Guru Gorakhnath

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लोहड़ी का पर्व – राजपूत योद्धा दुल्ला भट्टी

क्या आप जानते हैं ?

लोहड़ी का पर्व एक राजपूत योद्धा दुल्ला भट्टी कि याद में पुरे पंजाब और उत्तर भारत में मनाया जाता है ,
लोहड़ी की शुरुआत के बारे में मान्यता है कि यह राजपूत शासक दुल्ला भट्टी द्वारा गरीब कन्याओं सुन्दरी और मुंदरी की शादी करवाने के कारण शुरू हुआ है. दरअसल दुल्ला भट्टी पंजाबी आन का प्रतीक है. पंजाब विदेशी आक्रमणों का सामना करने वाला पहला प्रान्त था ।ऐसे में विदेशी आक्रमणकारियों से यहाँ के लोगों का टकराव चलता था .

दुल्ला भट्टी का परिवार मुगलों का विरोधी था.वे मुगलों को लगान नहीं देते थे. मुगल बादशाह हुमायूं ने दुल्ला के दादा सांदल भट्टी और पिता का वध करवा दिया..

दुल्ला इसका बदला लेने के लिए मुगलों से संघर्ष करता रहा. मुगलों की नजर में वह डाकू था लेकिन वह गरीबों का हितेषी था. मुगल सरदार आम जनता पर अत्याचार करते थे और दुल्ला आम जनता को अत्याचार से बचाता था.
दुल्ला भट्टी मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उस समय पंजाब में स्थान स्थान पर हिन्दू लड़कियों को यौन गुलामी के लिए बल पूर्वक मुस्लिम अमीर लोगों को बेचा जाता था।

दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न सिर्फ मुक्त करवाया बल्कि उनकी शादी भी हिन्दू लडको से करवाई और उनकी शादी कि सभी व्यवस्था भी करवाई।

सुंदर दास नामक गरीब किसान भी मुगल सरदारों के अत्याचार से त्रस्त था. उसकी दो पुत्रियाँ थी सुन्दरी और मुंदरी. गाँव का नम्बरदार इन लडकियों पर आँख रखे हुए था और सुंदर दास को मजबूर कर रहा था कि वह इनकी शादी उसके साथ कर दे.

सुंदर दास बाह्मण ने अपनी समस्या दुल्ला भट्टी को बताई. दुल्ला भट्टी ने इन लडकियों को अपनी पुत्री मानते हुए नम्बरदार को गाँव में जाकर ललकारा. उसके खेत जला दिए और लडकियों की शादी वहीं कर दी।जहाँ सुंदर दास बाह्मण चाहता था. इसी के प्रतीक रुप में रात को आग जलाकर लोहड़ी मनाई जाती है.!!

दुल्ले ने खुद ही उन दोनों का कन्यादान किया। कहते हैं दुल्ले ने शगुन के रूप में उनको शक्कर दी थी। वैसे तो हिन्दु शादी मे 7 फेरे होते है पर उस वख्त जब सुन्दर मुन्दरी की चौथा फेरा हो रहा था तो मुगलो ने दूल्ले को गोली मरवा दी थी और लोगो ने इसी 4 फेरे वाली शादी को ही सम्पूर्ण मान लिया था, तभी से पँजाबी हिन्दु शादी मे 4 फेरे लेते है और बाकी भारत मे 7 फेरे ली जाती है ।इसी कथा की हमायत करता लोहड़ी का यह गीत है, जिसे लोहड़ी के दिन गाया जाता है :

सुंदर मुंदरिए – हो तेरा कौन विचारा-हो
दुल्ला भट्टी वाला-हो
दुल्ले ने धी ब्याही-हो
सेर शक्कर पाई-हो
कुडी दे बोझे पाई-हो
कुड़ी दा लाल पटाका-हो
कुड़ी दा शालू पाटा-हो
शालू कौन समेटे-हो
चाचा गाली देसे-हो
चाचे चूरी कुट्टी-हो
जिमींदारां लुट्टी-हो
जिमींदारा सदाए-हो
गिन-गिन पोले लाए-हो
इक पोला घिस गया जिमींदार वोट्टी लै के नस्स गया – हो!

दुल्ला भट्टी मुगलों कि धार्मिक नीतियों का घोर विरोधी था। वह सच्चे अर्थों में धर्मनिरपेक्ष था.उसके पूर्वज संदल बार रावलपिंडी के शासक थे जो अब पकिस्तान में स्थित हैं। वह सभी पंजाबियों का नायक था। आज भी पंजाब(पाकिस्तान)में बड़ी आबादी भाटी राजपूतों की है जो वहां के सबसे बड़े जमीदार हैं।

लोहड़ी दी लख लख बधाईया..

Hindus are enemies of themselves due to cast divide

तैमूरलंग का सामना

डॉविवेकआर्य

हिन्दू समाज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे जातिवाद से ऊपर उठ कर सोच ही नहीं सकते। यही पिछले 1200 वर्षों से हो रही उनकी हार का मुख्य कारण है। इतिहास में कुछ प्रेरणादायक घटनाएं मिलती है। जब जातिवाद से ऊपर उठकर हिन्दू समाज ने एकजुट होकर अक्रान्तायों का न केवल सामना किया अपितु अपने प्राणों की बाजी लगाकर उन्हें यमलोक भेज दिया। तैमूर लंग के नाम से सभी भारतीय परिचित है। तैमूर के अत्याचारों से हमारे देश की भूमि रक्तरंजित हो गई। उसके अत्याचारों की कोई सीमा नहीं थी।
तैमूर लंग ने मार्च सन् 1398 ई० में भारत पर 92000 घुड़सवारों की सेना से तूफानी आक्रमण कर दिया। तैमूर के सार्वजनिक कत्लेआम, लूट खसोट और सर्वनाशी अत्याचारों की सूचना मिलने पर संवत् 1455 (सन् 1398 ई०) कार्तिक बदी 5 को देवपाल राजा (जिसका जन्म निरपड़ा गांव जि० मेरठ में एक जाट घराने में हुआ था) की अध्यक्षता में हरयाणा सर्वखाप पंचायत का अधिवेशन जि० मेरठ के गाँव टीकरी, निरपड़ा, दोगट और दाहा के मध्य जंगलों में हुआ।
सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये – (1) सब गांवों को खाली कर दो। (2) बूढे पुरुष-स्त्रियों तथा बालकों को सुरक्षित स्थान पर रखो। (3) प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति सर्वखाप पंचायत की सेना में भर्ती हो जाये। (4) युवतियाँ भी पुरुषों की भांति शस्त्र उठायें। (5) दिल्ली से हरद्वार की ओर बढ़ती हुई तैमूर की सेना का छापामार युद्ध शैली से मुकाबला किया जाये तथा उनके पानी में विष मिला दो। (6) 500 घुड़सवार युवक तैमूर की सेना की गतिविधियों को देखें और पता लगाकर पंचायती सेना को सूचना देते रहें।
पंचायती सेना – पंचायती झण्डे के नीचे 80,000 मल्ल योद्धा सैनिक और 40,000 युवा महिलायें शस्त्र लेकर एकत्र हो गये। इन वीरांगनाओं ने युद्ध के अतिरिक्त खाद्य सामग्री का प्रबन्ध भी सम्भाला। दिल्ली के सौ-सौ कोस चारों ओर के क्षेत्र के वीर योद्धा देश रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने रणभूमि में आ गये। सारे क्षेत्र में युवा तथा युवतियां सशस्त्र हो गये। इस सेना को एकत्र करने में धर्मपालदेव जाट योद्धा जिसकी आयु 95 वर्ष की थी, ने बड़ा सहयोग दिया था। उसने घोड़े पर चढ़कर दिन रात दूर-दूर तक जाकर नर-नारियों को उत्साहित करके इस सेना को एकत्र किया। उसने तथा उसके भाई करणपाल ने इस सेना के लिए अन्न, धन तथा वस्त्र आदि का प्रबन्ध किया।
प्रधान सेनापति, उप-प्रधान सेनापति तथा सेनापतियों की नियुक्ति
सर्वखाप पंचायत के इस अधिवेशन में सर्वसम्मति से वीर योद्धा जोगराजसिंह गुर्जर को प्रधान सेनापति बनाया गया। यह खूबड़ परमार वंश का योद्धा था जो हरद्वार के पास एक गाँव कुंजा सुन्हटी का निवासी था। बाद में यह गाँव मुगलों ने उजाड़ दिया था। वीर जोगराजसिंह के वंशज उस गांव से भागकर लंढोरा (जिला सहारनपुर) में आकर आबाद हो गये जिन्होंने लंढोरा गुर्जर राज्य की स्थापना की। जोगराजसिंह बालब्रह्मचारी एवं विख्यात पहलवान था। उसका कद 7 फुट 9 इंच और वजन 8 मन था। उसकी दैनिक खुराक चार सेर अन्न, 5 सेर सब्जी-फल, एक सेर गऊ का घी और 20 सेर गऊ का दूध।
महिलाएं वीरांगनाओं की सेनापति चुनी गईं उनके नाम इस प्रकार हैं – (1) रामप्यारी गुर्जर युवति (2) हरदेई जाट युवति (3) देवीकौर राजपूत युवति (4) चन्द्रो ब्राह्मण युवति (5) रामदेई त्यागी युवति। इन सब ने देशरक्षा के लिए शत्रु से लड़कर प्राण देने की प्रतिज्ञा की।
उपप्रधान सेनापति – (1) धूला भंगी (बालमीकी) (2) हरबीर गुलिया जाट चुने गये। धूला भंगी जि० हिसार के हांसी गांव (हिसार के निकट) का निवासी था। यह महाबलवान्, निर्भय योद्धा, गोरीला (छापामार) युद्ध का महान् विजयी धाड़ी (बड़ा महान् डाकू) था जिसका वजन 53 धड़ी था। उपप्रधान सेनापति चुना जाने पर इसने भाषण दिया कि – “मैंने अपनी सारी आयु में अनेक धाड़े मारे हैं। आपके सम्मान देने से मेरा खूब उबल उठा है। मैं वीरों के सम्मुख प्रण करता हूं कि देश की रक्षा के लिए अपना खून बहा दूंगा तथा सर्वखाप के पवित्र झण्डे को नीचे नहीं होने दूंगा। मैंने अनेक युद्धों में भाग लिया है तथा इस युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान दे दूंगा।” यह कहकर उसने अपनी जांघ से खून निकालकर प्रधान सेनापति के चरणों में उसने खून के छींटे दिये। उसने म्यान से बाहर अपनी तलवार निकालकर कहा “यह शत्रु का खून पीयेगी और म्यान में नहीं जायेगी।” इस वीर योद्धा धूला के भाषण से पंचायती सेना दल में जोश एवं साहस की लहर दौड़ गई और सबने जोर-जोर से मातृभूमि के नारे लगाये।
दूसरा उपप्रधान सेनापति हरबीरसिंह जाट था जिसका गोत्र गुलिया था। यह हरयाणा के जि० रोहतक गांव बादली का रहने वाला था। इसकी आयु 22 वर्ष की थी और इसका वजन 56 धड़ी (7 मन) था। यह निडर एवं शक्तिशाली वीर योद्धा था।
सेनापतियों का निर्वाचन – उनके नाम इस प्रकार हैं – (1) गजेसिंह जाट गठवाला (2) तुहीराम राजपूत (3) मेदा रवा (4) सरजू ब्राह्मण (5) उमरा तगा (त्यागी) (6) दुर्जनपाल अहीर।
जो उपसेनापति चुने गये – (1) कुन्दन जाट (2) धारी गडरिया जो धाड़ी था (3) भौन्दू सैनी (4) हुल्ला नाई (5) भाना जुलाहा (हरिजन) (6) अमनसिंह पुंडीर राजपुत्र (7) नत्थू पार्डर राजपुत्र (😎 दुल्ला (धाड़ी) जाट जो हिसार, दादरी से मुलतान तक धाड़े मारता था। (9) मामचन्द गुर्जर (10) फलवा कहार।
सहायक सेनापति – भिन्न-भिन्न जातियों के 20 सहायक सेनापति चुने गये।
वीर कवि – प्रचण्ड विद्वान् चन्द्रदत्त भट्ट (भाट) को वीर कवि नियुक्त किया गया जिसने तैमूर के साथ युद्धों की घटनाओं का आंखों देखा इतिहास लिखा था।
प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर के ओजस्वी भाषण के कुछ अंश –
“वीरो! भगवान् कृष्ण ने गीता में अर्जुन को जो उपदेश दिया था उस पर अमल करो। हमारे लिए स्वर्ग (मोक्ष) का द्वार खुला है। ऋषि मुनि योग साधना से जो मोक्ष पद प्राप्त करते हैं, उसी पद को वीर योद्धा रणभूमि में बलिदान देकर प्राप्त कर लेता है। भारत माता की रक्षा हेतु तैयार हो जाओ। देश को बचाओ अथवा बलिदान हो जाओ, संसार तुम्हारा यशोगान करेगा। आपने मुझे नेता चुना है, प्राण रहते-रहते पग पीछे नहीं हटाऊंगा। पंचायत को प्रणाम करता हूँ तथा प्रतिज्ञा करता हूँ कि अन्तिम श्वास तक भारत भूमि की रक्षा करूंगा। हमारा देश तैमूर के आक्रमणों तथा अत्याचारों से तिलमिला उठा है। वीरो! उठो, अब देर मत करो। शत्रु सेना से युद्ध करके देश से बाहर निकाल दो।”
यह भाषण सुनकर वीरता की लहर दौड़ गई। 80,000 वीरों तथा 40,000 वीरांगनाओं ने अपनी तलवारों को चूमकर प्रण किया कि हे सेनापति! हम प्राण रहते-रहते आपकी आज्ञाओं का पालन करके देश रक्षा हेतु बलिदान हो जायेंगे।
मेरठ युद्ध – तैमूर ने अपनी बड़ी संख्यक एवं शक्तिशाली सेना, जिसके पास आधुनिक शस्त्र थे, के साथ दिल्ली से मेरठ की ओर कूच किया। इस क्षेत्र में तैमूरी सेना को पंचायती सेना ने दम नहीं लेने दिया। दिन भर युद्ध होते रहते थे। रात्रि को जहां तैमूरी सेना ठहरती थी वहीं पर पंचायती सेना धावा बोलकर उनको उखाड़ देती थी। वीर देवियां अपने सैनिकों को खाद्य सामग्री एवं युद्ध सामग्री बड़े उत्साह से स्थान-स्थान पर पहुंचाती थीं। शत्रु की रसद को ये वीरांगनाएं छापा मारकर लूटतीं थीं। आपसी मिलाप रखवाने तथा सूचना पहुंचाने के लिए 500 घुड़सवार अपने कर्त्तव्य का पालन करते थे। रसद न पहुंचने से तैमूरी सेना भूखी मरने लगी। उसके मार्ग में जो गांव आता उसी को नष्ट करती जाती थी। तंग आकर तैमूर हरद्वार की ओर बढ़ा।
हरद्वार युद्ध – मेरठ से आगे मुजफ्फरनगर तथा सहारनपुर तक पंचायती सेनाओं ने तैमूरी सेना से भयंकर युद्ध किए तथा इस क्षेत्र में तैमूरी सेना के पांव न जमने दिये। प्रधान एवं उपप्रधान और प्रत्येक सेनापति अपनी सेना का सुचारू रूप से संचालन करते रहे। हरद्वार से 5 कोस दक्षिण में तुगलुकपुर-पथरीगढ़ में तैमूरी सेना पहुंच गई। इस क्षेत्र में पंचायती सेना ने तैमूरी सेना के साथ तीन घमासान युद्ध किए।
उप-प्रधानसेनापति हरबीरसिंह गुलिया ने अपने पंचायती सेना के 25,000 वीर योद्धा सैनिकों के साथ तैमूर के घुड़सवारों के बड़े दल पर भयंकर धावा बोल दिया जहां पर तीरों* तथा भालों से घमासान युद्ध हुआ। इसी घुड़सवार सेना में तैमूर भी था। हरबीरसिंह गुलिया ने आगे बढ़कर शेर की तरह दहाड़ कर तैमूर की छाती में भाला मारा जिससे वह घोड़े से नीचे गिरने ही वाला था कि उसके एक सरदार खिज़र ने उसे सम्भालकर घोड़े से अलग कर लिया। (तैमूर इसी भाले के घाव से ही अपने देश समरकन्द में पहुंचकर मर गया)। वीर योद्धा हरबीरसिंह गुलिया पर शत्रु के 60 भाले तथा तलवारें एकदम टूट पड़ीं जिनकी मार से यह योद्धा अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ा।
(1) उसी समय प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर ने अपने 22000 मल्ल योद्धाओं के साथ शत्रु की सेना पर धावा बोलकर उनके 5000 घुड़सवारों को काट डाला। जोगराजसिंह ने स्वयं अपने हाथों से अचेत हरबीरसिंह को उठाकर यथास्थान पहुंचाया। परन्तु कुछ घण्टे बाद यह वीर योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गया। जोगराजसिंह को इस योद्धा की वीरगति से बड़ा धक्का लगा।
(2) हरद्वार के जंगलों में तैमूरी सेना के 2805 सैनिकों के रक्षादल पर भंगी कुल के उपप्रधान सेनापति धूला धाड़ी वीर योद्धा ने अपने 190 सैनिकों के साथ धावा बोल दिया। शत्रु के काफी सैनिकों को मारकर ये सभी 190 सैनिक एवं धूला धाड़ी अपने देश की रक्षा हेतु वीरगती को प्राप्त हो गये।
(3) तीसरे युद्ध में प्रधान सेनापति जोगराजसिंह ने अपने वीर योद्धाओं के साथ तैमूरी सेना पर भयंकर धावा करके उसे अम्बाला की ओर भागने पर मजबूर कर दिया। इस युद्ध में वीर योद्धा जोगराजसिंह को 45 घाव आये परन्तु वह वीर होश में रहा। पंचायती सेना के वीर सैनिकों ने तैमूर एवं उसके सैनिकों को हरद्वार के पवित्र गंगा घाट (हर की पौड़ी) तक नहीं जाने दिया। तैमूर हरद्वार से पहाड़ी क्षेत्र के रास्ते अम्बाला की ओर भागा। उस भागती हुई तैमूरी सेना का पंचायती वीर सैनिकों ने अम्बाला तक पीछा करके उसे अपने देश हरयाणा से बाहर खदेड़ दिया।
वीर सेनापति दुर्जनपाल अहीर मेरठ युद्ध में अपने 200 वीर सैनिकों के साथ दिल्ली दरवाज़े के निकट स्वर्ग लोक को प्राप्त हुये।
इन युद्धों में बीच-बीच में घायल होने एवं मरने वाले सेनापति बदलते रहे थे। कच्छवाहे गोत्र के एक वीर राजपूत ने उपप्रधान सेनापति का पद सम्भाला था। तंवर गोत्र के एक जाट योद्धा ने प्रधान सेनापति के पद को सम्भाला था। एक रवा तथा सैनी वीर ने सेनापति पद सम्भाले थे। इस युद्ध में केवल 5 सेनापति बचे थे तथा अन्य सब देशरक्षा के लिए वीरगति को प्राप्त हुये।
इन युद्धों में तैमूर के ढ़ाई लाख सैनिकों में से हमारे वीर योद्धाओं ने 1,60,000 को मौत के घाट उतार दिया था और तैमूर की आशाओं पर पानी फेर दिया।
हमारी पंचायती सेना के वीर एवं वीरांगनाएं 35,000, देश के लिये वीरगति को प्राप्त हुए थे।
प्रधान सेनापति की वीरगति – वीर योद्धा प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर युद्ध के पश्चात् ऋषिकेश के जंगल में स्वर्गवासी हुये थे।
(सन्दर्भ-जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-३७९-३८३ )
ध्यान दीजिये। एक सवर्ण सेना का उपसेनापति वाल्मीकि था। अहीर, गुर्जर से लेकर 36 बिरादरी उसके महत्वपूर्ण अंग थे। तैमूर को हराने वाली सेना को हराने वाली कौन थे? क्या वो जाट थे? क्या वो राजपूत थे? क्या वो अहीर थे? क्या वो गुर्जर थे? क्या वो बनिए थे? क्या वो भंगी या वाल्मीकि थे? क्या वो जातिवादी थे?
नहीं वो सबसे पहले देशभक्त थे। धर्मरक्षक थे। श्री राम और श्री कृष्ण की संतान थे? गौ, वेद , जनेऊ और यज्ञ के रक्षक थे।
आज भी हमारा देश उसी संकट में आ खड़ा हुआ है। आज भी विधर्मी हमारी जड़ों को काट रहे है। आज भी हमें फिर से जातिवाद से ऊपर उठ कर एकजुट होकर अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपनी मातृभूमि की रक्षा का व्रत लेना हैं। यह तभी सम्भव है जब हम अपनी संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर सोचना आरम्भ करेंगे। आप में से कौन कौन मेरे साथ है?

The biggest problem of Hindu society is that they cannot think above casteism. This is the main reason for their defeat for the last 1200 years. There are some inspiring incidents in history. When the Hindu society, rising above casteism, unitedly not only faced the revolutionaries but also sent them to Yamlok by putting their lives on the line. All Indians are familiar with the name of Taimur Lang. Due to the atrocities of Timur, the land of our country became bloody. His atrocities knew no bounds.
In March 1398, Timur Lang made a stormy attack on India with an army of 92000 cavalry. On receiving information about Timur’s public massacre, plundering and apocalyptic atrocities, in Samvat 1455 (A.D. 1398), the session of Haryana Sarvakhap Panchayat under the chairmanship of Devpal Raja (who was born in a Jat family in Nirapada village district, Meerut) on Kartik Badi 5 District Meerut’s village Tikri, Nirpada, Dogat and Daha in the middle of the forest.
The following resolutions were passed unanimously – (1) Evacuate all the villages. (2) Keep old men, women and children in a safe place. (3) Every healthy person should join the army of Sarvkhap Panchayat. (4) Women should also take up arms like men. (5) The army of Timur, moving from Delhi to Hardwar, should be fought with guerilla warfare style and mix poison in their water. (6) 500 cavalry youths watch the activities of Timur’s army and keep track of them and inform the Panchayati army.
Panchayati Sena – 80,000 Malla warrior soldiers and 40,000 young women gathered under the Panchayati flag carrying weapons. Apart from the war, these heroines also took care of the provision of food items. Hundreds of brave warriors of the area around Delhi came to the battlefield to sacrifice their lives for the defense of the country. All over the region, young men and women became armed. Dharampaldev Jat warrior, whose age was 95 years, had given great support in gathering this army. He gathered this army by motivating men and women by going far and wide day and night on a horse. He and his brother Karanpal made arrangements for food, money and clothes etc. for this army.
Appointment of Chief Commander, Vice Chief General and Generals
In this session of Sarvkhap Panchayat, the brave warrior Jograj Singh Gurjar was unanimously made the chief commander. This Khubd was a warrior of Parmar dynasty who was a resident of Kunja Sunhati, a village near Hardwar. Later this village was destroyed by the Mughals. Descendants of Veer Jograj Singh fled from that village and settled in Landora (district Saharanpur) who established Landora Gurjar state. Jograj Singh was a child brahmachari and a famous wrestler. His height was 7 feet 9 inches and weight was 8 mans. His daily dose is four servings of food grains, five servings of vegetables and fruits, one serving of cow’s ghee and 20 servings of cow’s milk.
Women were elected commanders of the heroines, their names are as follows – (1) Rampyari Gurjar girl (2) Hardei Jat girl (3) Devikaur Rajput girl (4) Chandro Brahmin girl (5) Ramdei Tyagi girl. All of them pledged to die fighting the enemy for the defense of the country.
Deputy Chief General – (1) Dhula Bhangi (Balmiki) (2) Harbir Gulia was elected Jat. Dhula Bhangi was a resident of Hansi village (near Hisar) of District Hisar. This great mighty, fearless warrior, the great victorious of the guerilla (guerrilla) war was the Dhaadi (the great great robber) whose weight was 53 Dhadis. On being elected as the Vice-President, he gave a speech that – “I have killed many strands in my entire life. I am very happy to pay your respects. I take a vow in front of the heroes that I will shed my blood for the defense of the country and will not let the holy flag of Sarvakhap go down. I have participated in many wars and will sacrifice my life in this war. Saying this, he took out blood from his thigh and sprinkled blood at the feet of the commander-in-chief. He took his sword out of the sheath and said, “It will drink the blood of the enemy and will not enter the sheath.” With the speech of this brave warrior Dhula, there was a wave of enthusiasm and courage in the Panchayati Sena Dal and everyone shouted slogans of motherland loudly.
The second vice-chief commander was Harbir Singh Jat, whose gotra was Gulia. He was a resident of district Rohtak village Badli in Haryana. Its age was 22 years and its weight was 56 dhadis (7 mind). He was a fearless and mighty brave warrior.
Election of generals – their names are as follows – (1) Gajesingh Jat Gathwala (2) Tuhiram Rajput (3) Meda Rawa (4) Sarju Brahmin (5) Umra Taga (Tyagi) (6) Durjanpal Ahir.
The vice general who was elected – (1) Kundan Jat (2) Dhari Gadaria who was Dhaadi (3) Bhondu Saini (4) Hulla Nai (5) Bhana Weaver (Harijan) (6) Aman Singh Pundir Rajputra (7) Nathu Pardar Rajputra (😎) Dulla (Dhaadi) Jat who used to run from Hisar, Dadri to Multan (9) Mamchand Gurjar (10) Falwa Kahar.
Assistant commander – 20 assistant generals of different castes were elected.
Veer Kavi – The great scholar Chandradutt Bhatt (Bhat) was appointed as a heroic poet who wrote the history of the events of the wars with Timur.
Excerpts from the brilliant speech of Chief General Jograj Singh Gurjar –
“Veer! Follow the instructions given by Lord Krishna to Arjuna in the Gita. The door of heaven (salvation) is open for us. The position of salvation which the sage Muni attains through yoga practice, is attained by a brave warrior by sacrificing himself in the battlefield. Get ready to protect Mother India. Save the country or be sacrificed, the world will praise you. you i

शौचालय का इतिहास

🍁🍁🍁🍁#शौचालयकाइतिहास🍁🍁🍁🍁 👉जिसे बाद मे #मुग़लोनेधर्मान्तरण और #अंग्रेज़ोंनेफूट डालने के लीये अपनाया l जो आज भी….#राजनीतीकागहममुद्दाहै l 🚩🌍🚩विश्व इतिहास में सबसे पहले वर्ष 2000 बी.सी. में भारत के पश्चिमोत्तर क्षेत्रा (इसमें वर्तमान पाकिस्तान भी शामिल है) में सिंधु घाटी सभ्यता में सीवर तंत्रा के अवशेष पाए गए। 👉इन शौचालयों में मल को पानी द्वारा बहा दिया जाने की व्यवस्था थी। इन्हें ढंकी हुई नालियों से जोड़ा हुआ था। इस कालखंड में विश्व में और कहीं भी ऐसे शौचालयों का कोई विवरण नहीं मिलता। 🍁ईसा पूर्व 1200 में मिश्र में शौचालय मिलते हैं, परंतु उनमें मिट्टी के पात्रों में शौच किया जाता था, जिसे बाद में दासों द्वारा खाली किया जाता था। ईस्वी संवत् पहली शताब्दी में रोमन सभ्यता में शौचालय मिलते हैं। इस काल में अवश्य शौचालय की अच्छी व्यवस्था पाई जाती है। 👉कहा जाता है कि….#ग्रीस में #भारत से जो ज्ञान पहुंचा था, उसकी ही व्यावहारिक परिणति #रोमन सभ्यता में पाई जाती है। प्रकारांतर से #रोममेंशौचालयोंकीव्यवस्थाभारतकीही_देन कही जा सकती है।

🍁रोमन सभ्यता के पतन के बाद लंबे समय तक यूरोप में शौचालयों की व्यवस्था का अभाव रहा। स्थिति इतनी विकट थी कि ग्यारहवीं शताब्दी तक लोग सड़कों पर मल फेंक दिया करते थे। कई स्थानों पर घरों में मल करने के बाद उसे खिड़की से बाहर फेंक दिया जाता था जिससे आने-जाने वालों को काफी असुविधा का सामना करना पड़ता था। इस काल में लोग कहीं भी मूत्रात्याग कर देते थे। सड़कों के किनारे से लेकर बेडरूम तक में। यूरोप में छठी शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक का काल अंधकार का काल था, जिसमें सर्वत्रा अज्ञान और अंधविश्वास का बोलबाला था। इस पूरे कालखंड में मनुष्य के मल के निस्तारण की कोई उपयुक्त व्यवस्था पूरे यूरोप में कहीं नहीं थी।

🍁प्रसिद्ध इतिहासकार #भगवान_सिंह बताते हैं….कि भारतीय सभ्यता में प्रारंभ से ही शौचालयों की बजाय खुले में शौच जाने को प्राथमिकता दी जाती रही है। यदि राजपरिवारों में शौचालय बनाए भी गए तो उसका एक खास प्रारूप विकसित किया गया था। इसमें जमीन में गहरा गड्ढा करके उसमें एक के ऊपर एक करके 8-10 मिट्टी के घड़ों की श्रृंखला बनाई जाती थी। प्रत्येक घड़े के तल में छेद होता था। इस प्रक्रिया में पानी और मिट्टी की अभिक्रिया द्वारा मल पूरी तरह मिट्टी में ही मिल जाता था। उसे बाहर फेंकने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।

🍁मुस्लिमों के आक्रमण के बाद अवश्य शौचालय बनाए जाने लगे। मुस्लिम बादशाहों ने अपनी बेगमों को परदे में रखने के लिए महलों के अंदर ही शौचालय बनावाए, परंतु उन्हें शौचालय बनाने की कला ज्ञात नहीं थी।
👉साथ ही वे #इस्लामस्वीकार करने वाले #हिंदू स्वाभिमानियों का मानभंग भी करना चाहते थे,,, इसलिए उन्होंने ऐसे शौचालय बनावाए, जिनमें मल के निस्तारण की कोई व्यवस्था नहीं होती थी। उन शौचालयों में से मल को मनुष्यों द्वारा ही उठाकर फेंकवाया जाता था। 👉इस घृणित कार्य में मुस्लिम बादशाहों ने उन्हीं स्वाभिमानी #हिंदू जाति के लोगों को लगाया जो किसी भी हालत में #इस्लाम स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। उन लोगों को #भंगी कहा गया जो कालांतर में #अछूत कहलाए।
👉मुस्लिम बादशाहों से यह गलत परंपरा उनके हिंदू दरबारियों में पहुंची और इस प्रकार हिंदू लोगों में भी घरों में शौचालय और उनका मल उठाने के लिए मनुष्यों को नियुक्त करने की गलत परंपरा शुरू हो गई।

🍁इस प्रकार शौचालयों की व्यवस्थित विज्ञान का ज्ञान रखने वाले भारत में मनुष्य द्वारा ही मनुष्य का मल उठाने की घृणित प्रथा की शुरूआत हुई। इसका अंत बाद में अंग्रेजों ने आकर किया परंतु उन्होंने इसे भारतीय समाज के दोष के रूप में देखा। उन्होंने इसके पीछे के इतिहास को जानने और समझने की कोशिश नहीं की। उलटे उन्होंने इसके बहाने समाज में फूट पैदा करने की कोशिशें की। वे काफी हद तक सफल भी रहे।

⭕️👉 #️Note:-आज भी दलित आंदोलन अछूत-समस्या के मूल को समझे बिना चलाया जा रहा है। दु:खद यह है कि, जिन कट्टरपंथी और साम्राज्यवादी मुसलमान शासकों ने इसकी शुरूआत की, आज का #दलित_आंदोलन उसी मानसिकता के मुस्लिम राजनीति के साथ मिलने की कोशिशों में भी जुटा हुआ है।

भगवान विष्णु के वाराह अवतार की कथा

भगवान विष्णु के वाराह अवतार की कथा

👉 भगवान विष्णु ने पृथ्वी को किस समुद्र से निकाला था, जबकि समुद्र तो पृथ्वी पर ही है?

🏵️ बचपन से मेरे मन मे भी ये सवाल था कि आखिर कैसे पृथ्वी को समुद्र में छिपा दिया जबकि समुद पृथ्वी पर ही है। हिरण्यकश्यप के भाई हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया था। फलस्वरूप भगवान बिष्णु ने सूकर का रूप धारण करके हिरण्याक्ष का वध किया और पृथ्वी को पुनः उसके कच्छ में स्थापित कर दिया।
🏵️ इस बात को आज के युग में एक दंतकथा के रूप में लिया जाता था। लोगों का ऐसा मानना था कि ये सरासर गलत और मनगढंत कहानी है। लेकिन नासा के एक खोज के अनुसार

🏵️खगोल विज्ञान की दो टीमों ने ब्रह्मांड में अब तक खोजे गए पानी के सबसे बड़े और सबसे दूर के जलाशय की खोज की है। उस जलाशय का पानी, हमारी पृथ्वी के समुद्र के 140 खरब गुना पानी के बराबर है। जो 12 बिलियन से अधिक प्रकाश-वर्ष दूर है। जाहिर सी बात है कि उस राक्षस ने पृथ्वी को इसी जलाशय में छुपाया होगा।

🏵️ इसे आप “भवसागर”🌊 भी कह सकते हैं। क्योंकि हिन्दू शास्त्र में भवसागर का वर्णन किया गया है।
जब मैंने ये खबर पढ़ा तो मेरा भी भ्रम दूर हो गया। और अंत मे मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहुँगा की जो इस ब्रह्मांड का रचयिता है, जिसके मर्जी से ब्रह्मांड चलता है। उसकी शक्तियों की थाह लगाना एक तुच्छ मानव के वश की बात नही है। मानव तो अपनी आंखों से उनके विराट स्वरूप को भी नही देख सकता।

🏵️ कुछ लोग जिन्हें ये लगता है कि हमारा देश और यहाँ की सभ्यता गवांर है। जिन्हें लगता है कि नासा ने कह दिया तो सही ही होगा। जिन्हें ये लगता है की भारत की सभ्यता भारत का धर्म और ज्ञान विज्ञान सबसे पीछे है। उनके लिये मैं बता दूं कि सभ्यता, ज्ञान, विज्ञान, धर्म, सम्मान भारत से ही शुरू हुआ है। अगर आपको इसपर भी सवाल करना है तो आप इतिहास खंगाल कर देखिये। जिन सभ्यताओं की मान कर आप अपने ही धर्म पर सवाल कर रहे हैं उनके देश मे जाकर देखिये। उनके भगवान तथा धर्म पर कोई सवाल नही करता बल्कि उन्होंने अपने धर्म का इतना प्रचार किया है कि मात्र 2000 साल में ही आज संसार मे सबसे ज्यादा ईसाई हैं। और आप जैसे बेवकूफों को धर्मपरिवर्तन कराते हैं। और आप बेवकूफ हैं जो खुद अपने ही देश और धर्म पर सवाल करते हैं। अगर उनकी तरह आपके भी पूर्वज बंदर थे तो आप का सवाल करना तथा ईश्वर पर तर्क करना सर्वदा उचित है।

🏵️ कौन होता है नासा जो हमे ये बताएगा कि आप सही हैं या गलत। हिन्दू धर्म कितना प्राचीन है इसका अनुमान भी नही लगा सकता नासा। जब इंग्लैंड में पहला स्कूल खुला था तब भारत में लाखों गुरुकुल थे। और लाखों साल पहले 4 वेद और 18 पुराण लिखे जा चुके थे। जब भारत मे प्राचीन राजप्रथा चल रही थी तब ये लोग कपड़े पहनना भी नही जानते थे। तुलसीदास जी ने तब सूर्य के दूरी के बारे में लिख दिया था जब दुनिया को दूरी के बारे में ज्ञान ही नही था। खगोलशास्त्र के सबसे बड़े वैज्ञानिक आर्यभट्ट जो भारत के थे। उन्होंने दुनिया को इस बात से अवगत कराया कि ब्रह्मांड क्या है, पृथ्वी का आकार और व्यास कितना है। और आज अगर कुछ मूर्ख विदेशी संस्कृति के आगे भारत को झूठा समझ रहे हैं तो उनसे बड़ा मूर्ख और द्रोही कोई नही हो सकता। ये अपडेट करना आवश्यक हो गया था। जिनके मन मे ईश्वर के प्रति शंका है।

🏵️ जो वेद और पुराणों को बस एक मनोरंजन का पुस्तक मानते हैं। उनके लिए शास्त्र कहता है:-

🏵️ भगवान विष्णु के प्रति प्रीति नहीं रखने वाला, अस्नेही या विरोधी। इसे ईश्‍वर विरोधी भी कहा गया है। ऐसे परमात्मा विरोधी व्यक्ति मृतक के समान है।

🏵️ ऐसे अज्ञानी लोग मानते हैं कि कोई परमतत्व है ही नहीं। जब परमतत्व है ही नहीं तो यह संसार स्वयं ही चलायमान है। हम ही हमारे भाग्य के निर्माता है। हम ही संचार चला रहे हैं। हम जो करते हैं, वही होता है। अविद्या से ग्रस्त ऐसे ईश्‍वर विरोधी लोग मृतक के समान है जो बगैर किसी आधार और तर्क के ईश्‍वर को नहीं मानते हैं। उन्होंने ईश्‍वर के नहीं होने के कई कुतर्क एकत्रित कर लिए हैं।

🏵️ दिन और रात का सही समय पर होना। सही समय पर सूर्य अस्त और उदय होना। पेड़ पौधे, अणु परमाणु तथा मनुष्य की मस्तिष्क की कार्यशैली का ठीक ढंग से चलना ये अनायास ही नही हो रहा है। जीव के अंदर चेतना कहाँ से आता है, हर प्राणी अपने जैसा ही बीज कैसे उत्पन्न करता है, शरीर की बनावट उसके जरूरत के अनुसार ही कैसे होता है? बिना किसी निराकार शक्ति के ये अपने आप होना असंभव है। और अगर अब भी ईश्वर और वेद पुराण के प्रति तर्क करना है तो उसके जीवन का कोई महत्व नही है।

🙏 आप सभी महानुभावों से एक निवेदन है की हमारी सनातन संस्कृति का जोर शोर से प्रचार प्रसार करें तथा इस तरह की संस्कृति से जुड़ी जानकारियों को अधिक से अधिक फैलाएं ताकि संस्कृति से दूर हो चुके लोग अपनी संस्कृति के बारे में अधिक से अधिक जान सकें🙏

🙏तथा यदि आपके पास हमारी संस्कृति से जुड़ी कोई जानकारी हो तो हम तक पहुंचाने की कृपा करें🙏

🚩जय सनातन संस्कृति 🚩
जय श्री हरि विष्णु
❤️जय श्री राम ❤️
🔥हर हर महादेव 🔥

राजा हर्षवर्धन बैंस थानेश्वर, हरयाणा

हर्षवर्धन बैंस थानेश्वर,हरयाणा

  • सर्व खाप हरियाणा के निर्मातसम्राट हर्षवर्धन बैंस , इन्होंने ही ‘सर्वखाप पंचायत’ की नींव सन् 643 में रखी। जिसके इतिहास का समुचित रिकार्ड 7वीं सदी से लेकर आज तक का, स्वर्गीय चै० कबूलसिंह गाँव शोरम जिला मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) के घर लगभग 40 किलो भार में जर-जर अवस्था में उपलब्ध है।
  • नोट जाटों में खाप शुरू से ही है 5 वी शताब्दी में भी यशोवर्धन विर्क के नेतृत्व में खाप पंचायत का बहुत बड़ा सम्मेलन हुआ था । यशोवर्धन विर्क के नेतृत्व में ही जाट देवताओं ने हूणों को कूटा था ॥
  • बौद्व धर्मी जाट सम्राट राजा हर्षवर्धन – कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी । सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहाँ हमारा ॥</code></pre></li>महाराजा कनिष्क (कुषाणवंशीय जाट) से लेकर (सन् 73 ई०) से महाराजा हर्षवर्धन) राजा थे। कभी किसी हिन्दू राजपूत राजा ने बौद्व धर्म नहीं अपनाया क्योंकि यह कभी संभव नहीं था, क्योंकि उस समय तक इस संघ की उत्पत्ति नहीं हुई थी। सभी मौर्य राजा जाट मोरवंशज थे। गुप्त राजाओं ने अपने समय को भारतीय इतिहास का ‘स्वर्णकाल’ बना दिया। गुप्त इनको इसलिए कहा गया कि इनके पूर्वज मिल्ट्री गवर्नर थे, जिन्हें गुप्ता, गुप्ते व गुप्ती के नाम से जाना जाता था। इसलिए इस राज के संस्थापक राजा का नाम तो श्रीगुप्त ही था। इनके सिक्कों पर धारण लिखा पाया जाता है। क्योंकि इनका गोत्र व वंश धारण था, जो आज भी क्षत्रियवंशी जाटों में है। इनके राज प्रशासन से स्पष्ट हो जाता है कि इन्होंने कभी धर्म व जाति-पाति तथा ऊंच-नीच का भेदभाव नहीं किया। साम्राज्य को प्रान्तों में बांटा गया था तथा पंचायतों को समुचित अधिकार थे। ब्राह्मणों को क्षत्रियों से श्रेष्ठ नहीं माना जाता था। राजतंत्र होते हुए भी गणतंत्र प्रणाली लागू करने वाले सम्राट हर्षवर्धन बैंस जाट सम्राट चन्द्रगुप्त मोर/मौर्य,सम्राट अशोक मोर/मौर्य के बाद अगर कोई सम्राट महान हुआ
    है तो वो जाट राजा हर्षवर्धन बैंस है । जाट राजा हर्षवर्धन बैंस के पूर्वज

भोगवतीपुरी का शासक नागराज वासुकि नामक सम्राट् था। यह वसाति/बैंस गोत्र का था Iइस वंश का राज्य वसाति जनपद पर भी था । इस वंश का वैभव महाभारतकाल में और भी अधिक चमका। होशियारपुर (पंजाब) के समीप श्रीमालपुर प्राचीन काल से वसाति बैंस,क्षत्रियों का निवास स्थान है। वर्तमान में भी श्रीमालपुर के आसपास जाट बैंस बहुत बड़ी संख्या में निवास करते है ।

पुष्पपति नामक पुरुष अपने कुछ साथियों सहित श्रीमालपुर से चलकर कुरुक्षेत्र में आया और यहां श्रीकण्ठ (थानेश्वर बसाकर इसके चारों ओर के प्रदेश का राजा बन गया। इसका पुत्र नरर्व्धन 505 ई० में सिंहासन पर बैठा। इस के पुत्र राजर्व्धन और आदित्यर्वधन पहले गुप्तों के सामन्त (जागीरदार) थे गुप्त वंश के कमजोर होने का सबसे बड़ा प्रभाव पंजाब,हरियाणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश और इन्द्रप्रस्थ के जाट गणतंत्रो पर पड़ा सभी गणराज्यो को पुनः अपनी शक्ति को संगठित करने का अवसर मिल गया था । इस अवसर का जाट गणराज्यों ने भरपूर लाभ उठाते हुए अपने आप को पुनःस्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली थी ।

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य से पराजय के बाद अर्जुनायन,नाग ,यौधेय ,मालव जाट गणतंत्रो (खापो ) ने एक नवीन संगठन बनाया जिसमे सभी गणराज्यो की समान रूप से भागीदारी थीद्य प्रारंभ में इसका प्रधान पद मालव विर्क जाटों के पास था बाद में प्रधान नागवंशी बैंस जाटों को बनाया गया अश्व सेना का प्रधान अर्जुनायन (कुंतल ) जाटों को ,महासेनापति यौधेयो को बनाया गया थाद्य यह नागवंशी बैंस जाट श्रीमालपुर (पंजाब) के मूल निवासी से थेद्य इस संघ के शक्ति शाली होने पर यह नागवंशी जाट बैंस थानेश्वर के महाराजाओ के रूप में प्रसिद्ध हुए

आदित्यर्व्धन की महारानी महासेनगुप्ता नामक गुप्तवंश की कन्या थी। इससे पुत्र प्रभाकरर्व्धन की उत्पत्ति हुई। ए० स्मिथ के लेख अनुसार प्रभाकरर्व्धन की यह माता गुप्तवंश (धारण जाट गोत्र) की थी । प्रभाकरवर्धन सम्राट हर्ष के पिता है ।

पुष्पभूति वंश का पहला महान् शासक प्रभाकरर्व्धन था। प्रभाकरर्व्धन की रानी यशोमती से राज्यर्व्धन का जन्म हुआ। उसके चार वर्ष बाद पुत्री राजश्री और उसके दो वर्ष बाद 4 जून 590 ई० को हर्षर्व्धन का शुभ जन्म हुआ। राज्यश्री का विवाह मौखरीवंशी कन्नौज नरेश ग्रहवर्मा के साथ हुआ था। किन्तु मालवा और मध्य बंगाल के गुप्त शासकों ने ग्रहवर्मा को मारकर राज्यश्री को कन्नौज में ही बन्दी बना दिया। इनमें मालवा का गुप्तवंश का राजा देवगुप्त था और मध्य बंगाल का गौड़ आदिवासी राजा शशांक था

सम्राट् प्रभाकरर्व्धन की मृत्यु सन् 605 ई० में हुई थी, जब हर्षवर्धन हूणों से युद्ध कर रहा था । उसी समय कुरगक कुंतल (अर्जुनायन) ने हर्षवर्धन को उनके पिता के ज्वर से पीड़ित होने का समाचार दिया था इसके बाद उसके बड़े पुत्र राज्यवर्दधन ने राजगद्दी सम्भाली। उसने 10 हजार सेना के साथ मालवा पर आक्रमण करके देवगुप्त का वध कर दिया। फिर वहां से बंगाल पर आक्रमण करने के लिए वहां पहुंच गया। परन्तु मध्यबंगाल में गौड़ राजा शशांक ने अपने महलों में बुलाकर धोखे से राज्यवर्धन का वध कर दिया। हर्ष चरित्र के अनुसार जब राज्यर्व्धन की मृत्यु का समाचार देने के लिए ब्रह्देश्वर कुंतल (अश्व सेना का प्रधान) ने अपने एक अश्व सैनिक को थानेश्वर भेजा ।

यह सन्देश पाकर अपने भाई की मृत्यु का बदला लेने के उदेश्य से सम्राट हर्ष अपनी सेना के साथ ब्रह्देश्वर के पड़ाव की तरफ बढ़ा हर्ष का साथ देने के लिए यशोधर्मन का पुत्र भांडी ( हर्ष का ममेरा भाई ) भी आया हर्ष ने सिंघनाद यौधेय, ब्रह्देश्वर कुंतल ,भांडी विर्क को गौड़ शासक शशांक पर आक्रमण करने को कहा और स्वयं माधवगुप्त के साथ विंध्याचल की तरफ अपनी बहिन राजश्री को खोजने के लिए चल दिया सिंघनाद यौधेय , ब्रह्देश्वर कुंतल ,भांडी ने कन्नोज पर अधिकार कर लिया राज्यवर्धन की मृत्यु के पश्चात् 606 ई० में विद्वानों के कहने पर मात्र 16 वर्ष की आयु में जाट सम्राट हर्षवर्धन राजसिंहासन पर बैठा।

हर्षवर्धन ने विशाल हरयाणा सर्वखाप पंचायत की स्थापना की। इसके लेख प्रमाण आज भी चै० कबूलसिंह मन्त्री सर्वखाप पंचायत गांव शोरम जि० मुजफ्फरनगर के पासं हैं। हर्षवर्धन के अपनी पत्नी दुर्गावती से 2 पुत्र थे- वाग्यवर्धन और कल्याणवर्धन। पर उनके दोनों बेटों की अरुणाश्वा नामक ब्राहमण मंत्री ने हत्या कर दी। इस वजह से हर्ष का कोई वारिस नहीं बचा। हर्ष की मृत्यु के बाद, उनका साम्राज्य भी धीरे-धीरे बिखरता चला गया और फिर समाप्त हो गया। लेकिन उनके वंश के बैंस जाट आज भी थानेश्वर में 20 गामो में निवास करते है । हर्ष के पूर्वजो का गाम श्रीमालपुर में भी आज तक बैंस जाट निवास कर रहे है।

पुरे भारतवर्ष में बैंस जाटों के 200 से ज्यादा गाव है जिनमे उत्तरप्रदेश के अमरोहा में 27 गाव(बसेड़ा कंजर,बलदाना,रुस्तमपुर ,बधोहिया,धनौड़ा,ध्योती,ड्योडी वाजिदपुर ,घोसीपुर ,मंडिया,इसेपुर,कालाखेडा,खजुरी ,खंड्सल,खुनपुर ,कूबी,लाम्बिया ,मंदयिया ,मुकारी,शाहपुर ,तसीहा,अकवादपुर है हापुड में पांच गाम जिनंमे बहलोलपुर प्रमुख है हरिद्वार में रुहल्की ,दयालपुर ,मुरादाबाद में सात (हाकीमपुर,मुन्डाला) ,पीलीभीत में 6,रामपुर में 2,बदायूं में 3 आगरा जिले में पांच ,गावो में शाहजहांपुर ,लखीमपुर ,नैनीताल ,उधमसिंह नगर में बड़ी संख्या में बैंस जाट निवास करते है । राजस्थान में भरतपुर जिले में 14 ग्राम(चिकसाना ,फतेहपुर,भोंट ,भौसिंगा ,कुरका ,पूंठ) बैंस (बिसायती) जाटों के है धोलपुर जिले में 4ग्राम बैंस जाटों के है मध्यप्रदेश में जाट पथरिया ,पारदी ,रायपुर में बैंस जाट है हरियाणा में कुरुक्षेत्र थानेश्वर के आसपास 20 गाम है शाहबाद,शादीपुर ,शाहीदा ,उदरसी,कमोदा,बागथळा, जटपुरा,अम्मिन,अधोल यमुनानगर में 7 गाम ,फरीदाबाद के दयालपुर में हिसार के खेहर और लाथल में कैथल और करनाल जिले में भी बैंस जाट है ।

पंजाब के गुरदासपुर में 16 गाव ,पटियाला जिले में 18,लुधियाना में 5 (मुश्काबाद ,तप्परियां ) जालंधर जिले में 28 गाव (तलहन ,आदमपुर ,कन्दोला,माजरा कलान,शहतपुर ,पुनु माजरा ,चक बिलसा ,मीरपुर ,महमूदपुर ,सरोवल ,सुन्दरपुर ,खोजपुर ,बैंस कलां, होशियारपुर जिले में 35 गाम (बैंस कलां ,बैंस खुर्द ,बैंस तनिवल,नांगल खुर्द ,कहरी,चब्बेवाल ,श्रीमालपुर,महिलपुर,गणेशपुर ,भलटा ) इसके अतरिक्त पंजाब में अलग अलग जिलो मंे 50 से अधिक गांवो में बैंस जाट निवास करते है ।

महानजाटराजाहर्षवर्धनबैंस का जन्म 590 ई . में हुआ था । इनके पिता का नाम प्रभाकर वर्धन बैंस व माता का नाम यशोमति था । इनका बचपन बड़े लाड – प्यार से बीता तथा इन्हें उच्च शिक्षा दी गई । इसके साथ – साथ शस्त्र शिक्षा का भी प्रबंध किया गया । ये इतने निपुण हो गए थे कि इन्होने मात्र 14 वर्ष की अल्प आयु में युद्ध में भाग ले लिया था । ये अच्छी शिक्षा के कारण ही उच्चकोटि का विद्वान व साहित्यकार तथा नाटककार बने । इनके बड़े भाई राजवर्धन की अचानक मृत्यु हो गई थी इस कारण इनको छोटी सी आयु में ही राजगद्दी पर बैठना पड़ा और समय इनके राज्य में अनेक कठिनाइयां थीं । राज्य को शत्रुओं से भय था ।सम्राट हर्षवर्धन जी बुद्धि के साथ – साथ तलवार के भी धनी थे युद्ध कला , साहित्य कला प्रबंध कला व अन्य कलाओं में निपुण थे ।

सम्राट हर्षवर्धन अपने युग का एक महानायक था । इसने अपने राज्य का काफी विस्तार किया, अशोक के बाद यह सबसे ज्यादा शक्तिशाली राजा था । इसने अपने राज्य का विस्तार उत्तर , दक्षिण पूर्व व पश्चिम चारों दिशाओं में किया था तथा वहां पर एक कुशल शासन प्रबंध स्थापित किया था । तलवार के साथ – साथ यह कलम का भी धनी था । इसके जीवनकाल में राज्य ने साहित्य में बहुत उन्नति की थी । सम्राट हर्षवर्धन ने अपनी स्वयं की कलम से भी कई महान कलाकृत्तियों की रचना की थी । थानेश्वर नगर इसकी उन्नति का आधार था । जब वह राजगद्दी पर बैठा तो इसके पिता , भाई व अन्य सगे संबंधियों की मृत्यु हो चुकी थी और इनका राज्य चारों तरफ से संकटों में घिरा हुआ था ।

हर्षवर्धन बैस ने अपनी बुद्धि , अच्छे विचार , कुशल शासन प्रबंध , मानसिक हौंसला तथा युद्ध कला कौशल के कारण उसे सभी संकटों से उभारा और अपने राज्य की सीमाओं की ओर विस्तार किया । सही मायने में राजा हर्षवर्धन बैंस में सम्राट अशोक महान मोरध्मौर्य गोत्री जैसे गुण थे । इसने राज्य विस्तार के साथ प्रजा हितार्थ कार्य भी करवाये व अपने शासन को उच्चकोटि का प्रबंध किया तथा एक विशाल व महान राज्य की सुदृढ़ नींव रखी । सम्राट हर्षवर्धन बैंस ने राज्य विस्तार के साथ – साथ अपने राज्य को भी बहुत ही कुशल ढंग से चलाया ।सम्राट हर्षवर्धन बैंस ने साधन सीमित होते हुए भी बहुत ज्यादा प्रजाहितार्थ कार्य करवाये थे । इसने जनता व यात्रियों के लिए विश्राम गृह बनवाये व वहां पर खाने पीने का उचित प्रबन्ध करवाया । उसके राज्य के लोगों को कहीं भी आने जाने की स्वतंत्रता थी । उसने अपनी सहायता व राज्य के कुशल प्रबन्ध के लिए मंत्री परिषद् का गठन किया हुआ था ।

उसके राज में हर कार्य का पूर लेखा – जोखा रखा जाता था । प्रत्येक मंत्री का कार्य बांटा हुआ था तथा मन्त्री के कार्य के लिए अनेक कर्मचारी थे । अपने शासन को सही व सुचारू रूप से चलाने के लिए राजा हर्षवर्धन बैंस ने अपने राज्य को कई प्रान्तों बांटा हुआ था । उसके बाद आगे भी कई भागों में बंटा हुआ था । इस में राज्य की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी जिसक मुखिया गांव के ही किसी व्यक्ति को बनाया जाता था Iराजा हर्षवर्धन के राज्य में राजतंत्र होते हुए भी गणतन्त्र प्रणाली लागू थी । उसका प्रत्येक पदाधिकारी अधिकारी व कर्मचारी सभी अपने – अपने कार्यों व पदों के जिम्मेवार थे । सारे कार्य का लेखा – जोखा रखा जाता था । प्रत्येक विभाग का एक उच्च अधिकारी था । उसकी सहायता के लिए अनेक कर्मचारी होते थे जो प्रशासन व कानून व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में सहायक थे प्रत्येक कार्य सिद्धांत व सही सम्पन्न होता था तथा प्रत्येक अधिकारी का दायित्व था कि वह अपने कार्य का लेखा – जोखा प्रस्तुत करें ।

राजा हर्षवर्धन के राज्य में ये संगत आदेश थे कि राज्य में आय व व्यय का लिखित ब्यौरा होना चाहिए राजा की आय का प्रमुख साधन भूमिकर था । इसके अलावा वस्तुओं पर कर लगाकर व जुर्माने की वसूली से खजाने को भरा जाता था । उसके बाद उस धन का बड़े सुनियोजित ढंग से प्रयोग करते हुए खर्च किया जाता था ।

कुछ धन सरकारी काम पर खर्च होता था । कुछ कर्मचारियों को दिया जाता था । कुछ विद्वानों व साहसिक कार्य करने वालो पर खर्च होता था शेष धन प्रजा के कार्यों पर खर्च किया जाता था ।सम्राट हर्षवर्धन के राज्य की न्याय प्रणाली बहुत कठोर थी । सभी अपराधियों को इसी कठोर न्याय प्रणाली के आधार पर दण्ड दिया जाता था । इसके लिए अलग से भी अधिकारी नियुक्त कर रखे थे ताकि राज्य में अपराध का फैसला किया जा सके । ग्राम स्तर पर मुखिया इसका फैसला करते थे ।

राजा हर्षवर्धन ने अपने राज्य को सही चलाने के लिए व राज्य के बाहरी शत्रुओं का मुकाबला करने के लिए एक सेना रखी हुई थी । इनकी सेना में 1 लाख 20 हजार घुड़सवार व लाखों की संख्या में पैदल सैनिक थे । इनका कार्य राज्य में सही व्यवस्था बनाना तथा लड़ाई के समय युद्ध में भाग लेना था । सेना के मुखिया को सेनापति कहा जाता था । शिक्षा के ऊपर भी राजा हर्षवर्धन बैंस ने मुख्य रूप से ध्यान दिया । शिक्षा के प्रसार के लिए अनेक विद्यालयो की स्थापना की व नालंदा विश्वविद्यालय को फिर से ऊंचा उठाया व पूर्ण रूप से दान दिया इनके दरबार में अनेक विद्वान थे । बाण उनमें प्रमुख है । उसने अनेक ग्रन्थों को लिखकर तैयार किया इनके राज्य में साहित्य , भूगोल , ज्योतिषी व चिकित्सा का बहुत विकास हुआ था इनके राज्य में तलवार के साथ – साथ साहित्य को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया व विकास किया गया । जाट सम्राट ने स्वयं भी तीन प्रसिद्ध नाटक लिखे थे जिनके नाम रत्नावली , प्रियदर्शिका, नागानन्द थे ।

इन्होंने अपने राजदरबार में अनेक साहित्यकारों को शरण दी व साहित्य का खुद विकास करवाया । सम्राट काव्य कला का भी प्रेमी था । इनके विद्वानों ने इनकी तुलना कालिदास जैसे कवि से की थी । इन सब प्रशासनिक कार्यों के साथ – साथ जाट सम्राट हर्षवर्धन अपने राज्य की सीमाओं को समय – समय पर बढ़ाया व अपने राज्य को संगठित शक्तिशाली व विशाल बनाया था । अनेक प्रदेशों पर विजय प्राप्त की जिसमें प्रमुख विजयों का वर्णन यहां कर रहा हूँ ।

सम्राट हर्षवर्धन की विजय –

ह्यूनसांग के वृत्तान्त तथा बाण के हर्षचरित से उसके निम्नलिखित युद्धों एवं विजयों का ब्यौरा मिलता है –

1, जाट इतिहास उर्दू पृ० 356 लेखक ठा० संसारसिंह।

  1. जाट वीरों का इतिहास – दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-244

बल्लभी अथवा गुजरात की विजय – हर्ष के समय धरुवसेन द्वितीय बल्लभी अथवा गुजरात का राजा था। हर्ष ने उस पर आक्रमण करके उसको पराजित किया परन्तु अन्त में दोनों में मैत्री-सम्बन्ध स्थापित हो गये। हर्ष ने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री का विवाह उससे कर दिया।

गुजरात विजय के बाद सम्राट हर्षवर्धन ने अपना कदम कामरूप राज्य की ओर बढ़ाया । वहां के राजा ने शीघ्र ही सम्राट की अधीनता स्वीकार कर ली और उसके बाद उन्होंने बंगाल पर भी आक्रमण किया और दोनों की राजनैतिक व सैनिक शक्ति ने वहां के राजा को हराया था । कामरूप के बाद सम्राट हर्षवर्धन से जो बंगाल का आधा अधूरा कार्य रह गया था । बगाल पर पहला आक्रमण करके सम्राट हर्षवर्धन ने अपने भाई के वध का बदला लिया था परन्तु वह बंगाल की शक्ति को पूरी तरह से कुचल नहीं सका था । अंत में सम्राट ने बंगाल के राजा शशांक को पूरी तरह समाप्त करने के लिए कामरूप राज्य के राजा के साथ मिलकर बंगाल पर आक्रमण कर दिया इस युद्ध में बंगाल के राजा की बुरी तरह से हार हुई थी व सम्राट हर्षवर्धन बैंस की जीत हुई और बंगाल को अपने राज्य में मिला लिया । इससे उसका राज्य और विस्तृत हो गया ।

इस बंगाल विजय के राजा हर्षवर्धन जो बैंस गोत्री था , इनकी ख्याति चारों और फैल गई । बंगाल विजय के बाद सम्राट हर्षवर्धन पश्चिमी उत्तर की ओर बढा । उसने वहां पर पंजाब को विजित किया और अपने उत्तर पश्चिमी भाग को और विस्तृत किया और उसके बाद उत्तर भारत के बिहार व उड़ीसा को विजय किया और अपने राज्य को और विस्तृत किया । इस प्रकार लगभग समस्त उत्तरी भारतवर्ष पर सम्राट हर्षवर्धन बैंस का राज्य स्थापित हो गया ।

इसके बाद हर्षवर्धन ने अपना कदम सिन्ध राज्य की ओर बढ़ाया तथा सिन्ध को अपने राज्य में मिलाया । कहते हैं सिन्ध अलग प्रान्त था वह अलग व स्वतंत्र था , परन्तु बाद में सिन्ध राजा हर्षवर्धन बैंस के अधीन हो गया था । सिन्ध विजय के बाद हर्षवर्धन ने अपने कदम नेपाल की और बढ़ाए तथा नेपाल को विजय किया और अपने राज्य में मिलाया था । नेपाल को विजय करने के बाद सम्राट ने अपने कदम गजम की ओर बढ़ाये तथा दो या तीन युद्धों के बाद ही गजम पर अधिकार कर लिया था । यह उत्तरी पूर्वी भाग का प्रदेश था । इन विजयों के बाद राजा हर्षवर्धन बैस ने अपने राज्य को स्थापित व सुदृढ़ किया ।

इसके बाद राजा हर्षवर्धन बैंस ने अपने सम्बन्ध दूसरे देशों के साथ बनाने शुरू किये । चीन , श्रीलंका, बर्मा व अन्य कई पड़ोसी देशों के अन्दर अपने राजदूत भेजे । अपनी संस्कृति व कला का प्रचार पूरी दुनिया में करने के लिए कार्य किया । वहां के कई राजाओं ने भी राजा हर्षवर्धन की दोस्ती स्वीकार करते हुए उसे अनेक बहुमूल्य उपहार के रूप भेजे थे ।

पुलकेशिन द्वितीय से युद्ध – ह्यूनसांग लिखता है कि “हर्ष ने एक शक्तिशाली विशाल सेना सहित इस सम्राट् के विरुद्ध चढाई की परन्तु पुलकेशिन ने नर्वदा तट पर हर्ष को बुरी तरह पराजित किया। यह हर्ष के जीवन की पहली तथा अन्तिम पराजय थी। उसके साम्राज्य की दक्षिणी सीमा नर्वदा नदी तक ही सीमित रह गई। इस शानदार विजय से पुलकेशिन द्वितीय की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई और उसने ‘परमेश्वर’ की उपाधि धारण की। यह युद्ध 620 ई० में हुआ था।”

राहुल सांकृत्यायन अपनी पुस्तक ‘वोल्गा से गंगा’ पृ० 242-43 पर लिखते हैं कि “सम्राट् हर्षवर्धन की एक महाश्वेता नामक रानी पारसीक (फारस-ईरान) के बादशाह नौशेखाँ की पोती थी और दूसरी कादम्बरी नामक रानी सौराष्ट्र की थी।”

हर्ष एक सफल विजेता ही नहीं बल्कि एक राजनीतिज्ञ भी था। उसने चीन तथा फारस से राजनीतिक सम्बन्ध स्थापित कर रखे थे। हर्ष एक महान् साम्राज्य-निर्माता, महान् विद्वान् व साहित्यकार था। इसकी तुलना अशोक, समुद्रगुप्त जैसे महान् शासकों से की जाती है। हर्षवर्धन की इस महत्ता का कारण केवल उसके महान् कार्य ही नहीं हैं वरन् उसका उच्च तथा श्रेष्ठ चरित्र भी है। हर्ष आरम्भ में शिव का उपासक था और बाद में बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया था। इसकी कन्नौज की सभा एवं प्रयाग की सभा बड़ी प्रसिद्ध है। हर्ष हर पांचवें वर्ष प्रयाग अथवा इलाहाबाद में एक सभा का आयोजन करता था। सन् 643 ई० में बुलाई गई सभा में ह्यूनसांग ने भी भाग लिया था। ह्यूनसांग एक चीनी भ्रमणकारी नागरिक था ।

इस सभा में पांच लाख लोगों तथा 20 राजाओं ने भाग लिया। इस सभा में जैन, बौद्ध और ब्राह्मण तथा सभी सम्प्रदायों को दान दिया गया। यह सभा 75 दिन तक चलती रही। इस अवसर पर हर्ष ने पांच वर्षों में एकत्रित किया सारा धन दान में दे दिया, यहां तक कि उसके पास अपने वस्त्र भी न रहे। उसने अपनी बहिन राज्यश्री से एक पुराना वस्त्र लेकर पहना। चीनी यात्री ह्यूनसांग 15 वर्ष तक भारतवर्ष में रहा। वह 8 वर्षो तक हर्ष के साथ रहा। उसकी पुस्तक सि-यू-की हर्ष के राज्यकाल को जानने का एक अमूल्य स्रोत है।

इनसे मिलने के लिये आने वाला वंगहुएंत्से के नेतृत्व में चीनी राजदूतदल मार्ग में ही था कि उत्तराधिकारी विहीन वैस साम्राज्य पर ब्राह्मण सेनापति अर्जुन ने अधिकार करने के लिए प्रयत्न प्रारम्भ कर दिया किन्तु वंगहुएंत्से ने तिब्बत की सहायता से अर्जुन को बन्दी बनाकर चीन भेज दिया। बताया जाता है कि वहा चीन के राजा ने इस नीच ब्राहमण की आंखे निकाल दी थी जिससे आप हांगसान की किताब में भी पढ सकतो हो ।

डूंडिया खेड़ा – सम्राट् हर्षवर्धन के वंशधरों की सत्ता कन्नौज से समाप्त होने के पश्चात् डूंडिया खेड़ा में स्थिर हुई। वहां प्रजातन्त्री रूप से इनकी स्थिति सन् 1857 ई० तक सुदृढ़ रही। 1857 के बाद अवध में सत्ताप्राप्त जैस लोगों ने अपने आप को राजपूत घोषित कर दिया। इन लोगों से अवध का रायबरेली जिला भरा हुआ है। जनपद के रूप में इनका वह प्रदेश वैसवाड़ा के नाम पर प्रसिद्ध है। वैस वंशियों की सुप्रसिद्ध रियासत डूंडिया खेड़ा को अंग्रेजों ने इनकी स्वातन्त्र्यप्रियता से क्रुद्ध होकर ध्वस्त करा दिया था।

फगवाड़ा से 7 मील दूर बैंसला गांव से हरयाणा और यू० पी० के वैस जाटों का निकास माना जाता है। लुधियाना की समराला तहसील मुसकाबाद, टपरिया, गुड़गांव में दयालपुर, हिसार में खेहर, लाथल, मेरठमें बहलोलपुर, विगास, गुवांदा और बुलन्दशहर में सलेमपुर गांव बंैस जाटों के हैं। यह सलेमपुर गांव सलीम (जहांगीर) की ओर से इस वंश को दिया गया था। फलतः 1857 ई० में इस गांव के वैसवंशज जाटों ने सम्राट् बहादुरशाह के समर्थन में अंग्रेजों के विरुद्ध भारी युद्ध किया। अंग्रेजों ने इस गांव की रियासत को तोपों से ध्वस्त करा दिया।

सन् 647 ई० में इस प्रतापी सम्राट हर्षवर्धन का निस्सन्तान स्वर्गवास हो गया और उसका साम्राज्य विनष्ट हो गया।

When Taimur Lang was defeated by combined Hindu forces. तैमूर लंग

ने मार्च सन् 1398 ई० में भारत पर 92000 घुड़सवारों की सेना से तूफानी आक्रमण कर दिया। तैमूर के सार्वजनिक कत्लेआम, लूट खसोट और सर्वनाशी अत्याचारों की सूचना मिलने पर संवत् 1455 (सन् 1398 ई०) कार्तिक बदी 5 को देवपाल राजा (जिसका जन्म #निरपड़ा गांव जिला #मेरठ में एक #जाट घराने में हुआ था) की अध्यक्षता में हरियाणा सर्वखाप पंचायत का अधिवेशन जि० मेरठ के गाँव #टीकरी, #निरपड़ा, #दोघट और #दाहा के मध्य जंगलों में हुआ।

सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये – (1) सब गांवों को खाली कर दो। (2) बूढे पुरुष-स्त्रियों तथा बालकों को सुरक्षित स्थान पर रखो। (3) प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति सर्वखाप पंचायत की सेना में भर्ती हो जाये। (4) युवतियाँ भी पुरुषों की भांति शस्त्र उठायें। (5) दिल्ली से हरद्वार की ओर बढ़ती हुई तैमूर की सेना का छापामार युद्ध शैली से मुकाबला किया जाये तथा उनके पानी में विष मिला दो। (6) 500 घुड़सवार युवक तैमूर की सेना की गतिविधियों को देखें और पता लगाकर पंचायती सेना को सूचना देते रहें।

पंचायती सेना – पंचायती झण्डे के नीचे 80,000 मल्ल योद्धा सैनिक और 40,000 युवा महिलायें शस्त्र लेकर एकत्र हो गये। इन वीरांगनाओं ने युद्ध के अतिरिक्त खाद्य सामग्री का प्रबन्ध भी सम्भाला। दिल्ली के सौ-सौ कोस चारों ओर के क्षेत्र के वीर योद्धा देश रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने रणभूमि में आ गये। सारे क्षेत्र में युवा तथा युवतियां सशस्त्र हो गये। इस सेना को एकत्र करने में #धर्मपालदेव जाट योद्धा जिसकी आयु 95 वर्ष की थी, ने बड़ा सहयोग दिया था। उसने घोड़े पर चढ़कर दिन रात दूर-दूर तक जाकर नर-नारियों को उत्साहित करके इस सेना को एकत्र किया। उसने तथा उसके भाई #करणपाल ने इस सेना के लिए अन्न, धन तथा वस्त्र आदि का प्रबन्ध किया।

प्रधान सेनापति, उप-प्रधान सेनापति तथा सेनापतियों की नियुक्ति

सर्वखापपंचायत के इस अधिवेशन में सर्वसम्मति से वीर योद्धा #जोगराजसिंहगुर्जर को प्रधान सेनापति बनाया गया। यह खूबड़ परमार वंश का योद्धा था जो #हरिद्वार के पास एक गाँव #कुंजा_सुन्हटी का निवासी था। बाद में यह गाँव मुगलों ने उजाड़ दिया था। वीर जोगराजसिंह के वंशज उस गांव से भागकर #लंढोरा (जिला #सहारनपुर) में आकर आबाद हो गये जिन्होंने लंढोरा गुर्जर राज्य की स्थापना की। जोगराजसिंह बालब्रह्मचारी एवं विख्यात पहलवान था। उसका कद 7 फुट 9 इंच और वजन 8 मन था। उसकी दैनिक खुराक चार सेर अन्न, 5 सेर सब्जी-फल, एक सेर गऊ का घी और 20 सेर गऊ का दूध।

महिलाएं वीरांगनाओं की सेनापति चुनी गईं उनके नाम इस प्रकार हैं – (1) रामप्यारी गुर्जर युवति (2) हरदेई जाट युवति (3) देवीकौर राजपूत युवति (4) चन्द्रो ब्राह्मण युवति (5) रामदेई त्यागी युवति। इन सब ने देशरक्षा के लिए शत्रु से लड़कर प्राण देने की प्रतिज्ञा की।

उपप्रधान सेनापति – (1) #धूला_भंगी (बालमीकी) (2) हरबीर गुलिया जाट चुने गये। धूला भंगी जिला #हिसार के #हांसी गांव (हिसार के निकट) का निवासी था। यह महाबलवान्, निर्भय योद्धा, गोरीला (छापामार) युद्ध का महान् विजयी धाड़ी (बड़ा महान् डाकू) था जिसका वजन 53 धड़ी था। उपप्रधान सेनापति चुना जाने पर इसने भाषण दिया कि – “मैंने अपनी सारी आयु में अनेक धाड़े मारे हैं। आपके सम्मान देने से मेरा खूब उबल उठा है। मैं वीरों के सम्मुख प्रण करता हूं कि देश की रक्षा के लिए अपना खून बहा दूंगा तथा सर्वखाप के पवित्र झण्डे को नीचे नहीं होने दूंगा। मैंने अनेक युद्धों में भाग लिया है तथा इस युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान दे दूंगा।” यह कहकर उसने अपनी जांघ से खून निकालकर प्रधान सेनापति के चरणों में उसने खून के छींटे दिये। उसने म्यान से बाहर अपनी तलवार निकालकर कहा “यह शत्रु का खून पीयेगी और म्यान में नहीं जायेगी।” इस वीर योद्धा धूला के भाषण से पंचायती सेना दल में जोश एवं साहस की लहर दौड़ गई और सबने जोर-जोर से मातृभूमि के नारे लगाये।

दूसरा उपप्रधान सेनापति हरबीरसिंह जाट था जिसका गोत्र गुलिया था। यह हरयाणा के जिला #रोहतक गांव #बादली का रहने वाला था। इसकी आयु 22 वर्ष की थी और इसका वजन 56 धड़ी (7 मन) था। यह निडर एवं शक्तिशाली वीर योद्धा था।

सेनापतियों का निर्वाचन – उनके नाम इस प्रकार हैं – (1) गजेसिंह जाट गठवाला (2) तुहीराम राजपूत (3) मेदा रवा (4) सरजू ब्राह्मण (5) उमरा तगा (त्यागी) (6) दुर्जनपाल अहीर।

जो उपसेनापति चुने गये – (1) कुन्दन जाट (2) धारी गडरिया जो धाड़ी था (3) भौन्दू सैनी (4) हुल्ला नाई (5) भाना जुलाहा (हरिजन) (6) अमनसिंह पुंडीर राजपुत्र (7) नत्थू पार्डर राजपुत्र (8) दुल्ला (धाड़ी) जाट जो हिसार, दादरी से मुलतान तक धाड़े मारता था। (9) मामचन्द गुर्जर (10) फलवा कहार।

सहायक सेनापति – भिन्न-भिन्न जातियों के 20 सहायक सेनापति चुने गये।

वीर कवि – प्रचण्ड विद्वान् चन्द्रदत्त भट्ट (भाट) को वीर कवि नियुक्त किया गया जिसने तैमूर के साथ युद्धों की घटनाओं का आंखों देखा इतिहास लिखा था।

प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर के ओजस्वी भाषण के कुछ अंश –

“वीरो! भगवान् कृष्ण ने गीता में अर्जुन को जो उपदेश दिया था उस पर अमल करो। हमारे लिए स्वर्ग (मोक्ष) का द्वार खुला है। ऋषि मुनि योग साधना से जो मोक्ष पद प्राप्त करते हैं, उसी पद को वीर योद्धा रणभूमि में बलिदान देकर प्राप्त कर लेता है। भारत माता की रक्षा हेतु तैयार हो जाओ। देश को बचाओ अथवा बलिदान हो जाओ, संसार तुम्हारा यशोगान करेगा। आपने मुझे नेता चुना है, प्राण रहते-रहते पग पीछे नहीं हटाऊंगा। पंचायत को प्रणाम करता हूँ तथा प्रतिज्ञा करता हूँ कि अन्तिम श्वास तक भारत भूमि की रक्षा करूंगा। हमारा देश तैमूर के आक्रमणों तथा अत्याचारों से तिलमिला उठा है। वीरो! उठो, अब देर मत करो। शत्रु सेना से युद्ध करके देश से बाहर निकाल दो।”

यह भाषण सुनकर वीरता की लहर दौड़ गई। 80,000 वीरों तथा 40,000 वीरांगनाओं ने अपनी तलवारों को चूमकर प्रण किया कि हे सेनापति! हम प्राण रहते-रहते आपकी आज्ञाओं का पालन करके देश रक्षा हेतु बलिदान हो जायेंगे।

मेरठ युद्ध – तैमूर ने अपनी बड़ी संख्यक एवं शक्तिशाली सेना, जिसके पास आधुनिक शस्त्र थे, के साथ दिल्ली से मेरठ की ओर कूच किया। इस क्षेत्र में तैमूरी सेना को पंचायती सेना ने दम नहीं लेने दिया। दिन भर युद्ध होते रहते थे। रात्रि को जहां तैमूरी सेना ठहरती थी वहीं पर पंचायती सेना धावा बोलकर उनको उखाड़ देती थी। वीर देवियां अपने सैनिकों को खाद्य सामग्री एवं युद्ध सामग्री बड़े उत्साह से स्थान-स्थान पर पहुंचाती थीं। शत्रु की रसद को ये वीरांगनाएं छापा मारकर लूटतीं थीं। आपसी मिलाप रखवाने तथा सूचना पहुंचाने के लिए 500 घुड़सवार अपने कर्त्तव्य का पालन करते थे। रसद न पहुंचने से तैमूरी सेना भूखी मरने लगी। उसके मार्ग में जो गांव आता उसी को नष्ट करती जाती थी। तंग आकर तैमूर हरद्वार की ओर बढ़ा।

हरिद्वार युद्ध – मेरठ से आगे मुजफ्फरनगर तथा सहारनपुर तक पंचायती सेनाओं ने तैमूरी सेना से भयंकर युद्ध किए तथा इस क्षेत्र में तैमूरी सेना के पांव न जमने दिये। प्रधान एवं उपप्रधान और प्रत्येक सेनापति अपनी सेना का सुचारू रूप से संचालन करते रहे। हरद्वार से 5 कोस दक्षिण में तुगलुकपुर-पथरीगढ़ में तैमूरी सेना पहुंच गई। इस क्षेत्र में पंचायती सेना ने तैमूरी सेना के साथ तीन घमासान युद्ध किए।

उप-प्रधानसेनापति हरबीरसिंह गुलिया ने अपने पंचायती सेना के 25,000 वीर योद्धा सैनिकों के साथ तैमूर के घुड़सवारों के बड़े दल पर भयंकर धावा बोल दिया जहां पर तीरों तथा भालों से घमासान युद्ध हुआ। इसी घुड़सवार सेना में तैमूर भी था। हरबीरसिंह गुलिया ने आगे बढ़कर शेर की तरह दहाड़ कर तैमूर की छाती में भाला मारा जिससे वह घोड़े से नीचे गिरने ही वाला था कि उसके एक सरदार खिज़र ने उसे सम्भालकर घोड़े से अलग कर लिया। (तैमूर इसी भाले के घाव से ही अपने देश समरकन्द में पहुंचकर मर गया)। वीर योद्धा हरबीरसिंह गुलिया पर शत्रु के 60 भाले तथा तलवारें एकदम टूट पड़ीं जिनकी मार से यह योद्धा अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ा।

(1) उसी समय प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर ने अपने 22000 मल्ल योद्धाओं के साथ शत्रु की सेना पर धावा बोलकर उनके 5000 घुड़सवारों को काट डाला। जोगराजसिंह ने स्वयं अपने हाथों से अचेत हरबीरसिंह को उठाकर यथास्थान पहुंचाया। परन्तु कुछ घण्टे बाद यह वीर योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गया। जोगराजसिंह को इस योद्धा की वीरगति से बड़ा धक्का लगा।

(2) हरिद्वार के जंगलों में तैमूरी सेना के 2805 सैनिकों के रक्षादल पर भंगी कुल के उपप्रधान सेनापति धूला धाड़ी वीर योद्धा ने अपने 190 सैनिकों के साथ धावा बोल दिया। शत्रु के काफी सैनिकों को मारकर ये सभी 190 सैनिक एवं धूला धाड़ी अपने देश की रक्षा हेतु वीरगति को प्राप्त हो गये।

(3) तीसरे युद्ध में प्रधान सेनापति जोगराजसिंह ने अपने वीर योद्धाओं के साथ तैमूरी सेना पर भयंकर धावा करके उसे अम्बाला की ओर भागने पर मजबूर कर दिया। इस युद्ध में वीर योद्धा जोगराजसिंह को 45 घाव आये परन्तु वह वीर होश में रहा। पंचायती सेना के वीर सैनिकों ने तैमूर एवं उसके सैनिकों को हरद्वार के पवित्र गंगा घाट (हर की पौड़ी) तक नहीं जाने दिया। तैमूर हरिद्वार से पहाड़ी क्षेत्र के रास्ते #अम्बाला की ओर भागा। उस भागती हुई तैमूरी सेना का पंचायती वीर सैनिकों ने अम्बाला तक पीछा करके उसे अपने देश हरियाणा से बाहर खदेड़ दिया।

वीर सेनापति दुर्जनपाल अहीर मेरठ युद्ध में अपने 200 वीर सैनिकों के साथ दिल्ली दरवाज़े के निकट स्वर्ग लोक को प्राप्त हुये।

इन युद्धों में बीच-बीच में घायल होने एवं मरने वाले सेनापति बदलते रहे थे। कच्छवाहे गोत्र के एक वीर राजपूत ने उपप्रधान सेनापति का पद सम्भाला था। तंवर गोत्र के एक जाट योद्धा ने प्रधान सेनापति के पद को सम्भाला था। एक रवा तथा सैनी वीर ने सेनापति पद सम्भाले थे। इस युद्ध में केवल 5 सेनापति बचे थे तथा अन्य सब देशरक्षा के लिए वीरगति को प्राप्त हुये।

इन युद्धों में तैमूर के ढ़ाई लाख सैनिकों में से हमारे वीर योद्धाओं ने 1,60,000 को मौत के घाट उतार दिया था और तैमूर की आशाओं पर पानी फेर दिया।

हमारी पंचायती सेना के वीर एवं वीरांगनाएं 35,000, देश के लिये वीरगति को प्राप्त हुए थे।

प्रधान सेनापति की वीरगति – वीर योद्धा प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर युद्ध के पश्चात् ऋषिकेश के जंगल में स्वर्गवासी हुये थे।

(सन्दर्भ-जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-३७९-३८३ )

ध्यान दीजिये। एक सवर्ण सेना का उपसेनापति वाल्मीकि था। अहीर, गुर्जर से लेकर 36 बिरादरी उसके महत्वपूर्ण अंग थे। तैमूर को हराने वाली सेना को हराने वाली कौन थे? क्या वो जाट थे?बनिए थे? क्या वो भंगी या वाल्मीकि थे? क्या वो जातिवादी थे?

नहीं वो सबसे पहले देशभक्त थे। धर्मरक्षक थे। श्री राम और श्री कृष्ण की संतान थे? गौ, वेद , जनेऊ और यज्ञ के रक्षक थे।

आज भी हमारा देश उसी संकट में आ खड़ा हुआ है। आज भी विधर्मी हमारी जड़ों को काट रहे है। आज भी हमें फिर से से एकजुट होकर अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपनी मातृभूमि की रक्षा का व्रत लेना हैं। यह तभी सम्भव है जब हम अपनी संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर सोचना आरम्भ करेंगे। आप में से कौन कौन मेरे साथ है?

लेखक : डा. विवेक आर्य

HistoryFacts : “The Tiger of Sundarban”.

HistoryFacts : “The Tiger of Sundarban”

The following chapter hasbeen taken from the historical accounts of :
▪︎Eaton, Richard. 2009. Forest clearing and the growth of Islam in Bengal. 375-389 Islam in South Asia in Practice edited by Barbara D. Metcalf, Princeton. Princeton University Press.
▪︎Ali, Momammad. 1979. Pun̐thi Sāhitye Baṅga Jayer Itihās o Gājī-Kālu-Campābatī [History of the Conquest of Bengal in Chapbook Literature and Gaji-Kalu-Champabati].. Bāgurā. Bāgurā Jelā Pariṣad
▪︎Anooshahr, Ali. 2008. The Ghazi Sultans and the Frontiers of Islam: A Comparative Study of the Late Medieval and Early Modern Periods. New York. Routledge 10.4324/9780203886656
▪︎Chattopadhyaya, Brajadulal. 2003. Studying Early India: Archeology, Texts and Historical Issues. New Delhi. Permanent Black.
▪︎”Dakshin-Ray”. nationalmuseumindia.gov.in. Retrieved December 25, 2017.
▪︎Eaton, Richard. 1993. The Rise of Islam and the Bengal Frontier, 1204–1760. Berkeley. University of California Press.

● In 1294 CE, the Nawab of #DelhiSultanate Jalal-ud-din-Firuz Khilji of the invading Turkic #KhiljiDynasty ordered his commander Zafar Khan Ghazi to capture Sundarban. Zafar Khan Ghazi along with his son Bara Khan Ghazi invaded Bengal, captured some territory neighbouring #Sundarban & started mass killings & forced conversions of the native population. When the invading Turk forces reached Shaktigarh, Maharaja Dakshin Ray of Bhati Bengal Kingdom defeated them in the Battle of Khaniya. In the ensuing battle, Zafar Khan Ghazi was beheaded by the Bengal-Chakma Army & Bara Khan Ghazi was made a prisoner.
Now, Zafar Khan Ghazi & his son Bara Khan Ghazi are referred to as Martyrs of Islam. Bara Khan Ghazi got the title ‘Shaheed Barkhan Gaji Shaheb’ & Zafar Khan Ghazi’s tomb still exist on the ruins of a Vishnu Temple in Tribeni, #WestBengal, India. Whereas, Maharaja Dakshin Ray’s legacy hasbeen erased from the history books of the Indian Subcontinent. However, still few small temples of Sundarban in India & Bangladesh have preserved Dakshin Ray’s statue as a sacred deity.

Thailand- where real Ram Rajya is-

भारत के बाहर थाईलेंड में आज भी संवैधानिक रूप में राम राज्य है । वहां भगवान राम के छोटे पुत्र कुश के वंशज सम्राट “भूमिबल अतुल्य तेज ” राज्य कर रहे हैं , जिन्हें नौवां राम कहा जाता है ।

-भगवान राम का संक्षिप्त इतिहास-
वाल्मीकि रामायण एक धार्मिक ग्रन्थ होने के साथ एक ऐतिहासिक ग्रन्थ भी है , क्योंकि महर्षि वाल्मीकि राम के समकालीन थे , रामायण के बालकाण्ड के सर्ग ,70 . 71 और 73 में राम और उनके तीनों भाइयों के विवाह का वर्णन है , जिसका सारांश है।

मिथिला के राजा सीरध्वज थे , जिन्हें लोग विदेह भी कहते थे उनकी पत्नी का नाम सुनेत्रा ( सुनयना ) था , जिनकी पुत्री सीता जी थीं , जिनका विवाह राम से हुआ था ।
राजा जनक के कुशध्वज नामके भाई थे । इनकी राजधानी सांकाश्य नगर थी जो इक्षुमती नदी के किनारे थी l इन्होंने अपनी बेटी
उर्मिला लक्षमण से, मांडवी भरत से, और श्रुतिकीति का विवाह शत्रुघ्न से करा दी थी।

केशव दास रचित ” रामचन्द्रिका “-पृष्ठ 354 ( प्रकाशन संवत 1715 ) .के अनुसार, राम और सीता के पुत्र लव और कुश, लक्ष्मण और उर्मिला के पुत्र अंगद और चन्द्रकेतु , भरत और मांडवी के पुत्र पुष्कर और तक्ष, शत्रुघ्न और श्रुतिकीर्ति के पुत्र सुबाहु और शत्रुघात हुए थे ।

भगवान राम के समय ही राज्यों बँटवारा इस प्रकार हुआ था —
पश्चिम में लव को लवपुर (लाहौर ), पूर्व में कुश को कुशावती, तक्ष को तक्षशिला, अंगद को अंगद नगर, चन्द्रकेतु को चंद्रावती। कुश ने अपना राज्य पूर्व की तरफ फैलाया और एक नाग वंशी कन्या से विवाह किया था । थाईलैंड के राजा उसी कुश के वंशज हैंl इस वंश को “चक्री वंश कहा जाता है l चूँकि राम को विष्णु का अवतार माना जाता है , और विष्णु का आयुध चक्र है इसी लिए थाईलेंड के लॉग चक्री वंश के हर राजा को “राम ” की उपाधि देकर नाम के साथ संख्या दे देते हैं l जैसे अभी राम (9 th ) राजा हैं जिनका नाम “भूमिबल अतुल्य तेज ” है।

थाईलैंड की अयोध्या–
लोग थाईलैंड की राजधानी को अंग्रेजी में बैंगकॉक ( Bangkok ) कहते हैं , क्योंकि इसका सरकारी नाम इतना बड़ा है , की इसे विश्व का सबसे बडा नाम माना जाता है , इसका नाम संस्कृत शब्दों से मिल कर बना है, देवनागरी लिपि में पूरा नाम इस प्रकार है –

“क्रुंग देव महानगर अमर रत्न कोसिन्द्र महिन्द्रायुध्या महा तिलक भव नवरत्न रजधानी पुरी रम्य उत्तम राज निवेशन महास्थान अमर विमान अवतार स्थित शक्रदत्तिय विष्णु कर्म प्रसिद्धि ”

थाई भाषा में इस पूरे नाम में कुल 163 अक्षरों का प्रयोग किया गया हैl इस नाम की एक और विशेषता ह । इसे बोला नहीं बल्कि गा कर कहा जाता हैl कुछ लोग आसानी के लिए इसे “महेंद्र अयोध्या ” भी कहते है l अर्थात इंद्र द्वारा निर्मित महान अयोध्या । थाई लैंड के जितने भी राम ( राजा ) हुए हैं सभी इसी अयोध्या में रहते आये हैं ।

असली राम राज्य थाईलैंड में है-
बौद्ध होने के बावजूद थाईलैंड के लोग अपने राजा को राम का वंशज होने से विष्णु का अवतार मानते हैं , इसलिए, थाईलैंड में एक तरह से राम राज्य है । वहां के राजा को भगवान श्रीराम का वंशज माना जाता है, थाईलैंड में संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना 1932 में हुई।

भगवान राम के वंशजों की यह स्थिति है कि उन्हें निजी अथवा सार्वजनिक तौर पर कभी भी विवाद या आलोचना के घेरे में नहीं लाया जा सकता है वे पूजनीय हैं। थाई शाही परिवार के सदस्यों के सम्मुख थाई जनता उनके सम्मानार्थ सीधे खड़ी नहीं हो सकती है बल्कि उन्हें झुक कर खडे़ होना पड़ता है. उनकी तीन पुत्रियों में से एक हिन्दू धर्म की मर्मज्ञ मानी जाती हैं।

थाईलैंड का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है
यद्यपि थाईलैंड में थेरावाद बौद्ध के लोग बहुसंख्यक हैं , फिर भी वहां का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है । जिसे थाई भाषा में ” राम-कियेन ” कहते हैं । जिसका अर्थ राम-कीर्ति होता है , जो वाल्मीकि रामायण पर आधारित है l इस ग्रन्थ की मूल प्रति सन 1767 में नष्ट हो गयी थी , जिससे चक्री राजा प्रथम राम (1736–1809), ने अपनी स्मरण शक्ति से फिर से लिख लिया था l थाईलैंड में रामायण को राष्ट्रिय ग्रन्थ घोषित करना इसलिए संभव हुआ ,क्योंकि वहां भारत की तरह दोगले हिन्दू नहीं है ,जो नाम के हिन्दू हैं , लेकिन उनके असली बाप का नाम उनकी माँ भी नहीं बता सकती , हिन्दुओं के दुश्मन यही लोग है l

थाई लैंड में राम कियेन पर आधारित नाटक और कठपुतलियों का प्रदर्शन देखना धार्मिक कार्य माना जाता है । राम कियेन के मुख्य पात्रों के नाम इस प्रकार हैं-

राम (राम), 2 लक (लक्ष्मण), 3 पाली (बाली), 4 सुक्रीप (सुग्रीव), 5 ओन्कोट (अंगद), 6 खोम्पून ( जाम्बवन्त ) ,7 बिपेक ( विभीषण ), 8 तोतस कन ( दशकण्ठ ) रावण, 9 सदायु ( जटायु ), 10 सुपन मच्छा ( शूर्पणखा ) 11मारित ( मारीच ),12इन्द्रचित ( इंद्रजीत )मेघनाद , 13 फ्र पाई( वायुदेव ), इत्यादि । थाई राम कियेन में हनुमान की पुत्री और विभीषण की पत्नी का नाम भी है, जो यहाँ के लोग नहीं जानते l

थाईलैंड का राष्ट्रीय चिन्ह गरुड़
गरुड़ एक बड़े आकार का पक्षी है , जो लगभग लुप्त हो गया है l अंगरेजी में इसे ब्राह्मणी पक्षी (The brahminy kite ) कहा जाता है , इसका वैज्ञानिक नाम “Haliastur indus ” है । फ्रैंच पक्षी विशेषज्ञ मथुरिन जैक्स ब्रिसन ने इसे सन 1760 में पहली बार देखा था, और इसका नाम Falco indus रख दिया था, इसने दक्षिण भारत के पाण्डिचेरी शहर के पहाड़ों में गरुड़ देखा था । इस से सिद्ध होता है कि गरुड़ काल्पनिक पक्षी नहीं है । इसीलिए भारतीय पौराणिक ग्रंथों में गरुड़ को विष्णु का वाहन माना गया है । चूँकि राम विष्णु के अवतार हैं , और थाईलैंड के राजा राम के वंशज है , और बौद्ध होने पर भी हिन्दू धर्म पर अटूट आस्था रखते हैं , इसलिए उन्होंने ” गरुड़ ” को राष्ट्रीय चिन्ह घोषित किया है । यहां तक कि थाई संसद के सामने गरुड़ बना हुआ है।

सुवर्णभूमि हवाई अड्डा
हम इसे हिन्दुओं की कमजोरी समझें या दुर्भाग्य , क्योंकि हिन्दू बहुल देश होने पर भी देश के कई शहरों के नाम मुस्लिम हमलावरों या बादशाहों के नामों पर हैं l यहाँ ताकि राजधानी दिल्ली के मुख्य मार्गों के नाम तक मुग़ल शाशकों के नाम पार हैं l जैसे हुमायूँ रोड , अकबर रोड , औरंगजेब रोड इत्यादि , इसके विपरीत थाईलैंड की राजधानी के हवाई अड्डे का नाम सुवर्ण भूमि है। यह आकार के मुताबिक दुनिया का दूसरे नंबर का एयर पोर्ट है । इसका क्षेत्रफल 563,000 स्क्वेअर मीटर है। इसके स्वागत हाल के अंदर समुद्र मंथन का दृश्य बना हुआ है। पौराणिक कथा के अनुसार देवोँ और ससुरों ने अमृत निकालने के लिए समुद्र का मंथन किया था l इसके लिए रस्सी के लिए वासुकि नाग, मथानी के लिए मेरु पर्वत का प्रयोग किया था l नाग के फन की तरफ असुर और पुंछ की तरफ देवता थेl मथानी को स्थिर रखने के लिए कच्छप के रूप में विष्णु थेl जो भी व्यक्ति इस ऐयर पोर्ट के हॉल जाता है वह यह दृश्य देख कर मन्त्र मुग्ध हो जाता है।

इस लेख का उदेश्य लोगों को यह बताना है कि असली सेकुलरज्म क्या होता है, यह थाईलैंड से सीखो। अपने धर्म की उपेक्षा करके और दुश्मनों की चाटुकारी करके सेकुलर बनने से तो मर जाना ही श्रेष्ठ है। और जिन लोगों को खुद के राम भक्त होने पर गर्व है ! विचार करें !

साभार : संजय द्विवेदी

या पृथ्वी सच में शेषनाग पर टिकी हुई है ? क्या है इसका वैज्ञानिक रहस्य ?

क्या पृथ्वी सच में शेषनाग पर टिकी हुई है ? क्या है इसका वैज्ञानिक रहस्य ?


क्या पृथ्वी सच में शेषनाग पर टिकी हुई है ? चंद्रमा, आंतरिक्ष-स्टेशनो और सेट्लाइट से लिये गये पृथ्वी के फोटो में तो कोई भी शेषनाग (सर्प) दिखाई नहीं देते है फिर पुराणों और ग्रंथों में ऐसा क्यों कहा गया है कि पृथ्वी शेषनाग पर टिकी हुई है ?


इस विषय में श्रीरामचरित्रमानस, यथार्थ-गीता और भागवत-पुराण तीनों में बात की गयी है । यथार्थ-गीता के 10 अध्याय के 29 वे श्लोक के अनुसार, भागवत-पुराण में यह बताया गया है कि ‘पृथ्वी सरसों की दाने की तरह शेषनाग-नामक सर्प के ऊपर टिकी हुई है’ ।


इसी विषय में श्रीरामचरित्रमानस के बालकांड-दोहा-72 के दूसरे चौपाई में आया है कि :- …
तपबल संभु करहिं संघारा । तपबल सेषु धरइ महिभारा ॥ भावार्थ:- शेषजी तप के बल से ही पृथ्वी का भार धारण करते हैं॥2॥…….. ….. .


इस विषय का वैज्ञानिक तर्क निम्न प्रकार से है । हमारी पृथ्वी, 8 ग्रहों और सूर्य सहित सौरमंडल में स्थित है । यह सौरमंडल, अनेकों तारों सहित आकाशगंगा नामक मंदाकिनी में स्थित है । इस आकाशगंगा नामक मदाकिनी का आकार सर्पिलाकार (सर्प+अकार) है । शेषनाग वास्तव में तों एक सर्प ही तो है । हम सभी इस मंदाकिनी के शिकारी भुजा अर्थात मुख (ओरायन-सिग्रस) के पास स्थित है ।


हमारे सत्य-सनातन-धर्म के ॠषि-मुनी, आज के वैज्ञानिकों से अधिक ज्ञाता और योग्य थे । वे अपनी शक्ति से इस पृथ्वी लोक को छोड़कर अन्य लोकों में (एलियन-लोक) में विचरण करने में सक्षम थे । वे इस मंदाकिनी से बाहर जाकर, अकाशगंगा और पृथ्वी के स्थिति और अकार को स्पस्ट रुप में देखने में पुर्णतः सक्षम थे । वह यह भी देख सकते थे कि सर्प के अकार रुपी मंदाकिनी में, पृथ्वी सरसों के दाने की भाँति प्रतीत हो रही है ।


सौरमंडल के आकार औऱ मन्दाकिनी के आकार के संदर्भ में विज्ञान में आया है कि यदि सौरमण्डल को एक रुपया का सिक्का मान लिया जाय तो मन्दाकिनी का क्षेत्रफ़ल सम्पूर्ण भारत का 1.5 गुना होगा । इस अनुपात को शास्त्र भी मानता है ।


अकाशगंगा और पृथ्वी के इस अदभुत संरचना को असानी से समझाने के लिये, हमारे महर्षियों ने सर्प-माडल (शेषनाग-माडल) का नाम दे दिया था जैसे कि परमाणु-संरचना को समझाने के लिये जेजे टामसन ने तरबूज-माडल का नाम दे दिया था ।

Does the earth really rest on Sheshnag? What is its scientific secret?


Does the earth really rest on Sheshnag? No Sheshnag (serpent) is visible in the photos of the Earth taken from the Moon, Inner-stations and Satellites, then why is it said in the Puranas and texts that the Earth rests on Sheshnag?


This subject has been talked about in all three of Shri Ramcharitmanas, Reality-Gita and Bhagwat-Purana. According to the 29th verse of Chapter 10 of the Reality-Gita, it has been told in the Bhagavata-Purana that ‘the earth rests like a grain of mustard on a serpent named Sheshnag’.


In this subject it has come in the second chapter of Balkand-Doha-72 of Shri Ramcharitmanas that :- …
Tapabal sambhu karhin sanghara. Tapbal Seshu Dharai Mahibhara. Meaning:- Sheshji bears the weight of the earth only by the power of tenacity.


The scientific reasoning for this topic is as follows. Our Earth is located in the Solar System including 8 planets and the Sun. This solar system, with many stars, is located in a galaxy called a galaxy. The shape of this galaxy named Madakini is spiral (snake + shape). Sheshnag is actually a snake. All of us are situated near the hunter arm of this galaxy, that is, the mouth (Orion-Sigus).


The sages of our Satya-Sanatan-Dharma were more knowledgeable and capable than today's scientists. With his power, he was able to leave this earth and roam in other worlds (alien-lokas). He was able to go out of this galaxy and see clearly the position and size of the galaxy and the earth. He could also see that in the snake-shaped Mandakini, the earth looked like a mustard seed.


In the context of the size of the solar system and the size of the Mandakini, it has come in science that if the solar system is considered to be a one rupee coin, then the area of ​​the Mandakini will be 1.5 times that of the whole of India. Shastra also accepts this ratio.


To explain this amazing structure of galaxy and earth easily, our sages gave the name of snake-model (Sheshnag-model) like JJ Thomson gave the name of watermelon-model to explain atomic structure. .