pitifully few flowers from the tree. He finished his prayers that day and the next day appointed more guards to guard his gardens…
However much to his surprise, he looked at the shame faced guards the next day and saw most of the flowers missing today too! King Chitraratha fumed. After his prayers, he thought for some time.
He looked at the gardens and saw around saw all the other trees. He angrily called his guards, ‘Guard! Get those leaves and bring them here…’ He said pointing at the bilpatra plants.
The guards gathered the leaves and brought them before the king. ‘Spread them around the trees having the flowers….This way…When anyone walks over them, the leaves will rustle…you live hear the noise and be able to catch the thief…’ The king barked.
The guards nodded and spread the leaves around the trees.
The next day, Pushpadanta came inside the garden by becoming invisible. As he was walking towards the trees, he unknowingly stepped on the bilpatra leaves….
Up in Kailash, Lord Shiva was disturbed from his meditation. The bilpatra leaves were used to worship Lord Shiva and they were his favourite leaves. Lord Shiva frowned as he realized that someone had stepped on the leaves…Lord Shiva closed his eyes and used the powers to find out who had stepped on the bilpatra leaves. He opened his eyes as he realized that it was Pushpadanta. If it was a human who had committed this error, I would have forgiven him…but a gandharva…they are supposed to beings from heavens….they are supposed to know all this…’ Lord Shiva was angry as he thought… That man does not deserve to be a gandharva…And he is stealing the flowers from another…He is doing all this because he is invisible…Fine! I will take away his powers of being invisible and his powers to fly…
Back on earth, Pushpadanta was going towards the trees, when the guards, who had the rustling of the leaves ran towards the sound to find a tall gandharva coming towards the trees and plucking the flowers without any fear! They attacked the gandharva.
Pushpadanta was so amazed that the humans could see him that he was not able to defend himself. The guards caught him and took him to their king. King Chitraratha put Pushpadanta in prison.
As Pushpadanta was in prison, Pushpadanta slowly realized why he had suddenly become visible…The bilpatra leaves…Pushpadanta knew that he was made Lord Shiva very angry….
Anxious to regain his powers, Pushpadanta composed a sloka in favour of Lord Shiva. The sloka was beautiful to listen to…When Lord Shiva heard the sloka he was so pleased and that readily forgave the gandharva. This sloka is called as the Mahimnastava. The sloka is full of beautiful thoughts and meanings.
After Lord Shiva forgave Pushpadanta, Pushpadanta got back his powers. Pushpadanta met the King Chitraratha and asked for the king’s forgiveness. He promised that he would never steal again. The king was also amazed that the sloka composed by Pushpadanta and readily forgave him.
However the story of Pushpadanta does not end there. After composing the sloka, Pushpadanta grew very proud…He thought that he had written a sloka which was admired even by Lord Shiva.
He felt proud and boasted to everyone about how great his slokas were….Lord Shiva heard about this and came and talked him. ‘Pushpadanta! Do you know my temples, always have a Nandi outside…Why don’t you just go and peak inside Nandi’s mouth?
Pushpadanta was wondering why the Lord was making such a weird request…He went and looked inside Nandi’s mouth. Pushpadanta was taken aback to find that the entire sloka that he had composed was engraved in tiny letters in the teeth inside Nandi’s mouth!
Flabbergasted he ran back to Lord Shiva. Lord Shiva smiled and explained to him, ‘You are not the author of anything, Pushpadanta…It is the Brahman, which flows through you….All of this was written long ago…You are an instrument of the sloka coming out…’
Pushpandanta realized that he had been wrong in being proud of his composition, when he could not call the sloka his own composition. Pushpadanta asked the forgiveness of Lord Shiva and went back home and wiser man!

From Hinduism forgotten facts. 

Arab before Muhammad’s terrorism.

इराक का एक पुस्तक है, जिसे इराकी सरकार ने खुद छपवाया था। इस किताब में 622 ई से पहले के अरब जगत का जिक्र है। आपको बता दें कि ईस्लाम धर्म की स्थापना इसी साल हुई थी। किताब में बताया गया है कि मक्का में पहले शिव जी का एक विशाल मंदिर था जिसके अंदर एक शिव लिंग थी जो आज भी मक्का के काबा में एक काले पत्थर के रूप में मौजूद है। पुस्तक में लिखा है कि मंदिर में कविता पाठ और भजन हुआ करता था।प्राचीन अरबी का व्य संग्रह गंथ ‘सेअरूल-ओकुल’के 257वें पृष्ठ पर मोहम्मद से 2300 वर्ष पूर्व एवं ईसा मसीह से 1800 वर्ष पूर्व पैदा हुए लबी-बिन-ए-अरव्तब-बिन-ए-तुरफा ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता में भारत भूमि एवं वेदों को जो सम्मान दिया है, वह इस प्रकार है-“अया मुबारेकल अरज मुशैये नोंहा मिनार हिंदे। व अरादकल्लाह मज्जोनज्जे जिकरतुन। 

1 वह लवज्जलीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जिकरा।वहाजेही योनज्जेलुर्ररसूल मिनल हिंदतुन।

2।यकूलूनल्लाहः या अहलल अरज आलमीन फुल्लहुम।फत्तेबेऊ जिकरतुल वेद हुक्कुन मालन योनज्वेलतुन।

3।वहोबा आलमुस्साम वल यजुरमिनल्लाहे तनजीलन।फऐ नोमा या अरवीयो मुत्तवअन योवसीरीयोनजातुन।

4।जइसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-खुबातुन।व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।

5।”अर्थात-(1) हे भारत की पुण्य भूमि (मिनार हिंदे) तू धन्य है, क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझ को चुना। 

(2) वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश, जो चार प्रकाश स्तम्भों के सदृश्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, यह भारतवर्ष (हिंद तुन) में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुआ।

(3) और परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे ज्ञान है, इनके अनुसार आचरण करो।

(4) वह ज्ञान के भण्डार साम और यजुर है, जो ईश्वर ने प्रदान किये। इस लिए, हे मेरे भाइयों! इनकोमानो, क्योंकि ये हमें मोक्ष का मार्ग बताते है।

(5) और दो उनमें से रिक्, अतर (ऋग्वेद, अथर्ववेद) जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते है, और जो इनकी शरण में आ गया, वह कभी अन्धकार को प्राप्त नहीं होता।इस्लाम मजहब के प्रवर्तक मोहम्मद स्वयं भी वैदिक परिवार में हिन्दू के रूप में जन्में थे, और जब उन्होंने अपने हिन्दू परिवार की परम्परा और वंश सेसंबंध तोड़ने और स्वयं को पैगम्बर घोषित करना निश्चित किया, तब संयुक्त हिन्दू परिवार छिन्न-भिन्न हो गया और काबा में स्थित महाकाय शिवलिंग (संगेअस्वद) के रक्षार्थ हुए युद्ध में पैगम्बर मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम को भी अपने प्राण गंवाने पड़े।उमर-बिन-ए-हश्शामका अरब में एवं केन्द्र काबा (मक्का) में इतना अधिक सम्मान होता था कि सम्पूर्ण अरबी समाज, जो कि भगवान शिव के भक्त थे एवं वेदों केउत्सुक गायक तथा हिन्दू देवी-देवताओं के अनन्य उपासक थे, उन्हें अबुल हाकम अर्थात ‘ज्ञान का पिता’ कहते थे। बाद में मोहम्मद के नये सम्प्रदाय ने उन्हें ईर्ष्यावश अबुलजिहाल ‘अज्ञान का पिता’ कह कर उनकी निन्दा की।जब मोहम्मद ने मक्का पर आक्रमण किया, उस समय वहाँबृहस्पति, मंगल, अश्विनी कुमार, गरूड़, नृसिंहकी मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थी। साथ ही एक मूर्ति वहाँविश्वविजेता महाराजा बलि की भी थी, और दानी होने की प्रसिद्धि से उसका एक हाथ सोने का बना था।‘Holul’ के नाम से अभिहित यह मूर्ति वहां इब्राहम और इस्माइल की मूर्त्तियों के बराबर रखी थी। मोहम्मद ने उन सब मूर्त्तियों को तोड़कर वहां बने कुएं में फेंक दिया, किन्तु तोड़े गये शिवलिंग का एक टुकडा आज भी काबा में सम्मान पूर्वक न केवल प्रतिष्ठित है, वरन् हज करने जाने वाले मुसलमान उस काले (अश्वेत) प्रस्तर खण्ड अर्थात ‘संगे अस्वद’ कोआदर मान देते हुए चूमते है।जबकि इस्लाम में मूर्ति पूजा या अल्लाह के अलावा किसी की भी स्तुति हराम हैप्राचीन अरबों ने सिन्ध को सिन्ध ही कहा तथा भारत वर्ष के अन्य प्रदेशों को हिन्द निश्चित किया। सिन्ध से हिन्द होने की बात बहुत ही अवैज्ञानिक है। इस्लाम मत के प्रवर्तक मोहम्मद के पैदा होने से 2300 वर्ष पूर्व यानि लगभग 1800 ईश्वी पूर्व भी अरब में हिंद एवं हिंदू शब्द का व्यवहार ज्यों कात्यों आज ही के अर्थ में प्रयुक्त होता था।अरब की प्राचीन समृद्ध संस्कृति वैदिक थी तथा उस समय ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, धर्म-संस्कृति आदि में भारत (हिंद) के साथ उसके प्रगाढ़ संबंध थे। हिंद नाम अरबों को इतना प्यारा लगा कि उन्होंने उस देश के नाम पर अपनी स्त्रियों एवं बच्चों के नाम भी हिंद पर रखे।अरबी काव्य संग्रह ग्रंथ ‘ से अरूल-ओकुल’ के 253वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम की कविता है जिसमें उन्होंने हिन्दे यौमनएवं गबुल हिन्दू का प्रयोग बड़े आदर से किया है। ‘उमर-बिन-ए-हश्शाम’ की कविता नई दिल्ली स्थित मन्दिर मार्ग परश्री लक्ष्मी नारायण मन्दिर (बिड़लामन्दिर)की वाटिका में यज्ञ शाला के लाल पत्थर के स्तम्भखम्बे) पर काली स्याही से लिखी हुई है, जो इस प्रकार है –” कफविनक जिकरा मिन उलुमिन तब असेक । कलुवन अमातातुल हवा व तजक्करू ।

1।न तज खेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा ।वलुकएने जातल्लाहे औम असेरू ।

2।व अहालोलहा अजहू अरानीमन महादेव ओ ।मनोजेल इलमुद्दीन मीनहुम व सयत्तरू ।

3।व सहबी वे याम फीम कामिल हिन्दे यौमन ।व यकुलून न लातहजन फइन्नक तवज्जरू ।

4।मअस्सयरे अरव्लाकन हसनन कुल्लहूम ।नजुमुन अजा अत सुम्मा गबुल हिन्दू ।

5।अर्थात् –(1) वह मनुष्य, जिसने सारा जीवन पाप व अधर्म में बिताया हो, काम, क्रोध में अपने यौवन को नष्ट किया हो। 

(2) यदि अन्त में उसको पश्चाताप हो, और भलाई की ओर लौटना चाहे, तो क्या उसका कल्याण हो सकता है ?

(3) एक बार भी सच्चे हृदय से वह महादेव जी की पूजा करे, तो धर्म-मार्ग में उच्च से उच्चपद को पा सकता है। 

(4) हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर केवल एक दिन भारत (हिंद) के निवास का दे दो, क्योंकि वहां पहुंचकर मनुष्य जीवन-मुक्त हो जाता है।

(5) वहां की यात्रा से सारे शुभ कर्मो की प्राप्ति होती है, और आदर्श गुरूजनों (गबुल हिन्दू) का सत्संग मिलता है।

Shiva Lingas in Cambodia

Thousands of Lingas and other Vedic deities carved into the river-bed of the Kbal Spean river in Cambodia.
कम्बोडिया की क्बाल स्पिएन नदी के तल में प्राचीन काल में उकेरे गये सैकड़ों शिवलिङ्ग तथा वैदिक देवी-देवताओं की प्रतिमायें॥

The “Indianizers” of Kambuja Desha (modern day Cambodia). Thousands of years ago these men were among the intrepid pioneers who took India’s culture to far away lands. We need to remember their names and be inspired by the great work they did, so that we can reawaken this spirit in our younger generation. These were the great souls who inspired the Vedic culture in ancient Cambodia, which eventually led to the construction of the largest Hindu temple complex in the world: The Angkor Vat temple which was dedicated to Lord Vishnu. This is also the largest religious structure in the world. Remnants of a glorious Hindu past, such as great temples dedicated to Lord Shiva and river-beds in which thousands of Shiva Lingas have been carved, are found all around Cambodia even today.
ये कुछ उन श्रेष्ठ भारतीय महामना धर्मप्रचारकों के नाम की सूची है, जिन्हें शायद हम आज भारत में भूल चुके हैं, लेकिन जिन्होंने प्राचीन काल में सैकड़ों मील दूर की यात्रा करके कम्बुज देश (आधुनिक कम्बोडिया) में वैदिक सनातन धर्म की स्थापना की थी, जिसके परिणाम स्वरूप आज भी हमें कम्बोडिया में जो वैदिक सनातन धर्म से जुड़े ध्वंसावशेष उपलब्ध होते हैं,वे वास्तव में आश्चर्य जनक हैं। कम्बोडिया का ९०० वर्ष प्राचीन विष्णु मन्दिर ‘अंकोर वट’ विश्व का सबसे विशाल हिन्दू मन्दिर ही नहीं, विश्व का सबसे विशाल धार्मिक स्थान है; अन्य कोई भी धर्म इससे विशाल धर्मस्थान न बना पाया। इसके साथ ही भगवान् सदा शिव आदि भारतीय विभिन्न देवी-देवताओं को समर्पित अनेकों विशाल मन्दिरों के ध्वंसावशेष आज भी कम्बोडिया में खड़े हैं। सबसे आश्चर्यजनक मुझे लगी क्बाल स्पिएन नदी, जिसके तल में पत्थरों पर हजारों शिवलिङ्ग तथा अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां प्राचीन काल में उकेरी गयी थीं। एक बार ध्यान दें इन महामना मनीषियों के नामों की ओर, शायद इनका शुभ संस्मरण ही हमारे अन्दर उस सोई हुई वैदिक आत्मा को जागृत कर दे, जिसके कारण ये मनीषी सैकड़ों मीलों की यात्रा करके इस वैदिक ज्योति के महान् ज्योतिवाहक बने॥

Shiva Linga In Indonesia

Natural Shiva Linga, Lingga Islands, Indonesia.
Natural Shiva Linga on top of Mount Daik in the Lingga Islands of Indonesia. Obviously, the Indonesian Lingga archipelago gets its name from this natural structure. The archipelago lies in the south of Singapore. It must be noted that Shaivism was the form of Hinduism which was most popular in Indonesia before the advent of Islam.
प्राकृतिक शिवलिङ्ग, लिङ्ग द्वीपसमूह, इण्डोनेशिया..
इण्डोनेशिया के लिंग द्वीपसमूह में विद्यमान डाईक पर्वत की चोटी पर दिख रहा प्राकृतिक शिव लिङ्ग। इसमें कोई संशय नहीं कि इण्डोनेशिया के लिंग द्वीप समूह का नामकरण प्राचीन काल में इसी पर्वत की चोटी पर दिख रहे प्राकृतिक शिवलिङ्ग के कारण ही किया गया होगा। यह द्वीप समूह सिंगापुर के दक्षिण में विद्यमान है। इसलाम के आगमन से पूर्व शैव सम्प्रदाय ही इण्डोनेशिया में सबसे अधिक फैला हुआ हिन्दू सम्प्रदाय था।

 

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